| तेरे चरनन पर बलिहारी |
| मेरे गिरधर कृष्ण मुरारी |
| कृपा तेरी का बनु मैं अधिकारी |
| मेरे गिरधर कृष्ण मुरारी |
| तेरे दर्शन का मैं अभिलाषी |
| इस मन को बना दो काशी |
| तुम दाता मेरे, मै तेरा भिखारी |
| मेरे गिरधर कृष्ण मुरारी |
| कइयों को तुमने है तारा |
| भवसागर पार उतारा |
| कब आएगी अब मेरी बारी |
| मेरे गिरधर कृष्ण मुरारी |
| झूठी ये मोह और माया |
| अपनी कृपा की करदो छाया |
| तुम ही हो सच्चे हितकारी |
| मेरे गिरधर कृष्ण मुरारी |
| मुझ दीन को तेरा सहारा |
| मैं मझदार , तुम हो किनारा |
| दया सागर हो तुम मेरे बनवारी |
| मेरे गिरधर कृष्ण मुरारी |
| अंत समय की हो जब बेला |
| और अपनों का लगा हो मेला |
| तब तुम पकड़ना बांह हमारी |
| मेरे गिरधर कृष्ण मुरारी |
| तेरे चरनन पर बलिहारी |
| मेरे गिरधर कृष्ण मुरारी |
| कृपा तेरी का बनु मैं अधिकारी |
| मेरे गिरधर कृष्ण मुरारी |
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बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना
जवाब देंहटाएंdhanyaawaad ji
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