30 जुलाई 2015

सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो एपीजे की अमर कहानी



राजेश त्रिपाठी
अपने लिए कभी ना सोचा देश के हित दे दी जिंदगानी।
सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो एपीजे की अमर कहानी ।।
एपीजे अब्दुल कलाम का बचपन से था सपना।
देश हित कुछ कर जायें ऐसे उठे कदम अपना।।
पुश्तैनी  पेशे  को  छोड़ा जोड़ा शिक्षा से नाता।
बढ़ते कदम देख बेटे के खुश हो गये पिता-माता।।
बचपन से ही बड़े सपने की शुरू हो गयी थी ये कहानी।
सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो एपीजे की अमर कहानी ।।
डीआरडीओ में रह कर काम किया था खास।
मिसाइल, परमाणु क्षेत्र में रचा एक इतिहास।।
भारत की  शक्ति बढ़ायी और बढ़ाया मान ।
 सुविधा मिले स्वास्थ्य की, घर-घर पहुंचे ज्ञान।।
                                          वह अवश्य कर दिखलाया, मन में जो थी ठानी।
सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो एपीजे की अमर कहानी ।।
इक-इक पल उनका रहा ज्ञान के नाम।
अमर रखेगा उनको, उनका हर इक काम।।
 इक-इक शब्द प्रेरणा देता, भरता है उत्साह।
   यही सिखाया लगन अगर हो आसां होगी राह।।
जाति-धर्म से ऊपर उठ कर जो था सच्चा हिंदुस्तानी।
सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो एपीजे की अमर कहानी ।।
शिक्षा और विकास का कोई नहीं विकल्प।
 हर दिल में चाहिए आगे बढ़ने का संकल्प।।
थे एकाकी पर छोड़ गये बड़ा एक परिवार।
उनको खोकर देश ये पूरा रोया जार-जार।।
अब उनको थेलिखने पर दुख है आता आंखों में पानी।
सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो एपीजे की अमर कहानी ।।
विजन 2020 दिया देश को ताकि ये बने महान।
विश्व भर में नाम हो हर इक करे गुणगान ।।
भारत को आगे ले जाने का देख रहे थे सपना।
वह अवश्य पूरा हो अब यही ध्येय हो अपना ।।
                 उनके सपने साकार हों चहुंदिश विकास को मिले रवानी ।
                सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो एपीजे की अमर कहानी ।।       
कलाम से सपूत को खोकर रोयी भारतमाता ।
ऐसा योग्य पुत्र धरा पर सदियों में है आता।।
चांद-सितारे  हैं  जब तक अमर रहेगा नाम।
 बच्चे-बूढ़े सबके प्यारे अंतिम तुम्हें सलाम ।।
 वो मिसाइल मैन हमारा, अनुपम जिसकी जिंदगानी।।
सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो एपीजे की अमर कहानी ।।














27 जुलाई 2015

यादों में अब तक जीवित है प्यारा-सा वह गांव


­-राजेश त्रिपाठी

वह पनघट के गीत और बट की ठंडी छांव
यादों में अब तक जीवित है प्यारा-सा वह गांव।
                                     
अलस्सुबह जब मां पीसा करती जांत।
साथ-साथ दोहराती जाती परभाती की पांत।
जागिए रघुनाथ कुंअर पंछी बन बोले।
रवि की किरण उदय भयी पल्लव दृग डोले।।
    फगुआ की जब तान पर थिरका करते थे पांव।
    यादों में अब तक जीवित है ......
तारे छिटके आसमान पर धरती पर हरियाली।
डाल-डाल पर जहां कुहकती कोयलिया थी काली।।
महुआ की मदमस्त महक से महका करती भोर।
पावस में जहां नाचा करते होके मगन मन मोर।।
   मंगता से लेकर हर इक को मिलती जहां थी ठांव।
   यादों में अब तक जीवित है ......
हलधर जहां खेतों पर बोते थे अपनी तकदीर।
जाड़ा, गरमी या बारिश हो सहते थे हर पीर।।
यही टेर लगाते थे बरसो राम झमाझम पानी।
फसल होय भरपूर, चमक  जाये जिंदगानी ।।
  बिटिया को घाघरा चाहिए नंगे बापू के पांव।
                                     
  यादों में अब तक जीवित है प्यारा–सा वह गांव
                                     
    टेसू के फूलों के रंग से जहां मना करती थी होली।
   मनभावन कितनी लगती थी देवर-भाभी की ठिठोली।।
   राखी, कजरी, तीज त्योहार जहां आते लेकर खुशहाली।
   खेतों में लहलहाती किस्मत कूके कोयल डाली डाली।।
उस गांव तक पसर गये हैं अब आतंक के पांव।
यादों में अब  तक  जीवित  है प्यारा–सा वह गांव        
        सांझ-सकारे करे महाजन हर घर का फेरा।
    जहां जवान बहुरिया देखे डाले वहीं डेरा ।।
     कहने को हिसाब करे, आंखों से कुछ नापे।
     उसकी लोभी नजर देख,जियरा थर-थर कांपे।।
     पहले जैसा रहा कहां अब सपनो का वह गांव
  यादों में अब तक जीवित है प्यारा–सा वह गांव
  
   सालों पहले घुरहू के दादा ने रुपये लिये उधार।
   बंधुआ बनीं चार  पीढ़ियां पर ना चुका उधार।।
   जाने ऐसे कितने घुरहू सहते महाजनों की मार।
   जाने कब से चला आ रहा लूट का ये व्यापार।
जिसकी लाठी भैंस उसी की, चलता उसी का दांव।
यादों में अब  तक  जीवित  है प्यारा–सा वह गांव

   जहां चैन की वंशी बजती वहां चल रही गोली।
   नहीं सुनायी देती अब मनभावन प्यार की बोली।।
   सारे  रिश्ते-नातों  को  वहां दिया गया वनवास ।
   हर दिल में राज कर रही अब पैसे की प्यास ।।
शहरों की संस्कृति घुस बैठी अब मरने लगे हैं गांव।
यादों में अब तक जीवित है प्यारा–सा वह गांव
  
     देवीलाल  बेहाल  बहुत है  बढ़ता  जाता है कर्ज।
     दवा कहां से  करवाये बहुत पुराना बापू का मर्ज।।
     दिन-दिन जवान होती बिटिया, शोहदे घर में ताकें।
     लालच  से कमली का हर दिन रोम-रोम वे नापें।।
दूल्हे बिकते अब लाखों में कैसे पूजे बिटिया के पांव।

यादों में अब तक जीवित है प्यारा–सा वह गांव

20 जुलाई 2015

मैं स्त्री हूँ ....... मधुलिका पटेल



मैं स्त्री हूँ इसलिए मैं 
हर रिश्ते को काटती और बोती हूँ 
हर रिश्ते के रास्ते से मैं गुज़री हूँ 
हर रिश्ते को मैने जिया है
हर रिश्ते की कड़वाहट को मैंने पिया है
मैं एक स्त्री हूँ इसलिए मैंने 
फटे टूटे नए पुराने सभी रिश्ते सिए हैं 
सब रिश्तों को दम घुटने से बचाती हूँ
इसलिए पता नहीं मैं इस फेर में 
कितनी बार जीती और मर जाती हूँ 
कुछ रिश्ते ही सुख देते हैं 
बाकी सब तो घावों से दुख देते हैं 
पर मजबूरी सबको ढोना है
रिश्ते के ताने बांने का बिछौना है 
नीदं भले ना आए 
इसी पर हर स्त्री को सोना है |

लेखक परिचय -  मधुलिका पटेल 

16 जुलाई 2015

ऐ चांद ! मेरे महबूब से फ़क़्त इतना कहना...

ऐ चांद !
मेरे महबूब से फ़क़्त इतना कहना...
अब नहीं उठते हाथ
दुआ के लिए
तुम्हें पाने की ख़ातिर...

हमने
दिल की वीरानियों में
दफ़न कर दिया
उन सभी जज़्बात को
जो मचलते थे
तुम्हें पाने के लिए...

तुम्हें बेपनाह चाहने की
अपनी हर ख़्वाहिश को
फ़ना कर डाला...

अब नहीं देखती
सहर के सूरज को
जो तुम्हारा ही अक्स लगता था...

अब नहीं बरसतीं
मेरी आंखें
फुरक़त में तम्हारी
क्योंकि
दर्द की आग ने
अश्कों के समन्दर को
सहरा बना दिया...

अब कोई मंज़िल है
न कोई राह
और
न ही कोई हसरत रही
जीने की
लेकिन
तुमसे कोई शिकवा-शिकायत भी नहीं...

ऐ चांद !
मेरे महबूब से फ़क़्त इतना कहना...
-फ़िरदौस ख़ान

ईद का चांद देखकर...तुमसे मिलने की दुआ मांगी थी...


ईद का चांद देखकर
कभी दिल ने
तुमसे मिलने की
दुआ मांगी थी...

उसी लम्हा
कितने अश्क
मेरी आंखों में
भर आए थे...

ईद का चांद देखकर
कभी दिल ने
तुमसे मिलने की
दुआ मांगी थी...

उसी लम्हा
कितनी यादें मेरे तसव्वुर में
उभर आईं थीं...

ईद का चांद देखकर
कभी दिल ने
तुमसे मिलने की
दुआ मांगी थी...

उसी लम्हा
कितने ख़्वाब
इन्द्रधनुषी रंगों से
झिलमिला उठे थे...

ईद का चांद देखकर
कभी दिल ने
तुमसे मिलने की
दुआ मांगी थी...

उसी लम्हा
मेरी हथेलियों की हिना
ख़ुशी से
चहक उठी थी...

ईद का चांद देखकर
कभी दिल ने
तुमसे मिलने की
दुआ मांगी थी...

उसी लम्हा
शब की तन्हाई
सुर्ख़ गुलाबों-सी
महक उठी थी...

ईद का चांद देखकर
कभी दिल ने
तुमसे मिलने की
दुआ मांगी थी...
-फ़िरदौस ख़ान

तस्वीर गूगल से साभार