ब्लौग सेतु....

16 मार्च 2018

हां देखा हैं,किसान को मरते हुए....शुभम सिसौदिया


मंद मंद आंसू,आंखो में प्यास,सरकारी चिट्टी
सूखा बदन,माथे से लगाए अपने खेत की मिट्टी

दिल में उम्मीद,सीने में दर्द,भूखा और प्यासा
कल दिखा इक किसान मुझे ओढ़े निराशा

बंगला था साहब का,साहब भी आलीशान था
बैठा था बाहर भूखा इसी देश का किसान था

वो आया था आशा लिए,संग लिए बेटी छोटी
एक पन्ना लिए हाथ में,बस मांग थी दो रोटी

जंतर मंतर पे धरना करते हुए
मैने देखा है किसान को मरते हुए

-कवि शुभम सिसौदिया 
बाराबंकी
 ss8341916@gmail.com

13 मार्च 2018

मूर्ति


सोचता हूँ 
गढ़ दूँ 
मैं भी अपनी 
मिट्टी की मूर्ति, 
ताकि होती रहे 
मेरे अहंकारी-सुख की क्षतिपूर्ति। 

मिट्टी-पानी का अनुपात 
अभी तय नहीं हो पाया है, 
कभी मिट्टी कम 
तो कभी पर्याप्त पानी न मिल पाया है। 

जिस दिन मिट्टी-पानी का 
अनुपात तय हो जायेगा, 
एक सुगढ़ निष्प्राण 
शरीर उभर आयेगा। 

कोई क़द्र-दां  ख़रीदार भी होगा 
रखेगा सहेजकर, 
जहाँ पहुँचता न हो  दम्भी हथौड़ा 
मूर्तिभंजक नफ़रत का घूँट पीकर ..!   
#रवीन्द्र सिंह यादव 

7 मार्च 2018

गीत-



दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे
राजेश त्रिपाठी

वक्त कुछ इस कदर हम बिताते रहे ।
दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे ।।
     जिसपे भरोसा किया उसने हमको छला।
     परोपकार करके हमें क्या मिला।।
        पंख हम बन गये जिनके परवाज के।
       आज बदले हैं रंग उनके अंदाज के।।
  मुंह फेरते हैं वही गुन हमारे जो गाते रहे।
दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे ।।
       कामनाएं तड़पती सिसकती रहीं।
       प्रार्थनाएं ना जाने कहां खो गयीं।।
       हम वफाओं का दामन थामे रहे ।
         जिंदगी हर कदम हमको छलती रही।।
जुल्म पर जुल्म हम बारहा उठाते रहे।
दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे ।।

        मेहरबानियां उनकी कुछ ऐसी रहीं।
        आंसुओं का सदा हमसे नाता रहा।।
       नेकनीयत पर हम तो कायम रहे।
         हर कदम जुल्म हम पे वो ढाते रहे।
दिल दुखाना तो उनका शगल बन गया।
दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे ।।


2 मार्च 2018

होली की कथा


हमारी पौराणिक कथाऐं कहती हैं 

होली की कथा निष्ठुर ,

एक थे भक्त प्रह्लाद 

पिता  जिनका हिरण्यकशिपु  असुर। 


थी उनकी बुआ होलिका 

थी ममतामयी माता कयाधु ,

दैत्य कुल में जन्मे  

चिरंजीवी प्रह्लाद साधु। 


ईश्वर भक्ति से हो जाय विचलित प्रह्लाद 

पिता ने किये नाना प्रकार के उपाय, 

हो जाय जब विद्रोही बेटा 

बाप को पलभर न सुहाय। 


थे बाप-बेटे में  मतभेद भारी 

कहता बाप स्वयं को भगवान् , 

रहे झेलते यातनाऐं प्रह्लाद सदाचारी   

अनाचार को नहीं की मान्यता प्रदान। 

  

रार ज़्यादा ठनी जब

ख़्याल अपना लिया भयंकर हिरण्यकशिपु ने,

बुलाया बहन होलिका को 

प्रह्लाद को मारने। 



ब्रह्मा जी ने दिया  था  

होलिका को  वरदान, 

आग तुम्हें न जला सकेगी 

जब करोगी कार्य महान।  


लेकर बैठ गयी ज़बरन  प्रह्लाद को  चिता  पर 

छीनकर माँ से उसके दुलारे को ,

माँ चीख़ती रही बे-बस 

खोला होलिका ने दुष्टता के पिटारे को। 


नाम लेते रहे प्रह्लाद प्रभु का  

भस्म हो गयी होलिका,

बचा  न सका वरदान भी 

होता नहीं यत्न कोई प्रमाद की भूल का। 


सकुशल निकले भक्त प्रह्लाद  

प्रचंड चिताग्नि से 

आओ होली मनाऐं भर-भर उल्लास 

विमुक्त हों चिंताग्नि से। 


आओ जला दें आज अहंकार अपने 

खोल दें  उमंगों को जीभर मचलने।  



# रवीन्द्र सिंह यादव 

5 फ़रवरी 2018

मैं बदन बेचती हूँ--

Monday, November 1, 2010

मैं बदन बेचती हूँ--

मैं बदन बेचती हूँ--
उस औरत के तन का
कतरा-कतरा फुट बहा है 
तभी तो चीख-चीख कहती 
हाँ मै बदन बेचती हूँ 
अपनी तपिश बुझाने को नही 
पेट की भूख मिटाने को नही 
मै बेचती हूँ बदन ,हां बेचती हूँ मै 
भूख से बिलखते रोते -कलपते 
दो नन्हे बच्चो के लिए 
मैं अपनी लज्जा अपनी अस्मत बेचती हूँ 
छाती से दूध क्या 
लहू का एक कतरा तक 
न निकला सूखे होठो के लिए 
आँख के आंसू भी कम पड़े तो 
इन अबोध बच्चो की खातिर 
आपने सिने को गर्म सलाखों से भेदती हूँ 
हाँ मै बदन बेचती हूँ 
ठण्ड से ठिठुरते बदन पर 
धोती का इक टुकड़ा भर 
कैसे इन बच्चो को तन से चिपका रखा 
देखि नही किसी ने मेरी ममता 
नजर पड़ी तो बस 
फटे कपड़ो से झांकते 
मेरे जिस्मो बदन पर 
दौड़ पड़े सब पागल कुत्तो की तरह 
इनके पंजो से बचने की खातिर 
हवसी नजरो से बदन ढंकने की खातिर 
मै आँखों की पानी बेचती हूँ 
दर्द से कराहते बच्चो की खातिर 
हाँ मैं बदन बेचती हूँ 
पर इन सफ़ेदपोशो के जैसे 
अपने ज़मीर नही बेचती हूँ 
चाँद सिक्को की खातिर 
अपना ईमान नही तौलती हूँ 
कोई चोरी पाप नही कोई 
जहां के भूखे भेड़ों से बचने की खातिर
अपनी दौलत नीलाम करती हूँ 
इन मासूम बच्चो की दो रोटी की खातिर 
हाँ मै बदन बेचती हूँ 
आखिर हूँ तो एक माँ 
नही देख सकती बच्चो का दर्द 
नही सुन सकती उनकी चीत्कार 
उन्हें जीवन देने की खातिर 
खुद विषपान करती हूँ 
हाँ मैं बदन बेचती हूँ---
---पंकज भूषण पाठक "प्रियम "