29 नवंबर 2016

हमसे ज़माना खुद है........जिगर मुरादाबादी

हम को मिटा सके, ये ज़माने में दम नहीं
हमसे ज़माना खुद है, ज़माने से हम नहीं

बेफायदा अलम नहीं, बेकार ग़म नहीं
तौफ़ीक़ दे खुदा तो ये नेअमत भी कम नहीं

मेरी ज़बां पे शिकवा-ए-अहल-ए-सितम नहीं
मुझ को जगा दिया, यही अहसान कम नहीं

या रब, हुजूम-ए-दर्द को दे और वुसअतें
दामन तो क्या, अभी मेरी आँखें भी नम नहीं

शिकवा तो एक छेड़ है लेकिन हक़ीक़तन
तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं

मर्ग-ए-जिगर पे क्यूँ तेरी आँखें हैं अश्क-रेज़
एक सानेहा सही, मगर इतना अहम नहीं है
-जिगर मुरादाबादी 

28 नवंबर 2016

कभी कभी!!







कभी कभी कहानियाँ
यूँ खत्म हो जाती है !
वक़्त का मरहम मिलता नहीं
तो जैसे ज़ख्म हो जाती है !!
रिस जाती है आह भी
दिल के लहू में !
रंग में पड़कर प्यार के
आँखें भी नम हो जाती है!!
लफ्ज़ से लफ्ज़ जो कटता है
ख़ामोशी का रस्ता हटता है !
अपनी ही फिर नज़्म कोई
दिल पर सितम हो जाती है !!
दिल के पागलपन में आखिर
क्यों साँसों से कट जाओ !
इश्क़ तो ऐसे बढ़ता नहीं
मगर ज़िन्दगी कम हो जाती है !!

22 नवंबर 2016

परिवर्तन.........श्रीमती गिरिजा अरोड़ा




परिवर्तन, नियम है संसार का
पर परिवर्तन पर
संसार सदा है हैरान सा

परिवर्तन, कभी-कभी आता है धीरे-धीरे
जैसे बच्चा, कई साल बाद देखते ही
बढ़ा दिख जाता है
और हैरान कर जाता है  

जरा सोचो तो आखिर बच्चों को 
बढ़ना, रूप बदलना ही तो है
जड़ों का विस्तार,प्राणों का संचार
जीवन का प्रचार

परिवर्तन, कभी-कभी 
आता है चुपचाप
दबे पांव, अचानक और पूर्णतया
और देता है अचंभा  

जरा सोचो तो आखिर वे हवाएं
जो मौसम के अनुसार
बदल देती हैं अपनी दिशाएं पूर्णतया
ला सकती हैं मानसून

कर सकती हैं
जड़ों का विस्तार
प्राणों का संचार
जीवन का प्रचार  

-श्रीमती गिरिजा अरोड़ा  

20 नवंबर 2016

“सच"

सुना था कभी
साहित्य समाज का दर्पण होता है
अक्स सुन्दर हो तो
गुरुर बढ़ जाता है
ना हो तो
नुक्स बेचारा दर्पण झेलता है
सोच परिपक्वता मांगती है
आइना तो वही दर्शाता है
जो देखता है
झेला भोगा अनुभव कहता है
उमस और घुटन का कारण
हमारी सोचों के बन्द दरवाजे हैं
हवाएँ ताजी और सुकून भरी ही होंगी
दरवाजे और खिड़कियाँ खोलने की जरुरत भर है
हम से समाज हम से प्रतिबिम्ब
तो दोष के लिए उठी हुई उँगली का इशारा
किसी एक की तरफ क्यों है ।।


XXXXX

19 नवंबर 2016

खुद से मुलाकात..

कल मैं खुद ही खुद से मिली,
खुद को समझाया,
खुद को ही डाँटा,
खुद ही परेशान रही.
खुद से बातें की,
पर खुद को न बदल पाई,
कितनी मुश्किल है खुद से मुलाकात,
ये कल ही मैं जान पाई,
बहुत अच्छा लगा खुद से मिलकर,
लगा खुदा से मिल आई हूँ,
और अब मैं खुद ही खुद बने रहना चाहती हूँ ,
हे ईश्वर बस!..मुझे खुद ही बनकर जीने देना,
मैं खुद को नहीं बदल पाउँगी,
जब -जब मन करेगा तुझसे मिलने का
मैं खुद ही खुद में चली आउँगी......
तू मुझसे यूँ ही मिलते  रहना,
तभी खुद की तरह जीने के लिये..
तेरी बनाई दुनियाँ को मैं समझ पाउँगी...

लेखक परिचय - अर्चना चावजी


16 नवंबर 2016

याद आया तो ज़रूर होगा !!

कभी प्रेम 
कभी रिश्ता कोई 
बन गया हमनवां जब 
तुमने जिंदगी को  
हँस के गले  लगाया 
तो ज़रूर होगा !
 ... 
मांगने पर भी 
जो मिल न पाया 
ऐसा कुछ छूटा हुआ 
बिछड़ा हुआ कभी न कभी 
याद आया तो ज़रूर होगा !!
 ... 
कोई शब्द जब कभी 
अपनेपन की स्याही लिए 
तेरा नाम लिखता हथेली पे 
तुमने चुराकर नज़रें 
वो नाम पुकारा 
तो ज़रूर होगा !!

लेखक परिचय - सदा 


11 नवंबर 2016

दर्द!



दर्द को तो दर्द के बहाने चाहिए
हो सके तो गम भूलाने चाहिए !
न रखो यूँ कदम इश्क़ की दहलीज़ पर
रख दिया तो रिश्ते निभाने चाहिए !
है कोई तो वास्ता यूँ भी तेरा और मेरा
इसमें भी क्या वजूद पुराने चाहिए !
आह अक्सर दिल से ही निकलती है
क्यों  क़िस्से फिर दोहराने चाहिए!
दिल की परछाइयाँ गहरी होने लगी है
फिर क्यों रात के मुहाने चाहिए !
अब भी रखा है जिंदगी तले तुम्हारा दर्द
नहीं जीने को सपने सुहाने चाहिए !! 

9 नवंबर 2016

मलहम.....कल्पना पांडेय

जब कभी हारने लगो तो ....
शब्दों का मलहम नहीं 
अपने से...
अपनी ख्वाइशों के वादों का इक टुकड़ा
खुद पर रख लो
जख्मी हौसलों को आराम मिलेगा 
इक बार फिर इक नया आयाम मिलेगा !

लेखक परिचय - कल्पना पांडेय 

8 नवंबर 2016

लोककवि रामचरन गुप्त के पूर्व में हुए चीन-पाकिस्तान से भारत के हुए युद्ध के दौरान रचे गये युद्ध-गीत





लोककवि रामचरन गुप्त के पूर्व में हुए चीन-पाकिस्तान से भारत के हुए युद्ध के दौरान रचे गये युद्ध-गीत 
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कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री 'लोककवि रामचरन गुप्त ' का  चर्चित 'लोकगीत'—1.
|| पापी पाकिस्तान मान ||
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ओ पापी मक्कार रे, गलै न तेरी दार रे
भारत माँ के वीर बाँकुरे करि दें पनियाढार रे।

करि लीनी है कौल हमने अपनौ कोल न तोडिंगे 
पापी पाकिस्तान मान हम ऐसे फंद न छोडि़ंगे।
करि दें धूँआधार  रे, परै न तेरी पार रे
भारत माँ के वीर बाँकुरे करि दें पनियाढार रे।।
लाशों पर हम लाश बिछायें करि दें खूँ के गारे हैं
आँच न आने दें भारत पै चलें भले ही आरे हैं।
जालिम अब की बार रे, ओंधै दिंगे डार रे
भारत माँ वीर बाँकुरे करि दें पनियाढ़ार रे।।

रणभूमि में कूद पड़े जब भारत माँ के छइया हैं
बड़े लड़इया बड़े लड़इया बांके वीर लड़इया हैं।
करि लै सोच-विचार रे, काटें तेरे वार रे
भारत माँ के वीर बाँकुरे करि दें पनियाढार रे।।

करै हमारी तरफ अंगुरिया वा अंगुरी कूं तोरिंगे
आंखि दिखावै जो भुट्टा-सी उन आंखिन कूं फोरिंगे।
रामचरन तलवार रे, मती बढ़ावै रार रे
भारत माँ के वीर बाँकुरे करि दें पनियाढार रे।
+लोककवि रामचरन गुप्त



कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री 'लोककवि रामचरन गुप्त ' का   चर्चित 'लोकगीत---2.
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हम यमदूत भूत से तेरे प्राणों को लें छीन
जोर लगा लै चीनी गिनगिन इंच जमीन।

तेरा पल-पल होकर निर्बल बीतेगा
हमसे रण के बीच नीच क्या जीतेगा
थका-थका कर तोकूं मारें, करि दें हम गमगीन।।

तोरें हड्डी रोज कबड्डी खेलिंगे
तेरी चमड़ी फारे बीच उधेडिंगे
तेरे तोड़े गट्टे हिन्दुस्तानी पट्ठे चीन।।

पकरि लगाम धड़ाम जमीं पै डारिंगे
करि-करि मल्लयुद्ध हम तो कूं मारिंगे
अपने घोड़ों पै तू कसि लै चाहे जैसे जीन।।

रामचरन से युद्ध  नहीं करि पावैगौ
मात अरे बदजात हमेशा खावैगौ,
टुकड़े-टुकड़े करि दें तेरे एक नहीं, दो-तीन।।
+लोककवि रामचरन गुप्त



कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री 'लोककवि रामचरन गुप्त ' का  चर्चित 'लोकगीत'---3.
|| मुश्किल है जाय चीनी तेरा जीना है ||
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सीमा से तू बाहर हो जा ओ चीनी मक्कार
नहीं तेरी भारत डालैगौ मींग निकार।।

धोखौ तैने दियौ आक्रमण कीना है
मुश्किल है जाय चीनी तेरा जीना है,
मारि-मारि कें तेरौ करि दें पल में पनियाढ़ार।।

हम भारत के वीर तीर जब छोडि़ंगे
रणभूमी में तेरे सर को फोडि़ंगे 
जिस दम कूदें राजस्थानी हुलिया देइं बिगार।।

भारत में गर कदम रखे, पछितायेगा
हम से लड़कर नफा नहीं तू पायेगा
नेफा औ’ लद्दाख के ऊपर क्यों करता तकरार।।

रामचरन से तू दुश्मन मत टकराना
रामचरन है देशभक्ति में दीवाना
रामचरन से चीनी तेरी परै न कबहू पार।।
+लोककवि रामचरन गुप्त



कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री 'लोककवि रामचरन गुप्त ' का  चर्चित 'लोकगीत'...4. 
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रणभूमी के बीच में पल की करी न देर
उछलौ आकर युद्ध कूं बनकर दुश्मन शेर।

समझै बात न नीच, 
भारत करि देय घुटुअन कीच
जम्बू-काश्मीर के बीच, 
झण्डा लहरावै ||

टेंकन की भरमार, 
अमरीका ते लये उधार 
इतते हथगोलन की मार, 
बदन तैरा थर्रावै ||

तोकू दूध पिलायौ 
तू तौ उछल-उछल कें आयौ
डन्का रण के बीच बजायौ, 
खूब तू गर्वाबै ||

मिलौ चीन से बन्दर, 
भुट्टो अय्यूब  कलन्दर
रामचरन कूं देख सिकन्दर, 
अब तू झर्रावै || 
+लोककवि रामचरन गुप्त




कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री 'लोककवि रामचरन गुप्त ' का  चर्चित 'लोकगीत'---5.
|| रामचरन ते बैर अब लीनौ ||
[तर्ज-सपरी]
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चाउफ एन लाई चाल में कैसौ चतुर सुजान
होकर मद में मस्त तू रह्यौ भवौ को तान।

चाउ एन लाई बड़ौ कमीनौ भइया कैसी सपरी।।

हां लद्दाख आयकें जाने चौतरफा है घेरौ 
होकर मद में चूर जंग कूं आय फटाफट हेरौ
सोतौ शेर जगाय तो दीनौ भइया कैसी सपरी।। 

आस्तीन का सांप बना तू कैसी चाल दिखायी 
मिलकर घात संग में कीनी तैनें बधिक  कसाई 
खंडित सब विश्वास करि दीनौ, भइया कैसी सपरी।। 

खूनी उस चंगेज ने मुखड़ा तोड़ौ कैसौ तेरौ
अब भारत के वीरों ने तू चौतरफा है घेरौ
तेरौ चैन और सुख छीनौ, भइया कैसी सपरी।

और तेरी छाती पै चढ़कर मुहम्मद तुगलक आयौ 
खैर मना ओ दुश्मन तैने नव जीवन तब पायौ
रामचरन ते बैर अब लीनौ, भइया कैसी सपरी।।
+लोककवि रामचरन गुप्त




कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री 'लोककवि रामचरन गुप्त ' का एक चर्चित 'लोकगीत'---6.
|| रामचरन कोल्हू में पेलै ||
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ओ मिस्टर अय्यूब आग धधकी है सूख कंडी में
लहर-लहर लहराय तिरंगा अपना रावलपिंडी में। 

है भारत की कट्टर सेना, मुश्किल इससे लोहा लेना
गाड़ैगी अपनौ झंडा यह पाकिस्तानी झण्डी में। 

अमरीका को मीत बनाकर, बैठौ तू गोदी में जाकर
मगर तोय ना चैन मिलैगौ अमरीका पाखण्डी में।

रामचरन कोल्हू में पेलै, तेरौ चीया-चीया लै लै
अब देखिंगे तेल निकलतौ कित्तौ तेरी अन्डी में।
+लोककवि रामचरन गुप्त



कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री 'लोककवि रामचरन गुप्त ' का  चर्चित 'लोकगीत'---7.
|| रामचरन कब हारा है ||
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भारत की उत्तर सीमा पर फिर तुमने ललकारा है
दूर हटो ऐ दुष्ट चीनिओ ! भारतवर्ष हमारा है।

हमें न समझो हैं हम कायर, वीरों की सन्तान हैं 
मोम नहीं जो पिघल जायेंगे, हम भारी चट्टान हैं
भारत मां की रक्षा करना अब भी ध्येय हमारा है।

हम जब तनकर चलते हैं, रस्ते स्वयं निकलते हैं
गोली की बौछारों में हम, हंसते-गाते चलते हैं
अमन-दूत हर भारतवासी, पर अरि को अंगारा हैं ।

आओ डटो चीनिओ देखो कितना पानी हम में है
भगतसिंह सुखदेव राजगुरु भरी कहानी हम में है
हमको प्राणों से भी ज्यादा अपना भारत प्यारा है।

अपने खूं में राणा वाली अभी रवानी शेष है
वैसे ज्ञान-दान देने वाला ये भारत देश है।
चाहे जैसी आफत आये रामचरन कब हारा है।
+लोककवि रामचरन गुप्त



कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री ‘लोक कवि रामचरन गुप्त’ का एक चर्चित ‘लोकगीत’--8.
|| आग पर घी रहेंगे परख लो ||
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सर कटाये, न सर ये झुकाये
पीठ दिखला के भागे नहीं हम।
खून की होलियां हमने खेली
युद्ध  में आके भागे नहीं हम।

इतना पहचान लो चीन वालो
दृष्टि हम पर बुरी अब न डालो
हम बारुद अंगार भी है
प्यार के सिर्फ धागे नहीं हम।

हम शेरों के दांतों की गिनती 
खोल मुंह उनका करते रहे हैं
कोई कायर कहे या कि बुजदिल 
जग में इतने अभागे नहीं हम।

एक ही गुण की पहचान वाला
कोई समझे न रामचरन को 
आग पर घी रहेंगे परख लो 
स्वर्ण पर ही सुहागे नहीं हम।
+लोककवि रामचरन गुप्त



कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री ‘लोक कवि रामचरन गुप्त’ का  चर्चित ‘लोकगीत’—9.
।। मिलायें तोय माटी में।।
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एरे दुश्मन भारत पै मति ऐसे हल्ला बोल, मिलायें तोय माटी में।

माना पंचशीलता के हम पोषक-प्रेमपुजारी हैं
और शांति के अग्रदूत हम सहनशील अति भारी हैं
पर रै दुश्मन हाथी सौ मद कौ मारौ मत डोल, मिलायें तोय माटी में।

हम भारत के वीर तीर तकि-तकि के तो पै छोडि़ंगे
तोकूं चुनि-चुनि मारें तेरे अहंकार कूं तोडि़गे
एरे मुंह बन्दूकन के सीमा पै यूं मत खोल, मिलायें तोय माटी में।

पग-पग पापी पाक कूं नीचौ रामचरन दिखलावैगी
जाकूँ  चीरें फाड़ें  जो ये  सोते शेर जगावैगी
एरे हमरे साहस कूं कम करिकें मत रे तोल, मिलायें तोय माटी में। 
+लोककवि रामचरन गुप्त



कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री ‘लोक कवि रामचरन गुप्त’ का  चर्चित ‘लोकगीत’—10. 
|| अरि कूं छरि दइयें ||
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दुश्मन तेरे रक्त से हमें मिटानी प्यास
अब भी हैं कितने यहां सुन सुखदेव सुभाष।

सबके नयन सितारे
भगत सिंह से राजदुलारे
भारत में जब तक हैं प्यारे
अरि कूं छरि दइयें।

भरी भूमि वीरन से
डरपावै मति जंजीरन से 
तेरी छाती को तीरन से
छलनी करि दइयें।

अगर युद्ध  की ठानी 
कहते रामचरन ऐलानी
दाल जैसौ तोकूं अभिमानी
पल में दरि दइयें।
+लोककवि रामचरन गुप्त



कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री ‘लोक कवि रामचरन गुप्त’ का  चर्चित ‘लोकगीत’----11.
।। लड़ें हम डटि-डटि कें।।
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पल भर में दे तोड़ हम दुश्मन के विषदंत
रहे दुष्ट को तेग हम, और मित्र को संत।


अरि के काटें कान
हम भारत के वीर जवान
न इतनौ बोदौ बैरी जान 
 अड़ें हम डटि-डटि कें।

हर सीना फौलाद
दुश्मन रखियो इतनी याद
मारौ हमने हर जल्लाद
लडें हम डटि-डटि कें।

अरे पाक ओ चीन
भूमी का लै जायगौ  छीन
युद्ध की गौरव-कथा कमीन
गढ़ें हम डटि-डटि कें।

रामचरन कूं मान
हमारी ताकत कूं पहचान
फतह के जीवन-भर सोपान
चढ़ें हम डटि-डटि कें।
+लोककवि रामचरन गुप्त



कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री ‘लोक कवि रामचरन गुप्त’ का  चर्चित ‘मल्हार ’----12.
।। लडि़ रहे वीर ।।
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सावन आयौ, लायौ हमला चीन कौ जी
एजी सीमा पै लडि़ रहे वीर।

हारि न जावें, न भागें रण छोडि़ के जी
एजी वीरन कूं बध्इयो धीर ।

बादल छाये कारे कारे तौप के जी
एजी दुर्गन्धें भरी है समीर।

रामचरन कूँ कायर मति जानियो रे 
ऐरे तोकू मारें तकि-तकि तीर।
+लोककवि रामचरन गुप्त



कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री ‘लोक कवि रामचरन गुप्त’ का  चर्चित ‘लोकगीत’---13.
।। कशमीर न मिले किसी को ।।
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अय्यूब काटत रंग है अमरीका के संग है
काश्मीर ना मिलै किसी को ये भारत का अंग है।

भारत भू ऊपर  हम तो खूं की नदी बहा देंगे
काट-काट सर पाकिस्तानी रण के बीच गिरा देंगे
उठि-उठि होगी जंग है... काश्मीर ना मिले.....

मिलकर चाउफ एन लाई के कंजरकोट दबाया था
छोड़ छोड़कर भाजे रण से बिस्तर बगल दबाया था 
भई बटालियन भंग है... काश्मीर न मिलै...

सरगोदा बर्की के ऊपर भूल गये चतुराई थे 
तौबा तौबा करि के भागे देखे नहीं पिछाई थे
अब भी करि दें तंग है...काश्मीर ना मिलै....|
+लोककवि रामचरन गुप्त
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 सम्पर्क -15/109, ईसानगर, निकट थाना सासनीगेट, अलीगढ़-202001   मो.-9634551630 




6 नवंबर 2016

‘लोक कवि रामचरन गुप्त’ के 6 यथार्थवादी ‘लोकगीत’




लोक कवि रामचरन गुप्तके यथार्थवादी लोकगीत
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।। कपड़ा लै गये चोर ।।---1.
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ध्यान गजानन कौ करूं गौरी पुत्र महान
जगदम्बा मां सरस्वती देउ ज्ञान को दान।

जा आजादी की गंगा नहाबे जनता मन हरषायी है।।

पहली डुबकी दई घाट पै कपड़ा लै गये चोर
नंगे बदन है गयी ठाड़ी वृथा मचावै शोर
चोर पै कब कन्ट्रोल लगाई। या आजादी....

टोसा देखि-देखि हरषाये रामराज के पंडा
टोसा कूं हू खाय दक्षिणा मांगि रहे मुस्तंडा
पण्डा ते कछु पार न पायी है। जा आजादी....

भूखी नंगी फिरै पार पै लई महाजन घेर
एक रुपइया में दयौ आटौ आधा सेर
टेर-लुटवे की पड़ी सुनायी है। जा आजादी....

रामचरन कहि एसी वाले अरे सुनो मक्कार
गोदामों में अन्न भरि लयो, जनता की लाचार
हारते जाते लोग लुगाई है। जा आजादी........
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+लोककवि रामचरन गुप्त



|| नागों की फिरे जमात ||----2.
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भगवान आपकी दुनियां में अंधेर दिखाई दे
गुन्डे बेईमानों का हथफेर दिखायी दे ।

घूमते-फिरते डाकू-चोर, नाश कर देंगे रिश्वतखोर
जगह-जगह अबलाओं की टेर दिखायी दे।

नागों की फिरे जमात, देश को डसते ये दिन-रात
भाई से भाई का अब ना मेल दिखायी दे।

देश की यूं होती बर्बादी, धन के बल कुमेल हैं शादी
बाजारों में हाड-मांस का ढेर दिखायी दे।

घासलेट खा-खाकर भाई, दुनिया की बुद्धि बौरायी
रामचरन अब हर मति भीतर फेर दिखायी दे।
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+लोककवि रामचरन गुप्त



|| पढ़ाऊँ कैसे छोरा कूं ||----3.
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ऐरे चवन्नी भी जब नाय अपने पास, पढ़ाऊँ कैसे छोरा कूं?

किससे किस्से कहूं कहौ मैं अपनी किस्मत फूटी के
गाजर खाय-खाय दिन काटे भये न दर्शन रोटी के
एरे बिना किताबन के कैसे हो छटवीं पास, पढ़ाऊँ कैसे छोरा कूं?

पढि़-लिखि कें बेटा बन जावै बाबू बहुरें दिन काले
लोहौ कबहू पीटवौ छूटै, मिटैं हथेली के छाले
एरे काऊ तरियां ते बुझे जिय मन की प्यास, पढ़ाऊँ कैसे छोरा कूं?

रामचरन करि खेत-मजूरी ताले कूटत दिन बीते
घोर गरीबी और अभावों में अपने पल-छिन बीते
एरे जा महंगाई ने अधरन को लूटौ हास, पढ़ाऊँ कैसे छोरा कूं?
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+लोककवि रामचरन गुप्त



|| जनियो मत ऐसौ लाला ||----4.
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जननी जनियो तो जनियो ऐसी पूत, ए दानी हो या हो सूरमा।

पूत पातकी पतित पाप पै पाप प्रसारै
कुल की कोमल बेलि काटि पल-भर में डारै
कुल करै कलंकित काला
जनियो मत ऐसौ लाला।
जननी जनियो तो जनियो ऐसी पूत, ए दानी हो या हो सूरमा ||

सुत हो संयमशील साहसी
अति विद्वान विवेकशील सत सरल सज्ञानी
रामचरन हो दिव्यदर्श दुखहंता ज्ञानी
रहै सत्य के साथ, करै रवि तुल्य उजाला
जनियो तू ऐसौ लाला।
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+लोककवि रामचरन गुप्त



।। किदवई और पटेल रोवते।।-----5.
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जुल्म तैने ढाय दियो एरै नत्थू भइया
अस्सी साल बाप बूढ़े कौ बनि गयौ प्राण लिबइया।

भारत की फुलवार पेड़-शांति को उड़ौ पपइया
नजर न पड़े बाग कौ माली, सूनी पड़ी मढ़ैया।

आज लंगोटी पीली वालौ, बिन हथियार लड़ैया
अरिदल मर्दन कष्ट निवारण भारत मान रखैया।
आज न रहयौ हिन्द केसरी नैया को खिवैया

रामचरन रह गये अकेले अब न सलाह दिवैया
किदवई और पटेल रोवते, रहयौ न धीर  बधइया |
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+लोककवि रामचरन गुप्त




|| जा की छुक-छुक ||----6.
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एरे आयी-आयी है जिय नये दौर की रेल,
मुसाफिर जामें बैठि चलौ।

जा में डिब्बे लगे भये हैं भारत की आजादी के
भगतसिंह की कछू क्रान्ति के कछू बापू की खादी के
एरे जाकी पटरी हैं ज्यों नेहरू और पटेल,
 मुसाफिर जामें बैठि चलौ।।

जा की सीटी लगती जैसे इन्कलाब के नारे हों
जा की छुक-छुक जैसे धड़के फिर से हृदय हमारे हों
एरे जा के ऊपर तू सब श्रद्धा-सुमन उड़ेल,
मुसाफिर जामें बैठि चलौ।।

जाकौ गार्ड वही बनि पावै जाने कोड़े खाये हों
ऐसौ क्रातिवीर हो जाते सब गोरे थर्राये हों
एरे जाने काटी हो अंगरेजन की हर जेल,
मुसाफिर जामें बैठि चलौ।।

जामें खेल न खेलै कोई भइया रिश्वतखोरी के
बिना टिकट के, लूट-अपहरण या ठगई के-चोरी के
एरे रामचरन! छलिया के डाली जाय नकेल,
मुसाफिर जामें बैठि चलौ ||
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+लोककवि रामचरन गुप्त