28 मार्च 2017

रोटियों से भी लड़ी गयी आज़ादी की जंग +रमेशराज




रोटियों से भी लड़ी गयी आज़ादी की जंग

+रमेशराज
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    कुछ कांग्रेस के पिट्टू इतिहासकार आज भी जोर-शोर से यह प्रचार करते हैं कि बिना खड्ग और बिना तलवार के स्वतंत्रता संग्राम में कूदने वाले कथित अहिंसा के पुजारियों के आत्मसंयम, आत्मबल और स्वपीड़ासे भयभीत होकर आताताई और बर्बर अंग्रेज भारत को आजाद करने को मजबूर हुए। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की असली तस्वीर नहीं है। अगर आजादी सावरमती के संत के ब्रहमचर्य के प्रयोगोंके बूते आयी तो कांग्रेस उस काल के 1942 के जन आंदोलन को भारतीय जनमानस के सम्मुख क्यों नहीं लाती, जिसमें भले ही गांधी जी ने अहिंसात्मक आंदोलन किये जाने पर जोर दिया था, किंतु सरकारी दमन से विक्षिप्त और क्रुद्ध होकर कथित अहिंसा को नकारते हुए जनता ने अंग्रेजों के सरकारी 250 रेलवे स्टेशनों को नष्ट कर दिया। 600 डाकघरों को आग के हवाले किया। 3500 टेलीफोन और टेलीग्राम के तारों को काट दिया। 70 थानों को जलाकर राख किया। 85 सकारी भवनों को धूल-धूसरित कर डाला। 9 अगस्त 1942 से लेकर 31 दिसम्बर 1942 तक बौखलायी सरकार ने 940 स्वतंत्रता सेनानियों को गोलियों से भूनकर सदा के लिये संसार से विदा कर दिया। पुलिस और सेना की गोलियों की बौछार के बीच 1630 क्रान्तिवीर घायल हुए। 18000 सेनानियों को रक्षा कानून के अंतर्गत तो 60229 सेनानियों को हिंसा फैलाने और रक्तपात करने के आरोप में सलाखों के पीछे भेजा गया।
    भारत छोड़ो आन्दोलन का यह क्रान्तिकारी स्वरूप गांधी जी की अहिंसा और उनकी स्व पीड़नकी नीति पर एक तमाचा था। इस तमाचे और अहिंसावादियों के तमाशे के बीच सिर उठाती कटु सच्चाई केवल यही बयान करती है कि भारतवर्ष गांधी जी की अहिंसा से नहीं, क्रान्ति की फैलती ज्वाला के कारण आजाद हुआ। इस तथ्य को चर्चिलइग्लैंड की लोकसभा में इस प्रकार रखते हैं-‘‘कांग्रेस ने अब अहिंसा की उस नीति को, जिसे गांधी जी एक सिद्धांत के रूप में अपनाने पर जोर देते आ रहे थे, त्याग दिया है और क्रान्तिकारी आन्दोलन का रास्ता अपना लिया है।’’
    भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर यदि समग्र दृष्टि से सोचा-विचारा जाये तो यह तथ्य छुपा नहीं रह जाता है कि जो क्रान्ति की ज्वाला 1857 में भड़़की थी, उसे भड़काने में उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का महत्वपूर्ण योगदान है जो 1780 से ही सक्रिय थे। तत्समय एक विदेशी नागरिक ने कलकत्ता से देश का पहला अखबार बंगाल गजट’ और ‘जनरल एडवाइजरजिसे हीकीज गजटके नाम से भी पुकारा जाता है, में तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हैस्टिंग्ज और कम्पनी के अधिाकरियों की अनीति और मनमानी पर प्रहार किये थे। 1785 में बंगाल जर्नल’, ‘द वर्ल्ड ’, ‘टेली ग्राफ’, ‘कलकत्ता गजटनामक समाचार पत्रों में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अफसरों की घूसखोरी, अन्य काले कारनामों के खिलाफ जमकर लिखा गया। 9 अप्रैल 1807 को आम सभाओं पर प्रतिबंध लगने के बाद क्रान्तिवीरों ने पर्चे छापकर बाँटे और क्रान्ति की आग धधकायी। भारतीय पत्रकारिता के पहले शहीद मौलवी मोहम्मद वकार ने फिरंगियों और उनकी सरकार के खिलाफ  जमकर कलम चलायी।
    स्वतंत्रता संग्राम के कलम के सिपाहियों में एक तरफ  जहाँ लोकमान्य तिलक, विवेकानंद, भगत सिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रेमचंद, बालकृष्ट भट्ट, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालमुकुन्द गुप्त, राजा रामपाल सिंह, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, यशपाल, मन्मथनाथ गुप्त, सावरकर, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जैसे अनेक पुरोधा हैं, वहीं तीर-तलवार लेकर अंग्रेजों का रक्त-सत्कार करने वालों में रानी लक्ष्मीबाई, मदनलाल धींगरा, खुदीराम बोस, तात्या तोपे, मंगल पांडेय, सूर्यसेन, दामोदर चाफेकर, बेगम हजरत महल आदि का नाम जगत विख्यात है। लाला लाजपतराय, विपिनचन्द्र पाल, स्वामी श्रद्धानंद, सुभाषचन्द्र बोस चन्द्रशेखरआजाद , भगत सिंह, सूर्यसेन, अशफाक़उल्ला, रामप्रसाद बिस्मिल   आदि का जनभावनाओं को उभारकर अंगेजों के प्रति जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन करना भी एक ऐसा क्रान्तिकारी हथियार रहा है, जिसके आगे अंगेज थर-थर कांप उठे।
    क्रान्ति की भूमिका तैयार करने में कवियों-शायरों ने कविता को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने का भी काम किया। स्वतंत्रता संग्राम का पैगाम जन-जन तक पहुँचाने में महीदुद्दीन सलीम, शौक किदवई, फैज, मजाज, कैफी आजमी, साहिर लुधिायानवी, बहादुरशाह जफर, तिलक चंद, गोपीनाथ, झम्मन, आनंद नारायण मुल्ला, जोश मलीहाबादी, सोहनलाल द्विवेदी, राम प्रसाद बिस्मिल, आदि का योगदान भी अविस्मरणीय है।
    क्रान्ति की आग को घर-घर तक फैलाने या पहुँचाने के लिये रोटियोंका प्रयोग भले ही आश्चर्यजनक लगे किन्तु यह भी एक ऐसी सच्चाई है जिसका वर्णन इतिहास के पन्नों में दर्ज है। 1857 में एक तरफ जहाँ क्रान्तिकारियों की तलवारें चमकीं, बन्दूकें और तोपें गरजीं वहीं क्रान्ति की ज्वाला धधकाने के लिये और लोगों को अंग्रेजों के विरूद्ध संगठित करने के लिए गावं-गांव में चपातियाँभेजी गयीं। चपातियाँ म.प्र. के इन्दौर से निमाड़ में बाँटी गयीं। उत्तर भारत के अनेक जिलों जैसे मथुरा, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, बुलंदशहर, मेरठ आदि में ये चपातियाँ 1857 के जनवरी-फरवरी माह में बाँटी गयी। रोटियाँ बँटवाने का यह कार्य मद्रास में भी हुआ जिसके फलस्वरूप वैल्लौर में विप्लव हुआ। ये चपातियाँ कौन बनाता है और कहाँ से भेजी जाती हैं, इसका का पता अंगे्रजों के जासूस नहीं लगा पाये। चपातियों के माधयम से क्रान्ति का संदेश भेजने का ब्यौरा अंग्रेज अफसर थार्नाईल की डायरी के पृष्ट 23 पर दर्ज है।
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6 मार्च 2017

काव्य में सत्य, शिव और सौंदर्य +रमेशराज




काव्य में सत्य, शिव और सौंदर्य

+रमेशराज
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सत्य का संबंध लोकमंगल या मानवमंगल की कामनामात्र से ही नहीं, मानव मंगल के लिए काव्य में अपनाए गए उस वैचारिक एवं भावात्मक पक्ष से भी है, जिसमें आचार्य शुक्ल के अनुसार-‘‘उत्साह, क्रोध, करुणा, भय, घृणा आदि की गतिविधि में भी पूरी रमणीयता देखने को मिलती है, कवि जिस प्रकार प्रकाश को फैला हुआ देखकर मुग्ध होता है, उसी प्रकार अंधकार को हटाने में भी सौंदर्य का साक्षात्कार किया जा सकता है।’’
आचार्य शुक्ल ने काव्य में सत्य की स्थापना के लिए काव्य के जिस वैचारिक पक्ष की ओर संकेत किया है, उस मंगलकारी वैचारिकता का पूर्ण दर्शन हमें कबीर की उन रचनाओं में होता है, जिनमें क्रोध आदि के उग्र और प्रचंड भावों के विधान अपनी तह में करुणा का मार्मिक पक्ष संजोए हैं। इसलिए कबीर की दार्शनिक अभिव्यक्ति ही नहीं, खंडनात्मक अभिव्यक्ति में भी सौंदर्य का साक्षात्कार किया जाना चाहिए। लेकिन शैली के महाकाव्य ‘द रिबोल्ट ऑफ़ इस्लाम’ के नायक-नायिका के अत्याचारियों, आतातायियों के प्रति विद्रोही चरित्र की भूमिका की महत्ता स्वीकारने वाले आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, कबीर के धर्म-पाखंडियों पर किए गए प्रहारों को तनिक भी बर्दाश्त नहीं कर पाते? बल्कि उनकी लोकमंगल की सारी-की-सारी साधनावस्था मात्र तुलसी की साधनावस्था बनकर रह जाती है, जिसमें सत्य, शिव और सौंदर्य के नाम पर एक ऐसे मार्ग की खोज की जाती है, जिस पर चलने वाले भक्त के सहयात्री या शुभचिंतक वह मूल्य होते हैं जो संप्रदाय, व्यक्तिवाद, जातिवाद के उन लक्ष्यों तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं, जहां लोक की एक ऐसी कीर्तनियां मुद्रा बन जाती है, जिसमें ‘‘भक्त लोग उपदेश, वाद या तर्क की उपेक्षा चरित्र श्रवण और चरित्र कीर्तन का ही अधिक नाम लिया करते हैं।’’
साहित्य के शिव या मंगलपक्ष को तर्कवाद, उपदेश अर्थात् वैज्ञानिक चिंतन से काटकर सौंदर्य के साक्षात्कार का भला इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है? अवैज्ञानिकों तरीकों से की गई साहित्य की रसपरक, सौंदर्यपरक व्याख्याओं में जब तर्क की गुंजाइश ही नहीं हो तो चाहे जैसे कबीर की रचनाधर्मिता का खंडन किया जा सकता है और चाहे जैसे रामचरितमानस के रचयिता तुलसी को लोकमंगल, मानवमंगल का दृष्टा, चिंतक घोषित किया जा सकता है।
‘काव्य की साधनावस्था, जब लोकमंगल की साधनावस्था है’ जैसा कि आचार्य शुक्ल कहते हैं। वह यह भी मानते हैं कि-‘‘सब प्रकार के शासन में ‘चाहे धर्मशासन हो, चाहे राजशासन या संप्रदायशासन, मनुष्य जाति के भय और लोभ से पूरा काम लिया गया है। दंड का भय और अनुग्रह का लोभ दिखाते हुए राजशासन तथा नर्क का भय और स्वर्ग का लोभ दिखाते हुए धर्मशासन और मतशासन चलाते आ रहे हैं।’’
तब प्रश्न यह है कि आचार्य शुक्ल ने, ढोंगी, सांप्रदायिक, धार्मिक आडंबर से युक्त वर्ग की कलई खोलने वाले कबीर जैसे समाज सुधारक के काव्य को सत्य, शिव और सौंदर्य के पक्ष से क्यों काट डाला? इसी तरह शैली के काव्य की सार्थकता को स्वीकारते हुए टाॅलस्टाय के भ्रातृत्व प्रेम को खारिज करने के पीछे शुक्लजी की क्या मंशा रही है? देखा जाए तो इसके मूल में आचार्य शुक्ल की वह वैचारिक अवधारणाएं रही हैं, जो हर प्रकार के मंगल, लोककल्याणकारी, दयामय या उग्र और प्रचंड भावों के रूप में क्रोध और विद्रोह से युक्त अभिव्यक्ति का साक्षात्मकार अलौकिक शक्तियों जैसे राम-कृष्णादि के क्रियाकलापों में ही कर सौंदर्यसिक्त, रससिक्त होती है।
अतः यह कहना अनुचित न होगा कि आचार्य शुक्ल की सौंदर्य-दृष्टि के पीछे कहीं-न-कहीं ऐसे संस्कार अवश्य कार्य कर रहे हैं, जिनका कथित धार्मिक परंपराओं से कहीं-न-कहीं गहरा जुड़ाव है और यह धार्मिक जुड़ाव ही उनको वास्तविक और लौकिक सौंदर्य की पकड़ से परे कर डालता है।
भक्तिकाल की तरह सत्य के नाम पर जिस असत्य, अमंगल और असौंदर्य की स्थापना रीतिकाल में हुई है, वह व्यक्तिवाद का ऐसा जीता-जागता नमूना है, जिसमें नारी भोगविलास, कामुकता, रतिक्रिया में लीन नायिका का ऐसा बिंब प्रस्तुत करती है, जिसे न तो ब्रज में लगी आग की चिंता है और न भूखे-प्यासे बच्चों की। वह तो सामाजिक-पारिवारिक दायित्वों की उपेक्षा कर सिर्फ कृष्ण से मिलन में ही अपने उत्साह की जोर-आजमाइश करती है। दूसरी तरफ अलौकिक नायक कृष्ण, राधा और गोपियों के साथ ऐसी रस की होली खेलते रहते हैं, जिसमें डाले गये रंग, कपोल-चोली से लेकर जाने कहां-कहां अपना प्रभाव छोड़ते हैं।
    सामाजिक दायित्वों, मर्यादाओं का यह खुला उल्लंघन लोकमंगल के नाम पर कैसे सौंदर्यात्मक मूल्यों की स्थापना करेगाइसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है, लेकिन इस अमर्यादा, असमाजिकता का जिक्र करने का साहस उन विद्वजनों में भला मिल ही कैसे सकता है, जिनकी बौद्धिक क्षमताओं को कथित अलौकिक शक्तियों का जादू निगल गया हो। वे तो काव्य की सार्थकता, मार्मिकता, उक्ति वैचित्रय, बिंबात्मकता ऐसे ही दृष्टांतों में खोजेंगे कि कोई गोपी पानी भरने के लिए जमुना तट पर जा रही होगी, तथा काली-काली घटाएं घिरेंगी, बरसात होगी और गोपी की यह हालत होगी-
रपट्यौ पग घाट चढ्यौ न गयो
कवि मंडन ह्वै कै विहाल गिरी
चिर जीवहु नन्द कौ बारौ अरी
गहि बांह गरीबन ठाढ़ी करी।
अर्थात् गोपी पनघट पर बरसात के कारण धड़ाम से गिरेगी। नंदलाल कृष्ण जहां कहीं भी होंगे, उन्हें इस घटना का पता तो लग ही जाएगा [ वह अंतर्यामी जो ठहरे ], वे करुणा से द्रवीभूत गोपी के सामने प्रकट होंगे और उसकी बांह पकड़कर उठाएंगे। गोपी इस एहसान से द्रवीभूत होगी। चूंकि बरसात हो रही है, नायक-नायिका आमने-सामने हैं, इसके बाद क्या होगा, अनुमान पाठक स्वयं लगा सकते हैं। बरसात में किस गरीब की छत गिरी, किस गरीब का बच्चा निमोनिया का शिकार हुआ, किसका घर बाढ़ में डूबा? नंद किशोर के मन में ऐसे ब्रजवासियों के प्रति दया और करुणा के भाव क्यों जागृत नहीं होते? क्या उन्होंने गोपियों के साथ रतिक्रियाओं के माध्यम से ही लोकमंगल का ठेका ले रखा है?
कहने का अर्थ यह है कि मात्र रूप या देह भोग के माध्यम से सौंदर्य की स्थापना करने वाले कवि या रसमीमांसक न तो सत्य की स्थापना कर सकते हैं और न शिव की। सत्य शिव की स्थापना के लिए आत्मा के उस सौंदर्य की आवश्यकता पड़ती है जो शारीरिक सौंदर्यात्मकता को लोकमंगलकारी बनाता है। प्रेम की सार्थक और शाश्वत अर्थवत्ता तो कुछ इसी प्रकार के सदंर्भों में देखी जा सकती है जिसमें सामाजिक-पारिवारिक दायित्वों के बीच पसरे संघर्ष की मार्मिकता को साहस और उत्साह, प्रेम के साथ और अधिक प्रगाढ़ करता हुआ चला जाता है-
‘‘पहले की तरह अब भी
अच्छी लगती हैं तुम्हारी बांहें
लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम
उन्हें कुहनियों तक ढकी रखो
पहले की तरह तुम मुझे
अब भी विदा करती हो
लेकिन मेरी छाती पर खुली बटन
बंद कर देती हो।’’
सुदामा पांडेय धूमिल की ‘गृहयुद्ध’  शीर्षक से लिखी गई उक्त कविता में नायक-नायिका जिस सत्य की ओर इशारा करते है, वह सत्य हमें अजगरी व्यवस्था के उस चेहरे की पहचान कराता है, जो महंगाई के रूप में परिवार की सुख-शांति, प्रेम को निगलता जा रहा है। नायिका पारिवारिक संघर्षों में इतनी चुक गई है कि नायक उसकी कमजोर बांहों [ जो उसे अब भी अच्छी लगती हैं ] को कुहनियों तक ढंक देना चाहता था और नायक का शरीर इतनी दुर्बलता का शिकार हो गया है कि नायिका उसे काम पर भेजने से पूर्व, विदा करते समय, उसकी छाती के बटन रोज बंद कर देती है ताकि उसकी छाती पर उभरी पसलियां किसी को न दिखें।
उक्त कविता में कवि प्रेम के लिजलिजे कोरे रूप सौंदर्य से कोई प्रेम की सुखात्मक अनुभूति ग्रहण नहीं करता, बल्कि उसे तो वास्तविक सुख की अनुभूति कर्मक्षेत्र में होती है। वास्तविकता तो यही है कि एक-दूसरे के सुख-दुख में हिस्सेदारी करने वाले पात्रों की आपसी सूझबूझ ही एक ऐसे राग तत्त्व का निर्माण करती है, जिसकी रसात्मकता शाश्वत और अखंड सौंदर्य की पूर्णता की ओर ले जाती है, जिसमें नायिका की आंखें आंखें नहीं रह जातीं, बल्कि गरीबी की मार से लड़खड़ाते नायक के लिए सहारा देने वाले हाथ बन जाती हैं-
‘‘पत्नी की आंखें, आंखे नहीं हैं, जो मुझे थामे हुए हैं।’’
प्रेम के चरमोत्कर्ष की भावात्मक अभिव्यक्ति भला इससे बढ़कर और क्या हो सकती है, जो किसी भी प्रकार के आश्चर्यपूर्ण प्रसादन, अवसादन या कुतूहल मात्र को जन्म न देकर ऐसे आनंद की सृष्टि करती है, जो रस के नाम पर पाठक या श्रोता को पलायनवादिता या व्यभिचार का विष नहीं देती। वह तो पाठक या श्रोता के मन में ऐसे माधुर्य का प्लावन करती है, जिसके कारण स्वार्थमय जीवन की शुष्कता और विरसता विलुप्त हो जाती है। अगर सही अर्थों में देखा जाय तो यही कविता का कवितापन है, सत्य है, मंगलकारी तत्त्व है तथा चिरसौंदर्य की स्थापना का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001

मो.-9634551630       

काव्य में अलौकिकत्व +रमेशराज




काव्य में अलौकिकत्व

+रमेशराज
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काव्य का अलौकिकत्व सिद्ध करने के लिए रसाचार्यों ने रस को आनंद का पर्याय मानकर बड़े ही कल्पित तर्क प्रस्तुत किए। आदि रसाचार्य भरतमुनि ने जिन भावों, संचारी भावों, स्थायी भावों के संयोग से रसनिष्पत्ति का सूत्र गढ़ा था उन्होंने उसी सूत्र के टुकड़े कर डाले और कहा कि-
‘‘भाव तो लौकिक या जगत की अनुभूतियां हैं, जिनमें वे सारे लौकिक उपादन अंतर्निहित हैं, जिनके तहत एक भोजनभट्ट को मिठाई अच्छी लगती है, कृपण को धन अच्छा लगता है, दाता को दान देना रुचिकर है, यह सभी रुचिकर हैं।’’1
इसलिए इंद्रियज भोग का स्वप्न बहिर्मुखी है। वहां केवल अच्छा लगने से ही बात खत्म नहीं हो जाती। जिस वस्तु को देखकर अच्छा लगता है उसे प्राप्त करने की इच्छा होती है, अपनाने की मर्जी होती है। यह वस्तु एक ही समय दस जनों के पास नहीं रह सकती। इसीलिए अच्छी लगने वाली वस्तु को लेकर लोगों में विरोध मच जाता है। परिणामतः ऐसी स्थिति में अच्छी लगने वाली वस्तु को अपने अधीन करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को ‘कहां तक अच्छी लगनी चाहिए’, इसकी एक सीमा निर्धारित करनी पड़ती है। ‘‘यह वस्तु-विचार ही अच्छा या बुरा लगने की कसौटी है।’’2
‘‘अच्छा लगने की अनुभूति के साथ विषय इस प्रकार अविच्छेद्य ढंग से विद्यमान रहता है कि उसे हटा देने से अच्छा लगना भी समाप्त हो जाता है, इस अच्छे लगने को बनाए रखने के लिए वस्तुओं को सभी में मेल-मिलाप से बांटने के लिए नियमों की आवश्यकता होती है। इन्हीं नियमों के ऊपर राष्ट्र प्रतिष्ठित है। यह एक तरफ जैसे विधिनिषेध या नैतिकता का क्षेत्र है, दूसरी तरफ राष्ट्र-संयम या राज्य प्रशासन का क्षेत्र है, धर्म या कानून का क्षेत्र है। अच्छा लगना, बुरा लगना या व्यक्तिगत  अनुभूति के द्वारा काम की अच्छाई या बुराई की कसौटी यहां स्वतंत्र है।’’3
‘‘काव्य के संबंध में ऐसी कोई बात नहीं, क्योंकि यहां वस्तुओं की ऐसी कोई भीड़ नहीं, यहां विश्राम आनंदमय, रसमय, माधुर्यमय है। काव्य के  रसास्वादन में कोई द्वंद्व नहीं है। क्योंकि यहां रस का विश्राम है। वस्तु को लेकर यहां कोई छीना-झपटी नहीं है। इसलिए अन्य ऐंद्रिक विषयों के संदर्भ में जो अर्थ निकलता है, यहां अच्छा या बुरा कहने से वह अर्थ नहीं निकलता।’’1
काव्य में अलौकिकत्व के बारे में रसाचार्यों द्वारा दिए गए उक्त तर्कों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि-
1. लौकिक जीवन के सारे-के-सारे घटनाक्रम आनंदमय, रसमय, माधुर्यमय इसलिए नहीं होते, क्योंकि लौकिक भावानुभूति इंद्रियज भोग से युक्त होने के कारण स्वार्थ, मोह, लालच, प्रभुसत्ता, आमोद-प्रमोद, भोग-विलास आदि के व्यापार को जन्म देती है, जिससे पनपी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक विसंगतियों के निराकरण के लिए विधिनिषेध, नैतिकता, राष्ट्र-संयम, राज्य, प्रशासन, कानून आदि की आवश्यकता पड़ती है। कुल मिलाकर लौकिक भावानुभूति सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक क्षेत्र में द्वंद्व को जन्म देती है।
2. जहां तक काव्यानुभूति का प्रश्न है, यह अनुभूति अच्छे-बुरे, लोभ-लालच, छीना-झपटी आदि से सामाजिकों को मुक्त रखती है, क्योंकि यहां द्वंद्व नहीं होता। इसका आस्वादन सामाजिकों के मन को आनंद, रस और माधुर्य से सिक्त करता है।
    काव्य की आलौकिकता के संदर्भ में दिए गए उक्त तर्कों का सीधा –सीधा संबंध काव्य-सामग्री के आस्वादन और उसके आस्वादक से जोड़ा गया है। सतही तौर पर देखने या अनुभव करने से यह तर्क बड़े ही सारगर्भित और वैज्ञानिक लगते हैं, क्योंकि ऐसे तर्कों का तानाबाना ‘साधारणीकरण’ के सिद्धांत को और अधिक पुष्ट ही नहीं करता, उसे जीवंत और प्रासंगिक भी बनाता है। लेकिन अलौकिकता के संदर्भ में जब हम आस्वादक का मनौवैज्ञानिक विश्लेषण करने बैठते हैं, तो काव्य के संदर्भ में तैयार की गई ‘अलौकिकता’ की सारी-की-सारी किलेबंदी खोखली, बेबुनियाद और बेजान लगने लगती है।
कोई भी सुधी और वैज्ञानिक समझ रखनेवाला मनुष्य इस तथ्य को भली-भांति जानता है कि काव्य-सामग्री के रूप में चाहे मंच पर अभिनय करने वाले नट-नटी हों, या काव्य संबंधी पुस्तकें, ये सब लौकिक वस्तुएं हैं, और इनके द्वारा अभिव्यक्त भाषा, नीति, शील आदि अलौकिक न होकर लौकिक ही है, जिसका किसी भी प्रकार के आश्रय को बोध बिना इंद्रियों के या इन्द्रियभोग के संभव नहीं।
रही बात काव्य-सामग्री के आस्वादन अर्थात् इंद्रिय-भोग के उपरांत एक सामाजिक के रस-सिक्त, आनंद-सिक्त, माधुर्य-सिक्त होने की, तो इस प्रकार के आनंद की अवस्था [ जिसमें रसानुभूति सिर्फ सुखात्मक, आनंदस्वरूप हो जाती है अर्थात् सुख और दुख के द्वंद्व से परे ] हमारे सामाजिक जीवन में भी बहुधा देखने को मिल जाती है। अमर क्रांतिकारी भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव के चेहरे पर फांसी के समय भी वह ओज, वह माधुर्य, वह सुखानुभूति आलोकित थी, जिसके दर्शन जटिल द्वंद्व, संघर्ष और भय के समय काव्य के आस्वादक के चेहरे पर शायद ही मिलें। तब क्या इस सुखात्मक आनंद-स्वरूप को अलौकिक मान लिया जाये? आर्कमिडीज, न्यूटन जैसे अनेक वैज्ञानिकों के ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाते हैं, जिनके सुखात्मक आनंद-स्वरूप के दर्शन समझदार लोग तो कर ही सकते हैं, लेकिन जो साहित्य या काव्य को तर्क, शील, नैतिकता, द्वंद्व का विषय ही नहीं मानते, ऐसे कथित आनंदवादियों के समक्ष किसी भी प्रकार की बहस उठाना ही निरर्थक होगा। उन्हें तो कथित अलौकिकता की पूंछ पकड़ कर रस की वैतरिणी पार करनी है, सो कर रहे हैं, या करते रहेंगे।
रसवादियों के इन तर्कों या तथ्यों से इतर चाहे काव्य-सामग्री हो या उस काव्य-सामग्री के आस्वादन से उत्पन्न किसी भी आश्रय के मन में रस आनंद या माधुर्य का आलोक, अलौकिक नहीं, लौकिक ही है। इसके निम्न कारण हैं-
1. रस के कथित पंडित तर्क देते हैं कि “अपने इष्ट मित्र की हानि, मृत्यु आदि पर हमें शोक होता है और अपने प्रति शत्रुता का भाव देखकर हमें अन्य व्यक्ति पर क्रोध आता है, इन भावों की सुखात्मक-दुःखात्मक अनुभूतियों के तानेबाने से ही हमारा जीवन बुना है। भावों की यह अनुभूति लौकिक है।’’
भावों की अनुभूति के इस लौकिकस्वरूप के दर्शन क्या हमें काव्य में  नहीं होते? यदि नहीं होते हैं तो राम का सीता के प्रति विलाप, लक्ष्मण मूच्र्छा के समय अबाध क्रन्दन, एक-दूसरे को परास्त करने की कूटनीतिक चालें, रामायण के विभिन्न पात्रों की दुःखात्मक-सुखात्मक अनुभूतियों का विषय किस प्रकार बन गईं? क्या पूरा-का-पूरा महाभारत स्वार्थ, सत्तामद, कुनीति, व्यभिचार, दंभ, अहंकार की अभिव्यक्ति का विषय नहीं बना है।
 2. रसाचार्य मानते हैं कि भावानुभूति में हमें अपने प्रिय पात्र व इष्ट के निधन पर जो शोक की अनुभूति होती है, वह दुःखात्मक होती है। कामदेव के भस्म हो जाने पर, काव्य में वर्णित शोक-भाव भी कामदेव की पत्नी रति का शोक-भाव न रहकर सामान्य विशुद्ध शोक स्थायीभाव होता है। इस प्रकार विभावादि के साधारणीकरण हो जाने पर हमें विशुद्ध रूप में शोक स्थायीभाव को, वैयक्तिक संबंधों से परे जो रसानुभूति होती है, वह आनदंस्वरूपा है।
काव्य के विशुद्ध स्थायीभाव शोक के द्वारा जिस तरह से विभावादि का साधारणीकरण परोसकर इसकी रसानुभूति को आनंदस्वरूपा बताया है, सर्वप्रथम तो शोक और विशुद्ध शोक का हमारे पास कोई पैमाना नहीं है और इस तथ्य की भी कोई प्रामाणिकता सिद्ध नहीं है कि भावानुभूति प्रिय पात्र या इष्ट के निधन पर मात्र दुःखात्मक ही होती है। पाकिस्तानी सेना से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए अमर शहीद अब्दुल हमीद की मृत्यु पर भारतवासियों ने शोकग्रस्त होने के बजाय उनके साहस का ही गुणगान अधिक किया। तब क्या उक्त संदर्भ में विभाव का कथित साधारणीकरण स्थायीभाव शोक के माध्यम से वैयक्तिक संबंधों से परे की कोई रसानुभूति थी, जो आनंदस्वरूपा होकर उद्बुद्ध हुई या कुछ और?
ठीक इसी प्रकार अक्सर यह देखा गया है कि किसी नाव के डूब जाने, बस आदि के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर सैकड़ों लोग यात्रियों की सहायता के लिए उमड़ पड़ते हैं, सैकड़ों नर-नारी घायल और बिलखते लोगों को देखकर इतने शोकग्रसत हो जाते हैं कि उनकी आंखों से आंसुओं का ज्वार घंटों नहीं थमता, जबकि वह उन दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर सैकड़ों लोग यात्रियों की सहायता के लिए उमड़ पड़ते हैं, सैकड़ों नर-नारी घायल और बिलखते लोगों को देखकर इतने शोकग्रस्त हो जाते हैं कि उनकी आंखों से आंसुओं का ज्वार घंटों नहीं थमता, जबकि वह उन दुर्घटनाग्रस्त यात्रियों के न तो सगे-संबंधी होते हैं और न इष्ट मित्र। ऐसे में विभावादि का क्या कथित साधारणीकरण नहीं होता। घायलों और कराहते लागों के प्रति आई आश्रयों में करुणा और दया की स्थिति विशुद्ध और पवित्र नहीं होती? यदि होती है तो इस स्थिति को हमारे रसाचार्य रसानुभूति के कथित आनंदस्वरूप में क्यों नहीं रख लेते? क्योंकि उपरोक्त सारे के सारे घटनाक्रम में करुणा न तो किसी व्यक्ति पर अवलंबित है और न इसका संबंध किसी व्यक्तित्व के संकुचित रूप से है। बारीकी से सोचा जाए तो यहां ममत्व-परत्व का क्षुद्रत्व भी उजागर नहीं होता।
आचार्य शुक्ल रस-दशा के जिस चरमोत्कर्ष का जिक्र रागात्मक संबंधों की रक्षा और निर्वाह तथा व्यक्तित्व के परिस्ताकर के माध्यम से करते हैं, वह सब भी यहां मौजूद है, तब क्या यह भावानुभूति कथित रूप से लोकोत्तर होकर रसानुभूति के आनंदस्वरूप में अलौकिक नहीं हो जाती? अलौकिकता के संदर्भ में यदि यही अलौकिकता के लक्षण है तो आखिर लौकिक क्या है ?
    3. रस के पंडित काव्य की अलौकिकता के सदंर्भ में एक यह तर्क भी देते हैं कि चूंकि रस मनोवेगों का लौकिक अनुभव नहीं, उसका आस्वाद है, अतः रसानुभूति में सत्व गुण की सत्ता रहती है, जबकि भावानुभूति में   रजोगुण, तमोगुण, सतोगुण की मात्रा रहती है। कुछ भावों की अनुभूति में रजोगुण प्रधान रहता है, कुछ में सतोगुण, कुछ में तमोगुण। लेकिन रसानुभूति में सत, रज, तम की प्रथम सत्ता लोप हो जाती है और सारे भाव सात्विक हो जाते हैं।
काव्य के आस्वादन को मनोवेगों का लौकिक अनुभव न मानकर, रसानुभूति की सात्विक गुण सत्ता मानने के पीछे हमारे रसाचार्यों ने कुछ प्रामाणिक आस्वादकों के उदाहरण देकर रसानुभूति के अलौकिकत्व को यदि सिद्ध किया होता तो यह तथ्य सहज रूप से सबकी समझ में आ जाते कि वे जिसे लौकिक जगत की भावानुभूति का नाम देने की कोशिश कर रहे हैं, वह भी रसानुभूति ही है और लौकिक रसानुभूति में यदि सत, रज, तम की प्रथम सत्ता का आस्वादकों को कथित अनुभव होता है तो काव्य के आस्वादकों को भी साहित्य का आस्वादन रज, तम, सत गुण की पृथक् सत्ता का अनुभव निस्संदेह कराता है।
यदि रसानुभूति में रज, तम, सत की सत्ता का लोप हो जाता है तथा सारे भाव सात्विक गुणधर्म अपना लेते हैं तो क्या कारण है कि जिस रीतिकालीन काव्य-परंपरा को डॉ. राकेश गुप्त जैसे प्रसिद्ध रसमीमांसक भाव एवं अलंकार का श्रेष्ठ साहित्य, जिसमें कल्पना का वैभव, अर्थगर्भित शब्दों का सुंदर चयन एवं काव्य रसिकों के हृदय को चिरकाल तक रस-सिक्त करने वाली काव्य परंपरा मानते है,1 उसी रीति काल का आस्वादन आचार्य महावीर प्रसाद द्विवदी को घृणा के भावों से सिक्त कर डालता है, कवि श्री सुमित्रानंदन पंत इसे भक्ति के नाम पर नग्न  शृंगार का निर्लज्ज चित्रण अनुभव करते हैं। पं. कृष्ण बिहारी मिश्र, श्री प्रभुदयाल मीतल एवं डॉ. नगेंद्र जैसे सहृदय और सुधी रसमर्मज्ञ रीतिकालीन काव्य में अलौकिकता के दर्शन करने के बजाय लौकिकता के ही दर्शन करते हैं।2
क्या रस के पंडित उक्त तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध कर सकेंगे कि उक्त आस्वादकों की रसानुभूति दुःखात्मक और सुखात्मक भवानुभूतियों से अलग केवल सुखात्मक आनंदस्वरूप किस प्रकार है? जबकि इसमें प्रिय और कटु की भावानुभूति विभिन्न आस्वादकों में पूरी तरह मौजूद है।
इसीलिए कथित अलौकिकता का ताना-बाना सिर्फ इसी संदर्भ में प्रासंगिक है जबकि भावानुभूति और रसानुभूति को तर्क और विज्ञान की कसौटी पर परखने के बजाय, ऐसे आस्वादकों का आनंदस्वरूप बना दिया जाए, जिन्हें रसानुभूति या भावानुभूति के लिए प्रामाणिक रूप से सिद्ध  करने की कोई आवश्यकता न पड़े।
सच बात तो यह है कि रसाचार्यों ने रसानुभूति के आनंदस्वरूप, माधुर्यमय और अलौकिक इसलिए कहा क्योंकि काव्य के आलंबनविभावों के धर्म अर्थात् उनके क्रियाकलाप से न तो आस्वादकों को यह खतरा होता है कि काव्य में वर्णित पात्र जब क्रोध की मुद्रा में हाथों में तीर, तलवार, बंदूक लिए होते हैं तो वह आस्वादक पर प्रहार कर सकते हैं और न उन्हें यह लगता है कि काव्य की नायिका, काव्य के नायक के गले में बांहें डालने के बजाय आस्वादकों के गले में बांहें डालने लग जाएगी। ठीक इसी प्रकार मंच पर अभिनय करने वाले नट-नटी के बारे में वे भी भली-भांति जानते हैं कि उनका प्रेम-प्रदर्शन उन्हीं के बीच चल रहा है। इसलिए इसे भले अलौकिकता से विभूषित कर दिया जाए, लेकिन यदि किसी आस्वादक की ओर यही नटी-प्रेम का इजह़ार करने लगे तो यह कथित अलौकिक प्रेम, तुरंत लौकिक प्रेम में तब्दील हो जाएगा।
काव्य के संदर्भ में अलौकिकता की सारी दलीलें इसलिए भी बेबुनियाद और लौकिक ही हैं क्योंकि यदि काव्य का आस्वादन अलौकिक होता तो आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को इसे गठरी में बांध्कर नदी में फेंकने की जरूरत न पड़ती। अंग्रेज प्रेमचन्द की ‘सोजे सावन’ से इतने बौखलाए न होते कि उसे जब्त करना पड़ता। रूस की साम्यवादी सरकार ने कई ऐसे लेखकों को यातनाएं दीं, फांसी पर लटकाया, जिनकी कृतियों में उन्होंने रसानुभूति, सुखात्मक-आनंद के बजाय साम्यवाद के विरोध की बारुदी गंध महसूस की।
अस्तु, हमारी विचारधराओं से निर्मित रागात्मक चेतना ही हमें किसी काव्य के आस्वादन को कथित रसानुभूति, सुखात्मक आनंद और माधुर्य की ओर ले जाती है। जब किसी काव्य-कृति के आस्वादन से हमारी रागात्मक चेतना को खतरे होते हैं तो उस कृति के आस्वादनोपरांत हम उस कृति के प्रति कथित भावानुभूति जैसा व्यवहार करने लगते हैं अर्थात् अन्य सांसारिक वस्तुओं की तरह वह भी हमें कटु, तुच्छ, घृणास्पद और अवांछनीय लगने लगती है।
किसी व्यक्ति-विशेष, वर्ग-विशेष, संप्रदाय-विशेष पर लिखी गई काव्यकृति आस्वादकों के सामाजिक मूल्यों, व्यक्तिगत आस्थाओं को पुष्ट करती है तो वह आस्वादक इसमें रस, आनंद, माधुर्य आदि का अनुभव करते हैं। यदि वही काव्यकृति आस्वादकों के जीवनमूल्यों, उनकी रागात्मकता के विरुद्ध जाती है तो वे उससे सिर्फ घृणा, असंतोष, आक्रोश, विरोध्, विद्रोह और क्रोध का ही अनुभव प्राप्त करते हैं।
अतः यह बात तर्कपूर्वक कही जा सकती है कि काव्य का आनंद, रस, माधुर्य, सात्विक भावों का ताना-बाना एकपक्षीय और अधूरा ही नहीं, बल्कि लौकिकता के उन सारे गुणों को समाहित किए हुए हैं जिन्हें रसाचार्यों ने अलौकिक कहा है। काव्य में अलौकिकता जैसा कोई तत्त्व नहीं होता। काव्य और उसका आस्वादन भी लौकिक जगत की लौकिक घटना या वस्तु है।
सन्दर्भ –
1.  भा.का.सि., पृष्ठ-163, 164, 165
2.  वही पृष्ठ-164 , 165
3.  कृष्ण काव्य और नायिकाभेद, डॉ. राकेश गुप्त, पृष्ठ-44   
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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001

मो.-9634551630