26 अगस्त 2014

पीछे मुडकर देखना जिंदगी को -- आशा जोगळेकर :)

 @फोटो : गूगल से साभार

अब अच्छा लगता है
देखना जिंदगी को
पीछे मुडकर।

जब पहुंच गया है
मंजिल के पास
अपना ये सफर।

क्या पाया हमने
क्या खोया
सोचे क्यूं कर।

अच्छे से ही
कट गये सब
शामो सहर।

सुख में हंस दिये
दुख में रो लिये
इन्सां बन कर।

कुछ दिया किसी को
कुछ लिया
हिसाब बराबर....!!!

 लेखक परिचय -- स्वप्नरंजिता ब्लॉग से आशा जोगळेकर   



21 अगस्त 2014

खाली पड़ा कैनवास -- शिवनाथ कुमार :)


@फोटो : गूगल से साभार

उस खाली पड़े कैनवास  पर
हर रोज सोचता हूँ
एक तस्वीर उकेरूँ
कुछ ऐसे रंग भरूँ
जो अद्वितीय हो
पर कौन सी तस्वीर बनाऊँ
जो हो अलग सबसे हटकर
अद्वितीय और अनोखी
इसी सोच में बस गुम हो जाता हूँ
ब्रश और रंग लिए हाथों में
पर उस तस्वीर की तस्वीर
नहीं उतरती मेरे मन में
जो उतार सकूँ कैनवास पर
वह रिक्त पड़ा कैनवास
बस ताकता रहता है मुझे हर वक्त
एक खामोश प्रश्न लिए
और मैं
मैं ढूँढने लगता हूँ जवाब
पर जवाब ...
जवाब अभी तक मिला नहीं
तस्वीर अभी तक उतरी नहीं
मेरे मन में
और वह खाली पड़ा कैनवास
आज भी देख रहा है मुझे
अपनी सूनी आँखों में खामोशी लिए  !!


 लेखक परिचय - शिवनाथ कुमार

17 अगस्त 2014

ईश सब सन्ताप हरने को प्रकट होता तभी---द्विवेदी गजपुरी




पाप से सद्धर्म छिप जाता जगत में जब कभी
ईश सब सन्ताप हरने को प्रकट होता तभी
धर्म-रक्षा हेतु करके दुर्जनों का सर्वनाश
दूर कर संसार का तम सत्य का करता विकाश
इस तरह अवतार लेता विश्व में विश्वेश है
शेष रहता फिर कहाँ आपत्ति का लवलेश है
कंस ने उत्पात भारी जब मचाया था यहाँ
द्यूतकारी मद्यपी धन लूटता पाता जहाँ
डर उसे था हर घड़ी श्रीकृष्ण के अवतार का
देवती को दुख मिला पतियुक्त कारागार का
भाद्र की कृष्णाष्टमी सब ओर छाया अंधकार
चञ्चला घनघोरमाला में चमकती बार बार
ज्योति निर्मल देवकी के गर्भ में हो भासमान
विश्वपति शिशुरूप में लाया गया गोकुल निदान
नन्द ने अपना समझ कर प्रेम से पाला उसे
इसलिए संसार कहता नन्द का लाला उसे
कृष्ण वंशी को बजा गायें चराता था कभी
दूध माखन चोर कर मन को चुराता था कभी
पूतना केशी तथा कंसादि का संहार कर
द्वारिका जाके बसाया देवद्विज का कष्ट हर
बात ही उलटी हुई हा! अब मुरारी हैं नहीं
अब हमारे बीच में व्रज का विहारी है नहीं
किन्तु उसका रूप सुन्दर है नहीं दिल से हटा
याद आती हाय! अब भी साँवली सुन्दर छटा
है मुझे विश्वास, फिर भी श्याम आवेगा कभी
मोहनेवाली मधुर बंशी बजावेगा कभी
पाप-तापों से हमें वह फिर छुड़ावेगा कभी
सर्व दु:खों को दयामय फिर मिटावेगा कभीमन्नन

’सरस्वती’ पत्रिका के हीरक जयंती विशेषांक में प्रकाशित

14 अगस्त 2014

शहीद की माँ / हरिवंशराय बच्चन

इसी घर से
एक दिन
शहीद का जनाज़ा निकला था,
तिरंगे में लिपटा,
हज़ारों की भीड़ में।
काँधा देने की होड़ में
सैकड़ो के कुर्ते फटे थे,
पुट्ठे छिले थे।
भारत माता की जय,
इंकलाब ज़िन्दाबाद,
अंग्रेजी सरकार मुर्दाबाद
के नारों में शहीद की माँ का रोदन
डूब गया था।
उसके आँसुओ की लड़ी
फूल, खील, बताशों की झडी में
छिप गई थी,
जनता चिल्लाई थी-
तेरा नाम सोने के अक्षरों में लिखा जाएगा।
गली किसी गर्व से
दिप गई थी।

इसी घर से
तीस बरस बाद
शहीद की माँ का जनाजा निकला है,
तिरंगे में लिपटा नहीं,
(क्योंकि वह ख़ास-ख़ास
लोगों के लिये विहित है)
केवल चार काँधों पर
राम नाम सत्य है
गोपाल नाम सत्य है
के पुराने नारों पर;
चर्चा है, बुढिया बे-सहारा थी,
जीवन के कष्टों से मुक्त हुई,
गली किसी राहत से
छुई छुई।

5 अगस्त 2014

शब्‍दों के रिश्‍ते हैं शब्‍दों से -- सदा जी :)


शब्‍दों के रिश्‍ते हैं
शब्‍दों से
कोई चलता है उँगली पकड़कर
साथ - साथ
कोई मुँह पे उँगली रख देता है
कोई चंचल है इतना
झट से जुबां पर आ जाता है
कोई मन ही मन  कुलबुलाता है
किसी शब्‍द को देखो कैसे खिलखिलाता है
....
दर्द के साये में शब्‍दों को
आंसू बहाते देखा है
शब्‍दों की नमी
इनकी कमी
गुमसुम भी शब्‍दों की द‍ुनिया होती है
कुछ अटके हैं ... कुछ राह भटके हैं
कितने भावो को समेटे ये
मेरे मन के आंगन में
अपना अस्तित्‍व तलाशते
सिसकते भी हैं
....
जब भी मैं उद‍ासियों से बात करती हूँ,
जाने कितनी खुशियों को
हताश करती हूँ
नन्‍हीं सी खुशी जब मारती है  किलकारी,
मन झूम जाता है उसके इस
चहकते भाव पर
फिर मैं  शब्‍दों की उँगली थाम
चलती हूँ हर हताश पल को
एक नई दिशा देने
कुछ शब्‍द साहस की पग‍डंडियों पर
दौड़ते हैं मेरे साथ-साथ
कुछ मुझसे बातें करते हैं
कुछ शिकायत करते हैं उदास मन की
कुछ गिला करते हैं औरों के बुरे बर्ताव का
मैं सबको बस धैर्य की गली में भेज
मन का दरवाजा बंद कर देती हूँ.....!!

लेखक परिचय -- सदा जी