अाफियत की वक्त मुक़रर्र कर दो..
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चंद आफियत की
वक्त मुक़रर्र कर दो..
पुरखुलूस की ताब से ही
गुज़रती है जिन्दगी..
हर लबो पर तब्बसुम की आबोताब कर दो..
साजिशें थी दहर के चांद सितारो की
वर्ना खुशियाँ झाँकती हर दरीचों से
इस तरह ही हर पल को ढूढती
एक पल को गुज़ार दो
चंद आफियत की...
बेहतरीन रूमानी कविता ... शब्द मन में तैर रहे है
जवाब देंहटाएंआभार एवम् धन्यवाद
हटाएंआभार एवम् धन्यवाद उचित मंच पर अवसर
जवाब देंहटाएंप्रदान करने के लिए..
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