29 जुलाई 2016

फिर सावन रुत की पवन चली / नासिर काज़मी

फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आये
फिर पत्तों की पाज़ेब बजी तुम याद आये
फिर कुँजें बोलीं घास के हरे समन्दर में
रुत आई पीले फूलों की तुम याद आये
फिर कागा बोला घर के सूने आँगन में
फिर अम्रत रस की बूँद पड़ी तुम याद आये
पहले तो मैं चीख़ के रोया फिर हँसने लगा
बादल गरजा बिजली चमकी तुम याद आये
दिन भर तो मैं दुनिया के धंधों में खोया रहा
जब दीवारों से धूप ढली तुम याद आये


फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आये
फिर पत्तों की पाज़ेब बजी तुम याद आये
फिर कुँजें बोलीं घास के हरे समन्दर में
रुत आई पीले फूलों की तुम याद आये
फिर कागा बोला घर के सूने आँगन में
फिर अम्रत रस की बूँद पड़ी तुम याद आये
पहले तो मैं चीख़ के रोया फिर हँसने लगा
बादल गरजा बिजली चमकी तुम याद आये
दिन भर तो मैं दुनिया के धंधों में खोया रहा
जब दीवारों से धूप ढली तुम याद आये

28 जुलाई 2016

कारण

कारण


दर्द नहीं है कोई मौका किसी को युहीं जो मिल जाये
फूल नदी या हवा का झोंका बस युहीं जो चल जाये
फूलों के बिस्तर वाले इसकी कीमत क्या जानेंगे
दर्द उसी को मिलता है जो मरते मरते भी जी जाये ।
दर्द नहीं है लक्ष्य किसी का पाकर जो वो इतराए
नहीं है उत्कंठा कोई जो चखकर देखी ही जाये
कहने वाले कहते हैं की दर्द का कारण ये वो है
नहीं है ये दौलत कोई किसी को यूँ ही दी जाये।
दर्द नहीं है जिज्ञासा कि जिसको छूकर देखा जाये
नहीं दर्द कि परिभाषा कि जिससे समझ में आ जाये
ये तो उपपरिणाम है किसी लक्ष्य के पीछे का
जितनी ज्यादा हो लगी लगी ये उतना ही बढ़ता जाये।
जितनी गहराई से सोचा कि इस मंज़िल को पा जाये
दुनिया सारी छूटे मुझसे पर ये आँचल में आ जाये
रास्ता छूटे या देर लगे ये पीड़ा का उद्गगम भर है
जितना विशेष हो कारण वो उतना ही हमको है तडपाये।
अपनी चाहत को लेकर के संदेह कभी जो आ जाये
तो लेना दिल में झांक जरा सा दर्द कहीं जो मिल जाये
बस यही निशानी है उसकी कि सच्चा था विश्वास तुम्हे
जीवन पुष्पित फिर हो जाये जो तार दिलों में हिल जाये।
दर्द नहीं कोई धोखा जो तुमको कोई भी दे जाये
कितना था तुमने प्रेम किया उसका परिमाण बता जाये
जब कम था तब ये थोड़ा था जब ज्यादा था तो बहुत मिला
अपने जीवन कि सत्यकथा ये दर्द हमें ही बतलाये ॥
दर्द नहीं है कोई मौका किसी को युहीं जो मिल जाये॥॥॥
===========१४ जून २०१६ को लिखित

26 जुलाई 2016

खाली पड़ा कैनवास -- शिवनाथ कुमार :)


उस खाली पड़े कैनवास  पर
हर रोज सोचता हूँ
एक तस्वीर उकेरूँ
कुछ ऐसे रंग भरूँ
जो अद्वितीय हो
पर कौन सी तस्वीर बनाऊँ
जो हो अलग सबसे हटकर
अद्वितीय और अनोखी
इसी सोच में बस गुम हो जाता हूँ
ब्रश और रंग लिए हाथों में
पर उस तस्वीर की तस्वीर
नहीं उतरती मेरे मन में
जो उतार सकूँ कैनवास पर
वह रिक्त पड़ा कैनवास
बस ताकता रहता है मुझे हर वक्त
एक खामोश प्रश्न लिए
और मैं
मैं ढूँढने लगता हूँ जवाब
पर जवाब ...
जवाब अभी तक मिला नहीं
तस्वीर अभी तक उतरी नहीं
मेरे मन में
और वह खाली पड़ा कैनवास
आज भी देख रहा है मुझे
अपनी सूनी आँखों में खामोशी लिए  !!

 लेखक परिचय - शिवनाथ कुमार 

22 जुलाई 2016

दिन सावन के..........विनोद रायसरा


दिन सावन के
तरसावन के
कौंधे बिजली
यादें उजली
अंगड़ाई ले
सांझें मचली

आते सपने
मन भावन के...

चलती पछुआ
बचते बिछिआ
सिमटे-सहमें
मन का कछुआ

हरियाए तन
सब घावन के

नदिया उमड़ी
सुधियां घुमड़ी
लागी काटन
हंसुली रखड़ी

छाये बदरा
तर-सावन के..

बरसे बदरा
रिसता कजरा
बांधूं कैसे
पहुंची गजरा

बैरी दिन हैं
दुख पावन के...

मीठे सपने
कब है अपने
चकुआ मन का
लगता जपने

कितने दिन हैं
पिऊ आवन के..
--विनोद रायसरा

21 जुलाई 2016

फिर तुम्हारा साथ मिले न मिले - अनुषा मिश्रा

सालों पहले मुझे हो गई थी तुमसे मोहब्बत
जिसे अपने दिल में छुपाकर
काटा मैंने हर एक दिन
मेरे पास भले ही नहीं थे तुम
लेकिन तुमसे दूर नहीं थी मैं
आज जब मिले हो तुम मुझे
इतने सालों बाद तो
जी करता है कि आने वाले
हर पल को बिताऊं तुम्हारे साथ
तुम्हारेचेहरे को बसा लूं अपनी आंखों में
तुम्हारी खुशबू से महका लूं अपना मन
छुप जाऊं तुम्हारे सीने में मैं
समा जाऊं तुम्हारी सांसों में
हाथों में लेकर तुम्हारा हाथ
देखती रहूं तुम्हारी सूरत सारी रात
रख लो तुम मेरे कंधे पर सिर
खो जाऊं मैं तुम्हारी बातों में फिर
जी लूं हर एक लम्हे को जी भरकर
क्या पता फिर तुम्हारा साथ मिले न मिले !

लेखक परिचय - अनुषा मिश्रा


19 जुलाई 2016

है वक़्त बेरहम थानेदार की तरह...गुलाब जैन


ज़िन्दगी है गिरती दीवार की तरह,
हालात चल रहे हैं बीमार की तरह। 

अब किस के पास जाएँ फ़रियाद लेके हम,
है वक़्त बेरहम थानेदार की तरह।

उम्मीद हिफ़ाज़त की कोई क्या करे उनसे,
बुत बनके जो खड़े हैं पहरेदार की तरह।

ख़ुद से हूँ बेख़बर मैं, मुझको पढ़ेगा कौन,
दीवार पे चिपका हूँ इश्तेहार की तरह।

बेहतर नहीं है कुछ भी पढ़ने के वास्ते,
है ज़िन्दगी के पन्ने अख़बार की तरह।

-गुलाब जैन
jain.gulab@gmail.com

16 जुलाई 2016

माँ मुझे गोंद में फिर आना है -- प्रभात


माँ मुझे गोंद में फिर आना है
बारिश से मुझे बचा लो
गोदी में अचरे से छुपा लो
आँखों में कजरा लगा दो
सुबह मुझे स्नान करा दो
पढ़के स्कूल से थके आना है 
माँ मुझे★★★
डांट मिली तो दुलरा दो
चम्पक दे मन बहला दो
शाम हुयी तो दूध पिला दो
चांदनी रात में कथा सुना दो 
खिलौने पाने की जिद करना है 
माँ मुझे★★★
जो मैं खाऊं वही बना दो 
बात बात में मुझे हंसा दो 
रोते हुए मुझे बहला दो
सरसों से लेपन कर दो
भूत न आये छुप जाना है
माँ मुझे★★★

माँ मुझे गोंद में फिर आना है
बारिश से मुझे बचा लो
गोदी में अचरे से छुपा लो
आँखों में कजरा लगा दो
सुबह मुझे स्नान करा दो
पढ़के स्कूल से थके आना है 
माँ मुझे★★★
डांट मिली तो दुलरा दो
चम्पक दे मन बहला दो
शाम हुयी तो दूध पिला दो
चांदनी रात में कथा सुना दो 
खिलौने पाने की जिद करना है 
माँ मुझे★★★
जो मैं खाऊं वही बना दो 
बात बात में मुझे हंसा दो 
रोते हुए मुझे बहला दो
सरसों से लेपन कर दो
भूत न आये छुप जाना है
माँ मुझे★★★



14 जुलाई 2016

हाथ में सब्र की कमान हो तो तीर निशाने पर लगता है - कविता रावत

धैर्य कडुवा लेकिन इसका फल मीठा होता है।
लोहा आग में तपकर ही फौलाद बन पाता है।।

एक-एक पायदान चढ़ने वाले पूरी सीढ़ी चढ़ जाते हैं।
जल्दी-जल्दी चढ़ने वाले जमीं पर धड़ाम से गिरते हैं।।

छटाँक भर धैर्य सेर भर सूझ-बूझ के बराबर होता है।
जल्दीबाजी में शादी करने वाला फुर्सत में पछताता है।।

उतावलापन बड़े-बड़े मंसूबों को चौपट कर देता है।
धैर्य से विपत्ति को भी वश में किया जा सकता है।।

हाथ  में सब्र की कमान हो तो तीर निशाने पर लगता है।
आराम-आराम से चलने वाला सही सलामत घर पहुँचता है।।


लेखक परिचय - कविता रावत 


11 जुलाई 2016

क्या मिला है देश को इस संविधान से - दिगंबर नासवा

इसलिए की गिर न पड़ें आसमान से
घर में छुप गए हैं परिंदे उड़ान से

क्या हुआ जो भूख सताती है रात भर
लोकतंत्र तो है खड़ा इमिनान से

चंद लोग फिर से बने आज रहनुमा
क्या मिला है देश को इस संविधान से

जीत हार क्या है किसी को नहीं पता
सब गुज़र रहे हैं मगर इम्तिहान से

है नसीब आज तो देरी न फिर करो
चैन तो खरीद लो तुम इस दुकान से

झूठ बोलते में सभी डर गए मगर
सच नहीं निकलता किसी की जुबान से

गुनाहगार को लगे या बेगुनाह को
तीर तो निकल ही गया है कमान से

लेखक परिचय -  दिगंबर नासवा

8 जुलाई 2016

सुनो तो

सुनो तो
काली घनेरी बूँद से पूछो क्यों रो दिए
इंसान हर तरफ मिला इंसान खो दिए ।

मंदिर हो या मस्जिद कहीं कलीसा सभी जगह
वो तू ही था हर उस जगह, जिसको नज़र किये ।

ऐसा लगे क्यों तुझमे नहीं है कोई रहम
या फिर गुनाह कर दिए अल्लाह जो कहे ।

मजहब नहीं सीखता है गर आपस में रखना बैर
फिर क्यों उसी के नाम पर इतने कतल किये ।

क्या माँ के नाम से बड़ा दुनिया में है मजहब
वो कौन सी आयत थी जो माँ ही ले गए ।
(http://navbharattimes.indiatimes.com/world/asian-countries/twin-allegedly-killed-mother-after-being-stopped-from-joining-isis/articleshow/53080931.cms)

तुझको जरा भी है लगी इस कायनात से
इंसानियत तू ही पढ़ा या कर फ़ना उन्हें ।

है इल्तिज़ा नहीं मेरी हर दिल की है दुआ
तेरी राज़ा का आसरा है आज भी हमें ।

दरिया ख़ुलूस की बहा नहीं तो सुनेगा फिर
इंसान हर तरफ मिला इंसान खो दिए ।

====== ६ जुलाई २०१६ को लिखित





7 जुलाई 2016

अंतर्द्वंद........संध्या शर्मा


क्या बताओगे  
आने वाली पीढ़ी को 
कि
सिर्फ दिमाग लेकर ही 
पैदा हुआ था 
आज का इंसान 
दिल नहीं था 
इसके पास 
निज स्वार्थ के आगे 
मानवता भी भूला 
द्वंद्व है मन के अंदर 
सच कहूं तो
अपनी हालत पर 
दया से ज्यादा 
गुस्सा आता है 
जो आज 
अपने आप से ही 
मुंह छुपाता
फिर रहा हो 
जो खुद को 
निरन्तर छल रहा हो 
जिसके पास 
आज के लिए जवाब न हो
कल को क्या जवाब दे पायेगा !!

लेखक परिचय - संध्या शर्मा