18 नवंबर 2014

अटक गया विचार-- बृजेश नीरज

माथे पर सलवटें;

आसमान पर जैसे

बादल का टुकड़ा थम गया हो;

समुद्र में

लहरें चलते रूक गयीं हों,

कोई ख्याल आकर अटक गया।

धकियाने की कोशिश बेकार,

सिर झटकने से भी

निशान नहीं जाते।

सावन के बादलों की तरह

घुमड़कर अटक जाता है

वहीं

उसी जगह

उसी बिन्दु पर।

काफी वजनी है;

सिर भारी हो चला

आंखें थक गईं,

पलकें बोझल।

सहा नहीं जाता

इस विचार का वजन।

आदत नहीं रही

इतना बोझ उठाने की;

अब तो घर का राशन भी

भार में इतना नहीं होता कि

आदत बनी रहे।

बहुत देर तक अटका रहा;

वह कोई तनख्वाह तो नहीं

झट खतम हो जाए।

अभी भी अटका है वहीं

सिर को भारी करता।

बहुत देर से कुछ नहीं सोचा।

सोचते हैं भी कहां

सोचते तो क्यों अटकता।

इस न सोचने,

न बोलने के कारण ही

अटक गयी है जिंदगी।

तालाब में फेंकी गई पालीथीन की तरह

तैर रहा है विचार

दिमाग में

सोच की अवरूद्ध धारा में मंडराता।

अब मजबूर हूं सोचने को

कैसे बहे धारा अविरल

फिर न अटके

सिर बोझिल करने वाला

कोई विचार।

- बृजेश नीरज

15 नवंबर 2014

सौ संस्कारों के ऊपर भारी मजबूरी एक - कुँवर जी

सौ संस्कारों के ऊपर भारी मजबूरी एक
आचरण बुरा ही सही पर है इरादे नेक!

खुद बोले खुद झुठलाये जो करे कह न पाए
अजब चलन चला जग में चक्कर में विवेक

भ्रष्टाचार से लड़ाई में हाल ये सामने आये
विजयी मुस्कान लिए सब रहे घुटने टेक!

मेहनत से डर कर खुद को मजबूर कहलवाए 
जब तक मौका न मिले तब तक है सब नेक!
 

7 नवंबर 2014

आम की खेती बबूल से करवायी है

हमने एक और ग़लती अपनायी है
आम की खेती बबूल से करवायी है

पिछले मौसम में गर्मी भ्रष्ट थी
अबके मात्र वादों की बाढ़ आयी है

कुबेर और भिखारी एक ही जानो 
भेद बतलाने में वादाखिलाफ़ी है

उसने मक्कारी से सही कमाई तो है
फ़िज़ूल में हाय हाय और दुहाई है

लूटने का मौसम आया, लूटेरे आयें
बाँझ मिट्टी की बोली लगने वाली है

हवा अब भी बेपरवाह है फिरती
कोई बताये उस पर भी शामत आयी है

शाख से झूलते मुर्झाये जिस्म ने बताया
इस इलाके में सूखे की कारवायी है

गर गूंगे हो 'शादाब' तो गूंगे रहो
जिसने मुँह खोला जान पे बन आयी है !

5 नवंबर 2014

हर रोज बैठे रहते हैं अकेले -- संध्या शर्मा


हर रोज बैठे रहते हैं अकेले 
कभी टी वी के निर्जीव चित्र देखते 
कभी मोटे चश्मे से अखबार छानते 
एक वक़्त था कि फुर्सत ही न थी 
एक पल उसकी बातें सुनने की
आज कितनी याद आती है वह 
वही सब मन ही मन दोहराते
बीच-बीच में नाती से कुछ कहते 
क्या कहा कोई सुनता नहीं 
अभी - अभी बहु ने गुस्से से 
ऐसे पटकी चाय की प्याली 
फूटी क्यों नहीं वही जानती होगी 
बेटों ने ऐसे कटाक्ष किये कि
जख्मों पर नमक पड़ गया  
तन-मन में सुलगती आग
फिर भी गूंजी एक आवाज़ 
"बेटा शाम को घर कब आएगा"
ठण्ड से कांपता बूढ़ा शरीर
सिहर उठता है रह-रह कर
अपनी ही आँखों के आगे  
अपने शब्द और अस्तित्व 
दोनों को  धूं -धूं करके
गुर्सी की आग में जलते देख 
जो उड़कर बिखर रहे हैं 
वक़्त क़ी निर्मम आंधी में 
कागज़ के टुकड़ों क़ी तरह...!!