29 मई 2016

एक गजल

हाथ खाली हैं बिटिया सयानी हो गयी

राजेश त्रिपाठी

मुश्किलें हैं और जाने कितने अजाब हैं।
जिंदगी की बस इतनी कहानी हो गयी।।

अधूरे रह गये जाने कितने ख्वाब हैं।
मुश्किलों के हवाले जिंदगानी हो गयी।।

लाखों करोड़ों  में अब बिकते हैं दूल्हे ।
पावन परिणय की रवायत खो गयी ।।

दर्द कौन पढ़ सकता है उस शख्स का।
हाथ खाली हैं, बिटिया सयानी हो गयी।।

सियासत की चालों का है ऐसा असर।
हर गली कुरुक्षेत्र की कहानी हो गयी।।

नफरतों के गर्त में है अब जिंदगी ।
अमन तो अब बीती कहानी हो गयी।।

तरक्की का ढोल तो सब पीट रहे हैं ।
पर बद से बदतर जिंदगानी हो गयी।।

बढ़ रहे हैं अब दिलों के बीच फासले।
एकजहती तो अब बेमानी हो गयी।।

दिल में नफरत, हाथ में खंजर जहां।
अमन की बात इक कहानी हो गयी।।

अजाब=दुख, दर्द, पीड़ा



24 मई 2016

कुर्सी और आदमी....निर्मल गुप्त














गहरे भूरे रंग की जिल्द वाली
आरामदेह कुर्सी पर पसर
मुतमईन है वह
उसकी आँखें खोज रही हैं
कुर्सी को रखने के लिए
उचित उपयुक्त और निरापद जगह।

कुर्सी का मिल जाना 
एक खूंखार सपने की शुरुआत है
वह कुर्सी के पीठ पर टँगे तौलिये से
पोंछता जा रहा है हाथ
रंगे हाथों पकड़े जाने का अब कोई ख़ौफ़ नहीं।

कुर्सी में लगे हैं पहिये
घूमने की तकनीक से है लैस
वह उसके हत्थे को कस कर थामे है
उसे पता है कि कुर्सियाँ
अमूमन स्वामिभक्त नहीं होती। 

कुर्सी पर मौक़ा ताड़कर पसर जाना 
फिर भी है काफ़ी आसान
लेकिन बड़ा जटिल है
उसे अपने लायक़ बनाना
बड़ा मुश्किल है कुर्सी को
घोड़े की तरह सधा लेना।

कुर्सी पर बैठते ही आदमी
घिर जाता है उसके छिन जाने की 
तमाम तरह की आशंकाओं से
इस पर बैठ जाने के बाद
वह वैसा नहीं रह पाता
जैसा कभी वह था नया नकोर।









-निर्मल गुप्त
gupt.nirmal@gmail.com

17 मई 2016

अंजाम क्या होगा (ग़ज़ल)

                                                                                                        इस बेनाम चाहत का न जाने अंजाम क्या होगा 
बैचैन दिल को जो सुकून देगा उसका नाम क्या होगा 
निगाहें  ढूंढती  हैं  हरपल  उस  हमसफ़र  को 
कहीं मिल वो जाये तो उसका निशान क्या होगा 
नहीं हर किसी के सामने दिल की किताब है खुलती 
किसी बेवफा के सामने हाल ऐ दिल बयां क्या होगा 
जो दिल उनकी याद में जल कर राख हो चुका है 
भला वो इस बेदर्द ज़माने से परेशान क्या होगा 
एक लम्बी सी जिंदगी जिसने तनहा गुजार दी हो 
उसके सब्र का भला और इम्तहान  क्या  होगा 
क़यामत से ही बस इक उम्मीद बाकी हो जिसे 
फिर उसके लिए जहर से उम्दा जाम क्या होगा 
उनके इंतज़ार ने अब तक इस दिल को ज़िंदा रखा 
उनसे मिलने से अच्छा भला और पैगाम क्या होगा 

12 मई 2016

आखिर क्यों...............श्रीमती राजेश्वरी जोशी

    





    
                                            
आखिर क्यों होते हैं युद्ध?                                      
क्यों बोये जाते हैं बम ।                                         
क्यों लहलहाती है उसमें ,                                       
आतंक की फसल ।                                              
बीच  चौराहो पर जब ,                                       
फूटते हैं बम ।                                                          
छितरा जाती हैं चारों ओर,                                    
लाशें  ही लाशें ।                                           
हर ओर चीख पुकार ,                                                    
मातम ही मातम ।                                                
फैल जाता है सडकों पर ,                                    
बस खून ही खून ।                                                
पा जाते हैं चंद जमीनें ,                                        
मनाते हैं जीत का जश्न ।                                     
लेकिन सोचा है कभी ,                                        
क्या होगा इस युद्ध का अंत ।                                            
दमघोटू बम के धुएँ में ,                                        
क्या जी पाएंगे हम ।                                             
खून से भरा नदिया का जल ,
क्या पी पाएंगे हम ।                                
                                                   
             
-श्रीमती राजेश्वरी जोशी                                
उत्तराखण्ड भारत

5 मई 2016

आज की नारी...............कमला घटऔरा

आज की नारी
क्षमता है मुझ में
भरूँ उड़ान
दिखाऊँ ज्ञान गुण
नहीं अछूता
कोई कोना मुझ से
छू न पाऊँ मैं
'कल्पना' बन मैंने
छूआ था स्पेस
उच्च पदों पे बैठी
करती राज
जो सदियों से जानी
अबला गई
आज सबला बन
सम्भाले सीमा
सैनिक भेष धारे
खड़ी तैयार
आतंक मिटाने को
सशक्त बन
करने निगरानी
लाने को शान्ति
सीमाओं पर शत्रु
खड़े ताक में
बनाये देश द्रोही
बँटवारे की
पट्टी पढ़ाये, उन्हें
राह दिखाने
पथ भ्रष्ट हो गये
माँ के लालों को
मातृ भूमि महत्व
सिखाने हित
देश भक्ति के भाव
जगाये गी वो
गायें वन्दे मातरम्
हे ! जन्मभूमि
तेरी सदा जय हो
मिला के हाथ
चलेंगें अब साथ
होना पड़े न
जन्मदायिनी माँ को
लज्जित कभी
बिगड़े सपूतों को
नशे से हटा
राह उन्हे दिखाने
स्वदेश हित
आगे आयेगी नारी ।
धरा सी धैर्य धारी।









-कमला घटऔरा
kamla.gaura@gmail.com

4 मई 2016

मन का बंधन




बहुत हुआ सर झुका के बंदन 
अब खोल सारे मन के  बंधन 
कुंठित था तेरा मन सदा  से 
अब तो सुलझा ये उलझे धागे 
सांस सांस में घटता जीवन 
राम नाम से कर सिंचित उपवन 
मिटा अभिलाषा का अपूर्ण भ्रमण 
राम  समक्ष  कर  पूर्ण  समर्पण 
लेखा जोखा लाभ और  हानि 
भ्रमित करती मन की  मनमानी 
करता चल अब भला दूसरों का 
मिटेगा विषाद जो था बरसों का 
भीतर  के  इंसान  को  जगा 
मन से दूषित तम  को  भगा 
औरों को भी जगा तू  जागकर 
बूँद  बूँद  से  बनता  सागर 
साकार निर्विकार कोई भी  मूरत 
दिल में बसा तू सांवली सूरत 
नव प्रभात की है सुन्दर बेला 
बांध गठरी और  चल  अकेला 
चलता चल, नहीं विश्राम का ये काल 
अंतकाल कट जायेगा ये मायाजाल 
हितेश