21 दिसंबर 2013

दोस्तों से डर लगे







राजेश त्रिपाठी
रहबर कभी थे आजकल राहजन होने लगे।
मूल्य सारे क्यों भला इस तरह खोने लगे।।
स्वार्थ की आग में जल गयी इनसानियत।
दुश्मनों की कौन पूछे दोस्तों से डर लगे।।

जमीं पर था कभी अब आसमां को चूमता।
उसको इनसानियत का पाठ बेमानी लगे।।
झोंपड़ी सहमी हुई है, बंगले तने शान से।
ये तरक्की की तो हमें बस लंतरानी लगे।।

आपने देखा अपना आज का ये हिंदोस्तां।
हर तरफ मुफलिसी औ गम के मेले लगे।।
कोई मालामाल तो कर रहा है फांके कोई।
ख्वाब गांधी का तो अब यहां फानी लगे।।

हर तरफ नफऱत रवां है, आदमी बेजार है।
प्यार लेता सिंसकियां दुश्मनी हंसती लगे।।
हम भला क्या कहें अब सारा जहां बीमार है।
मुल्क में लोग खौफ के ख्वाब हैं बोने लगे।।

पाठ समता का कभी जिसने पढ़ाया खो गया।
सुख की सोये नींद कोई कोई कर रहा रतजगे।।
दुनिया में जो था आला आज वह बदहाल है।
ये खुशी तो है नहीं हंसता आदमी रोने लगे।।



11 दिसंबर 2013

 हे मां तुझे प्रणाम PDF Print Write e-mail
राजेश त्रिपाठी
अपने लिए कभी न सोचा, बस सदा किया उपकार।
बदले में कुछ न चाहा तूने, बस बांटा केवल प्यार ।।
मेरी सुख-नींद की खातिर, रात-रात भर मां तू जागी।
दुनिया की हर खुशी मुझे दी, खुशियां अपनी त्यागीं।।
जग के झंझावात झेल कर, दिया हमेशा मुझे सहारा।
मेरे गिर्द बस रहा हमेशा, ऐ मां सुंदर संसार तुम्हारा।।
तेरे दुलार का तेरे प्यार का, कर्ज है मुझ पर माता।
कैसे उसे चुकाऊंगा मैं, समझ नहीं कुछ आता ।।
मां  से  बड़ी कोई मूरत है, यह मैं कभी ना मानूं ।
इससे  प्यारी सूरत दुनिया में, दूजी मैं न जानूं ।।
मां की  आंखें चंदा सूरज, मां के कदम में जन्नत।
मां की  पूजा से बढ़ कर, दूजी कोई न मन्नत।।
मैंने की  गलती तो तूने, हंस कर सदा था टाला।
खुद की  सुध भूल के तूने, मुझको ऐसा पाला।।
आज  मैं जो  कुछ बन पाया, है तेरा आशीष।
ईश से  आगे सदा  मैं माता तुझे नवाता शीष।।
तुममें मंदिर  मसजिद देखे, देखा और शिवाला।
तेरा आसन  दिल में मेरे, कोई न लेनेवाला ।।
तुममें  मेरे  कृष्ण विराजें, और विराजें राम।
तुममें  मेरे  सारे तीरथ,  हे मां तुम्हें प्रणाम।।

20 नवंबर 2013

जीने की अभिलाषा

राजेश त्रिपाठी





एक अंकुर
चीर कर पाषाण का दिल
 बढ़ रहा आकाश छूने।
 जमाने के थपेड़ों से
 निडर और बेखौफ।
 उसके अस्त्र हैं दृढ़ विश्वास, 
अटूट लगन और 
बड़ा होने की उत्कट चाह। 
इसीलिए वह बना पाया
 पत्थर में भी राह। 
 उसका सपना है 
एक वृक्ष बनना, 
 आसमान को चीर
 ऊंचे और ऊंचे तनना। 
 बनना धूप में 
किसी तपते की छांह,
 अपने फलों से बुझाना
 किसी के पेट की आग।
 इसीलिए जाड़ा, गरमी,
 बारिश की मार सह रहा है वह
 जैसे दूसरों के लिए जीने की
 सीख दे रहा है वह।
 है नन्हा पर बड़े दिलवाला,
 इसीलिए बड़े सपने
 देख रहा है एक अंकुर।

14 नवंबर 2013

कविता

  उसने सोचा





राजेश त्रिपाठी

उसने सोचा

चलो खेलते हैं

एक अनोखा खेल

खेल राजा-प्रजा का

खेल ईनाम-सजा का।

वैसा ही

जैसे खेलते हैं बच्चे।

उसने सुना था

चाणक्य ने

राजा का खेल खेलते देख

किसी बच्चे को

बना दिया था चंद्रगुप्त मौर्य

दूर-दूर तक फैला था

जिसका शौर्य

उसने बनाया एक दल

कुछ हां-हुजूरों का

मिल गया बल

उनसे कहा,

आओ राजनीति-राजनीति खेले

सब हो गये राजी

बिछ गयीं राजनीति की बिसातें

राज करने को चाहिए था

एक देश

शायद वह भारत था

चाहें तो फिर कह सकते हैं इंडिया

या फिर हिंदुस्तान

यहीं परवान चढ़े

उस व्यक्ति के अरमान

राजनीति की सीढ़ी दर सीढ़ी

चढ़ता रहा

यानी अपनी एक नयी दुनिया गढ़ता रहा।

दुनिया जहां है फरेब,

जिसने ऊपर चढ़ने को दिया कंधा

उसे धकिया ऊपर चढ़ने का

यानी शातिर नेता बने रहने की राह में

कदम दर कदम चढ़ने का।

आज वह ‘राजा’ है

हर ओर बज रहा डंका है।

अब वह आदमी को नहीं

पैसे को पहचानता है,

जिनकी मदद से आगे बढ़ा

उन्हें तो कतई नहीं जानता,

इस मुकाम पर पहुंच

वह बहुत खुश है

राजनीति का खेल

बुरा तो नहीं,

उसने सोचा।

7 नवंबर 2013

मुल्क की ऐसी-तैसी हो रही

                          
     
 राजेश त्रिपाठी

 






वे कह रहे हैं मुल्क में है तरक्की हो रही।
तो फिर भला जनता क्यों है भूखी सो रही।।

कहते हैं कि रोशन हैं मुल्क का हर मकां।
झोंपड़ी गरीब की क्यों अंधेरे में सो रही।।

सियासत मुल्क की अब मतलब परस्त है।
हवा जब जैसे चले वैसे ही करवट ले रही।।

गर्त में जाये तो जाये मुल्क फिक्र क्या।
अपनी तो सुबहो-शाम अब रंगीं हो रही।।

आप ख्वाबों में अब तो जीना छोड़िए।
गौर कीजै मुल्क की ऐसी-तैसी हो रही।।

कानून किसको कहते हैं, है क्या पता।
हर कदम बदसलूकी, सीनाजोरी हो रही।।

हिंद का क्या हस्र कर डाला सियासत ने।
हर सिम्त कहर है, इनसानियत है रो रही।।

आपको गर फिकर है तो किब्लां जागिए।
मुल्क को लीजै बचा, देर वरना हो रही।।

वे मतलबी हैं इंसां को इंसा से बांट रहे।
इंसानियत मायूस है और दम तोड़ रही।।े

3 नवंबर 2013

 जाने कितने कैदखाने

राजेश त्रिपाठी

हमने अपने गिर्द

खड़े कर रखे हैं

जाने कितने कैदखाने

हम बंदी हैं

अपने विचारों के

आचारों के

न जाने कितने-कितने

सामाजिक विकारों के।

हमने खींच रखे हैं

कुछ तयशुदा दायरे

अपने गिर्द,

उनमें भटकते हम

भूल बैठे हैं कि

इनके पार

है अपार संसार।

उसकी नयनाभिराम सृष्टि,

उसके रंग, उसकी रौनक।

हम बस लगा कर

एक वाद का चश्मा

बस उसी से दुनिया

रहे हैं देख।

वाद का यह चश्मा

सिर्फ खास किस्म की

दुनिया लाता है सामने।

उसेक परे हम

कुछ नहीं देख पाते

या कहें देखना नहीं चाहते।

इस चश्मे का

अपना एक नजरिया है

अपना सिद्धांत है

यह क्रांति को ही

बदलाव का जरिया

मानता है

लेकिन बदलती दुनिया

कर चुकी है साबित

हर क्रांति धोखा है छलावा है

अगर उसमें इनसानी हित नहीं।

हम इन विचारों से आना है बाहर

हम आजाद हो जाना चाहते हैं

खास किस्म के वाद से

जो आदमी आदमी में

करता है फर्क

जो सुनना नहीं चाहता

कोई तर्क।

हम आजाद होना चाहते हैं

हर उस बंधन से

जो रच रखा है

हमने अपने गिर्द

29 अक्तूबर 2013

आज का आदमी

 





राजेश त्रिपाठी

आज का आदमी

लड़ रहा है,

कदम दर कदम,

एक नयी जंग।

ताकि बचा रहे उसका वजूद,

जिंदगी के खुशनुमा रंग।

जन्म से मरण तक

बाहर से अंतस तक

बस जंग और जंग।

जिंदगी के कुरुक्षेत्र में

वह बन गया है

अभिमन्यु

जाने कितने-कितने

चक्रव्यूहों में घिरा हुआ

मजबूर और बेबस है।

उसकी मां को

किसी ने नहीं सुनाया

चक्रव्यूह भेदने का मंत्र

इसलिए वह पिट रहा है

यत्र तत्र सर्वत्र।

लुट रही है उसकी अस्मिता,

उसका स्वत्व

घुट रहे हैं अरमान।

कोई नहीं जो बढ़ाये

मदद का हाथ

बहुत लाचार-बेजार है

आज का आदमी।

19 अक्तूबर 2013

........ दरिंदा :)

सभी साथियों को मेरा नमस्कार आप सभी के समक्ष पुन: उपस्थित हूँ प्रसिद्ध कवि भवानीप्रसाद मिश्र जी की रचना...... दरिंदा के के साथ उम्मीद है आप सभी को पसंद आयेगी.......!!


दरिंदा
आदमी की आवाज़ में
बोला

स्वागत में मैंने
अपना दरवाज़ा
खोला

और दरवाज़ा
खोलते ही समझा
कि देर हो गई

मानवता
थोडी बहुत जितनी भी थी
ढेर हो गई !

- - भवानीप्रसाद मिश्र



12 अक्तूबर 2013

दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं

प्रस्तुत है श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता जो मुझे बहुत प्रिय है .............

पंथ जीवन का चुनौती दे रहा है हर कदम पर ,
आखिरी मंजिल नहीं होती कहीं भी दृष्टिगोचर ,
धूलि से लद ,स्वेद से सिंच, हो गई है देह  भारी,
कौन - सा विश्वास मुझको खींचता जाता निरंतर !

पंथ क्या, पथ की थकन क्या
स्वेद कण क्या,
दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं !

एक भी संदेश आशा का नहीं देते सितारे ,
प्रकृति ने मंगल शकुन - पथ में नहीं मेरे संवारे ,
विश्व का उत्साहवर्धक शब्द भी  मैंने सुना कब ,
किन्तु बढ़ता जा रहा हूँ लक्ष्य पर किसके सहारे !

विश्व की अवहेलना क्या ,
अपशकुन  क्या, दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं !

चल रहा है पर पहुंचना लक्ष्य पर इसका अनिश्चित ,
कर्म कर भी कर्मफल से  यदि  रहा यह पथ वंचित,
विश्व तो उस पर हंसेगा ,खूब भूला ,खूब भटका !
किन्तु  गा  यह पंक्तियाँ दो वह करेगा धैर्य संचित !

व्यर्थ जीवन ,व्यर्थ जीवन
की लगन क्या ,
दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं ?

अब नहीं उस पार का भी भय मुझे  कुछ सताता ,
उस तरफ के लोक से भी जुड़ चुका है एक नाता ,
मैं भी उसे भूला नहीं वह भी नहीं भूली मुझे भी ,
मृत्यु पथ पर भी बढूंगामोद से यह गुनगुनाता -

अंत यौवन ,अंत जीवन
का, मरण क्या

दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं !

9 अक्तूबर 2013

सागर लम्बी सांसें भरता है















प्रस्तुत है तार सप्तक के प्रमुख कवियों में से एक - रामविलास शर्मा की यह कविता, जो मुझे बहुत प्रिय है ........

सागर लम्बी सांसें भरता है
सिर धुनती है लहर – लहर

बूँदी बादर में एक वही स्वर
गूँज रहा है हहर - हहर

सागर की छाती से उठकर
यह टकराती है कहाँ लहर ?

जिस ठौर हृदय में जलती है
वह याद तुम्हारी आठ प्रहर

बस एक नखत ही चमक रहा है
अब भी काली लहरों पर

जिसको न अभी तक ढँक पाए हैं
 सावन के बूँदी - बादर

यह जीवन यदि अपना होता
यदि वश होता अपने ऊपर

यह दुखी हृदय भी भर आता
भूले दुख से जैसे सागर

वह डूब गया चंचल तारा
जो चमक रहा था लहरों पर

सावन के बूँदी - बादर में
अब एक वही स्वर हहर हहर

सागर की छाती से उठकर
यह टकराती है कहाँ लहर ?

जिस ठौर नखत वह बुझ कर भी
जलता रहता है आठ पहर

सागर लम्बी सांसें भरता है
सिर धुनती है लहर - लहर

पर आगे बढ़ता है मानव
अपनेपन से ऊपर उठकर

आगे सागर का जल अथाह
ऊपर हैं नीर भरे बादर

बढ़ता है फिर भी जनसमूह
जल की इस जड़ता के ऊपर

बैठा है कौन किनारे पर
यह गरज रहा है जन - सागर?

पीछे हटकर सर धुनकर भी
आगे बढती है लहर - लहर

दुःख के इस हहर - हहर में भी
ऊँचा उठता है जय का स्वर

सीमा के बंधन तोड़ रही है
सागर की प्रत्येक लहर 

5 अक्तूबर 2013

........है जिंदगी एक छलावा -- श्रीमती आशा लता सक्सेना जी :)



है जिंदगी एक छलावा
पल पल रंग बदलती है
है जटिल स्वप्न सी
कभी स्थिर नहीं रहती |
जीवन से सीख बहुत पाई
कई बार मात भी खाई
यहाँ अग्नि परीक्षा भी
कोई यश न दे पाई |
अस्थिरता के इस जालक में
फँसता गया ,धँसता गया
असफलता ही हाथ लगी
कभी उबर नहीं पाया |
रंग बदलती यह जिंदगी
मुझे रास नहीं आती
जो सोचा कभी न हुआ
स्वप्न बन कर रह गया |
छलावा ही छलावा
सभी ओर नज़र आया
इससे कैसे बच पाऊँ
विकल्प नज़र नहीं आया  !!

--  आशा लता सक्सेना 

3 अक्तूबर 2013

तुम गर जरा मुझे प्यार दो


-राजेश त्रिपाठी

मेरे गीतों को दे दो मधुर रागिनी, मेरे सपनों को होने साकार दो।

सारी दुनिया की खुशियां मिल जायेंगी, तुम गर जरा मुझे प्यार दो।।

कामनाएं तड़पती, सिसकती रहीं।

जिंदगी इस कदर दांव चलती रही।।

हम वफाओं का दामन थामे रहे।

हर कदम जिंदगी हमको छलती रही।।

एक उजडा चमन है ये जीवन मेरा, फिर संवरने का इसको आधार दो। (सारी दुनिया...)

प्रार्थनाएं सभी अनसुनी रह गयीं।

याचनाएं न जाने कहां खो गयीं।।

हर तमन्ना हमारी अधूरी रही।

गम का पर्याय ये जिंदगी हो गयी।।

जिंदगी जिसके खातिर तरसती रही, सुख का वही मुझको संसार दो। (सारी दुनिया...)

खुलें जब तुम्हारे नयन मदभरे।

जैसे सूरज को फिर से रवानी मिले।।

मुसकराओ तो ऐसा एहसास हो।

फूलों को इक नयी जिंदगानी मिले।।

एक मूरत जो है कल्पना में बसी, उसे रंग दो, आकार दो। (सारी दुनिया...)

कल्पनाओं को मेरी नयी जान दो।

गीतों को इक नया उनमान दो।।

दो मुझे जिंदगी के नये मायने।

मेरे होने की इक पहचान दो।।

जिसकी यादों में जागा किये ये नयन, उसी रूप का उनको दीदार दो। (सारी दुनिया...)

2 अक्तूबर 2013

शत बार प्रणाम

शांति, अहिंसा का जो पुजारी, जीवन ऐसा जैसे फकीर।
सत्याग्रह से बदल के रख दी जिसने भारत की तकदीऱ।।
हमे दिलायी उसने आजादी, हम भूल गये उसके आदर्श।
रामराज्य का सपना टूटा, जिससे रो रहा है भारतवर्ष ।
आज उन्हें जन्मदिवस पर करते हैं शत बार प्रणाम।
जिनके कंठ से गूंजा था रघुपति राघव राजा राम़ ।।

29 सितंबर 2013

मुझको भी जीवन का अधिकार दे हे माँ


यह एक अजन्मी बेटी भ्रूण की अपनी माँ से पुकार है. . .

 मुझको भी जीवन का अधिकार दे हे माँ
 ममता की मूरत का मुझे दीदार दे हे माँ

 मुझमे तेरा अंश है मैं तेरी ही परछाई हूं
 मुझको तू अपना सा ही आकार दे हे मां
to read more please click here
  http://mankamirror.blogspot.in/

.............अपाहिज व्यथा -- दुष्यंत कुमार

आप सभी साथियों को मेरा नमस्कार मैं संजय भास्कर कविता मंच पर दोबारा हाजिर हूँ कवि दुष्यन्त कुमार जी की सुंदर रचना....अपाहिज व्यथा...के साथ उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी........ !!


अपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ,
तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ !

ये दरवाज़ा खोलो तो खुलता नहीं है,
इसे तोड़ने का जतन कर रहा हूँ !

अँधेरे में कुछ ज़िन्दगी होम कर दी,
उजाले में अब ये हवन कर रहा हूँ !

वे सम्बन्ध अब तक बहस में टँगे हैं,
जिन्हें रात-दिन स्मरण कर रहा हूँ !

तुम्हारी थकन ने मुझे तोड़ डाला,
तुम्हें क्या पता क्या सहन कर रहा हूँ !

मैं अहसास तक भर गया हूँ लबालब,
तेरे आँसुओं को नमन कर रहा हूँ !

समालोचको की दुआ है कि मैं फिर,
सही शाम से आचमन कर रहा हूँ !


- - दुष्यंत कुमार


26 सितंबर 2013

रंजो गम मुफलिसी की गज़ल जिंदगी

 





राजेश त्रिपाठी
रंजो गम मुफलिसी की गज़ल जिंदगी।
कैसे कह दें खुदा का फज़ल जिंदगी।।
भूख की आग में तपता बचपन जहां है।
नशे में गयी डूब जिसकी जवानी ।।
फुटपाथ पर लोग करते बसर हैं।
राज रावण का सीता की आंखों में पानी।।
किस कदर हो भला फिर बसर जिंदगी।
कैसे कह दें.....
चोर नेता हैं, शासक गिरहकट जहां के।
पूछो मत हाल कैसे हैं यारों वहां के ।।
कहीं पर घोटाला, कहीं पर हवाला।
निकालेंगे ये मुल्क का अब दिवाला ।।
इनके लिए बस इक शगल जिंदगी।
कैसे कह दें....
राज अंधेरों का उजालों को वनवास है।
ये तो गांधी के सपनों का उपहास है।।
कोई हर रोज करता है फांकाकसी ।
किसी की दीवाली तो हर रात है ।।
मुश्किलों की भंवर जब बनी जिंदगी।
कैसे कह दें....
जहां सच्चे इंसा का अपमान हो।
खो गया आदमी का ईमान हो ।।
योग्यता हाशिए पर जहां हो खड़ी।
पद से होती जहां सबकी पहचान हो।।
उस जहां में हो कैसे गुजर जिंदगी।
कैसे कह दें...
सियासत की चालों का ऐसा असर है।
मुसीबत का पर्याय अब हर शहर है।।
कहीं पर है दंगा, कहीं पर कहर है।
खून से रंग गयी मुल्क की हर डगर है।।
किस कदर बेजार हो गयी जिंदगी।
कैसे कह दें खुदा का फज़ल जिंदगी।

23 सितंबर 2013

...........बहुत दिनों में आज मिली है साँझ अकेली :))

आप सभी साथियों को मेरा सादर नमस्कार मैं संजय भास्कर कविता मंच ( सामूहिक ब्लॉग - जिसका जिसका का उदेश्य नये कवियों को प्रोत्साहन व अच्छी कविताओं का संग्रहण करना है ) पर हाजिर हूँ अपनी पहली प्रस्तुति के साथ अपने प्रिय प्रसिद्ध कवि शिवमंगल सिंह सुमन जी की सुंदर रचना......सूनी साँझ के के साथ....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी और साथ ही धन्यवाद करना चाहूँगा कुलदीप ठाकुर जी का जिन्होंने मुझे इस सामूहिक ब्लॉग में योगदान करने का अवसर प्रदान किया.............. !!


                                      


 बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम ।

पेड खडे फैलाए बाँहें
लौट रहे घर को चरवाहे
यह गोधुली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम ।

कुलबुल कुलबुल नीड-नीड में
चहचह चहचह मीड-मीड में
धुन अलबेली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम ।

जागी-जागी सोई-सोई
पास पडी है खोई-खोई
निशा लजीली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम ।

ऊँचे स्वर से गाते निर्झर
उमडी धारा, जैसी मुझपर-
बीती झेली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम ।

यह कैसी होनी-अनहोनी
पुतली-पुतली आँख मिचौनी
खुलकर खेली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम ।


@  शिवमंगल सिंह सुमन

21 सितंबर 2013

मेरे देश को आज क्या हो रहा है

-राजेश त्रिपाठी
मेरे देश को आज क्या हो रहा है।
हंसते हंसते यहां आदमी रो रहा है।।
न अमराइयों में पड़ें आज झूले।
पनघट भी गांवों के अब गीत भूले।।
न कजरी की तानें न बिरहा की बोली।
चले बात ही बात में आज गोली ।।
बारूदी गंधों में डूबी दिशाएं।
गांधी का सपना दफन हो रहा है।। (हंसते हंसते)
कोई मंदिरों के लिए है परेशां।
किसी को फकत मसजिदों की फिकर है।।
वहां सरहदों पर , बवंडर उठे हैं।
तनीं देश पर, दुश्मनों की नजर है।।
बगावत के ब्यूहों को, अब कौन तोड़े।
भारत का अभिमन्यु जब सो रहा है।।
बचपन से ये सीख है हमने पायी।
इंसानियत का , धरम है भलाई।।
लग रहा आज, ये पाठ उलटा पढ़ा है।
सूली पे हर सदी का मसीहा चढ़ा है।।
चाटुकारों की चांदी जहां कट रही।
सच्चा इंसा वहां हाशिया हो रहा है।। (हंसते हंसते)
सियासत के सरमायेदारों, करम हो।
बहुत हो चुका, अब कुछ तो शरम हो।।
इंसा को वोटों में, तुमने है ढाला।
मिल्लत की छाती पर, भोंका है भाला।।
छोटे कदम अब , बहकने लगे हैं।
संभालो इन्हें अब, गजब हो रहा है।। (हंसते हंसते)
हवाओं में बढ़ती तपिश कह रही है।
बगावत की आंधी यहां उठ रही है।।
न अब जहर घोलो, न नफरत बढ़ाओ।
मुल्क के रहनुमा, वक्त है चेत जाओ।।
दहशत ही दहशत , कदम दर कदम है।
हर दिशा से ये कैसा धुआं उठ रहा है।।
मेरे देश को आज क्या हो रहा है।
हंसते हंसते यहां आदमी रो रहा है।।

20 सितंबर 2013

इक नई दुनिया बनाना है अभी

आज फिर से, एक नया सा, स्वप्न सजाना है अभी,
आज फिर से, इक नई दुनिया बनाना है अभी |

कह दिया है, जिंदगी से, राह न मेरा देखना,
खुद ही जाके, औरों पे, खुद को लुटाना है अभी |

साख पे, बैठे परिंदे, हिल रहे हैं खौफ से,
घोंसला उनका सजा कर, डर भागना है अभी |

लग गई है, आग अब, दुनिया में देखो हर तरफ,
बाँट कर, शीत प्रेम फिर से, वो बुझाना है अभी |

जा रहा है, वह मसीहा, रूठकर हम सब से ही,
रोक कर उसका पलायन, यूँ मनाना है अभी |

दिख रहे, सोये हुए से, जाने कितने कुम्भकरण,
पीट कर के, ढोल को, उनको जगाना है अभी |

देखती, माँ भारती, आँखों में लेके, अश्रु-सा,
सोख ले, उन अश्क को, कुछ कर दिखाना है अभी |

राह को हर, कर दे रौशन, रख दूं ऐसा "दीप" मैं,
आज फिर से, इक नई दुनिया बनाना है अभी |

-प्रदीप कुमार साहनी

19 सितंबर 2013

वो इक भोली-सी लड़की जो मेरे सपनों में आती है

-राजेश त्रिपाठी

हवाएं गुनगुनाती हैं, वह जब जब मुसकराती है।
घटाएं मुंह चुराती हैं, वो जब जुल्फें सजाती है।।
फिजाएं झूम जाती हैं, वो जब जब गीत गाती है।
वो इक भोली-सी लड़की जो मेरे सपनों में आती है।।
 
किसी मंदिर की मूरत है, किसी की कल्पना है वो।
किसी सुंदर से आंगन में सजी एक अल्पना* है वो।।
किसी की आंख की ज्योती किसी दीपक की बाती है।
वो इक भोली-सी लड़की जो मेरे सपनों में आती है।।

जिधर से वो गुजरती है, उधर हो नूर* की बारिश।
इक बांका-सा शहजादा बस उसकी भी है ख्वाहिश।।
पिता का मान है वो, मां की अनमोल थाती है।
इक भोली-सी लड़की जो मेरे सपनों में आती है।।

यही डर है कहीं सपना ये उसका टूट न जाये।
उसे जालिम जमाने का लुटेरा लूट न जाये।।
कली ये टूट न जाये अभी जो खिलखिलाती है।
वो इक भोली-सी लड़की जो मेरे सपनो में आती है।।

प्रभु से प्रार्थना है हमेशा ये मोती सलामत हो।
उससे दूर दुनिया की हरदम सारी अलामत हो।।
खुशी झूमा करे हर सूं जिधर को भी वो जाती है।
वो इक भोली-सी लड़की जो मेरे सपनो में आती है।।



*अल्पना (रंगोली)

* नूर (उजाला)

हिमालय

सोहनलाल द्विवेदी जी की कालजयी रचना:-

युग युग से है अपने पथ पर 
देखो कैसा खड़ा हिमालय!
डिगता कभी न अपने प्रण से
रहता प्रण पर अड़ा हिमालय!

जो जो भी बाधायें आईं
उन सब से ही लड़ा हिमालय,
इसीलिए तो दुनिया भर में
हुआ सभी से बड़ा हिमालय!

अगर न करता काम कभी कुछ
रहता हरदम पड़ा हिमालय
तो भारत के शीश चमकता
नहीं मुकुट–सा जड़ा हिमालय!

( प्राथमिक विद्यालय में सिर्फ आगे की पंक्तियाँ थी, जो आज भी कंठस्थ है )

खड़ा हिमालय बता रहा है
डरो न आँधी पानी में,
खड़े रहो अपने पथ पर
सब कठिनाई तूफानी में!

डिगो न अपने प्रण से तो ––
सब कुछ पा सकते हो प्यारे!
तुम भी ऊँचे हो सकते हो
छू सकते नभ के तारे!!

अचल रहा जो अपने पथ पर
लाख मुसीबत आने में,
मिली सफलता जग में उसको
जीने में मर जाने में!

लिखूं गजल इक तेरे नाम

राजेश त्रिपाठी

तेरी हंसी को सुबह लिखूं,
और उदासी लिखूं शाम ।
आज बहुत मन करता है,
लिखूं गजल इक तेरे नाम।।

जुल्फें ज्यों सावन की घटा,
चेहरे में पूनम सी छटा ।
नीलकंवल से तेरे नयन,
मिसरी जैसे मीठे बचन।।
गालिब की तुम्हें लिखूं गजल,
और लिखूं इक छवि अभिराम।। (लिखूं गजल---)

सुंदरता को कर दे लज्जित,
ऐसी तू शफ्फाक बदन।
तेरे कदमों की आहट से,
खिल उठे मुरझाया चमन।।
तुझे जिंदगी लिखूं मैं,
और एक खुशनुमा पयाम।। (लिखूं गजल---)

मतलब भरे जमाने में,
इक गम के अफसाने में।
तुम ही हो इक आस किरण,
बस तुम ही हो जीवन धन।।
तुमको ही दिन-रात लिखूं,
लिखूं तुम्हें ही सुबहो-शाम (लिखूं गजल---)

आती जाती सांस लिखूं,
इक मीठा अहसास लिखूं।
जीवन का पर्याय लिखूं,
और भला क्या हाय लिखूं।।
तुम्हें लिखूं दिल की धड़कन,
खुशियों की हमनाम लिखूं। (लिखूं गजल..)

मेरी बांहों में खुशियों की बारात है

 गीत
राजेश त्रिपाठी
आपका साथ है, चांदनी रात है।
मेरी बांहों में खुशियों की बारात है।।
मैंने सपनों में बरसों तराशा जिसे।
वही मन के मंदिर की मूरत हो तुम।।
तारीफ में अब तेरी क्या कहूं।
खूबसूरत से भी खूबसूरत हो तुम।।
रंजो गम मिट गये मिल गयी ऐसी सौगात है।
मेरी बांहों में खुशियों की सौगात है।।
तुम मिली जिंदगी जिंदगी बन गयी।
तेरी चाहत मेरी बंदगी बन गयी ।।
नजरों में तुम, नजारों में तुम हो।
महकती हुई इन बहारों में तुम हो।।
तुम मेरी कल्पना, तुम मेरी रागिनी,
बस तुम्ही से ये मेरे नगमात हैं।
मेरी बांहों में खुशियों की बारात है।।
कामनाओं ने लीं फिर से अंगडाइयां।
यूं लगा बज उठीं फिर से शहनाइयां।।
हवा मदभरी फिर लगी डोलने।
बागों में कोयल लगी बोलने।।
क्या तेरे हुश्न की ये करामात है।
मेरी बांहों में खुशियों की बारात है।।
मन हुआ बावरा यूं तेरे प्यार में।
तुम बिन भाता नहीं कुछ भी संसार में।।
तुमसे शुरू प्यार की दास्तां।
खत्म भी तुम में होती है ऐ मेहरबां।।
अब तेरे बिन नहीं चैन दिन-रात है।
मेरी बांहों में खुशियों की बारात है।।

14 सितंबर 2013

मैंने जन्म नहीं मांगा था










प्रस्तुत है श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी(जो न केवल एक सफल राजनेता बल्कि सहृदय कवि भी रहे हैं ) की यह कविता……………………. ………… 

मैंने जन्म नहीं मांगा था, किन्तु
मरण की मांग करूंगा
जाने कितनी बार जिया हूँ
जाने कितनी बार मरा हूँ
जन्म - मरण के फेरे से मैं
इतना पहले नहीं डरा हूँ
अंतहीन अंधियार ,ज्योति की
कब तक और तलाश करूंगा

मैंने जन्म नहीं मांगा था, किन्तु
मरण की मांग करूंगा

बचपन ,यौवन और बुढ़ापा
कुछ दशकों में ख़तम कहानी
फिर - फिर जीना, फिर -फिर मरना
यह मजबूरी या मनमानी
पुनर्जन्म के पूर्व बसी
दुनियां का द्वाराचार करूंगा

मैंने जन्म नहीं मांगा था, किन्तु
मरण की मांग करूंगा 

10 सितंबर 2013

हमारी हिंदी रघुवीर सहाय


हमारी हिंदी एक दुहाजू की नई बीवी है
बहुत बोलनेवाली बहुत खानेवाली बहुत सोनेवाली

गहने गढ़ाते जाओ
सर पर चढ़ाते जाओ

वह मुटाती जाए
पसीने से गंधाती जाए घर का माल मैके पहुँचाती जाए

पड़ोसिनों से जले
कचरा फेंकने को ले कर लड़े

घर से तो खैर निकलने का सवाल ही नहीं उठता
औरतों को जो चाहिए घर ही में है

एक महाभारत है एक रामायण है तुलसीदास की भी राधेश्याम की भी
एक नागिन की स्टोरी बमय गाने
और एक खारी बावली में छपा कोकशास्त्र
एक खूसट महरिन है परपंच के लिए
एक अधेड़ खसम है जिसके प्राण अकच्छ किए जा सकें
एक गुचकुलिया-सा आँगन कई कमरे कुठरिया एक के अंदर एक
बिस्तरों पर चीकट तकिए कुरसियों पर गौंजे हुए उतारे कपड़े
फर्श पर ढंनगते गिलास
खूँटियों पर कुचैली चादरें जो कुएँ पर ले जाकर फींची जाएँगी

घर में सबकुछ है जो औरतों को चाहिए
सीलन भी और अंदर की कोठरी में पाँच सेर सोना भी
और संतान भी जिसका जिगर बढ गया है
जिसे वह मासिक पत्रिकाओं पर हगाया करती है
और जमीन भी जिस पर हिंदी भवन बनेगा

कहनेवाले चाहे कुछ कहें
हमारी हिंदी सुहागिन है सती है खुश है
उसकी साध यही है कि खसम से पहले मरे
और तो सब ठीक है पर पहले खसम उससे बचे
तब तो वह अपनी साध पूरी करे ।

6 सितंबर 2013

हमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक नहीं,साहिर लुधियानवी


हमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक नहीं,
हमें तो अपनी ज़मीं पर हलों की हाजत है॥
कहो कि अब कोई ताजिर इधर का रुख न करे,
अब इस जा कोई कंवारी न बेची जाएगी।
ये खेत जाग पड़े, उठ खड़ी हुई फ़सलें,
अब इस जगह कोई क्यारी न बेची जायेगी॥
यह सर ज़मीन है गौतम की और नानक की,
इस अर्ज़े-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभी।
हमारा खून अमानत है नस्ले-नौ के लिए,
हमारे खून पे लश्कर न पल सकेंगे कभी॥
कहो कि आज भी हम सब अगर खामोश रहे,
तो इस दमकते हुए खाकदाँ की खैर नहीं।

29 अगस्त 2013

मधुशाला [10 से 15]



जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।

मेहंदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।

जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।