ब्लौग सेतु....

18 अगस्त 2017

युद्ध


       (1)
जीवन मानव का
हर पल एक युद्ध है
मन के अंतर्द्वन्द्व का
स्वयं के विरुद्ध स्वयं से
सत्य और असत्य के सीमा रेखा
पर झूलते असंख्य बातों को
घसीटकर अपने मन की अदालत में
खड़ा कर अपने मन मुताबिक
फैसला करते हम
धर्म अधर्म को तोलते छानते
आवश्यकताओं की छलनी में बारीक
फिर सहजता से घोषणा करते
महाज्ञानी बनकर क्या सही क्या गलत
हम ही अर्जुन और हम ही कृष्ण भी
जीवन के युद्ध में गांधारी बनकर भी
जीवित रहा जा सकता है
वक्त शकुनि की चाल में जकड़.कर भी
जीवन के लाक्षागृह में तपकर
कुंदन बन बाहर निकलते है
हर व्यूह को भेदते हुए
जीवन के अंतिम श्वास तक संघर्षरत
मानव जीवन.एक युद्ध ही है
          (2)
ऊँचे ओहदों पर आसीन
टाई सूट बूट से सुसज्जित
माईक थामे बड़ी बातें करते
महिमंडन करते युद्ध का
विनाश का इतिहास बुनते
संवेदनहीन हाड़ मांस से बने
स्वयं को भाग्यविधाता बताते
पाषाण हृदय निर्विकार स्वार्थी लोग
देश के आत्मसम्मान के लिए
जंग की आवश्यकता पर
आकर्षक भाषण देते
मृत्यु का आहवाहन करते पदासीन लोग
युद्ध की गंध बहुत भयावह है
पटपटाकर मरते लोग
कीड़े की तरह छटपटाकर
एक एक अन्न.के दाने को तरसते
बूँद बूँद पानी को सूखे होंठ
अतिरिक्त टैक्स के बोझ से बेहाल
आम जनमानस
अपनों के खोने का दर्द झेलते
रोते बिसूरते बचे खुचे लोग
अगर विरोध करे युद्ध का
देशद्रोही कहलायेगे
देशभक्ति की परीक्षा में अनुत्तीर्ण
राष्ट्रभक्त न होने के भय से मौन व्रत लिये
सोयी आत्मा को थपकी देते
अनदेखा करते बुद्धिजीवी वर्ग
एक वर्ग जुटा होगा कम मेहनत से
ज्यादा से ज्यादा जान लेने की तरकीबों में
धरती की कोख बंजर करने को
धड़कनों.को गगनभेदी धमाकों और
टैंकों की शोर में रौंदते
लाशों के ढेर पर विजय शंख फूँकेगे
रक्त तिलक कर छाती फुलाकर नरमुड़ पहने
सर्वशक्तिमान होने का उद्घोष करेगे
शांतिप्रिय लोग बैठे गाल बजायेगे
कब तक नकारा जा सकता है सत्य को
युद्ध सदैव विनाश है
पीढ़ियों तक भुगतेगे सज़ा
इस महाप्रलय की अनदेखी का।

15 अगस्त 2017

कहाँ है मेरा हिन्दोस्तान - अजमल सुल्तानपुरी

सभी पाठकों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाए
मुसलमाँ और हिन्दू की जान 
कहाँ है मेरा हिन्दोस्तान 
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ 

मिरे बचपन का हिन्दोस्तान 
न बंगलादेश न पाकिस्तान 
मिरी आशा मिरा अरमान 
वो पूरा पूरा हिन्दोस्तान 
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ 

वो मेरा बचपन वो स्कूल 
वो कच्ची सड़कें उड़ती धूल 
लहकते बाग़ महकते फूल 
वो मेरे खेत मिरे खलियान 
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ 

वो उर्दू ग़ज़लें हिन्दी गीत 
कहीं वो प्यार कहीं वो प्रीत 
पहाड़ी झरनों के संगीत 
देहाती लहरा पुर्बी तान 
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ 

जहाँ के कृष्ण जहाँ के राम 
जहाँ की शाम सलोनी शाम 
जहाँ की सुब्ह बनारस धाम 
जहाँ भगवान करें अश्नान 
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ 

जहाँ थे 'तुलसी' और 'कबीर' 
'जायसी' जैसे पीर फ़क़ीर 
जहाँ थे 'मोमिन' 'ग़ालिब' 'मीर' 
जहाँ थे 'रहमन' और 'रसखा़न' 
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ 

वो मेरे पुरखों की जागीर 
कराची लाहौर ओ कश्मीर 
वो बिल्कुल शेर की सी तस्वीर 
वो पूरा पूरा हिन्दोस्तान 
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ 

जहाँ की पाक पवित्र ज़मीन 
जहाँ की मिट्टी ख़ुल्द-नशीन 
जहाँ महांराज 'मोईनुद्दीन' 
ग़रीब-नवाज़ हिन्द सुल्तान 
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ 

मुझे है वो लीडर तस्लीम 
जो दे यक-जेहती की ता'लीम 
मिटा कर कुम्बों की तक़्सीम 
जो कर दे हर क़ालिब इक जान 
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ 

ये भूका शाइर प्यासा कवी 
सिसकता चाँद सुलगता रवी 
हो जिस मुद्रा में ऐसी छवी 
करा दे 'अजमल' को जलपान 
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ 

मुसलमाँ और हिन्दू की जान 
कहाँ है मेरा हिन्दोस्तान 
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ 
-अजमल सुल्तानपुरी



इकहत्तरवां स्वाधीनता-दिवस



अँग्रेज़ी हुक़ूमत के

ग़ुलाम थे  हम

15 
अगस्त 1947 से पूर्व


अपनी नागरिकता


ब्रिटिश-इंडियन


लिखते थे हम आज़ादी से पूर्व।




ऋषि-मुनियों का


दिया परिष्कृत ज्ञान


शोध / तपस्या से


विकसित विज्ञान


राम-कृष्ण का


जीवन दर्शन


नियत-नीति-न्याय  में


विदुर-चाणक्य का आकर्षण


बुद्ध-महावीर के अमर उपदेश


करुणा और अहिंसा के संदेश


जन-जन  तक  पहुँचा सके हम


सूत्र एकता का अटूट  बना सके हम।




अहंकार  के अस्त्र -शस्त्र


और स्वहित  की परिधि


खींचते गए  लकीरें सरहदी


बनते गए क़िले


बंटती रही झील-नदी


राष्ट्रीयता का भाव


रियासती हो गया


सूरमाओं का मक़सद


किफ़ायती हो गया


सरहदी मुल्क़ों  से


लुटेरे आते-जाते रहे


कुछ बस गए


कुछ माल-दौलत ले जाते रहे


कुछ जनता के अज़ीज़ हो गए


कुछ  इश्क़  के  मरीज़ हो गए।




कारवां अनवरत चलते  रहे


लोग वक़्त की माँग में ढलते रहे


व्यथित जनमानस को राह दिखाने


सूर-तुलसी-कबीर-चिश्ती-रहीम  आये


प्रेम और ज्ञान का सन्देश लेकर


नानकरैदास -मीरा-जायसी भी छाये।




कश्मीर की वादियों से


कन्याकुमारी में


समुंदर की लहरों तक



एक अन्तः सलिला बही


स्वाधीनता की बयार

देशभर में अलख जगाती रही। 




यातना के दौर


आज़ादी के दीवानों ने सहे


अनगिनत किस्से हैं


अपने  कहे-अनकहे


हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई


मिल जाओ सब छोड़ बुराई


हो गए  मुक़म्मल  


आज़ादी  के  सत्तर  बरस! 

आओ मनाएं इकहत्तरवां  

स्वाधीनता-दिवस!!

जय हिन्द !!!

रवीन्द्र सिंह यादव



14 अगस्त 2017

सब ख़ामोश हो गए....विवेक माधवार


वो बच्चे थे 
सब ख़ामोश हो गए
कोई सचिन कोई अटल कोई कलाम बनता
विश्व पटल पर शायद बड़ा कोई नाम बनता
पर अचानक ही सब बेहोश हो गये
बच्चे थे साहेब ............सब ख़ामोश हो गए

बाप का सबर माँ का प्यार टूटा
राखी बहन की दादी का दुलार टूटा
देखते देखते सब ज़मींदोज़ हो गए
बच्चे थे साहेब ............सब ख़ामोश हो गए

चिताओं में अब हम तुमको भी सुला देंगे
बहुत बेशर्म हैं हम तुमको भी भुला देंगें
सियासी दाँव पेंचों से वो सब निर्दोष हो गए
बच्चे थे साहेब ............सब ख़ामोश हो गए

-विवेक माधवार
प्रस्तुतिः संगीता अस्थाना
फेसबुक से

9 अगस्त 2017

"छोटू"

"छोटू" ----
आज़ादी का जश्न मनाने
के पहले एक नज़र देखिये
**चित्र साभार गूगल**

कंधे पर फटकर झूलती
मटमैली धूसर कमीज
चीकट हो चुके धब्बेदार
नीली हाफ पैंट पहने
जूठी प्यालियों को नन्ही
मुट्ठियों में कसकर पकड़े
इस मेज से उस मेज दौड़ता
साँवले चेहरे पर चमकती
पीली आँख मटकाता
भोर पाँच बजे ही से
चाय समोसे की दुकान पर
नन्हा दुबला मासूम सा 'छोटू'
किसी की झिड़की किसी
का प्यार किसी की दया
निर्निमेष होकर सहता
पापा के साथ दुकान आये
नन्हें हम उमर बच्चों को
टुकुर टुकुर हसरत से ताकता
मंगलवार की आधी छुट्टी में
बस्ती के बेफ्रिक्र बच्चों संग
कंचे, गिट्टू, फुटबॉल खेलता
नदी में जमकर नहाता
बेवजह खिलखिलाता
ठुमकता फिल्मी गाने गाता
अपने स्वाभिमानी जीवन से
खुश है या अबोधमन बचपना
वक्त की धूप सहना सीख गया
रोते रोते गीला बचपन
सूख कर कठोर हो गया है
सूरज के थक जाने के बाद
चंदा के संग बतियाता
बोझिल शरीर को लादकर
कालिख सनी डेगची और
खरकटे पतीलों में मुँह घुसाये
पतले सूखे हाथों से घिसता
निढाल थका सुस्त होकर
बगल की फूस झोपड़ी में
अंधी माँ की बातें सुनते
हाथ पैर छितराये सो जाता
        #श्वेता🍁

5 अगस्त 2017

दोस्ती, एक रिश्ता मीठा सा....स्मृति आदित्य

कल रविवार को मित्रता दिवस है....
इस अवसर पर प्रस्तुत है आदरणीय स्मृति दीदी को आलेख
........

दोस्ती, एक सलोना और सुहाना अहसास है, जो संसार के हर रिश्ते से अलग है। तमाम मौजूदा रिश्तों के जंजाल में यह मीठा रिश्ता एक ऐसा सत्य है जिसकी व्याख्या होना अभी भी बाकी है। व्याख्या का आकार बड़ा होता है।... लेकिन गहराई के मामले में वह अनुभूति की बराबरी नहीं कर सकती। इसीलिए दोस्ती की कोई एक परिभाषा आजतक नहीं बन सकी।

दोस्ती, शुद्ध और पवित्र मन का मिलन होती है। एक बेहद उत्कृष्ट अनुभूति, जिसे पाते ही तनाव और चिंता के सारे तटबंध टूट जाते हैं।। उलझनों की जंजीरें खुल जाती है।

दोस्ती एक ऐसा आकाश है जिसमें प्यार का चांद मुस्कुराता है, रिश्तों की गर्माहट का सूर्य जगमगाता है और खुशियों के नटखट सितारे झिलमिलाते हैं। एक बेशकीमती पुस्तक है दोस्ती, जिसमें अंकित हर अक्षर, हीरे, मोती, नीलम, पन्ना, माणिक और पुखराज की तरह है, बहुमूल्य और तकदीर बदलने वाले।

एक सुकोमल और गुलाबी रिश्ता है दोस्ती, छुई-मुई की नर्म पत्तियों-सा। अंगुली उठाने पर यह रिश्ता कुम्हला जाता है। इसलिए दोस्त बनाने से पहले अपने अन्तर्मन की चेतना पर विश्वास करना जरूरी है।

सच्चाई, ईमानदारी, परस्पर समझदारी, अमिट विश्वास, पारदर्शिता, समर्पण, सम्मान जैसे श्रेष्ठ तत्व दोस्ती की पहली जरूरत है। दोस्त वह विश्वसनीय शख्स होता है जिसके समक्ष आप अपने मन की अंतिम परत भी कुरेद कर रख देते हैं। एक सच्चा दोस्त आपके विकसित होने में सहायता करता है। उसका निश्छल प्रेम आपको पोषित करता है। जिसके साथ आप अपनी ऊर्जा व निजता बांटते हैं।

दोस्ती की नवविकसित नन्ही कोंपल को जमाने के प्रदूषण से बचाना जरूरी है। तमाम उम्र इंसान को एक अच्छे दोस्त की तलाश रहती है। इसी तलाश में यह पता चलता है कि दोस्ती का एक रंग नहीं होता। अलग-अलग रंगों से सजी दोस्ती कदम-कदम पर अपना रूप दिखाती है। कई दोस्त दोस्ती की गरिमा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देते हैं। अकसर अच्छी दोस्ती को शक की दीमक लग जाती है जो अन्तत: उसे खोखला कर के छोड़ती है।

दोस्तों, शक, दोस्ती का दुश्मन है 
अपने दिल में इसे घर बनाने न दो
कल तड़पना पड़े याद में जिनकी 
रोक लो रूठकर उनको जाने न दो.. 

दोस्ती, उस गठरी के समान होती है जिसमें बंधी होती है ढेर सारी बातें, गहरे रिश्ते और खूबसूरत अहसास। इस गठरी को तुरंत खोलना चाहिए। वरना वे बातें, जो तह कर रखी हैं, वे रिश्ते, जो सिलवटों से भर गए हैं, और वे अहसास, जो गुड़-मुड़ हो गए हैं, उसमें ही गल सकते हैं, फट सकते हैं, सड़ सकते हैं। इस गठरी को मिलन सूर्य की गुनगुनी धूप में खोल कर फैलाया जाए। जैसे ही नमी दूर होगी खिल उठेगीं ढेर सारी बातें, रिश्ते और अहसास।
....
एक मीठी-सी कविता दोस्ती के नाम

दोस्ती, खुशी का मीठा दरिया है 
जो आमंत्रित करता है हमें 
'आओ, खूब नहाओ,
हंसी-खुशी की 
मौज-मस्ती की 
शंख-सीपियां 
जेबों में भरकर ले जाओ !
आओ, मुझमें डुबकी लगाओ, 
गोता लगाओ 
खूब नहाओ 
प्यार का मीठा पानी,

हाथों में भरकर ले जाओ...!
- स्मृति आदित्य     

3 अगस्त 2017

सूखा पेड़ काटने हेतु आवेदन......


माननीया /माननीय  सक्षम अधिकारी महोदया / महोदय ,

महानगर पालिक निगम / लोक निर्माण विभाग
 सदाबहार नगर , नई दिल्ली 1100 **,भारत

बिषय: सूखा पेड़ काटने हेतु आवेदन


महोदया / महोदय,

         सविनय निवेदन है कि  हमारी कॉलोनी (जोकि पॉश कॉलोनी है ) की मुख्य सड़क के किनारे उत्तर से दक्षिण की ओर (ब्लॉक - ए ) जाते हुए  दाहिनी ओर  मकान  क्रमांक  ए -125 के बाहर एक बहुत पुराना पेड़ सूख गया है। अब यह पेड़ कॉलोनीवासियों,वाहनों ,मकानों ,बिजली के तारों ,राहगीरों,पशुओं आदि  के लिए ख़तरा  बन चुका है।
         आँधी-तूफ़ान में............................................................................................................................ .............................................................................................................................................................

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         कृपया जनहित में शीघ्र फैसला लेने की कृपा करें। किसी हादसे का इंतज़ार न करें। 

सधन्यवाद।


दिनांक : 28 जुलाई 2017



                                                                   आवेदक

                                                 समस्त ग्रीन पार्क एन्क्लेव निवासी


संलग्न - 1. सूखे पेड़ के छायाचित्र -4                                                      

              2. स्थानीय विधायक की अनुशंसा
              3.स्थानीय निगम पार्षद की अनुशंसा
              4.आर डब्ल्यू ए अध्यक्ष की अनुशंसा
...................................................................................................................................................................

एक दिन

तेज़ हवा बही
सड़ा सूखा  पेड़ की
छाल का टुकड़ा
छायाविहीन
सूखे शजर
के नीचे खड़ी
लग्ज़री-कार की
छत पर  आ  गिरा
नुकसान नहीं हुआ
आवाज़ सुनकर
हुज़ूम   आ   घिरा।



लोगों ने सूखे पेड़ को

नीचे से ऊपर तक घूरा
किसी ने कहा -
इसका तो हो
चुका समय पूरा
कार-मालिक के घर में
चार और महँगी  कारें  हैं
सबकी अपनी-अपनी कारें हैं
चोटिल चॉकलेटी रंग की
उपेक्षित कार के लिए
घर  में  जगह   की   तंगी  है
शहरों में भौतिकता पसरी है
सहेजते हैं जो चीज़ महँगी है।



कॉलोनीवासियों

को कर  लिया एकत्र
चतुर कार- मालिक  ने
सूखे पेड़ को कटवाने का
पारित  करा  लिया प्रस्ताव
अपनी-अपनी राय देते
सयाने ख़ूब  खा रहे थे भाव।



आवेदन लिखने

की बारी आयी
"क" बोला -
आजकल हिंदी
बहुत  है चर्चा में
समझ नहीं पाएंगे
अधिकारी क्या
लिखा है पर्चा में
"ख" बोला -
अर्ज़ी  का मज़मून
समझ नहीं आता है जब
सरकारी अमला करता है
कार्यवाई अति शीघ्र तब
"ग" बोला -
हिंदी में लिखेगा कौन ?
"घ" बोला -
व्हाट्सएप पर
मेसेज़ घुमाते हैं
हिंदी-गुरु को बुलाते हैं।
"ङ" ने कहा -
गूगल से तर्जुमाँ करवाते हैं
"च" बोला -
क्या अर्थ का अनर्थ करवाना है ?
"छ" ने पूछ लिया -
इस पेड़ का नाम क्या है ?
अलंकरण विहीन
वृक्ष का नाम .....  ?
कोई उत्तर नहीं मिला ....
पेड़  की  पहचान
तो क्या पत्ते,फूल-फल,बीज होते हैं?.



तलाश पूरी हुई

अर्ज़ी  तैयार हुई
रौब से अँग्रेज़ी में
किये सबने
हस्ताक्षर
मोती / जलेबी  जैसे
आँग्ल-भाषा-आखर
आवेदन चला
कार में होकर सवार
साथ  चले  युवा
उत्साही  दो-चार।



ऑपरेशन की

देख-सुन तैयारी
सूखा सिकुड़ा बे-नूर
दरख़्त हुआ बेचैन
तेज़  हवा  को
कोसता कहता-
है तेरी ही यह देन
चहुँओर घिर आयी
विकट निराशा को
नहीं पा रहा खदेड़
अतीत की स्मृतियों में
खो गया सूखा  पेड़।



मैं एक नर्सरी में

अंकुरित हुआ
सलोनी धूप पाकर
विकसित हुआ
एक  क़द्र-दान-ए- क़ुदरत
ले आया था  अपने घर
रोपा था उसने तबियत से
घर के बाहर
पहुँच पशुओं की
न हो मुझ तक
ईंटों का  मेरे आसपास
घेरा बनाया जालीदार
खाद-पानी देता
छिड़कता दवा दीमकमार।
..... जारी









लाता  गुड़ गोबर

सूखी पत्तियों
का कम्पोस्ट
अब कहाँ मिलेगा
वो प्यारा दोस्त।



मैं बड़ा होने लगा

वो मेरी बेडोल
शाख़ों की छंटाई करता
मुझे रूपवान होते देख
आल्हादित होता गया
आहिस्ता-आहिस्ता
मैं गबरू जवान हो गया
डालियाँ  फैलीं
इठलाकर तनकर
करने लगीं  गुफ़्तगू
नीले अम्बर से
तना तनते-तनते
सख़्त और चौड़ा हो गया
पत्तियाँ धना साया
लेकर आच्छादित हुईं
सांझ की धूप मुझपर ठहरती
मानो ढका हूँ पीले अम्बर से



धूप-चाँदनी बादल-घटाऐं

फ़लक   से  ज़मीं  तक
छाने लगीं चंचल फ़ज़ाऐं
झूमती  डालियों  की
आहें-अदाएँ पशु-पक्षी
इंसान   को  रिझाने  लगीं
फ़सल -ए -बहार की
मनोरम आहटें आने लगीं
नाज़-ओ-अंदाज़ से
इतराता मेरा सौंदर्य
हसीं साज़-सा  बजता
कोंपलों-पल्लवों  का माधुर्य
मुझे आत्ममुग्ध करता।





मुझे पाल-पोशकर

बड़ा करने वाला
एक दिन कहीं और
रहने चला गया
कुछ वर्ष पहले
मेरे साथ सेल्फ़ी ले गया
वर्षों से देखा नहीं
पता नहीं उसे क्या हुआ
करता हूँ उसके
चंगे रहने की दिन-रात दुआ।



मैं गवाह हूँ

बहुतेरे खट्टे-मीठे
किस्सों का
मेरे साये  में
चैन से बैठकर
कितनी मौलिक
कहानियाँ कही गयीं
प्यार और दर्द के
अनसुने अफ़्साने सुने
वेदना से कराहते
लोगों की आहें-चीखें
सोचो मुझसे कैसे सही गयीं.....



मेरी छाँव में

कभी चोर अपना
हिसाब लगाता  था
कभी कोई रोटी को व्याकुल
रोज़ी की आश लिए बैठता था
बस्तियां आबाद हुईं मेरे साथ
कितनों ने पींगें बढ़ायीं झूलों पर
कितने मर-मिटे अपने उसूलों पर
अगाध श्रद्धा ने बाँध दिए कितने धागे
मनौती के साथ
वृक्ष-देवता का
मान-सम्मान  देकर
देता  रहा हूँ ठंडक
बिना बिजली लेकर
सबको मुफ़्त में दी
ऑक्सीजन प्राणवायु
ख़ुद ग्रहण की  ज़हरीली
कार्बन-डाई-ऑक्साइड
हों  सभी   दीर्घायु ।




साक्षी हूँ समय का

बढ़ती पीढ़ियों  का
इतिहास मुझसे पूछो
सभ्यता की सीढ़ियों का
दफ़्न हैं मेरे सीने में
कई राज़ दुर्घटनाओं के
संगीन ज़ुर्म-वारदात के
पुलिस की तफ़तीश में
मेरा ज़िक्र होता है
क़ानून भी अब मेरी
रखवाली का भार ढोता है।



मनुष्य  तुम

कितने  ख़ुद-ग़रज़ हो ?
अपने  लाभ के लिए
रोपते-सहेजते हो मुझे
अपनी सहूलियत-सुविधा
के लिए उजाड़ते हो मुझे
आज भी घर लौटते
लम्बी उड़ान से
हाँफते हारे-थके पक्षी
मेरी सूखी काया पर
विश्राम करते हैं
बग़ल में हरे-भरे
वृक्षों  में घात लगाए छिपे
शिकारियों  के
डर से लरज़ते हैं।



घरघराती आवाज़ के साथ

एक ट्रैक्टर  आकर रुका
कुछ आदमी उतरे
रस्सी,कुल्हाड़ी,आरी,दराँती लिए
"लकड़ी तो काम की है ...."
कसाई-निगाहों से
सूखे पेड़ को कूतते हुए
एक ने कहा
और दूसरे ने तने को
ज़ोर से थपथपाया
थरथर काँपा बेचारा देख नज़ारा
सूखा पेड़  सपनों से बाहर आया।




कटते-कटते

कराहते हुए
सोच रहा है
बे-बस सूखा पेड़ -
मुझमें अब भी
बाक़ी है आग ही आग
लकड़ी आएगी काम
संसार की भलाई में
वर्षों छुपी रहेगी आग
मेरी लकड़ी से बनी
दिया-सलाई में
मेरी लकड़ी से
बनी अगर कुर्सी-मेज़
तो कुर्सी पर बैठने वाला
एक ऐसा भी होगा
जिसका
ज़मीर ज़रूर जागेगा
उठाएगा मेज़ से
कागज़-क़लम
और लिखेगा -
कविता,कहानी,लेख,उपन्यास,वार्ता,ख़बर ,
रेखाचित्र,  ग़ज़ल , निबंध,  नज़्म ,  नाटक ...........
जिनमें संवेदना  की चाभियाँ
खोलेंगीं वृक्षों को  रोपने / सहेजने  के  लिए
आदमी  के  दिमाग़  के  ताले और  फाटक .......



हे परमात्मा !

सुनो मेरी निदा !
सुनो मेरी जुस्तुजू !
नादान मनुष्य को !
माफ़ करना.......!
मुझ मज़बूर
मूक जीव  ने...!
इच्छा-मृत्यु  के लिए...!!
कभी एप्लाई नहीं किया था... !!!
             
#रवीन्द्र सिंह यादव

चित्र साभार - वीरेश कुमार ,तुषार ,मुकुंद ,पुनीत कुमार आगरा वाले