ब्लौग सेतु....

5 फ़रवरी 2018

मैं बदन बेचती हूँ--

Monday, November 1, 2010

मैं बदन बेचती हूँ--

मैं बदन बेचती हूँ--
उस औरत के तन का
कतरा-कतरा फुट बहा है 
तभी तो चीख-चीख कहती 
हाँ मै बदन बेचती हूँ 
अपनी तपिश बुझाने को नही 
पेट की भूख मिटाने को नही 
मै बेचती हूँ बदन ,हां बेचती हूँ मै 
भूख से बिलखते रोते -कलपते 
दो नन्हे बच्चो के लिए 
मैं अपनी लज्जा अपनी अस्मत बेचती हूँ 
छाती से दूध क्या 
लहू का एक कतरा तक 
न निकला सूखे होठो के लिए 
आँख के आंसू भी कम पड़े तो 
इन अबोध बच्चो की खातिर 
आपने सिने को गर्म सलाखों से भेदती हूँ 
हाँ मै बदन बेचती हूँ 
ठण्ड से ठिठुरते बदन पर 
धोती का इक टुकड़ा भर 
कैसे इन बच्चो को तन से चिपका रखा 
देखि नही किसी ने मेरी ममता 
नजर पड़ी तो बस 
फटे कपड़ो से झांकते 
मेरे जिस्मो बदन पर 
दौड़ पड़े सब पागल कुत्तो की तरह 
इनके पंजो से बचने की खातिर 
हवसी नजरो से बदन ढंकने की खातिर 
मै आँखों की पानी बेचती हूँ 
दर्द से कराहते बच्चो की खातिर 
हाँ मैं बदन बेचती हूँ 
पर इन सफ़ेदपोशो के जैसे 
अपने ज़मीर नही बेचती हूँ 
चाँद सिक्को की खातिर 
अपना ईमान नही तौलती हूँ 
कोई चोरी पाप नही कोई 
जहां के भूखे भेड़ों से बचने की खातिर
अपनी दौलत नीलाम करती हूँ 
इन मासूम बच्चो की दो रोटी की खातिर 
हाँ मै बदन बेचती हूँ 
आखिर हूँ तो एक माँ 
नही देख सकती बच्चो का दर्द 
नही सुन सकती उनकी चीत्कार 
उन्हें जीवन देने की खातिर 
खुद विषपान करती हूँ 
हाँ मैं बदन बेचती हूँ---
---पंकज भूषण पाठक "प्रियम "

27 जनवरी 2018

तुम तितली बन जाओ.....पंकज भूषण पाठक"प्रियम"

चली वासन्ती मलयन
भ्रमरों का ये अनुगूंजन है
नवकलियों का यौवन
देता निश्छल आमन्त्रण है

कामदेव का रति से
चला प्रणय अनुराग है
बावली बन फिर रही
तितली बैठी पराग है।

वासन्ती रंग रँगी वसुधा
फिजां में छाई बहार है।
फूलों का ओढ़ चादर
प्रेमरस भरा श्रृंगार है।

रस से भीगी है रसा जो
बनी हर कली शबाब है
तुम तितली बन जाओ
 बने हम तेरा गुलाब हैं।

फूलों से तितली का जीवन
तितली फूलों का श्रृंगार है
तूम पी लो सारा रस मेरा
हम मुरझाने को तैयार हैं।
©पंकज भूषण पाठक"प्रियम"

22 जनवरी 2018

मधुमास के प्रथम दिवस में......पंकज भूषण पाठक "प्रियम"


मधुमास के प्रथम दिवस में
है प्रियम का ये अभिनन्दन प्रिये
पूर्णचन्द्र की क्षीण कला सी
अम्बर को छूती चपला सी
लहराई यूँ कनक लता सी
धरा अम्बर का है ये मिलन प्रिये।
अंतर की मधुमयी विकलता
अधरों में छलकी थिरकन
सांसों के मनमोहक सुर में
पलकों का निश्चल आमन्त्रण प्रिये।
याद कर रही अलस सुबह में
रतजगी पलको का स्पंदन
द्वार देहली खड़ी निरखती
भ्रमरों का मादक अनुगूँजन प्रिये।
अरे!वही तो फिर फिर आती
विम्बाधर में मादक थिरकन
अधखुले अधरों पर मानो
जलगुलाब की आयी छलकन प्रिये।
मृदु लालित्य बासन्ती मलयन
की हल्की हल्की सी सिहरन
स्वप्निल मादक नयनों से
मन्दिर माधवी का अभिनन्दन प्रिये।
नवकलिओं के स्पर्श को
सुनो मधुकर का अनुगूँजन
धूप में नहायी पहली किरण
कर रही कैसी प्रणय निवेदन प्रिये।
नींद से भारी अलसायी
यौवन की खुमारी छायी
बोझिल पलके बार बार
किस कदर भेदती उर निर्मम प्रिये।
बौराये आम्र तरुओं से
टपकते रसमंजरी से
भीगी रसा मदहोश
चला मरुत करने आलिंगन प्रिये।
मतवाली कोयल काली
पुष्पबोझ में झुकी डाली
बाल मन तरंगों वाली
मन माधव का अभिनन्दन प्रिये।
इस मधुरिम बेला में
न रूठो मेरी प्रियतमे
आओ करीब बाहों में
भर करूँ जी भर आलिंगन प्रिये।
-पंकज भूषण पाठक "प्रियम"

20 जनवरी 2018

एक औरत का वेश्या बनना / मंजरी श्रीवास्तव


जब अजनबी थे हम
तुमने मुझे जानना चाहा
मैंने भी हंसकर
अपने बारे में तुम्हें बताया
हम दोस्त बने
जब तुमने दोस्ती का हाथ बढ़ाया
फिर तुमने मुझे प्रेमिका कहा
जब मैंने प्रेम में अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया
तो सबसे पहले
तुमने ही मुझे
बनाया ‘वेश्या’!





19 जनवरी 2018

अन्याय के विरुद्ध / पूनम तुषामड़

शहर में कोई हिन्दू मरा
मैं इसके खिलाफ हूं
कोई मुस्लिम
दंगों का शिकार हुआ
मैं उसके खिलाफ हूं
किसी सिक्ख के धर्म का अपमान हुआ
मैं उसके भी खिलाफ हूं
किसी ईसाई को अपने ही देश में
विदेशी कह कर मारा जाए
मैं इसके भी खिलाफ हूं

मैं लडूंगी
हर धर्म हर सम्प्रदाय
में होने वाली हर ज्यादती के खि़लाफ
परन्तु
क्यों नहीं आता कोई हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई
मेरे साथ
उस अन्याय के विरुद्ध
जो कभी खैरलांजी
झज्जर दुलीना और गोहाना
का कहर बन
बरस जाता है
मेरे समाज पर
क्या कोई देगा साथ
मेरे हकों की लड़ाई में
उनके लिए जो
बार-बार अनेकों बार
बहलाए गए फुसलाए गये
और धकेल दिए गये हाशिए पर
धर्म और जाति के दोज़ख़ में
कभी दलित सिक्ख और दलित ईसाई बनाकर...?