ब्लौग सेतु....

12 मई 2018

शहर

शहर

शहर ..... ही शहर है,
फैला हुआ,
जहाँ तलक जाती नजर है 
शहर ..... ही शहर है|

फैली हुई कंक्रीट 
और का बड़ा अम्बार,
वक्त की कमी से बिखरते रिश्ते,
बढ़ती हुयी दूरी का कहर है,
शहर ..... ही शहर है|

पैरो से कुचला हुआ,
है अपनापन,
बस खुद से खुद के साथ,
विराना सफर है,
शहर ...... ही शहर है|

मेरे दिल को ना भाया यह शहर,
इसमें मेरे गाँव जैसी बात नहीं,
यही मेरे शहर से गाँव,
 तक का सफर है,
शहर ..... ही शहर है|


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11 मई 2018

जख्म



                     



वो जो अक्सर फजर से उगा करते है
सुना है बहुत दिल से धुआं करते है।
जलता है इश्क या खुद ही जल जाते है
कलमे में खूब चेहरे पढा करते है।
फजल की बात पर खामोशी थमा देते है
बेवजह ही क्यों खुद को खुदा करते है?
आयतें रोज ही लिखते है मदीने के लिए
और अक्सर मगरिब में डूबा करते है
मेरी रुह तक आती है लफ्जों की आहट
मुद्दतों से जो ऐसे जख्म लिखा करते हैं।।


पारुल
Rhythmofwords.blogspot.com

1 मई 2018

गीत -दर्द दिल में छिपा मुसकराते रहे


राजेश त्रिपाठी 
         
वक्त कुछ इस कदर हम बिताते रहे ।
दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे ।।
     जिसपे भरोसा किया उसने हमको छला।
     परोपकार करके हमें क्या मिला।।
     पंख हम बन गये जिनके परवाज के।
     आज बदले हैं रंग उनके अंदाज के।।
मुंह फेरते हैं वही गुन हमारे जो गाते रहे।
दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे ।।
       कामनाएं तड़पती सिसकती रहीं।
       प्रार्थनाएं ना जाने कहां खो गयीं।।
       हम वफाओं का दामन थामे रहे ।
       जिंदगी हर कदम हमको छलती रही।।
जुल्म पर जुल्म हम बारहा उठाते रहे।
दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे ।।

        मेहरबानियां उनकी कुछ ऐसी रहीं।
        आंसुओं का सदा हमसे नाता रहा।।
        नेकनीयत पर हम तो कायम रहे।
        हर कदम जुल्म हम पे वो ढाते रहे।
दिल दुखाना तो उनका शगल बन गया।
दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे ।।

16 मार्च 2018

हां देखा हैं,किसान को मरते हुए....शुभम सिसौदिया


मंद मंद आंसू,आंखो में प्यास,सरकारी चिट्टी
सूखा बदन,माथे से लगाए अपने खेत की मिट्टी

दिल में उम्मीद,सीने में दर्द,भूखा और प्यासा
कल दिखा इक किसान मुझे ओढ़े निराशा

बंगला था साहब का,साहब भी आलीशान था
बैठा था बाहर भूखा इसी देश का किसान था

वो आया था आशा लिए,संग लिए बेटी छोटी
एक पन्ना लिए हाथ में,बस मांग थी दो रोटी

जंतर मंतर पे धरना करते हुए
मैने देखा है किसान को मरते हुए

-कवि शुभम सिसौदिया 
बाराबंकी
 ss8341916@gmail.com

13 मार्च 2018

मूर्ति


सोचता हूँ 
गढ़ दूँ 
मैं भी अपनी 
मिट्टी की मूर्ति, 
ताकि होती रहे 
मेरे अहंकारी-सुख की क्षतिपूर्ति। 

मिट्टी-पानी का अनुपात 
अभी तय नहीं हो पाया है, 
कभी मिट्टी कम 
तो कभी पर्याप्त पानी न मिल पाया है। 

जिस दिन मिट्टी-पानी का 
अनुपात तय हो जायेगा, 
एक सुगढ़ निष्प्राण 
शरीर उभर आयेगा। 

कोई क़द्र-दां  ख़रीदार भी होगा 
रखेगा सहेजकर, 
जहाँ पहुँचता न हो  दम्भी हथौड़ा 
मूर्तिभंजक नफ़रत का घूँट पीकर ..!   
#रवीन्द्र सिंह यादव