25 मई 2017

रमेशराज के प्रेमपरक दोहे




रमेशराज के प्रेमपरक दोहे 
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तुमसे अभिधा व्यंजना तुम रति-लक्षण-सार
हर उपमान प्रतीक में प्रिये तुम्हारा प्यार |
+रमेशराज

+मंद-मंद मुसकान में सहमति का अनुप्रास
जीवन-भर यूं ही मिले यह रति का अनुप्रास |
+रमेशराज


तुमसे कविता में यमक तुमसे आता श्लेष
तुमसे उपमाएं मधुर तुम रति का परिवेश |
+रमेशराज

तुमसे मिलकर यूं लगे एक नहीं हर बार
सूरज की पहली किरण प्रिये तुम्हारा प्यार |
+रमेशराज

गहरे तम के बीच में तुम प्रातः का ओज
तुमसे ही खिलता प्रिये मन के बीच सरोज |
+रमेशराज

नयन कमल से किन्तु हैं उनके वाण अचूक
बोल तुम्हारे यूं लगें ज्यों कोयल की कूक |
+रमेशराज

और चलाओ मत प्रिये यूं नैनों के वाण
होने को है ये हृदय अब मानो निष्प्राण |
+रमेशराज

तुम प्रत्यय-उपसर्ग-सी तुम ही संधि-समास
शब्द-शब्द वक्रोक्ति की तुमसे बढ़े मिठास |
+रमेशराज

तुम लोकोक्ति-मुहावरा तुम शब्दों की शक्ति
तुमसे गूंगी वेदना पा जाती अभिव्यक्ति |
+रमेशराज

चन्दन बीच सुगंध तुम पुष्पों में बहुरंग
हर पल चंदा से दिपें प्रिये तुम्हारे अंग |
+रमेशराज

छा जाता आलोक-सा मन के चारों ओर
गहरे तम के बीच प्रिय तुम करती हो भोर |
+रमेशराज

कमल खिलें, कलियाँ हंसें तुम वो सुखद प्रभात
तुम्हें देख जल से भरें सूखे हुए प्रपात |
+रमेशराज

तन में कम्पन की लहर प्रिये उठे हर बार
तुमको छूकर ये लगे तुम बिजली का तार |
+रमेशराज

तुम सावन का गीत हो झूला और मल्हार
रिमझिम-रिमझिम बरसता प्रिये तुम्हारा प्यार |
+रमेशराज
     

प्रिये तुम्हें लखि मन खिला, मौन हुआ वाचाल
कुंदन-काया कामिनी कल दो करो निहाल |
+रमेशराज 

तू ही तो रति-भाव है, यति गति लय तुक छंद
प्रिय तेरे कारण बसा कविता में मकरंद |

+रमेशराज
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Rameshraj, 15/109, Isanagar, Aligarh-202001
Mo.-9634551630

22 मई 2017

रमेशराज 6 चतुष्पदियाँ





रमेशराज 6 चतुष्पदियाँ 
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1. 
नेता बाँट रहे हैं नोट
सोच-समझ कर देना वोट
कल मारेंगे तुझको लात
आज रहे जो पांवों लोट |
+रमेशराज
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2.  
पी पऊआ, नाली में लोट
दे बेटा गुंडों को वोट,
यही चरेंगे गद्दी बैठ
तेरे हिस्से के अखरोट |
+रमेशराज  

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3.
भारत माता भारत माता भारत माता की जै रे
कमरतोड़ महगाई से तू थोड़ी-सी राहत दै रे ,
सँग भारत माता के तेरी भी जय-जय हम बोलेंगे
लालाजी नहीं अरे जनता की सुख से झोली भरी दै रे |
+रमेशराज    
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4.
हमको सत्ता-धर्म निभाना अच्छा लगता है
आज अदीबों को गरियाना अच्छा लगता है,
कहने को हम कवि की दम हैं बाल्मीकि के वंशज पर
कवि-कुल को गद्दार बताना अच्छा लगता है |
+रमेशराज
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5.
सच्चे को मक्कार बताने का अब मौसम है
गर्दन को तलवार बताने का अब मौसम है ,
जनता की रक्षा को आतुर अरे जटायू सुन
तुझको भी गद्दार बताने का अब मौसम है |
+रमेशराज
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6.
गिरगिट जैसे रन्ग बदलने का अब मौसम है
सच के मुँह पर कालिख मलने का अब मौसम है,
पुरस्कार लौटाकर तू गद्दार कहाएगा
बाजारू सिक्कों में ढलने का अब मौसम है |

+रमेशराज
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15/109, ईसानगर, अलीगढ़ 
मो.-९६३४५५१६३०

18 मई 2017

रमेशराज के 10 मुक्तक




रमेशराज के मुक्तक 
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1.
“असुर ” कहो या बोलो-“ खल हैं “
हम मल होकर भी निर्मल हैं |
साथ तुम्हारे ‘ सच ‘ होगा पर-
अपने साथ न्यूज-चैनल हैं ||
+रमेशराज
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2.
जटा रखाकर आया है, नवतिलक लगाकर आया है
मालाएं-पीले वस्त्र पहन, तन भस्म सजाकर आया है
जग के बीच जटायू सुन फिर से होगा भारी क्रन्दन  
सीता के सम्मुख फिर रावण झोली फैलाकर आया है |
+रमेशराज

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3.
गाली देते प्रातः देखे, संध्याएँ पत्थरबाज़ मिलीं
ईसा-सी, गौतम-गाँधी-सी संज्ञाएँ पत्थरबाज़ मिलीं |
कटुवचन-भरा, विषवमन भरा भाषा के भीतर प्रेम मिला
अब सारी चैन-अमन वाली कविताएँ पत्थरबाज़ मिलीं |
+रमेशराज     

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4. 
हम शीश झुकाना भूल गये
सम्मान जताना भूल गये,
तेज़ाब डालते नारी पर
अब प्यार निभाना भूल गये |
+रमेशराज 

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5.
ये टाट हमेशा हारेंगे चादर-कालीनें जीतेंगे
तू सबको रोज नचाएगा तेरी ये बीनें जीतेंगी |
तू सबसे बड़ा खिलाड़ी है इस भ्रम में प्यारे मत जीना
ये सफल हमेशा चाल न हो , मत सोच मशीनें जीतेंगी ||
+रमेशराज

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6.
बस यही फैसला अच्छा है
मद-मर्दन खल का अच्छा है |
जो इज्जत लूटे नारी की
फांसी पर लटका अच्छा है ||
+रमेशराज


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7.
सब हिस्से के इतवार गये
त्यौहार गये सुख-सार गये,
हम मोहरे बने सियासत के 
वे जीत गये हम हार गये
+रमेशराज 
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8.
मिलता नहीं पेट-भर भोजन अब आधी आबादी को
नयी गुलामी जकड़ रही है जन-जन की आज़ादी को |
भारत की जनता की चीख़ें इन्हें सुनायी कम देतीं
हिन्दुस्तानी चैनल सारे ढूंढ रहे बगदादी को ||
+रमेशराज
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9.
पेड़ों से बौर छीन लेगा
खुशियों का दौर छीन लेगा |
हम यूं ही गर खामोश रहे
वो मुँह का कौर छीन लेगा ||
+रमेशराज 


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10.
केसरिया बौछार मुबारक
होली का त्यौहार मुबारक |
जो न लड़ा जनता की खातिर
उस विपक्ष को हार मुबारक ||
+रमेशराज


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रमेशराज, 15/109 ईसा नगर, अलीगढ़-२०२००१ 
मो.-९६३४५५१६३०   

तेवरी




|| तेवरी ||
बुझते सपनों को मिल साथी कुछ तो दो आकर नया
नव निर्माण चाहता भारत माँग रहा आधार नया |

नाम धर्म का ले भारत में जाने कितनी जान गईं
नफरत को दो प्रीति रीति का श्रीमान संसार नया |

भेद मिटें सब जात-पांत के प्रान्तवाद के स्वर टूटें
और न कर बैठे अरि हम पर सोच-समझकर वार नया |

बहुत झुलस ली भोली जनता भेद-भाव की आतिश में
और न रख जाये भेदों का अब दुश्मन अंगार नया |

उत्तर यदि होगा उत्तम तो जय-जयकार सुनायी दे
श्रीमान जनता को भाए सत्ता का अभिसार नया |

+रमेशराज

तेवरी




|| तेवरी ||
बदगुमाँ पहले न था ऐसे ज़ेहन कश्मीर का |
नफरतों से भर रहा तू पाक मन कश्मीर का |

फिर किया घायल इसे तेरी सियासी चाल ने
पड़ रहा हमको सुनायी फिर रुदन कश्मीर का |

जो उठाये आँख इस पर फोड़ दें हम आँख वो
हमसे रक्षा का जुड़ा है हर वचन कश्मीर का |
+रमेशराज