31 अगस्त 2015

सन्नाटा........दीपक सैनी

गहरा सन्नाटा है
शोर से पहले
और
शोर के बाद
जानते हुए भी
खोये रहते है इसी शोर में
हजारों पाप की गठरी लादे
चले जाते है
भूल कर उचित अनुचित
मगन रहते है
इसी शोर में
जो क्षणिक है
अन्जान  बने रहते है
उस सन्नाटे से
जो सत्य है
जो निश्चित है
हर शोर के बाद

लेखक परिचय - दीपक सैनी

25 अगस्त 2015

आँखों की नीलामी ......मधुलिका पटेल


कल बाज़ार में बड़ा शोर था
किस बात का हल्ला चारों ओर था
क्या किया तुम्ने ?
मैने कहा - कल मैने अपनी आँखें
बड़े अच्छे दामों में बेच दी
ये मेरी हैसियत से ज़्यादा
बड़े -बड़े सपने देखा करती थी
इस ज़माने में दाल - रोटी कमाने में
हौसला परास्त हो जाता है
ये जब देखती है
रात का अंधकार काले साए
अबला नारी चीख पुकार
अपहरण हत्या और अत्याचार
तब ये लाल हो जाती है
लहू के रगं सी
इनके लाल होने से मैं बहुत डर जाता हूं
क्योंकि ज़ुबान बदं रखना और
मुट्ठी को भिचें रखना पड़ता है
कसकर
वरना जुनून सवार हो जाता है
हर एक को आँखों के रंग में रंगने का
मैं कब से सोच रहा था
की इनके लाल होने से पहले
इनको बेच दूँगा
इसलिए मैने चुपचाप सौदा कर लिया
पर सौदा आखों का था न
इसलिए बड़ा शोर था
अब नई आँखें हैं
पत्थरों की तरह
न सपनें देखती न दुनिया की हलचल !

लेखक परिचय -  मधुलिका पटेल 


11 अगस्त 2015

शाख और पत्ता-अखिलेश...



टुटा शाख से पत्ता,
चला अपनी राह बनाने,
खुद की मेहनत से,
खुद को खुदा बनाने,
छोड़ फ़िक्र तरु की,
छोड़ यादें साथियों की,
चला पवन के साथ बतियाने,
टूट शाख से पत्ता,
चला अपनी राह बनाने|
कभी गति पवन ने दी,
कभी साथ मिला जलधारा का,
कभी स्थिरता को पाया,
कभी वेग था विचारों सा,
अपनी गति देख कर,
लगा था वो इठलाने,
टूट शाख से पत्ता ,
चला अपनी राह बनाने|
राहे आसाँ थी नहीं,
प्रकति पर निर्भर गति,
भय हमराही पशुओ से ,
पहुचा दे ना कोई क्षति,
मुश्किल राहों में ठहर,
जाने का डर अब,
था लगा सताने,
टूट शाख से पत्ता,
चला अपनी राह बनाने|
जीवन कितना था बाकि,
कितनी राहे थी बाकि,
बढ़ना था तीव्र गति से,
पर था कहाँ समय साथी,
समय चक्र तेज चलने लगा,
करीब अंत लगा था आने,
टूट शाख से पत्ता ,
चला अपनी राह बनाने|
अंत नियति है सबकी,
सभी को लगाया उसने गले,
माटी से मिल माटी में खो गया,
आज फिर शाख पर ,
देखो एक अंकुर उभर रहा,
बन अंकुर देखो फिर
शाख से जुड़ गया वो,
जो टूट शाख से,
चला था अपनी राह बनाने|
साभार...
Akhilesh जी के ब्लौग से...

6 अगस्त 2015

कविता

कलम

राजेश त्रिपाठी
कलम वो  है  लिख सकती है तकदीर भी।
कलम  वो  है  बन सकती है शमशीर भी।।
कलम  वो है जिसमें लहराता है सुख-सागर।
कलम  चाहे  तो भर दे गागर में ही सागर।।
कलम  चाहे  तो  पल  में  लगा दे जंग भी।
ये जुल्मियों के साथ भी, मजलूमों के संग भी।।
       है छोटी पर यह करती घाव नावक के तीर सी।
      ये लिखती है खुशी, कभी विरहिन की पीर भी।।
कलम के कितने पुजारी इसके चलते हो गये अमर।
इसने कभी संधि लिखी तो इसने ही करवाये समर।।
चाहे तो ये वीराने में गुलशन खिला दे, या दे खिजां।
है ये वो शै कि जिसके इशारे पर दिशा बदले फिजा।।
     यह कभी राजा तो कभी बन जाती फकीर है।
    धार जिसकी कुंद ना हो ये ऐसी शमशीर  है।।
              कलम  वह  है  ज्ञान और विज्ञान का आधार है।
              कलम का  क्या  कहें  यह  चला रही संसार है।।
              कलम  के  दिल में नफरत, भरा इसमें प्यार है।
              कलम की  दुनिया में खिजां, इसमें ही बहार ।।
                 कलम चाहे तो हंसा दे या ला दे आंखों में नीर भी।
                 दे सकती है सुख का संदेशा, गा सकती है पीर भी।।
              कलम  राजा  है,  है  रंक-सी, ये महान है।
              चाहे तो बंटाढार कर दे, ये इतनी बलवान है।।
              इससे  लखपति  पल  में  भिखारी  हो गये।
              किसी के सपने फले, भाग्य कुछ के सो गये।।
                   धरा  को  इसने  दिये थे, तुलसी और कबीर भी।
                   अर्श से फर्श पर ला सकती है, इसकी तहरीर भी।।






3 अगस्त 2015

हम क्या करें !


 राजेश त्रिपाठी
  
आदमी आदमी का बन गया दुश्मन,
 हाथों में फूल नहीं आ गये खंजर।।
सियासत का जहर इनसान को बांट रहा है,
 भाई भाई को किस कदर काट रहा है।।
        हालात बद से बदतर हो रहे क्या करें, 
        आइए अब मुल्क की बरबादी पे मातम करें।।
इक जमाना था गिरे को उठाते थे लोग।
किसी के घर गमी हो , मिलके मनाते थे सोग।।
क्या वक्त था, कितने आला प्यारे थे लोग।
हाय क्या वक्त है कितने बेरहम आवारे हैं लोग।।
           ले लुकाठी गर कोई अपना ही घर फूंका करे।
           आइए मिलके उसकी नादानी का मातम करें।।
    भाईचारा औ मोहब्बत अब तो कहानी हो गयी।
     नशे की अंधी सुरंग में अब जवानी  खो गयी।।
    सुदामा की बांह थामे  वो किशन अब हैं कहां।
गरीब, मजलूम  सांसत  से सिसकते हैं यहां।।
    हालात ऐसे हैं तो इस पर और हम क्या करें।
    आइए वक्त की इस मार का हम मातम करें।।
गांधी का नाम तो मोहब्बत  का नाम था।
सत्य, अहिंसा प्रेम ही जिसका पैगाम था।।
वो गया तो हिंदोस्तां क्या से क्या हो गया।
विश्वगुरु, शांतिदूत का स्वत्व जैसे खो गया।।
      इस आलमे तबाही में भला क्या सरगम करे।
     जो खो गया हम उसको बिसूरें, मातम करें।।
कभी इस देश के बाशिंदे सभी हिंदोस्तानी थे।
साथ थे, मिले हाथ थे मोहब्बत की कहानी थे।।
अब तो आदमी की धर्म से हो रही पहचान है।
जाने कितने फिरकों में बंटा गया हिंदोस्तान है।।
      सियासी जमातों ने जो किया उस पर हम क्या करें।
  आइए इऩ जख्मों को भरें, न सिर्फ हम मातम करें।।
मानाकि मुल्क के लिए सियासत भी जरूरी है।
पर यह  इसे बांटे ऐसी क्या कोई मजबूरी है।।
हर कौम मे सौहार्द्र हो, सब मिल कर काम करें।
हर इक का दर्द बांटनेवाला हो ऐसा कुछ राम करें।।
      मुल्क में अमनो अमान फिर से मकाम करे।
     तब  भ़ला  किस बात का हम मातम करें।।
उम्मीद पर दुनिया टिकी, हमको भी यह आस है।
जुल्म  ज्यादा  चलता  नहीं, साक्षी इतिहास है।।
फिर अमन, भाईचारे के फूल खिलेंगे बगिया में।
फिर हिंदोस्तान की यही पहचान होगी दुनिया में।।
      हर वर्ग, हर धर्म के लोग जहां गलबहियां करें।
      भला उस मुल्क में कोई किस बात का मातम करे।
      आमीन कहते हैं हम, आप भी सुम्मामीन करें।
     प्रेम का यह देश हो उम्मीद ऐसी हम सब करें।।