29 अक्तूबर 2014

गजल


गर आप फरमाइश करें
-राजेश त्रिपाठी
हमने आज जलाये हैं, हौसलों के चिराग।
हवाओं से कहो, वे जोर आजमाइश करें।।

हम तो रियाया हैं, हमारी क्या बसर।
आप आका हैं, जो सात को सत्ताइश करें।।

झुनझुने की तरह , हम आगे-पीछे बजते रहे।
सजदे में झुक जायेंगे, गर आप फरमाइश करें।।

मुसलसल आपकी जफाओं ने, मारा है हमें।
कितने आंसू अब तक बहे, आप पैमाइश करें।।

हाथों को काम मुंह को निवाला मिलता रहे।
खुदारा आप बस इतनी तो गुंजाइश  करें।।

भूखे पेट जी रही है, देश की आधी अवाम।
और आप हैं कि शानो शौकत की नुमाइश करें।।

देश का अमनो अमान हो गया है काफूर।
आग है लगी हुई, आप वो करें जो तमाशाई करें।।



27 अक्तूबर 2014

ढलता हुआ सूरज नहीं देखा -- सदा जी


खोजते थे तुम पल कोई ऐसा 
जिसमें छिपी हो 
कोई खुशी मेरे लिए 
मैं हंसती जब भी खिलखिलाकर 
तुम्‍हारे लबों पर 
ये अल्‍फ़ाज होते थे 
जिन्‍दगी को जी रहा हूं मैं
ठिठकती ढलते सूरज को देखकर जब भी 
तो कहते तुम 
रूको एक तस्‍वीर लेने दो 
मैं कहती 
कभी उगते हुए सूरज के साथ  भी
देख लिया करो मुझे 
चिडि़यों की चहचहाहट  
मधुरता साथ लाती है 
तुम झेंपकर 
बात का रूख बदल देते थे 
कुछ देर ठहरते हैं 
बस चांद को आने दो छत पे 
जानते हो 
वो मंजर सारे अब भी 
वैसे हैं 
मेरी खुशियों को किसी की 
नजर लग गई है 
मैने बरसों से  
ढलता हुआ सूरज नहीं देखा ... !!



18 अक्तूबर 2014

आये थे तेरे शहर में -- साधना वैद


आये थे तेरे शहर में मेहमान की तरह,
लौटे हैं तेरे शहर से अनजान की तरह !

सोचा था हर एक फूल से बातें करेंगे हम,
हर फूल था मुझको तेरे हमनाम की तरह !

हर शख्स के चहरे में तुझे ढूँढते थे हम ,
वो हमनवां छिपा था क्यों बेनाम की तरह !

हर रहगुज़र पे चलते रहे इस उम्मीद पे,
यह तो चलेगी साथ में हमराह की तरह !

हर फूल था खामोश, हर एक शख्स अजनबी,
भटका किये हर राह पर गुमनाम की तरह !

अब सोचते हैं क्यों थी तेरी आरजू हमें,
जब तूने भुलाया था बुरे ख्वाब की तरह !

तू खुश रहे अपने फलक में आफताब बन,
हम भी सुकूँ से हैं ज़मीं पे ख़ाक की तरह !



14 अक्तूबर 2014

खुदा कि रजायें ..तय होती हैं -- वंदना सिंह


वफायें  ..जफ़ाएं   तय होती है 
इश्क में सजाएं  तय होती हैं 

पाना खोना हैं जीवन के पहलू 
खुदा की  रजाएं.. तय होती हैं 

ये माना... के गुनहगार हूँ मैं 
मगर कुछ खताएं तय होती हैं 

कोई मौसम सदा नहीं रहता 
जिन्दगी में हवाएं तय होती हैं 

होनी को चाहिए ...बहाना कोई 
अनहोनी कि वजहायें तय होती हैं !



4 अक्तूबर 2014

      साथी था अब अजनबी है-सुरेन्द्र भुटानी




मुल्क का मुल्क ही  अपनी यादाश्त खो बैठा है यहां
अब जो खिलाडी आया है वो अपना खेल दिखायेगा
तुम भी अपने दिलो-दिमाग़ की खिड़कियां बंद कर लो
वक़्त नहीं वक़्त का साया है तुम से क्या मेल बढ़ायेगा
ये मौसमी ना'रे हैं इनकी भी इक मीयाद होगी आखिर
फिलहाल साँसों के सिवा सब हमसफ़र तो छूट गये 
हर सुबह बदलता रहेगा ये ज़माना नित नए रंग अपने 
शोरीशे-हस्ती का इक  बहाना है सब रहबर तो लूट  गये
ले उडा  तमाम नींदें ,क्या ख़्वाब की ता'बीर देखोगे
सर-चश्मा-ए -ज़ुल्मत में अब  खुर्शीद की आमद क्या
रुदादे -ग़मे-वफ़ा से  लोगों के अफ़साने जुड़ते जायेंगे
झूठी चमक की शोहरत में अब  हुस्ने-दीद की आमद क्या
एक अजब सा खौफ बना रहेगा, अब ऐसी ही  दुश्वारी है
नीम सी कड़वी  बातों पे तुम्हे  अपने तंज़ करते रहना है
तुम अपने हो कर फिर अजनबी बने, ये रीत तो पुरानी है
गल्त वक़्त की मुलाक़ातों पे तुम्हे अपने तंज़ करते रहना है

3 अक्तूबर 2014

विजय दशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ :)


कविता मंच ब्लॉग की ओर से आप सभी ब्लोगर मित्रों को विजय दशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ .....!!

 -- संजय भास्कर