| कब तक यूं दुखी रहेगा |
| ये धरती का भगवान |
| सबका ये है पेट भरता |
| फिर भी रोज़ मरता किसान |
| नंगी धरती का करता |
| नित्य नया शृंगार |
| इनकी ही बदौलत |
| खेतों में आती बहार |
| फिर क्यों पल- पल सहता अपमान |
| सबका ये है पेट भरता |
| फिर भी रोज़ मरता किसान |
| करता खेतों की रखवाली |
| मेहनत से आठों प्रहर |
| कभी अपनों से दर्द सहता |
| कभी कुदरत का कहर |
| पल -पल खो रहा अपनी पहचान |
| सबका ये है पेट भरता |
| फिर भी रोज़ मरता किसान |
| कुदरत के सूखे में |
| आंसू के बीज बोता |
| उमीदो के आसमान पर |
| पानी की बूँद के लिए रोता |
| क़र्ज़ तले दबा , देता अपनी जान |
| सबका ये है पेट भरता |
| फिर भी रोज़ मरता किसान |
| इनका दुःख-दर्द सब भूले |
| सरकार हो या जनता |
| ये वो धरती पुत्र हैं |
| जिनसे देश खुशहाल है बनता |
| इनकी अनदेखी से, धूमिल हुई देश की शान |
| सबका ये है पेट भरता |
| फिर भी रोज़ मरता किसान |
| गिरता , पड़ता , रोता , बिलखता |
| पर कभी उठ नहीं पाता |
| भीड़ भरी दुनिया में |
| सदा अपने को अकेला पाता |
| सबकुछ जान कर भी, हम बने अनजान |
| सबका ये है पेट भरता |
| फिर भी रोज़ मरता किसान |
| वो दिन अब दूर नहीं |
| जब इनकी अनदेखी पड़ेगी भारी |
| बंज़र होगी सारी धरती |
| और सूखी रहेगी हर क्यारी |
| बनेगी हरीभरी धरा शमशान |
| सबका ये है पेट भरता |
| फिर भी रोज़ मरता किसान |
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ji dhanyawaad
जवाब देंहटाएंकुदरत के सूखे में
जवाब देंहटाएंआंसू के बीज बोता
उमीदो के आसमान पर
पानी की बूँद के लिए रोता
क़र्ज़ तले दबा , देता अपनी जान
सबका ये है पेट भरता
फिर भी रोज़ मरता किसान
उम्दा प्रस्तुति।
bahut bahut dhanyawaad
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