27 जुलाई 2014

एक गजल




हर शख्स तो बिकता नहीं है
·        राजेश त्रिपाठी
खुद को जो मान बैठे हैं खुदा ये जान लें।
ये सिर इबादत के सिवा झुकता नहीं है।।

वो और होंगे, कौड़ियों के मोल जो बिक गये।
पर जहां में हर शख्स तो बिकता नहीं है।।

दर्दे जिंदगी का बयां कोई महरूम करेगा।
यह खाये-अघाये चेहरों पे दिखता नहीं है।।

पैसे से न तुलता हो जो इस जहान में ।
लगता है अब ऐसा कोई रिश्ता नहीं है।।

जिनके मकां चांदी के , बिस्तर हैं सोने के।
उन्हें इक गरीब का दुख दिखता नहीं है।।

इक कदम चल कर जो मुश्किलों से हार गये।
उन्हें मंजिले मकसूद का पता मिलता नहीं है।।

वो और होंगे जो निगाहों में तेरी खो गये।
जिंदगी के जद्दोजेहद में, प्यार अब टिकता नहीं है।।

मत भागिए दौलत, शोहरत की चाह में।
तकदीर से ज्यादा यहां मिलता नहीं है।।

सुहाने ख्वाब दिखा ऊंची कुरसियों में बैठ गये।
लगता है उनका मजलूम के दर्द से रिश्ता नहीं है।।


यह अंधेरा दिन ब दिन घना होता जा रहा है मगर।
उम्मीद का सूरज हमें अब तलक दिखता नहीं है।।


आइए अब तो हम ही कोई जतन करें।
मंजिलों तक जो ले जाये राहबर दिखता नहीं है।।

आपाधापी मशक्कत में ना यों बेजार हों।
यहां किसी को मुकम्मल जहां मिलता नहीं है।।

चाहे जितने पैंतरे या दांव-पेंच खेले मगर।
किस्मत पे किसी का दांव तो चलता नहीं है।।

चाहे कुछ भी हो हौसला अपना बुलंद रखिएगा।
हौसला ही पस्त हो तो काम फिर बनता नहीं है।।



23 जुलाई 2014

एक गजल

प्यार की बातें करें
राजेश त्रिपाठी
 
सिर्फ लफ्फाजी हुई है अब तलक।
आइए अब काम की बातें करें।।
कदम तो उठ गये जानिबे मंजिल मगर।
पेशेनजर है जो उस तूफान की बातें करें।।
कोठियों में तो रोशनी चौबीस घंटे है।
अब जरा झोंपड़ी की शाम की बातें करें।।
रेप, मर्डर, लूट का अब बोलबाला है जहां।
शांति के उस दूत हिंदोस्तां की बातें करें।।
योग्यता है पस्त, चमचों की चांदी हो जहां।
नये इस आगाज के अंजाम की बातें करें।।
मेहनतकशों के पसीने के गारे से बनी हैं कोठियां।
फुटपाथ पर जिसका हो बसर,अवाम की बातें करें।।
हर सिम्त, हर शख्स के हाथों में खंजर है जहां।
नफरतों के उस बियबां में, प्यार की बातें करें।।
स्वार्थ के साये में जहां, पिस रही है जिंदगी।
उस बुरे हालात में, उपकार की बातें करें।।
मजहब के नाम पर जो, मुल्क को बांटा किये।
आइए अब तो उसके, परिणाम की बातें करें।।
जुल्म सहते रहे जो, मुसलसल मुल्क में।
उनके सीने में घुमड़ते, तूफान की बातें करें।।
एक मकसद, एक जज्बा, एकता का संदेश दे।
आइए अब उस पयामे, खास की बातें करें।।
देश के हालात , बद से बदतर हो रहे।
हालात ये बदलें, आओ अब ऐसी  बात करें।।
हाथ में ले फूल, दोस्ती हम चाहते।
एक ऐसा मुल्क, पीठ पीछे जो घातें करे।।
लिखने से हालात अब बदलेंगे नहीं।
फिर भला क्यों हम बेकार की बातें करें।।
फर्ज समझा इसलिए यह लिख दिया।
आपका क्या, आप बस बहार की बातें करें।।
आग ये आपके दामन तक  पहुंचेगी हुजूर।
आइए अब मुल्क के उद्धार की बातें करें।।

पलकों मे बंद तुम्हारी छवि -- साधना वैद


पता नहीं क्यों
पलकों मे बंद तुम्हारी छवि
मेरी आँखों में चुभ सी क्यों जाती है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे जुड़ी हर बात
छलावे के प्रतिमानों की याद क्यों दिला जाती है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे जुड़ी हर याद
गहराई तक अंतर को खरोंच क्यों जाती है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे मिलने के बाद
आस्था अपना औचित्य खो क्यों बैठी है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे मिले हर अनुभव के बाद
विश्वास की परिभाषा बदली सी क्यों लगती है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे बिछुड़ने के बाद
हार की टीस की जगह जीत का दर्द क्यों सालता है ?
पता नहीं क्यों
तुम्हें देखने की तीव्र लालसा के बाद भी
आँखे खोलने से मन क्यों डरता है ?
पता नहीं क्यों
सालों पहले तुम्हारे दिये ज़ख्म
पर्त दर पर्त आज तक हरे से क्यों लगते हैं ?
पता नहीं क्यों
जीवन के सारे अनुत्तरित प्रश्न
उम्र के इस मुकाम पर आकर भी
अनसुलझे ही क्यों रह जाते हैं ?
पता नहीं क्यों ....!!

लेखक परिचय -- साधना वैद


19 जुलाई 2014

मृत्यु


उसकी उमर ही क्या है !
मेरे ही सामने की
उसकी पैदाइश है !
पीछे लगी रहती है मेरे
कि टूअर-टापर वह
मुहल्ले के रिश्ते से मेरी बहन है !

चौके में रहती हूँ तो
सामने मार कर आलथी-पालथी
आटे की लोई से चिड़िया बनाती है !
आग की लपट जैसी उसकी जटाएँ
मुझ से सुलझती नहीं लेकिन
पेशानी पर उसकी
इधर-उधर बिखरी
दीखती हैं कितनी सुंदर !

एक बूंद चम-चम पसीने की
गुलियाती है धीरे-धीरे पर
टपके- इसके पहले
झट पोंछ लेती है उसको वह
आस्तीन से अपने ढोल-ढकर कुरते के !
कम से कम पच्चीस बार

इसी तरह
हमको बचाने की कोशिश करती है।
हमारे टपकने के पहले !
कभी कभी वह
लगा देती है झाड़ू घरों में!
जिनके कोई नहीं होता-
उन कातर वृद्धाओं की
कर देती है जम कर खूब तेल-मालिश।
दिन-दिन भर उनसे बतियाती है जो सो !

जब किसी को ओठ गोल किए
कुछ बोलते देखें गडमड-
समझ लें- वह खड़ी है वहीं
या ऊंघ रही है वहीं खटिया के नीचे-
छोटा-सा पिल्ला गोद में लिये !
बडे़ रोब से घूमती है वह
इस पूरे कायनात में।
लोग अनदेखा कर देते हैं उसको
पर उससे क्या?
वह तो है लोगों की परछाईं !
और इस बात से किसको होगा भला इनकार
आप लांघ सकते हैं सातों समुंदर
बस अपनी परछाईं नहीं लांघ सकते ।

.....रचनाकारा श्रीमति अनामिका...

17 जुलाई 2014

कुत्तो की पंचायत (एक सामाजिक ब्यंग रचना )




एक कुत्ता दूसरे कुत्ते से भिड गया ,
उसके आदमी संबोधन से चिढ गया |
बोला तुम्हारी जबान बढ़ गयी है ,
या दारू पिए हो जो चढ़ गयी ||

वह गुर्राया दूजे से लड़ने लगा ,
दूसरे का पाला कमजोर पड़ने लगा
तब तक दूजे का भाई सुखिया आ गया
बात बढती कुत्तो का मुखिया आ गया |

मुखिया के समझाने पर वह मान गया
लेकिन अगले दिन पंचायत ठान गया ,
बोला विरादरी में तेरी शिकायत होगी
तूने मुझे आदमी कहा पंचायत होगी |

अगले दिन इलाके में डुग्गी लगाई गयी
गांव के बागीचे में पंचायत बुलाई गयी ,

कालू ,लालू , भूरा ,झबरा ,और टाइगर पंच आये
मुखिया के साथ कुत्तो के सरपंच आये ,
पुराना मुखिया पूंछ का भुंडा भी आया
साथ ही नया पंच मूंछ मुंडा भी आया ||

पंचो के आदेश पर वादी के पास सिपाही मूछा गया
सिकायत के बारे में तफसील से पूछा गया ,
वादी का नाक भौ था चढ़ा हुआ
आँखे तरेर गुर्राता वह खड़ा हुआ |

प्रतिवादी को देखा गुस्से से मुख खोला
पंचायत की लाज रखी संभल कर बोला ,

जहाँपनाह !
इसने मुझे आदमी कहा बदनाम किया है
मेरी गैरत को ललकारा है ,मेरी स्वामिभक्ति
पर ऊँगली उठाई है ..............................|

मै आप सबको आदमी नजर आता हूँ?
क्या मै कभी हराम की खाता हूँ?
हम टुकडो की लालच में दर दर जाते है ,
लेकिन क्या उसके बदले फर्ज नहीं निभाते है ||

हम अपनी वफादारी पर दाग नहीं लगाते
कभी अपने भाई के घर आग नहीं लगाते ,
हम वह करते है जो हरिसन के ताले नहीं करते
सब जानते है हम कोई घोटाले नहीं करते ||

हम आज खाते आज की बात करते है
अपनों से नहीं कोई घात करते है,
टुकडो पर ही अपना पेट पाल लेते है
नहीं मिला तो जूठन ही डाल लेते है||

हमें गर्व है !
हम आज की सोचते कल की नहीं सोचते
दिल्ली सी किसी कुतिया को नहीं नोचते ,
किसी कुतिया को डिब्बे का दूध पिलाते देखा है ?
या दहेज़ के लिए डायन कह बहु जलाते देखा है ?

हम डायन , भूत और जंतर नहीं मानते,
उनकी तरह बेटा- बेटी में अंतर नहीं मानते,
हमे कभी झूठ का गीत गाते देखा है ?
या चारा ,यूरिया,ताबूत खाते देखा है ?

जब हमारी सरहद में दूसरा कुत्ता आता है
हम उसे बेसक भगा देते है,
लेकिन हम कभी नहीं अपने कुत्तेपन को
दगा देते है ||

माना बाताकही होती है होता झगड़ा भी है
कभी लातामुक्की कभी थोडा तगड़ा भी है ,
लेकिन हम सरहद बाँटते है दिल नहीं बाँटते
दाँत काटते है किसी का सिर नहीं काटते ||

हमारा नेता बिरादरी की शान समझता है
आदमी का नेता तो खुद को भगवान समझता है,
हमारे पास गाड़ी , बंगला ,कार नहीं है
लेकिन हमें इसकी दरकार नहीं है ||

हम खुले आसमान के नीचे रह लेते है
जाड़ा ,गर्मी ,बरसात भी सह लेते है ,
हम अपनी कौम की बर्बादी का दम नहीं बनाते
आदमी की तरह विनासक बम नहीं बनाते ||

मान्यवर ,
अब आप ही बताये ये संबोधन मेरे लिए जाली नहीं है?
क्या आदमी कहना किसी कुत्ते के लिए गाली नहीं है?

अगर इसे सजा नहीं मिली तो हमारी कौम का हौसला
भी पस्त हो जायेगा ,
अपनी बिरादरी में भी न्याय का सूर्य अस्त हो जायेगा //

अब पंचो ने कुछ कहा आपस में कुछ भुनभुनाया ,
चिंतन के बाद पंचायत ने अपना फैसला सुनाया :-
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पंचायत का फैसला
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वादी के तर्क सही है सत्य है
पंचो के भी तर्क है कुछ कथ्य है ,
"
आदमी के दो रूप है या दो भाग है
एक इन्सान दूसरा शैतान रूपी नाग है |

इन्सान जिससे आदमियत अभी जिन्दा है
दूसरा आदमी के रूप में दरिंदा है ,
हमारी आँखे इसी से तो नम है
पहले की संख्या दुसरे से कम है |

इसलिए पहले पर दूसरा हावी है
दूजे का मुख खुला पहले पर जाबी है ,
यही पंचो के निर्णय का तथ्य है
वास्तव में वादी का कथन सत्य है |

वादी के लिए आदमी संबोधन जाली है
किसी कुत्ते को आदमी कहना गाली है |<><>|

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सबको सचेत किया जाता है और पंचायत यह हुक्म देती है <>

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टोपी को टोपी रहने दो .जूते को जूता रहने दो @@@@
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आदमी को आदमी रहने दो .कुत्ते को कुत्ता रहने दो @

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रचनाकार:-संतोष कुमार श्रीवास्तव "तनहा "