ब्लौग सेतु....

20 जनवरी 2018

एक औरत का वेश्या बनना / मंजरी श्रीवास्तव


जब अजनबी थे हम
तुमने मुझे जानना चाहा
मैंने भी हंसकर
अपने बारे में तुम्हें बताया
हम दोस्त बने
जब तुमने दोस्ती का हाथ बढ़ाया
फिर तुमने मुझे प्रेमिका कहा
जब मैंने प्रेम में अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया
तो सबसे पहले
तुमने ही मुझे
बनाया ‘वेश्या’!





19 जनवरी 2018

अन्याय के विरुद्ध / पूनम तुषामड़

शहर में कोई हिन्दू मरा
मैं इसके खिलाफ हूं
कोई मुस्लिम
दंगों का शिकार हुआ
मैं उसके खिलाफ हूं
किसी सिक्ख के धर्म का अपमान हुआ
मैं उसके भी खिलाफ हूं
किसी ईसाई को अपने ही देश में
विदेशी कह कर मारा जाए
मैं इसके भी खिलाफ हूं

मैं लडूंगी
हर धर्म हर सम्प्रदाय
में होने वाली हर ज्यादती के खि़लाफ
परन्तु
क्यों नहीं आता कोई हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई
मेरे साथ
उस अन्याय के विरुद्ध
जो कभी खैरलांजी
झज्जर दुलीना और गोहाना
का कहर बन
बरस जाता है
मेरे समाज पर
क्या कोई देगा साथ
मेरे हकों की लड़ाई में
उनके लिए जो
बार-बार अनेकों बार
बहलाए गए फुसलाए गये
और धकेल दिए गये हाशिए पर
धर्म और जाति के दोज़ख़ में
कभी दलित सिक्ख और दलित ईसाई बनाकर...?

18 जनवरी 2018

तलाक / मुंशी रहमान खान

सुजान न लेवहिं नाम यह तलाक न उमदह नाम।
घ्रणित काम यह अति बुरा नहिं असलौं का काम।
नहिं असलौं का काम नारि जो अपनी छोड़ै।
करैं श्‍वान का काम हाथ दुसरी से जोडै़।।
कहैं रहमान बसें खग मिलकर जो मूर्ख अज्ञान।
कहु लज्‍जा है की न‍हीं दंपति लडै़ सुजान।।



17 जनवरी 2018

-------तीन कविताएँ...मनु वैरागी


माँ, मैं शून्य था।
तुम्हारी कोख में आने से पहले
शून्य आकार था। एकदम शून्य
आपने जीवन दिया मुझे...
अंश बना तुम्हारा...
अनेक उपकार हैं तुम्हारे
मैं आहवान करता हूँ माँ तुम्हारा!
..............................................
लिखी रेत पे कविता
लिखा नाम तुम्हारा
लिखा क़लमा...
परवाज़ रूह हो गयी
जुगनू की रोशनी में...

...............................
हाँथो से तस्वीर उतरी
उंगुलियों ने रंग पहना
दिल के कैनवास पर
ज़िन्दगी एक नई दौड़ी



16 जनवरी 2018

ख्वाहिश मुझे जीने की ज़ियादा भी नहीं है / अनवर जलालपुरी

ख्वाहिश मुझे जीने की ज़ियादा भी नहीं है
वैसे अभी मरने का इरादा भी नहीं है

हर चेहरा किसी नक्श के मानिन्द उभर जाए
ये दिल का वरक़ इतना तो सादा भी नहीं है

वह शख़्स मेरा साथ न दे पाऐगा जिसका
दिल साफ नहीं ज़ेहन कुशादा भी नहीं है

जलता है चेरागों में लहू उनकी रगों का
जिस्मों पे कोई जिनके लेबादा भी नहीं है

घबरा के नहीं इस लिए मैं लौट पड़ा हूँ
आगे कोई मंज़िल कोई जादा भी नहीं