21 दिसंबर 2013

दोस्तों से डर लगे







राजेश त्रिपाठी
रहबर कभी थे आजकल राहजन होने लगे।
मूल्य सारे क्यों भला इस तरह खोने लगे।।
स्वार्थ की आग में जल गयी इनसानियत।
दुश्मनों की कौन पूछे दोस्तों से डर लगे।।

जमीं पर था कभी अब आसमां को चूमता।
उसको इनसानियत का पाठ बेमानी लगे।।
झोंपड़ी सहमी हुई है, बंगले तने शान से।
ये तरक्की की तो हमें बस लंतरानी लगे।।

आपने देखा अपना आज का ये हिंदोस्तां।
हर तरफ मुफलिसी औ गम के मेले लगे।।
कोई मालामाल तो कर रहा है फांके कोई।
ख्वाब गांधी का तो अब यहां फानी लगे।।

हर तरफ नफऱत रवां है, आदमी बेजार है।
प्यार लेता सिंसकियां दुश्मनी हंसती लगे।।
हम भला क्या कहें अब सारा जहां बीमार है।
मुल्क में लोग खौफ के ख्वाब हैं बोने लगे।।

पाठ समता का कभी जिसने पढ़ाया खो गया।
सुख की सोये नींद कोई कोई कर रहा रतजगे।।
दुनिया में जो था आला आज वह बदहाल है।
ये खुशी तो है नहीं हंसता आदमी रोने लगे।।



11 दिसंबर 2013

 हे मां तुझे प्रणाम PDF Print Write e-mail
राजेश त्रिपाठी
अपने लिए कभी न सोचा, बस सदा किया उपकार।
बदले में कुछ न चाहा तूने, बस बांटा केवल प्यार ।।
मेरी सुख-नींद की खातिर, रात-रात भर मां तू जागी।
दुनिया की हर खुशी मुझे दी, खुशियां अपनी त्यागीं।।
जग के झंझावात झेल कर, दिया हमेशा मुझे सहारा।
मेरे गिर्द बस रहा हमेशा, ऐ मां सुंदर संसार तुम्हारा।।
तेरे दुलार का तेरे प्यार का, कर्ज है मुझ पर माता।
कैसे उसे चुकाऊंगा मैं, समझ नहीं कुछ आता ।।
मां  से  बड़ी कोई मूरत है, यह मैं कभी ना मानूं ।
इससे  प्यारी सूरत दुनिया में, दूजी मैं न जानूं ।।
मां की  आंखें चंदा सूरज, मां के कदम में जन्नत।
मां की  पूजा से बढ़ कर, दूजी कोई न मन्नत।।
मैंने की  गलती तो तूने, हंस कर सदा था टाला।
खुद की  सुध भूल के तूने, मुझको ऐसा पाला।।
आज  मैं जो  कुछ बन पाया, है तेरा आशीष।
ईश से  आगे सदा  मैं माता तुझे नवाता शीष।।
तुममें मंदिर  मसजिद देखे, देखा और शिवाला।
तेरा आसन  दिल में मेरे, कोई न लेनेवाला ।।
तुममें  मेरे  कृष्ण विराजें, और विराजें राम।
तुममें  मेरे  सारे तीरथ,  हे मां तुम्हें प्रणाम।।