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22 फ़रवरी 2014

कुछ लपटे तो वहा भी उठ रही थी - कुँवर जी

हर और आग थी,
जलन थी,
धुआँ...

बड़ी मुश्किल से एक कोना ढूँढा ...
बैठे,
कुछ अपने दिल में झाँका,
देखा...
कुछ लपटे तो वहा भी उठ रही थी!
अब..?



लेखक-- कुंवर जी 


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