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10 सितंबर 2019

तेवरी में गीतात्मकता +योगेन्द्र शर्मा


तेवरी में गीतात्मकता

+योगेन्द्र शर्मा
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                ग़ज़ल के जन्म के समय, लगभग सभी प्रचलित विधाएं, कथ्य पर ही आधारित थीं। ग़ज़ल का कथ्य था, हिरन जैसे नेत्रों वाली ;मृगनयनी से प्रेमपूर्ण वार्तालाप। भजन का कथ्य था, अपने इष्ट के प्रति समर्पण तथा मर्सिया किसी दिवंगत के प्रति श्रद्धा-सुमन अर्पण था आदि।
                वैज्ञानकि कहते हैं कि स्वभाव से नकलचीबन्दर हमारे पूर्वज थे। कटुसत्य तो यही है कि हम भेंड़ों से सर्वाधिक प्रभावित हैं। जिस स्थान पर भीड़ जुट जायें, अथवा जो व्यक्ति-भीड़ जुटा ले, उसे ही पवित्राता, महानता का चश्मा पहना देते हैं। हमारे पड़ोस में एक छोटा सी जीर्ण-शीर्ण मन्दिर है, वैसे ही पुजारी जी, पूजा में लीन, दुनियादारी से हीन। मेरे पड़ोसी मित्र कहते हैं, इस बेकार मन्दिर में जाकर क्या करेगें? यहाँ से कुछ दूर अति भव्य मन्दिर है, बड़ी बड़ी कारों में सेठ आते हैं, सैकड़ो भक्त आते हैं, बड़ा सिद्ध मन्दिर है, जो माँगो सो मिलता है। आजकल तो राजनैतिक पार्टियाँ लोकप्रिय खिलाडि़यों व अभिनेताओं को धड़ाधड़ टिकट बाँट रही हैं, क्योंकि वह भीड़ जुटाने में सक्षम हैं।
                वह जीर्ण-शीर्ण मन्दिर जहां दो चार भक्त ही आते हैं, वह छोटा-सा मन्दिर ही-तेवरी का घर है, और वह भव्य मन्दिर जहाँ भक्तों की भीड़ है, हजारों का चढ़ावा है- ग़ज़ल का घर है। क्या संख्या का बल ही, वास्तविक बल है ! क्या हमारा कर्तव्य पूर्व महाकवियों का अन्धानुकरण करना ही है? क्या यही तर्क काफी है, कि हर भाव की अभिव्यक्ति का एकमात्र माध्यम ग़ज़ल ही है।                      इतिहास गवाह है, कि जब-जब किसी नये विचार ने जन्म लिया है, यथास्थितिवादियों ने सदा उसकी उपेक्षा की, उपहास किया, फिर विरोध किया और कड़े संघर्ष के पश्चात उसे स्वीकार भी किया।
                यूं शैशवकाल में ग़ज़ल अपने पाले भी ही रही, सामन्तों, बादशाहों राजाओं की लाडली रही। ग़ज़ल एक अर्से तक राजाश्रय में फलते-फूलती रही। धीरे-धीरे वह वर्तमान समाज की विसंगतियों व्यवस्था-विरोध, असंतोष की अभिव्यक्ति बन गयी। कभी-
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है, जोर कितना, बाजु-ए-कातिल में है।
                जैसी ग़ज़लों ने आजादी के सिपाहियों को आत्मोत्सर्ग की राह पर चलने को प्रेरित किया। आजकल तो हर भाव की अभिव्यक्ति ग़जल के माध्यम से कर देना, एक फैशन बन गया है।
                हमारा ग़ज़लकारों से अनुरोध है कि भले ही आप हमें तेवरीबाज और तेवरी को घेवरीकहकर मजाक उड़ायें, आपको स्वागत है। आपको अपनी मृयनयनीसे प्रेमपूर्ण बातचीत करनी है, तो बाखुशी ग़ज़ल लिखें, परन्तु यदि आपको व्यवस्था से युद्ध करना है, तो क्या यहीं रोमांटिकनाम ही बचा है, आपके पास? क्या आपके पास नामों का अकालहै? या फिर बताया जाये, कि हम वैचारिक रूप से कहाँ ग़लत है? क्या हिवस्की में शक्ति-रूह-अफ्ज़ा मिलाना उचित है? यदि कोई दवा कम्पनी द्राक्षासव को लेबिल लगा कर आपको कुमारी आसव दे रही है, तो क्या यह ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी नहीं है, ठीक है, ‘तेवरीअटपटा लगता है, तो कोई दूसरा नाम सुझा दीजिये, परन्तु किसी विधा से ऐसी मनमानी, घालमेल मत कीजिये।
                तेवरी की प्रेरणास्रोत भले ही ग़ज़ल रही हो, परन्तु वह आज शिल्प व कथ्य की दृष्टि से गीत के अधिक करीब है। ग़ज़ल का हर शेर जहाँ स्वयं में मुकम्मलहोता है, वहां तेवरी का हर तेवर आपस में अन्तरसंबंधित होता है। भावान्वति में एकरसता होती है, निरन्तरता होनी है।
                अरूण लहरी की यह तेवरी, एक बेरोजगार का सरकार को खुला-पत्रा प्रतीत होता है। हर तेवर एक माला की तरह आपस में गुथा हुआ है-
हर नैया मंझधार है प्यारे
टूट गयी पतवार है प्यारे।
हर कोई भूखा नंगा है
ये कैसी सरकार है प्यारे।   
शिक्षा पाकर बीए , एमए
हर कोई बेकार है प्यारे।
                इसी क्रम में योगेन्द्र शर्मा की तेवरी का हर तेवर, माला जैसा प्रतीत होता है। वस्तुतः यह तेवरी, एक भ्रष्ट थानेदार पर लिखी गयी पाती’-सी प्रतीत होती है-
डाकुओं कौ तुमही सहारौ थानेदारजी
नाम खूब है रह्यो, तुम्हारौ थानेदारजी।
सच्चे ईमानदार डूब गये नदी बीच
गुंडन कूं रोज तुम तारौ थानेदारजी।
देवे नहीं घूस कोई, फिर तौ जी आपको
फौरन ही चढि़ जात पारौ थानेदारजी।
                एक अभावों में पली-बढ़ी मध्यवर्गीय गृहणी, अपनी सहेली को अपनी मनोव्यथा, सुरेश त्रस्त की तेवरी के माध्यम से सुना रही है। हर तेवर की भावान्वति दूसरे से अन्तरसंबंधित है। तेवरी दृष्टव्य है-
दलदल में है गाड़ी बहिना,
गाड़ीवान अनाड़ी, बहिना।
दुख के पैबन्दों में जकड़ी
खुशियों की हर साड़ी बहिना।
साँस-साँस पर दुखदर्दों की
चलती आज कुल्हाड़ी बहिना।
                आम जनता को जगाती, ज्ञानेन्द्र साज की एक ऐसी ही तेवरी, मुलाहिज़ा हो-
लूट रही सरकार, साथी जाग रे
कर कोई उपकार, साथी जाग रे।
तेरे-मेरे सबके तन पर है अब तो
महंगाई की मार, साथी जाग रे।
                असंतोष आक्रोश-भरी इस तेवरी के माध्यम से कवि रमेशराज अपनी लेखनी से ही वार्तालापरत हैं, तेवरी-
अब हंगामा मचा लेखनी
कोई करतब दिखा लेखनी।
मैं आदमखोरों से लड़ लूँ
तुझको चाकू बना लेखनी।
सब घायल हैं इस निजाम में
कौन यहाँ पर बचा, लेखनी।
                गोपियाँ ज्ञानी ऊधो को ज्ञान दे रही हैं, निम्न तेवरी के माध्यम से भावन्वति की निरन्तरता दृष्टव्य है-
सुख बस्ती में श्याम ने ऐसे बाँटे रोज
दर्द गया हर गाल पर, जड़ कर चाँटे रोज। मरें हम कब तक ऊधो?
डकैतियाँ तो पड़ गयी पहुंच न पायी चौथ
इस पर थानेदार ने डाकू डाँटे रोज। मरें हम कब तक ऊधो?
                बहाना तो ज्ञानवान ऊधो को ज्ञान का दान है, परन्तु अज्ञानी गोपियाँ रमेशराज की इस तेवरी के माध्यम से सारी व्यवस्था पर निर्मम चोट कर जाती है। शिल्प व कथ्य दोनों की दृष्टि से उद्धृत तेवरी ग़जल से मीलों दूर है-
                                नौकरशाही ने किये  ऊधो अजब कमाल
दफ्तर-दफ्तर बैठ कर खींची जन की खाल। लाल जसुदा के चुप हैं।
                                साँस-साँस में भर गयी नयी विषैली वायु
वृन्दावन भी हो गया, जैसे अब भोपाल। लाल जसुदा के चुप हैं।
                रमेशराज, एक प्रयोगधर्मी कवि के रूप में, एक हाइकुदार तेवरी के माध्यम से , जनता जनार्दन का असंतोष व्यक्त करते हैं। भोली गोपियाँ, किस प्रकार विद्वान ऊधो की खबर ले रहीं हैं, उक्त तेवरी में दृष्टव्य हैं-
पहले भूख मिटाइये, ऊधो ब्रज में आप।
फिर मोबाइल लाइये, ऊधो ब्रज में आप। सियासी दाँव न खेलो।
हरित क्रान्ति रट रात-दिन, बिन बिजली बिन खाद
हमको मत भरमाइये, ऊधो ब्रज में आप। सियासी दाँव न खेलो।
                वस्तुतः हम कह सकते हैं कि तेवरी एक स्वतंत्रा, व स्वावलम्बी व सम्पूर्ण विधा है, जो गीत और गीतात्मकता के साथ आत्मीय सबंध बना चुकी है। भले ही तेवरी लिखने वालों कवियों की संख्या, गिनी-चुनी है, परन्तु तेवरी के जन्म के पीछे जो तर्क, जो ऊर्जा है, उससे कोई इन्कार नहीं कर सकता।
                                                                               
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सम्पर्कः 3@29 सीलक्ष्मीबाई मार्ग रामघाट रोड, अलीगढ़     . मो-9897410320,  9760002274


कविता में ‘तेवरी प्रयोग’ साहित्य के लिए एक सुखद अनुभव *विश्वप्रताप भारती

कविता में तेवरी प्रयोग’ साहित्य के लिए एक सुखद अनुभव

*विश्वप्रताप भारती
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                                श्री रमेशराज छंदबद्ध कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं। तेवरी लेखन’ एवं विचार को लेकर रस की निष्पत्ति पर वैचारिक विवेचन’ में उनकी एक अलग पहचान है। रमेशराज ने ग़ज़ल विधा में नये-नये तेवरों को ग़ज़ल न कहकर तेवरी बताकर हिन्दी साहित्य में विधागत विमर्श को आगे बढ़ाया है। तेवरी विधा को पहचान और स्थापन दिलाने के लिए तेवरीपक्ष का संपादन-प्रकाशन कियाजिससे वे लगातार जूझते रहे। हिन्दी की प्रगतिशील-जनवादी कविता में जिला अलीगढ़ से बहुत नाम आते हैंउनमें रमेशराज शीर्षस्थ हैं। ये कहना गलत न होगा कि आलोचकों ने उनकी पुस्तकें तो पढ़ी लेकिन उनका नाम लेने सेउनकी चर्चा करने से कतराते रहे। चूंकि तेवरी पर आलोचक चुप्पी साधे रहे। कुछ आलोचकों ने तो तेवरी लिखने वालों को तेवरबाज तक कह डाला।
                रमेशजी अपनी लम्बी तेवरी पुस्तक- घड़ा पाप का भरा’ [तेवर शतक] के माध्यम से एक बार फिर चर्चा में है। उनकी तेवरियों को पढ़कर हर एक व्यक्ति ये महसूस कर सकता है, ‘अरे ये तो हमारे मन की बात कह दी।’ शायद लेखक के लिखने की यही सफलता है। 
                सामान्यतः कविता दूसरों को कुछ बताने के लिए लिखी जाती है जो मानवीयता के पक्ष की मुखर आवाज बनती है। मानवीयता के स्तर पर कविता में जो भाव आते हैंवे अद्भुत होते हैं। रमेशजी की कविता [तेवरी] में ये भाव एक बड़ी सीमा तक विद्यमान हैं-
                ‘‘ ‘तेरे भीतर आग है- लड़ने के संकेत
                बन्धु किसी पापी के सम्मुखतीखेपन की मौत न हो।
                जन-जन की पीड़ा हरेजो दे धवल प्रकाश
जो लाता सबको खुशहालीउस चिन्तन की मौत न हो।’’
  
              वस्तुतः आज आमआदमी की जिन्दगी इतनी बेबस और उदास हो गयी है कि वह समय के साथ सेजीवन के साथ से छूटता जा रही है। संवेदनाशून्य समाज की स्थिति कवि को सर्वाधिक पीडि़त करती है-
                ‘‘कायर ने कुछ सोचकर ली है भूल सुधार
                डर पर पड़ते भारी अब इस संशोधन की मौत न हो।’’
                समाज में जो परिवर्तन या घटनाएँ हो रही हैंवे किसी एक विषय पर केन्द्रित नहीं हैं। घटनाओं के आकार बदले हैंप्रकार बदले हैं। इन घटनाओं के माध्यम से नयी संस्कृति जन्म ले रही है तो कहीं लूटहत्याचोरीबलात्कारघोटालानेताओं का भृष्टाचारसरकारी कर्मचारियों की रिश्वतखोरीकानूनी दाँवपेंच का दुरुपयोग जैसी घटनाएँ सामने आ रही है-
                ‘‘लोकपाल का अस्त्र लेजो उतरा मैदान
                करो दुआएँ यारो ऐसे रघुनन्दन की मौत न हो।
                नया जाँच आयोग भी जाँच करेगा खाक
                ये भी क्या देगा गारण्टी कालेधन की मौत न हो’’
                कविता में भोगे हुए यथार्थ की लगातार चर्चा हुई हैलेकिन उसके चित्र तक। दलित लेखकों ने इस सीमा को तोड़ा है। दलित लेखकों ने अपने लेखन में जहाँ समस्याओं को दिखाया है तो वहीं उनका समाधान भी बताया है। रमेशजी दलित नहीं हैं। उनका जन्म विपन्न परिवार में हुआइसलिए दलितों के प्रति व्यक्तिगत तौर पर उनकी पीड़ा घनीभूत है। निःसंदेह आज दलितों ने निरन्तर प्रयास के बावजूद अपना जीवन-स्तर बदला है। अपने लिए अनंत संभावनाओं का आकाश तैयार कर लिया है परन्तु समाज में अभी भी कुछ ऐसा है जिससे लेखक आहत है-
                पूँजीपति के हित यहाँ साध रही सरकार
                निर्बल दलित भूख से पीडि़त अति निर्धन की मौत न हो।
                लिया उसे पत्नी बनाजिसका पिता दबंग
                सारी बस्ती आशंकित है अब हरिजन की मौत न हो।’’
                कवि ने आजादी की लड़ाई के माध्यम से राजनीति के दोगलेपन पर तीखा प्रहार किया है-
                झाँसी की रानी लिए जब निकली तलवार
                कुछ पिट्ठू तब सोच रहे थे प्रभु लंदन की मौत न हो
       
         कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द्र के उपन्यास गोदान के युवा पात्र गोबर’ के माध्यम से कवि ने करारी चोट की है। ऐसे गोबर आज हर जगह मिल जायेंगे जो समाज और देश के विकास के लिए चिन्तित हैं-
                ‘झिंगुरी’, दातादीन’ को जो अब रहा पछाड़
                ‘होरी’ के गुस्सैल बेटे गोबरधन’ की मौत न हो।
   
             हिन्दी साहित्य में नये-नये प्रयोग होते रहे हैं आगे भी होते रहेंगे। कविता में तेवरी प्रयोग’ साहित्य के लिए एक सुखद अनुभव है जो सामाजिक सन्दर्भों से गुजरते हुए समसामयिक युगबोध तक ले जाता है। तेवरी अपना काम बखूबी कर रही है। तेवरीकार के शब्दों में-
                ‘‘इस कारण ही तेवरी लिखने बैठे आज
                किसी आँख से बहें न आँसूकिसी सपन की मौत न हो।’’
      
          स्पष्ट हैतेवरी नयी सोचनयी रोशनी लेकर आई है। प्रस्तुत तेवरी शतक में सभी रचनाएँ आँखें खोलने वाली हैं। विलक्षण और अद्भुत। आशा है लेखक तेवरी विधा को स्वतंत्र विधा के रूप में अपनायेंगेऔर बढ़ायेंगे।

-विश्वप्रताप भारती
बरला अलीगढ़ [उ.प्र.]