ब्लौग सेतु....

15 फ़रवरी 2019

रणभूमि :एक रण जीवन का

भ्रष्टाचार के दावानल में भस्मासात् जनता सारी
हे विश्वेश्वर !हमें बचाओ क्यों भ्रष्ट भए हैं नर नारी
अवलोकित कलिकाल दशा को डमरू वाला मुस्काया
कर्मविरत! मत मुझे पुकारो सजी तुम्हारी रणभूमि

माया रंग से रंजित होकर जीव ब्रह्म विसराता है
पाकर कुछ भौतिक सपनों को खुद को धन्य समझता है
जीव पतंगा जग दीपक में निज अस्तित्व मिटाता है
माया तो बस खेल खिलाए जीव त्यागता रणभूमि

पंकज पंख में बिलख रहे पर आंचल मोह का न त्यागा
पृथक् डाल से नलिनी को कर गज काल पाएगा लीला
हंस अकेला अनत गगन में उड़ा प्रीत से मिलने को
देह मिलेगी पंच तत्व में छूटेगी यह रणभूमि

पाना है यदि खुद को तो अध्व मध्य से साध्य को जा
त्याग भोग कर कष्ट देह का सुगत वचन से प्रगत बना
अमल -धवल निर्मल को पाकर प्रकाशित होगी ज्योति
मिलेगा पद निर्वाण का तुझको साक्ष्य रहेगी रणभूमि

कामिनी कांचन कालदूत जब कुटिल कुपथ दिखलाएगी
शक्ति विवेक की  दिव्य अस्त्र बन कर्माकर्म बताएगी
सज्जित कर निज को शस्त्रों से रक्षित होने को जग में
मृगतृष्णा का कर आलिंगन क्यों देखे तू रणभूमि

ज्ञानज्योति की दीप्त शिखा से जो भासित हो जाता है
निज स्वरूप का दर्शन कर वह ब्रह्मरूप कहलाती है
अवबोधन कर जीव ब्रह्म का त्वम् असि दोहराया है
सत्य ज्ञान और नित्य ब्रह्म बस रहती उसकी रणभूमि

धरा बने रणक्षेत्र जगत् का मोह बने रणशूर यहाँ
प्रणव को तू गाण्डीव बना कर आत्म रूप यह शस्त्र चला
ब्रह्म है तेरा परम लक्ष्य अब ध्यान लगा संधान चला
लक्ष्यभेद तू विजय बनेगा जयघोष करेगी रणभूमि


ब्रह्म सत्य है जगत् भ्रमित है जीव तो है बस अज्ञानी
माया का जो सत्य समझ ले नित्य शुद्ध सच्चा ज्ञानी
परम सत्य का तिनका है तू  न  कह जग अपना प्राणी
माया भेद का कर अवबोधन ब्रह्म बनेगी रणभूमि

कस्तूरी मृग बन मुझे खोजता वन वन क्यों भागा भटका
मैल हटा निज अंतर्मन की शांतचित्त से ध्यान लगा
वहीं बसा उर अंतर मन में मैं को तू बस दूर भगा
सुंदर स्थिर स्थित मन से हंकार मिटाए रणभूमि

जीवन के दो पहिए सुख दुख नित करते इसको गतिमान्
दुख का भी कर मन से स्वागत बढ जाएगा तेरा मान
साम्यभाव रख कर सुख स्वागत फैलेगी गरिमा पूरी
भावों के सम संगम तट पर चरण पखारे रणभूमि


साहस का तू आँचल थामे बजा दे जीवन की भेरी
शत योजन सागर सा जीवन पार करेगा तू प्रणी
दुष्कर है पर अगम नही है आह्वान कर मन को जगा
भीमरूप धर बजरंगी सा जामवंत है रणभूमि

रंगों से संसार सुसज्जित ऋतुराज ने की है तैयारी
राधा माधव मोहन गिरिधर खेले विमल धवल होली
प्रेम के हर रंग मन में भरकर वर्णिका बनी राधारानी
प्रणय वंदना के इस पर्व का स्वागत करती रणभूमि

लंपट लोलुप भोगी जन की देव करे क्यों रखवाली
मधुशाला आकण्ठ्य लगाकर वर्णहीन न कर होली
द्वारिकाधीश के नंदन वन में मंजुलता सी है होली
रंग दे धरती अपने रंग में तिलक लगाए रणभूमि

तारकमय वेणी बंधन जब निशा का जगमग करता है
वसुधा को आगोश में भरकर श्यामल गात पसरता है
चंचल चितवन मंथर गति से रजनी चदरिया ढके पूरी
छुडाए सुधबुध तन मन धन की स्वप्न नगरिया रणभूमि

संध्या सुंदरी मंद मुकुंद सी मृदुल मुदित मन करती है
मंद समीर मदमस्त मधुरता जीवन राग सुनाती है
दिवसेश्वर रथ मणिमय मण्डित आरुणि की रक्तिम लाली
प्रात प्रभात की सुखमय बेला देखो बन गई रणभूमि

मन उपवन में भाव सुमन के लेकर जब मैं चलता हूँ
अलग अलग पथ भँवर बनाकर नौका डगमग करते हैं
माझी कुशल तो सुमन सुमन के विरही प्रीत मिलाते हैं
माझी यदि मझधार में छोडे आस बँधाती रणभूमि

अस्त व्यस्त इस आपाधापी में  बिसरी थी निंदिया प्यारी
तुम आई ज़िंदा हूँ मैं भी अहसास हुआ मन को भारी
अठखेली हठ तेरे खेल खिलौने सब मेरे संगी साथी
प्रेम के रस में सराबोर हो, फिर बचपन बन गई रणभूमि!!

नर नारी अभेद अवस्थित  अविरल है अचला सारी
बाल बालिका यौवन बचपन सबमें पूजित है नारी
कन्या जन्म जो दुखभूधर है बालक जन्म क्यों दीवाली
दुहिता जन्म की दीवाली की राह देखती रणभूमि

हिम पर्वत उच्च शिखर पर ध्यानावस्थित केदारी
हाथ जोड करबद्ध निवेदन करता हूँ गंगाधारी
पथभ्रम मतिभ्रम दिग्भ्रम होकर न कोई भटके संसारी
निज स्वरूप का कर अवबोधन पार करें सब रणभूमि

शब्दब्रह्म की विजयपताका किंकर का रण पूर्ण करे
रणवीर बनाकर विजित करे अरु जन जन को रणशूर करे
साहस शौर्य सन्मार्ग दिखाकर रणविजय बनाकर पार करे
अकाट्य कवच बन कठिन समर में सदा रहेगी  रणभूमि  |

"डॉ. विमल ढौंडियाल "

25 सितंबर 2018

रमेशराज की तेवरियाँ


 रमेशराज की तेवरियाँ 
----------------------------------------------------------
रमेशराज की तेवरी....1 
.............................................
हर कोई आहत मिलता है
दर्दों में जड़वत मिलता |
कुंठा जलन घुटन सिसकन का
अब खुशियों को खत मिलता |
नवयुवकों के अहंकार में
एक महाभारत मिलता |
अभिवादन को खड़ीं तल्खियाँ
पीड़ा का स्वागत मिलता |
सबके स्वाभिमान का किस्सा
छल के आगे नत मिलता |
+रमेशराज

रमेशराज की तेवरी....2 
.............................................
बस्ती में जन-जन घायल है
फूलों जैसे मन घायल |
आज दहेज बिना निर्धन की
बेटी का यौवन घायल |
जब से हुयी व्यवस्था बाघिन
सच का रोज हिरन घायल |
सुख के बादल नहीं बरसते
सावन भरे नयन घायल |
आज अभाव घाव देता है
बिन खुशबू चन्दन घायल |
+रमेशराज  

रमेशराज की तेवरी....
.............................3 
हम कब खाते हैं अब रोटी
खातीं हमें रोटियां रे |
उनके पेटों की खातिर हम
बनते रहे सब्जियां रे |
कितनी बीतीं सदियाँ प्यारे
कटी नहीं हथकड़ियाँ रे |
शब्दों के भीतर माचिस की
रख तो सही तीलियाँ रे |
सर से पांवों पर आनी हैं
कल को सभी टोपियाँ रे |
+रमेशराज

रमेशराज की तेवरी....4 
.............................................
रोते-रोते सुबह हुयी है
नयन भिगोते रात कटी |
हंसी डसी अधरों की गम ने
आहत होते रात कटी |
सुख बोना चाहा था हमने
दुःख को बोते रात कटी |
दिन-सी राधा बोल रही है
मोहन खोते रात कटी |
सुबह मिली मैली की मैली
चादर धोते रात कटी |
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....5 
.............................................
बात-बात में घात हज़ारों
मुलाकात में घाव भरे |
जिसे महकना था फूलों-सा
उसी बात में घाव भरे |
खुशियों की बीमार फसल है
पात-पात में घाव भरे |
धनिया झुनिया या हो मरियम
गात-गात में घाव भरे |
घूम कबीरा जग में आया
कायनात में घाव भरे |
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....6 
.............................................
खायी रोटी रख हाथों पर
कहां मिली है थाली रे |
सूरज से दीपक अच्छा है
सुबह जहाँ हो काली रे |
गाल बजा मत खाली प्यारे
ला आँखों में लाली रे |
तेरे हिस्से में आयी है
अब तक विष की प्याली रे |
सिर्फ फाइलों में बंदी है
अब तक हर खुशहाली रे |
नैतिकता की बातें लगतीं
अब तो जैसे गाली रे |
होगा वार पेड़ पीछे से
सम्हल समय के बाली रे |
आज सियासी बातों पर तू
पीट न ऐसे ताली रे |
+रमेशराज

रमेशराज की तेवरी....7
.............................................
पहले से ही कठिन राह थी
और हुयी अब मुश्किल रे |
पत्थर धड़क रहे सीनों में
कहाँ रहे वैसे दिल रे |
इतनी बेचैनी है भीतर
मन जाता अब छिल-छिल रे |
बनकर मोम रौशनी तो दी
भले गले हम तिल-तिल रे |
बूँद-बूँद को तरस रहे अब
सब नदियों के साहिल रे |
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....8 
.............................................
साँपों में तब ही भय होगा
पैदा हो जनमेजय रे |
ढूंढ रहे हम चिंगारी को
कुछ तो अपना आशय रे |
आदमखोर बना डालेगा
आचरणों का ये क्षय रे |
और और तू और देखना
व्यभिचारों का विनमय रे |
ज्वालामुखियों को फटना है
आज नहीं तो कल तय रे |
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....9
.............................................
कहीं नहीं अब स्वागत भाई
सब में तंग ज़हनियत रे |
सुख-संदेश बने अब सब ही
कोने फटे हुए खत रे |
ज़हर-सरीखा मन कर देता
जो दीखता अमृतवत रे |
पेड़ स्वयं में छत होते हैं
क्या मांगेंगे ये छत रे |
ये जंगें लम्बी खिंचनी है
ऐसे भाई चुक मत रे |
+रमेशराज 

रमेशराज की तेवरी....
.............................................
जितने हम शालीन दिख रहे
उतने ही संगीन सुनो |
हम अर्जुन हैं, हम बींधेंगे
इस निज़ाम की मीन सुनो |
चिन्तन के घोड़ों पर कस लो
संकल्पों की जीन सुनो |
ज़ख्मी करते, पंख नोचते
वे हैं करुणाहीन सुनो |
छल-प्रपंच के बल सारे खल
कुर्सी पर आसीन सुनो |
+रमेशराज



रमेशराज की तेवरी....10
.............................................
बड़े बुरे हालात सखी री
रहबर करते घात सखी |
ये वसंत कैसा वसंत है
सूखे टहनी-पात सखी |
आज हमारी रक्षा करने
डाकू हैं तैनात सखी |
सत्ता की साजिश के चाकू
गोद रहे हैं गात सखी |
आज देश में बेईमानी
है नरसी का भात सखी |
+रमेशराज

रमेशराज की तेवरी....11
.............................................
आये दिन अब काले बहिना
भूख-गरीबी वाले री |
बात करें क्या अंधियारों की
डसते आज उजाले री |
सत्य बोलने पर हैं अब तो
हर ज़ुबान पर ताले री |
हर शासन ने गर्दन-गर्दन
केवल फंदे डाले री |
कर तू चोट इसतरह कुछ री
हर सिंहासन हाले री |
+रमेशराज



रमेशराज की तेवरी....12 
.............................................
आग-आग अब गाऔ बहिना
ऐसौ गीत उठाऔ री |
जिसमें हो इस तम का मातम
ऐसौ पाठ पढ़ाऔ री |
नेता सभी नाशपीटे हैं
क्या विश्वास जताऔ री |
आज सुलगते-से मंजर हैं
छप्पर-छान बचाऔ री |
दुःख से जो तुम लड़ना सीखौ
तभी सुखों को पाऔ री |
+रमेशराज

        

रमेशराज की तेवरी....13 
.............................................
सब करते हैं चोट सखी री
दें किसको हम वोट सखी |
लाले पड़े इधर रोटी के
वे चरते अखरोट सखी |
ओढ़ लिए दुःख ऐसे हमने
जैसे ओवरकोट सखी |
चित भी उनकी, पट भी उनकी
ऐसी चलते गोट सखी |
अब न दाल सुख की गलती है
चाहे जितना घोट सखी |
बाहर-बाहर सब सच्चे हैं
भीतर-भीतर खोट सखी |
यहाँ न पुजता खरा रुपैया
पुजता खोटा नोट सखी |
+रमेशराज

रमेशराज की तेवरी....14
.............................................
घर में माल न दाल सखी री
हर सुख हुआ हलाल सखी |
सुख के दर्शन कहीं नहीं हैं
क्या पीहर-ससुराल सखी |
मीन-मीन को बीन रहे हैं
मछुआरों के जाल सखी |
मरुथल का छल सब में बोले
क्या पोखर क्या ताल सखी |
मन की चिड़िया क्या नभ छूए
पंख-पंख बेहाल सखी |
+रमेशराज

रमेशराज की तेवरी....
..............................15.
ये कैसा मधुमास सखी री
हर मन बड़ा उदास सखी |
सुख तो हैं परदेश आजकल
दर्दों का सहवास सखी |
आते-आते अब अधरों तक
तोड़े दम परिहास सखी |
मरुथल जल को तरस रहे हैं
नदिया के मन प्यास सखी |
सपने अपने अब बन बैठे
टूटे हुए गिलास सखी |
+रमेशराज

रमेशराज की तेवरी....16 
.............................................
मांगो सुविधा-साधन लोगो
तोड़ो-तोड़ो बंधन लोगो !
जिनसे थी पहचान समय की
टूट गये वे दर्पन लोगो !
सर ऊंचा कर जीना सीखो
क्यों तुम में बंधुआपन लोगो !
तुम भूखे पर वे चरते हैं
अब तो मिसरी-माखन लोगो !
अब तो लाओ कुछ खुशहाली
सामाजिक परिवर्तन लोगो !
+रमेशराज 

रमेशराज की तेवरी....17
.............................................
गीत प्यार के अब तू गा रे
लय न समय की हारे रे |
आंत-आंत पर आज भूख के
चलते जमकर आरे रे |
अब तो रोज सियासत देती
केवल झूठे नारे रे |
रोटी नहीं, हाथ पर तेरे
वे रखते अंगारे रे |
ठगते रहते हरदम तुझको
वोटों के बंजारे रे |
+रमेशराज 

रमेशराज की तेवरी....
.............................................
ज़हर-भरा है जाम सियासत
षड्यंत्रों का नाम सियासत |
इसे भुनाया नित नेता ने
वैसे खोटा दाम सियासत |
कभी दगती तीर-गोलियां
कभी छुरा ले थाम सियासत |
तेरे चक्कर में अब भूखा
नंगा हुआ अवाम सियासत |
गुंडे तस्कर या चोरों का
तू है नैतिक धाम सियासत |
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....18
.............................................
तुम न हुए शिक्षाप्रद लोगो
बात बुरी ये बेहद है |
एक ज़िबहखाना पंछी का
आज बना हर गुम्बद है |
बौने फिर भी रहते बौने
दर्प भले आदमक़द है |
मंत्री जी के नकली आंसू
ये अवाम पर गदगद है |
भाषण-नारों का हंगामा
आज हमारी संसद है |
+रमेशराज   

रमेशराज की तेवरी....19 
.............................................
अब तो यही टाट हैं सखि री
टूटी हुयी खाट हैं सखि |
यह तीरथ हो या वो तीरथ
रहजन घाट-घाट हैं सखि |
आज रौशनी रहे अनमनी
अंधकार विराट हैं सखि |
यह सुख की कैसी बस्ती है
उर के सुर उचाट हैं सखि |
जिनको खुला-खुला रहना था
बंद वही कपाट हैं सखि |
+रमेशराज

रमेशराज की तेवरी....20
.............................................
दुःख की आज कटारी सखि री
चले बदन पर आरी सखि |
मुद्दत हुए मिली ना सँग-सँग
रोटी औ’ तरकारी सखि |
अब तो खर्चे ही खर्चे हैं
मुआ पाँव है भारी सखि |
दुःख-दर्दों से अटी हुयी है
सुख की हर अलमारी सखि |
आज वतन को बेच रहे हैं
वोटों के व्यापारी सखि |
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....
.............................................
दुःख-दर्दों को नित पीते हैं
लोग यहाँ पर जीते हैं |
रात कटी चिंता में डूबे
दिन कैसे भी बीते हैं |
सबको नोच-नोच कर खाते
अब सिस्टम के चीते हैं |
कंठ-कंठ में प्यास डोलती
मन के सब घट रीते हैं |
शब्दों की चोटें नित सहते
हम टाइप के फीते हैं |
+रमेशराज  


रमेशराज की तेवरी....21
.............................................
जिनकी आँखें नम हैं ग़म से
उन लोगों से प्यार करें |
तूफ़ानों में जो घबरायी
उस किश्ती को पार करें |
इस सिस्टम से लड़ना हमको
हर जुल्मी पर वार करें |
ढूंढ रहे हैं हम चिंगारी
इस सच का सत्कार करें |
इस निजाम की आज पीठ पर
चाबुक जैसी मार करें |
+रमेशराज



रमेशराज की तेवरी....22
.............................................
वे हम सबको लूट रहे हैं
बाज-गिद्ध से टूट रहे |
ये कैसा क़ानून है जिसमें
सब अपराधी छूट रहे |
लोग आजकल बारूदों में
चिंगारी-से फूट रहे |
आज हमारी यही वीरता
हम निर्बल को कूट रहे |
सच को आयीं चोटें गहरी
कूट आजकल बूट रहे |
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....23
.............................................
लोगों का ईमान रुपैया
लोगों की पहचान रुपैया |
आज बना रामायण-पाठन
गीता और क़ुरान रुपैया |
शोषण लूट खसोट कराता
फिर भी बना महान रुपैया |
रिश्वतखोरों चोरों के घर
रहता सीना तान रुपैया |
जो सच्चा मेहनतकश भोला
उससे है अंजान रुपैया |
+रमेशराज




रमेशराज की तेवरी....२४ 
.............................................
हर तन अब तो जलता भाई
मोम सरीखा गलता है |
दिन अनुबंधित अंधकार से
सूरज कहाँ निकलता है |
अब गुलाब भी इस माटी में
कहाँ फूलता-फलता है |
देनी है तो अब रोटी दे
नारों से क्यों छलता है |
यह ज़मीन कैसी ज़मीन है
सबका पाँव फिसलता है |
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....25
.............................................
जिन्हें प्यार से टेरे साथी
वे दुश्मन हैं तेरे सुन |
केवल वंशज है साँपों के
अब जो दिखें सपेरे सुन |
धूप नहीं अब तम का जादू
सूरज रोज उकेरे सुन |
फिर आये नदिया के तट पर
लेकर जाल मछेरे सुन |
कविता को बांटो रोटी-सा
लोग भूख ने घेरे सुन |
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....26 
.............................................
मन पर रख पत्थर कोने में
रोये अक्सर कोने में |

महफिल-महफिल सभी हँसे पर
नैन गये भर कोने में।

चुपके-चुपके शीलभंग है
बल इज्जत पर कोने में।

एक अनैतिक गर्भधारिणी
जख्मों से तर कोने में,

अक्सर कुछ आहत सोचों की
छलकी गागर कोने में।
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....27
...........................................
कितनी क्षत-विक्षत बिस्तर पर
धनियाआहत बिस्तर पर।

विवश देह का रति-रस लेने
व्यभिचारी रत बिस्तर पर।

चीरहरण का चरण शुरू है
लुटनी इज्जत बिस्तर पर।

आँखों में शोले हैं लेकिन
अब काया नत बिस्तर पर।
+रमेशराज



रमेशराज की तेवरी....8.
..................................................
रोते-रोते रात कटी है
नयन भिगोते रात कटी, यह दुर्घटना रोज घटी।

हँसी डसी अधरों की ग़म ने
आहत होते रात कटी, यह दुर्घटना रोज घटी।

सुख बोना चाहा था हमने
दुःख को बोते रात कटी, यह दुर्घटना रोज घटी।

दिन-सी राधा बोल रही है
मोहन खोते रात कटी, यह दुर्घटना रोज घटी।

सुबह मिली मैली की मैली
चादर धोते रात कटी, यह दुर्घटना रोज घटी।
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....28
............................................
बात-बात में घाव भरे हैं
मुलाकात में घाव भरे, तू सोच अरे!

खुशियों की बीमार फसल है
पात-पात में घाव भरे, तू सोच अरे!

धनियाँ झुनियाँ या हो मरियम
गात-गात में घाव भरे, तू सोच अरे!

जिसे महँकना था फूलों-सा
उसी बात में घाव भरे, तू सोच अरे!

घूम कबीरा जग में आया
कायनात में घाव भरे, तू सोच अरे!
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....29
.........................................................
बस्ती में जन-जन घायल हैं
फूलों जैसे मन घायल |

आज दहेज बिना निर्धन की
बिटिया का यौवन घायल |

जब से हुई व्यवस्था बाघिन
मन का रोज हिरन घायल।

सुख के बादल नहीं बरसते
सावन बने नयन घायल।

आज अभाव घाव देता है
बिन खुशबू चन्दन घायल।
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....30 
..................................................
हर कोई आहत मिलता है
दर्दों में जड़वत मिलता

नवयुवकों के अहंकार में
एक महाभारत मिलता

कुंठा जलन घुटन सिसकन का
अब खुशियों को खत मिलता

अभिवादन को खड़ी तल्खियाँ
पीड़ा का स्वागत मिलता

अब तो स्वाभिमान का किस्सा
धन के आगे नत मिलता
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....31
..........................................................
क्षोभ और संत्रास भरा है
जन-जन का इतिहास यहाँ |

अमन-चैन की सुखद रौशनी
कहाँ हमारे पास यहाँ |

सिर्फ अँधेरों के घेरों में
करें आज हम वास यहाँ |

इन्सानों के खूँ की सब में
बढ़ती जाती प्यास यहाँ |

दूर-दूर तक केवल पतझर
आज यही मधुमास यहाँ |
+रमेशराज


रमेशराज की तेवरी....32
.................................................
पाँवों में जंजीर करें क्या
चुभें वक्ष में तीर यहाँ |

अपने हिस्से छल के किस्से
दुःख की है जागीर यहाँ ।

बस्ती-बस्ती में द्रौपदि का
खिंचे आज भी चीर यहाँ।

नित कोठों पर नाच रही है
अब राँझे की हीर यहाँ।

खण्ड-खण्ड हर एक आस्था
बढ़ती जाती पीर यहाँ।
+रमेशराज

रमेशराज की तेवरी....33
....................................................
सत्य-धर्म का ज्ञान आजकल
हिंसा की पहचान यहाँ।

नैतिकता के बदल गये सब
मान ध्यान प्रतिमान यहाँ।

लगा रहे जो सिर्फ अँगूठे
बने हुए विद्वान यहाँ।

हम केवल नफरत ही सीखें
पढ़कर वेद-कुरान यहाँ।

लील गया फिरकों का जज्बा
अधरों के मृदुगान यहाँ।
.......................................................................
+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001
मो.-9634551630