24 फ़रवरी 2017

“घड़ा पाप का भर रहा ” पठनीय तेवरी संग्रह +डॉ. हरिसिंह पाल





“घड़ा पाप का भर रहा ” पठनीय तेवरी संग्रह 

+डॉ. हरिसिंह पाल 
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 “घड़ा पाप का भर रहा ” नामक काव्य कृति तेवरी काव्य विधा को समर्पित कथ्य और शिल्प की दृष्टि से पठनीय कृति है | रमेशराज ने तेवरी विधा को प्रतिष्ठापित करने में जो सक्रिय भूमिका निभाई है वह सराहनीय है | आप मेरे गृह जनपद अलीगढ़ में रहकर साहित्य की सेवा कर रहे हैं , यह मेरे लिए आत्मीयता से परिपूर्ण तथ्य है , दूसरे आप और हम लगभग समवयस्क भी हैं | आपकी साहित्यिक उपलब्धियां आकर्षित करती हैं |
    “घड़ा पाप का भर रहा ” कृति की लम्बी तेवरी मन को छूती है इसके लिए रमेशराज विशेष बधाई के पात्र हैं | “मौत न हो ” विषय को लेकर आपने “तेवर शतक ” की रचना कर दी , यह हिंदी काव्य जगत की अनूठी घटना है | आपकी ये पंक्तियाँ तो तेवरी को ही व्याख्यायित कर देती हैं ....
        शब्द शब्द से और कर व्यंग्यों की बौछार
        यही कामना तेवरियों में अभिव्यंजन की मौत न हो |
साथ ही अपने ग़ज़ल और तेवरी का सीमांकन कर नयी दिशा दी है ....
     आलिंगन के जोश को कह मत तू आक्रोश
    ग़ज़लें लिख पर कथ्य काफ़िया और वज़न की मौत न हो |    
   इन तेवरियों में भाव की प्रवहमन्यता के आगे भाषा की दीवार भरभराकर गिर पड़ी है | हिंदी के तत्सम तद्भव और देशज शब्दों के साथ-साथ आंग्ल और अन्य विदेशी ( अरबी, फारसी, पुर्तगाली आदि ) के भी शब्द बेरोकटोक बहते चले आये हैं | यथा – टाई पेंट, सूट | जहाँ अंग्रेजी के शब्द – गारंटी, डिस्कोक्लब, शर्ट, ऑनरकिलिंग , सिस्टम , कमेटी  आदि प्रयुक्त  हुए हैं वहीं उर्दू के रहबर, दलाल, जुआ, यार , दावपेंच, शाद, रौशनी, जोश, काफिया, खाक , आफत , खिलवाड़ , बर्बर , फतह , जंजीर , तंगजहन आदि शब्दों के साथ –साथ नये-नये शब्द अपनी ओर से गढ़कर तेवरीकार ने  तेवरी की आत्मा में  जगह बनाये रखने में सफलता पायी  है तथा नव चटकन , नव चिन्तन , वलयन, हिंदीपन , किलकन , घुटुअन , काव्यायन, शब्दवमन, आयन , जैसे शब्दों का प्रयोग निस्संदेह शब्दसाधना का ही सुपरिणाम है |

     “ घड़ा पाप का भर रहा ” तेवरी संग्रह की लम्बी तेवरी के अंतमें ‘सर्प कुण्डली राज छंद’ में तेवरी प्रस्तुत कर श्री रमेशराज ने एक अभिनव प्रयोग किया है जो पूर्णतया सफल है |हिंदी का ‘सिंहावलोकन’ छंद भी लगभग इसी प्रकार का है | ‘सिंहावलोकन’ में जहाँ काव्यपंक्ति का अंतिम काव्यांश अगली काव्य पंक्ति का अंश बनता है वहीं सर्प कुण्डली में काव्यपंक्ति का अंतिम काव्यांश या अर्धाली अगली पंक्ति को बनाती है | अस्तु एक ही पुस्तकनुमा कृति में काव्य के दो दो छंदों से सहज ही परिचय हो जाता है |

          " घड़ा पाप का भर रहा " तेवरी कर श्री रमेश राज जी का लाजबाब तेवर-शतक है | इसमें हिन्दी छंद का प्रयोगधर्मी स्वरुप आपको देखने को मिलता है | इस शतक के प्रत्येक तेवर की पहली पंक्ति दोहे की अर्धाली ( 13 , 11 पर यति ) व् दूसरी पंक्ति चौपाई छंद ( 16 मात्राएँ पर यति , व् 14 मात्राएं पर विराम लिए हुए हैं )| इस शतक का एक एक तेवर तलवार की धर से भी अधिक पैना है | इस शतक के तेवर एक ओर जहाँ कुव्यवस्था पर वार करते हैं वहीं दूसरी ओर सुव्यवस्था की राह भी सूझाते हैं | "हाथ उठा सबने किया , अत्याचार विरोध | जड़ने के संकल्प न टूटें, अनुमोदन की मौत न हो " इतना ही नहीं भोली भाली जनता को आगाह करते हुए कहते हैं कि - "ये बाघों का देश है , जन जन मृग का रूप | अब तो चौकस रहना सीखो , किसी हिरन की मौत न हो |" इतना ही नहीं आगे जनता को समझाते हुए कहते हैं कि "संसद तक भेजो उसे जो जाने जन -पीर | नेता के लालच के चलते , और वतन की मौत न हो " |
    रमेशराज जी लम्बी तेवरी-तेवर शतक “घड़ा पाप का भर रहा ” की जितनी तारीफ की जाए उतनी ही कम है | रमेश जी गागर में सागर भर दिया है | जनमानस के सरोकारों को मुखरित करने के लिए रमेशजी की रचना धर्मिता प्रसंशनीय है | तेवरी विधा में यह शतक हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर साबित होगाश्री रमेशराज की पत्रिका ‘तेवरीपक्ष ’ भी मन को आनन्द प्रदान करती है | तेवरी साहित्य यात्रा अनवरत जारी रहे , यही वाग्देवी से प्रार्थना है | रमेश जी को एवं उनकी लेखनी को हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं |

काव्य का एक नया रस - “ विरोधरस “ + डॉ. अभिनेष शर्मा




काव्य का एक नया रस - “ विरोधरस “

+ डॉ. अभिनेष शर्मा
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शोध कृति क्रोध “ विरोधरस “ में श्री रमेशराज ने समझाया है कि क्रोध और आक्रोश में महीन अंतर है | क्रोध अपने विरोधी का विनाश करता है , आक्रोश केवल विनाश की कामना करता है | वह विचारों को बदलने की क्षमता रखता है | विरोध बर्बर आततायी पक्ष को वैचारिक रूप से परिवर्तन की ओर ले जाना चाहता है जबकि क्रोध शत्रु पक्ष का केवल और केवल विनाश करता है |
अब तक साहित्य में जितने रस विराजते हैं , उनकी आभा का एक अलग स्वरूप है , परन्तु “ विरोधरस ” जिसे साहित्य जगत में रमेशराज ने स्थापित करने का प्रयास किया है, स्तुत्य इसलिए है क्योंकि राज जी ने इस नये रस के प्रत्येक अंग पर विस्तार से चर्चा की है |
किसी भी व्यवस्था, विचार, विसंगति, चरित्र, व्यक्तिविशेष , या परम्परा का विरोध करना समाज की सनातन रीति रही है | इस रीति को पूर्ववर्ती रसाचार्यों ने स्थायी भाव साहस या क्रोध के साथ रखकर वीररस अथवा रोद्र्रस के रूप में स्थापित किया है | रसचिंतन को आगे बढ़ाते हुए श्री रमेशराज ने समीक्ष्य पुस्तक “विरोधरस” में बताया है कि वीररस , रौद्ररस से विरोध रस पूरी तरह प्रथक है | विरोध आक्रोशित असहाय, निर्बल आदमी का बयान है | विरोध का जन्म स्थायी भाव आक्रोश से होता है | डॉ. नरेशपाण्डेय चकोर के शब्दों में-
“ विरोधरस ” सचमुच शोधपूर्ण और स्व्गात्योग्य कृति है | इसे नये रस के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए |     
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डॉ.अभिनेष शर्मा, देव हॉस्पिटल, खिरनी गेट , अलीगढ़
मोबा.-9837503132

रमेशराज का अनुपम तेवर-शतक-‘ घड़ा पाप का भर रहा ‘ +विश्वप्रताप भारती




रमेशराज का अनुपम तेवर-शतक-‘ घड़ा पाप का भर रहा ‘

+विश्वप्रताप भारती
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रमेशराज छन्दबद्ध कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं | रस के क्षेत्र में “ विचार और रस “, “ विरोधरस “ नामक दो पुस्तकों के माध्यम से रस के क्षेत्र में जहाँ आपने रस को व्यापकता प्रदान की है , वर्तमान विचारशील कविता को रस से जोड़ा है | वहीं ग़ज़ल से रोमानी पक्ष से व्यवस्था विरोध के तेवर को अलग कर उसे तेवरी के रूप में स्थापित किया है  तथा हिंदी साहित्य में तेवरी के विधागत वैचारिक विमर्श को आगे बढ़ाया है |
रमेशराज ने तेवरी विधा को पहचान और स्थायित्व प्रदान करने के लिए “ तेवरीपक्ष ” पत्रिका के साथ साथ “ अभी जुबां कटी नही “, “कबीर ज़िन्दा है “, “इतिहास घायल है ” जैसे कई तेवरी संग्रहों का सम्पादन किया | हिंदी की प्रगतिशील जनवादी कविता में जिला अलीगढ से बहुत से नाम आगे आते हैं ,    उनमें रमेशराज शीर्षस्थ हैं | ये कहना गलत न होगा कि आलोचकों ने उनकी पुस्तकों को तो पढ़ा किन्तु उनकी चर्चा करने से कतराते रहे | उनकी इस चुप्पी के दौरान कुछ रचनाकारों ने तो तेवरी लिखने वालों को “तेवरीबाज़ ” तक कह डाला |
श्री रमेशराज अपनी लम्बी तेवरी (तेवर शतक ) “घड़ा पाप का भर रहा ” के माध्यम से एक बार फिर चर्चा में हैं |इस संग्रह की 100 से ऊपर तेवरवाली तेवरी को पढकर हर एक सामाजिक यह महसूस कर सकता है – “अरे ये तो हमारे मन की बात कह दी ” शायद तेवरीकार के लेखनकर्म की यही सफलता है | 
सामान्यतया कविता दूसरों को कुछ बताने के लिए लिखी जाती है जो मानवीयता के पक्ष की मुखर आवाज़ होती है | मानवीयता के स्तर पर कविता में जो भाव आते हैं वे अद्भुत होते हैं | रमेशराज की कविता (तेवरी ) में ये भाव एक बड़ी सीमा तक विद्यमान हैं –
तेरे भीतर आग है , लड़ने के संकेत
बन्धु किसी पापी के सम्मुख तीखेपन की मौत न हो |
++   ++  ++
जन जन की पीड़ा हरे जो दे धवल प्रकाश
जो लाता सबको खुशहाली उस चिन्तन की मौत न हो |
दरअसल आज आदमी की ज़िन्दगी इतनी बेबस और उदास हो गयी है कि वह समय के साथ से , जीवन के हाथ से छूटता जा रहा है | सम्वेदनशून्य समाज की स्थिति तेवरीकार रमेशराज को सर्वाधिक पीड़ित करती है –
कायर ने कुछ सोचकर ली है भूल सुधार
डर पर पड़ते भारी अब इस संशोधन की मौत न हो |
समाज में जो परिवर्तन या घटनाएँ हो रहीं हैं वे किसी एक विषय पर केन्द्रित नहीं | घटनाओं के आकर प्रकारों में बीभत्सता परिलक्षित हो रही है | इन घटनाओं के माध्यम से नई अपसंस्कृति जन्म ले रही है फलतः लूट , हत्या , चोरी , बलात्कार , घोटाले , नेताओं का भ्रटाचार , सरकारी कर्मचारियों की रिश्वतखोरी  अब चरम पर हैं| रमेशराज के  इस विद्रूप को उजागर करने और इससे उबरने के प्रयास देखिये  –
लोकपाल का अस्त्र ले जो उतरा मैदान
करो दुआएं यारो ऐसे रघुनन्दन की मौत न हो |
++  ++  ++
नया जाँचआयोग भी जांच करेगा खाक
ये भी क्या देगा गारन्टी कालेधन की मौत न हो |
कविता में भोगे हुए यथार्थ की लगातार चर्चा हुयी है लेकिन उसके चित्रण तक | दलित लेखकों ने अपने लेखन में जहाँ समस्याओं को उजागर किया है वहीं उनका समाधान भी बताया है | रमेशराज दलित नहीं हैं किन्तु उनका जन्म एक विपन्न परिवार में हुआ , इस नाते दलितों के प्रति उनकी तेवरियों में वही पीड़ा घनीभूत है, जो दलित लेखकों के लेखन में दृष्टिगोचर हो रही है |  
    निस्संदेह आज दलितों ने निरंतर प्रयास से अपना जीवन-स्तर बदला है | अपने लिए अनंत सम्भावनाओं का आकाश तैयार किया है | किन्तु समाज में अभी भी कुछ ऐसा है जिससे तेवरीकार आहत है-
पूंजीपति के हित यहाँ साध रही सरकार
निर्बल दलित भूख से पीड़ित अति निर्धन की मौत न हो |
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लिया उसे पत्नी बना जिसका पिता दबंग
सारी बस्ती आशंकित है अब हरिजन की मौत न हो |
    तेवरीकार ने आज़ादी की लड़ाई का चित्रण उन दोगले चरित्रों को उजागर करते हुए किया है, जिन्होंने आजादी के दीवानों की पीठ में छुरे घोंपे-
झाँसी की रानी लिए जब निकली तलवार
कुछ पिठ्ठू तब सोच रहे थे “ प्रभु लन्दन की मौत न हो” |
    कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यास ‘गोदान’ के पात्र  ‘गोबर्धन’ के माध्यम से युवा आक्रोश को इस प्रकार व्यक्त किया है-
झिंगुरी दातादीन को जो अब रहा पछाड़
‘होरी’ के गुस्सैले बेटे ‘गोबरधन’ की मौत न हो |
    हिंदी साहित्य में नये-नये प्रयोग होते रहे हैं, आगे भी होते रहेंगे | कविता में “ तेवरी-प्रयोग “ एक सुखद अनुभव है जो सामाजिक सन्दर्भों से गुजरते हुए समसामयिक युगबोध तक ले जाता है | तेवरी की भूमिका कैसी है स्वयं तेवरीकार के शब्दों में अनुभव की जा सकती है-
इस कारण ही तेवरी लिखने बैठे आज
किसी आँख से बहें न आंसू , किसी सपन की मौत न हो |
    स्पष्ट है, तेवरी नयी सोच, नयी रौशनी लेकर आयी है | अन्य तेवरी शतकों की तरह ‘ घड़ा पाप का भर रहा ‘ की लम्बी तेवरी आँखें खोलने वाली है | आशा है, हिंदी साहित्य के लेखक तेवरी को स्वीकारने, संवारने में हिचकेंगे नहीं |           
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+विश्वप्रताप भारती , बरला, अलीगढ़

मोबा.-8445193301