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13 मार्च 2018

मूर्ति


सोचता हूँ 
गढ़ दूँ 
मैं भी अपनी 
मिट्टी की मूर्ति, 
ताकि होती रहे 
मेरे अहंकारी-सुख की क्षतिपूर्ति। 

मिट्टी-पानी का अनुपात 
अभी तय नहीं हो पाया है, 
कभी मिट्टी कम 
तो कभी पर्याप्त पानी न मिल पाया है। 

जिस दिन मिट्टी-पानी का 
अनुपात तय हो जायेगा, 
एक सुगढ़ निष्प्राण 
शरीर उभर आयेगा। 

कोई क़द्र-दां  ख़रीदार भी होगा 
रखेगा सहेजकर, 
जहाँ पहुँचता न हो  दम्भी हथौड़ा 
मूर्तिभंजक नफ़रत का घूँट पीकर ..!   
#रवीन्द्र सिंह यादव 

2 मार्च 2018

होली की कथा


हमारी पौराणिक कथाऐं कहती हैं 

होली की कथा निष्ठुर ,

एक थे भक्त प्रह्लाद 

पिता  जिनका हिरण्यकशिपु  असुर। 


थी उनकी बुआ होलिका 

थी ममतामयी माता कयाधु ,

दैत्य कुल में जन्मे  

चिरंजीवी प्रह्लाद साधु। 


ईश्वर भक्ति से हो जाय विचलित प्रह्लाद 

पिता ने किये नाना प्रकार के उपाय, 

हो जाय जब विद्रोही बेटा 

बाप को पलभर न सुहाय। 


थे बाप-बेटे में  मतभेद भारी 

कहता बाप स्वयं को भगवान् , 

रहे झेलते यातनाऐं प्रह्लाद सदाचारी   

अनाचार को नहीं की मान्यता प्रदान। 

  

रार ज़्यादा ठनी जब

ख़्याल अपना लिया भयंकर हिरण्यकशिपु ने,

बुलाया बहन होलिका को 

प्रह्लाद को मारने। 



ब्रह्मा जी ने दिया  था  

होलिका को  वरदान, 

आग तुम्हें न जला सकेगी 

जब करोगी कार्य महान।  


लेकर बैठ गयी ज़बरन  प्रह्लाद को  चिता  पर 

छीनकर माँ से उसके दुलारे को ,

माँ चीख़ती रही बे-बस 

खोला होलिका ने दुष्टता के पिटारे को। 


नाम लेते रहे प्रह्लाद प्रभु का  

भस्म हो गयी होलिका,

बचा  न सका वरदान भी 

होता नहीं यत्न कोई प्रमाद की भूल का। 


सकुशल निकले भक्त प्रह्लाद  

प्रचंड चिताग्नि से 

आओ होली मनाऐं भर-भर उल्लास 

विमुक्त हों चिंताग्नि से। 


आओ जला दें आज अहंकार अपने 

खोल दें  उमंगों को जीभर मचलने।  



# रवीन्द्र सिंह यादव 

19 दिसंबर 2017

अश्क़ का रुपहला धुआँ

    बीते वक़्त की
एक मौज लौट आई, 
आपकी हथेलियों पर रची
हिना फिर खिलखिलाई। 

मेरे हाथ पर 
अपनी हथेली रखकर 
दिखाए थे 
हिना  के  ख़ूबसूरत  रंग, 
बज उठा था 
ह्रदय में 
अरमानों का जल तरंग।




छायी दिल-ओ-दिमाग़ पर 


कुछ इस तरह भीनी महक-ए-हिना, 


सारे तकल्लुफ़ परे रख ज़ेहन ने 


तेज़ धड़कनों को बार-बार गिना।   

निगाह 
दूर-दूर तक गयी, 
स्वप्निल अर्थों के 
ख़्वाब लेकर लौट आयी। 

लबों पर तिरती मुस्कराहट 
उतर गयी दिल की गहराइयों में, 
गुज़रने लगी तस्वीर-ए-तसव्वुर 
एहसासों की अंगड़ाइयों में।

एक मोती उठाया 
ह्रदय तल  की गहराइयों से, 
आरज़ू के जाल में उलझाया 
उर्मिल ऊर्जा की लहरियों से। 
उठा ऊपर आँख से टपका गिरा........ 

रंग-ए-हिना से सजी हथेली पर, 
अश्क़  का रुपहला धुआँ लगा ज्यों 
चाँद उतर आया हो ज़मीं  पर ........! 

#रवीन्द्र सिंह यादव 


1 दिसंबर 2017

एक नाज़ुक-सा फूल गुलाब का ...




हूँ  मैं  एक  नाज़ुक-सा  फूल 
घेरे रहते हैं मुझे नुकीले शूल 

कोई तोड़ता पुष्पासन से 
कोई तोड़ता बस पंखुड़ी 
पुष्पवृंत से तोड़ता कोई 
कोई मारता बेरहम छड़ी  

कोई देता  है अपने महबूब को तोड़कर 
बिछा देता है कोई कुपात्र के क़दमों पर 
अर्पित  करता  है  कोई  ईष्ट  के  सर 
बिलखता हूँ मैं भी किसी के मरने पर। 

मिट जाता हूँ ख़ुशी-ख़ुशी बेहिचक औरों की ख़ुशी के लिए 
बनता है इत्र गुलकंद गुलाब-जल ज़माने की ख़ुशी के लिए 

मन-मस्तिष्क,नज़र और दिल 
सब पर मेरा ही राज  है 
मकरंद मेरा मधुमख्खियों को 
लगता मधुर साज़ है

ले जाती हैं वे बूंद-बूंद
क़रीने से एक छत्ता बनाने 
शहद की मधुरिम मिठास 
मतलबी संसार को चखाने   

छत्ते का मधुमय मोम  Lipstick में मिलकर 
खेलता है अठखेलियां गोरी के गुलाबी लबों पर 

भीनी ख़ुशबू में तर-बतर  होकर 
मीठे बोल फ़ज़ाओं में अदब से उतरते हैं 
आबोहवा की मधुर सदायें सुन लगता है 
समाज को जैसे  होंठों से फूल झरते हैं 


आशिक़-महबूबा की गुफ़्तुगू सुनता हूँ 
गुलशन में इश्क़ के सौदे रोज़ बुनता  हूँ 

शर्म-ओ-हया ,यकीं ,वफ़ा , इक़रार सब ज़िक्र हुए 
रेशमी मरमरी ख़्वाबों के चर्चे सरेआम बेफ़िक्र हुए 

अकेला आता कोई दिलजला 
तब  महसूसता हूँ धधकते शोलों की तपन
दिल की बाज़ी हारकर 
सुना जाता है अपने सीने की चुभन-जलन  

तितलियाँ,ततैया,भँवरे,मधुमख्खियाँ,कीट-पतंगे आते रहते मुझसे मिलने 
होंगे इनके अपने  मक़सद  संपन्न होता है परागण पीढ़ियां संसार में बढ़ने 

मृत्यु के भय से परे औरों के लिए मुस्कराते हैं फूल 
मुरझाने की नियति से कदापि नहीं घबराते हैं फूल 

ज़माना माने तो माने उन्हें बेवफ़ा 
मैं कैसे मानूँ  उन्हें अलग-थलग 
Break up के बाद तन्हा आये 
मज़बूरियाँ  बताने अलग-अलग 
वफ़ा का चराग़ रहेगा रौशन 
देखी  है  मैंने  उन आँखों में  
Purity  Of  Emotion!

#रवीन्द्र सिंह यादव 


शब्दार्थ / WORD MEANINGS 

नाज़ुक = अत्यंत कोमल,विनम्र,विनीत / DELICATE
शूल = काँटा ,कंटक / THORN 

पुष्पासन = फूल का निचला भाग जहाँ सभी भाग इससे जुड़े होते हैं इस  पर टिककर फूल खिलता /  RECEPTACLE 

पुष्पवृंत = डंठल जिससे फूल और डाली जुड़े होते हैं / STALK OF A  FLOWER 

पंखुड़ी = पाँख ,दल / PEPAL 

छड़ी =  STICK 

इत्र = ख़ुशबूदार तरल / PERFUME, ESSENCE , SCENT 

गुलकंद = सूखे गुलाब की पंखुड़ियों को पानी में शक्कर के साथ गर्म करके बना  मिठासभरा गाढ़ा उत्पाद  / CONSERVE OF ROSE PETALS

मकरंद = पराग / NECTOR 

मोम= मधुमख्खियों  के छत्ते का सम्पूर्ण स्पंजनुमा भाग जोकि उत्कृष्ट गुणवत्ता की लिप स्टिक बनाने में उपयोगी है / NATURAL WAX 

परागण (POLLINATION ) = फूलों में प्रजनन की प्रक्रिया जिसमें STAMEN (POLLEN GRAINS ) को एक फूल से दूसरे फूल या उसी फूल में STIGMA तक  पहुँचाने में कीट-पतंगों ,तितलियों आदि का महत्वपूर्ण योगदान होता है।  


लिपस्टिक (Lipstick ) = एक सौंदर्य प्रसाधन उत्पाद जोकि अधरों की सुंदरता में नयनाभिराम आकर्षण उत्पन्न कर सके।  इसमें नमी बरक़रार रखने वाले तत्व , तेल , मोम (Wax) और रंगों का इस्तेमाल किया जाता है।  वास्तव में इस उत्पाद में सभी तत्व नैसर्गिक (Natural ) होने चाहिए ( यहां उल्लेखनीय है शहद के छत्ते से प्राप्त मोम / WAX  का लिपस्टिक बनाने में  प्रयोग ) किन्तु आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमें अब इतना भी भान नहीं है कि बाज़ार ने इसमें कौन-कौन से हानिकारक रसायन मिला दिए हैं जिसका खामियाज़ा सीधा ग़रीब वर्ग उठाता है क्योंकि प्राकृतिक तत्वों के साथ तैयार की हुई लिपस्टिक ख़रीदने की उसकी हैसियत नहीं है लेकिन इस शौक को भी पूरा करना है तो बाज़ार ने सस्ता से सस्ता हानिकारक विकल्प उपलब्ध करा दिया है।  

हमारी मानसिकता भी अरबों के व्यवसाय का आधार बन जाती है। 

मेक अप ( Make up ) अर्थात क्षतिपूर्ति।  जो कमी है उसे पूरा किया जाना।  फ़ैशन का क्रम ऊपर से नीचे की ओर बढ़ता है।  पहले इसे आभिजात्य वर्ग अपनाता है फिर समाज में नीचे की ओर इसका अंधानुकरण फैलता चला जाता है। 


लब (Lip ) = होंठ , ओष्ठ , अधर 

प्राकृतिक रूप से स्वस्थ  होंठों का रंग गुलाबी ही होता है ख़ून की कमी के कारण या अन्य कारणों से इनका रंग काला या नीला भी देखा जाता है।  आजकल फ़ैशन का ऐसा रंग चढ़ा है कि बाज़ार ने मानसिकता पर कब्ज़ा कर लिया है और लिपस्टिक  काले , हरे और न जाने कितने रंगों में उपलब्ध होकर अधरों पर सज रही है; परिधान के रंगों से मैच करती हुई। 

श्रृंगार रस के कवियों ने अधरों का वर्णन करने में कोई कोताही नहीं की है। गीतकार राजेंद्र कृष्ण जी ने   फ़िल्म शहनाई के  एक गीत   "न झटको ज़ुल्फ़ से पानी" .......  में पढ़िए कितनी कलात्मकता प्रदर्शित की है।  आगे ख़ूबसूरत प्रतीकों का इस्तेमाल करते हुए कहा है -
 "ये नाज़ुक लब हैं या आपस में दो लिपटी हुई कलियाँ.....
   ज़रा  इनको   अलग  कर  दो  तरन्नुम  फूट  जाएंगे।" 


10 नवंबर 2017

डाकिया



डाकिया अब भी आता है बस्तियों में 
थैले में नीरस डाक लेकर, 
पहले आता था 
जज़्बातों से लबालब थैले में  आशावान सरस डाक लेकर। 


गाँव से शहर चला बेटा या चली बेटी तो माँ कहती थी -
पहुँचने पर चिट्ठी ज़रूर भेजना 
बेटा या बेटी चिट्ठी लिखते थे 
क़ायदे भरपूर लिखते थे 
बड़ों को प्रणाम 
छोटों को प्यार लिखते थे 
साथ लाये सामान का हाल लिखते थे 
ज़माने की चाल लिखते थे
थोड़ा लिखा बहुत समझना लिखते थे । 



साजन और सजनी भी ख़त लिखते थे 
आशिक़ महबूबा भी ख़त लिखते थे
मित्र-मित्र को प्यारे ख़त लिखते थे 
ख़त आचरण और यादों के दस्तावेज़ बनते थे
कभी-कभी ठोस कारगर क़ानूनी सबूत बनते थे 
डाकिया को  ख़त  कभी न बोझ लगते थे
ख़त पढ़कर सुनाने में महाबोझ लगते थे।

कभी  बेरंग ख़त भी आता था 
पाने वाला ख़ुशी से दाम चुकाता था 
डाकिया सबसे प्यारा सरकारी मुलाज़िम होता था 
राज़,अरमान,राहत,दर्द ,रिश्तों की फ़सलें बोता था  
डाकिया चिट्ठी  तार पार्सल रजिस्ट्री मनी ऑर्डर  लाता था  
डाकिया कहीं ख़ुशी बिखराता कहीं ग़म के सागर लाता था।  


आज भी डाकिया आता है
राहत कम आफ़त ज़्यादा लाता है
पोस्ट कार्ड नहीं रजिस्ट्री ज़्यादा लाता है
ख़ुशियों का पिटारा नहीं
थैले में क़ानूनी नोटिस लाता है। 

#रवीन्द्र सिंह यादव

शब्दार्थ / Word  Meanings 

बेरंग ख़त = ऐसा पत्र जो प्रेषक  द्वारा बिना टिकट लगाए या डाकघर में मिलने वाले लिफ़ाफ़े में रखकर न भेजा गया  हो बल्कि सादा  लिफ़ाफ़े में भेजा गया हो जिसे पाने वाला टिकट का दुगना दाम चुकाकर प्राप्त करता था।  समय और पैसे की कमी के चलते ऐसा किया जाता था / A  Without  Ticket  Letter

तार = आपातकालीन या ख़ुशी की सूचना अति शीघ्र पहुँचाने के लिए यह संचार सुबिधा बड़े डाकघरों में सुबह 8 बजे से रात्रि 9  बजे तक उपलब्ध होती थी।  27 शब्दों का शुल्क 50 रुपये लिया जाता था इस सुबिधा के 163 साल चलने के बाद 15 जुलाई 2013 को समापन के वक़्त / Telegram  



26 अक्टूबर 2017

यादें


यादों का ये  कैसा जाना-अनजाना सफ़र है, 

भरी फूल-ओ-ख़ार से आरज़ू की रहगुज़र है। 


रहनुमा  हो जाता  कोई, 

मिल जाते हैं हम-सफ़र,

रौशनी बन  जाता  कोई,

हो  जाता   कोई   नज़र,

ऐसी लगन बेताबियों की,

हो जाता कोई दरबदर है।



याद   धूप   है  याद  ही  छाँव  है,

तड़प-ओ-ख़लिश का एक गाँव है, 

याद  रात   है  याद  ही   दिन  है,

न फ़लक़-ज़मीं पर होता  पाँव है,

हिय  में  हूक  होती  है  पल-पल,
  
बस  बेक़रारी में चश्म-ए-तर  है। 




सुध  न  तन  की  न  ही मन  की,
   
तसव्वुर में रहती  तस्वीर उनकी,
  
ठौर-ए-वस्ल ताजमहल लगता है,

आब-ए-चश्म गंगाजल लगता है,

बे-ख़ुदी में रहती किसे क्या ख़बर,

कब शब  हुई  कब आयी सहर  है। 




दौर-ए-ग़म   में  भाता  नहीं  मशवरा,

लगता ज्यों चाँदनी रात में हो बारिश,

आये हवा उनके दयार की तो लगता है,

छुपा  है  इसमें  संदेशा और सिफ़ारिश,

ज़माने   की  लाख  बंदिशों  को  तोड़ने,

  बार-बार  दिल  में उठती एक  लहर है।   

#रवीन्द्र सिंह यादव 

23 अक्टूबर 2017

ख़्यालों का सफ़र




अल्फ़ाज़ है कुछ माज़ी के 
दिल कभी भूलता ही नहीं
नये-पुराने घाव भर गए सारे  
दर्द-ओ-ग़म राह ढूँढ़ता ही नहीं। 



उम्र भर साथ चलने का वादा है 
अभी से लड़खड़ा गए हो क्यों ?
प्यास बुझती कहां है इश्क़ में 
साहिल पे आज आ गए हो क्यों ?



गर  न  हों  फ़ासले  दिल में   
तो दूरियों की परवाह किसे
नग़मा-ऐ-वफ़ा गुनगुनाती हो धड़कन
तो सानेहों की परवाह किसे। 



छूकर फूल को महसूस हुआ 
हाथ आपका जैसे छुआ हो 
रूह यों जगमग रौशन हुई
ज्यों रात से सबेरा हुआ हो। 

#रवीन्द्र सिंह यादव     

शब्दार्थ / WORD MEANINGS 
अल्फ़ाज़ = शब्द, शब्द समूह  ( लफ़्ज़ का बहुवचन ) / WORDS 

माज़ी = अतीत ,भूतकाल / PAST 

दर्द-ओ-ग़म= दर्द और ग़म / PAIN AND SORROW 

साहिल =समुद्री किनारा / SEA SHORE ,COAST  

फ़ासले = दूरी / DISTANCE 

सानेहों = त्रासदी (त्रासदियों ) / TRAGEDIES 

रूह= आत्मा / SOUL ,SPIRIT 

16 अक्टूबर 2017

ख़ाकी

समाज को सुरक्षा का एहसास, 

क़ानून की अनुपालना के लिए  

मुकम्मल मुस्तैद मॉनीटर, 

मज़लूमों की इंसाफ़ की गुहार ,

हों गिरफ़्त में मुजरिम-गुनाहगार ,

हादसों में हाज़िर सरकार , 

ख़ाकी को दिया ,

सम्मान और प्यार ,

अफ़सोस कि इस रंग पर ,

रिश्वत ,क्रूरता ,बर्बरता,अमानवीयता,ग़ैर-वाजिब हिंसा ,

विवेकाधिकार का दंभ ,भेदभाव का चश्मा, काला पैसा ,

सत्ता के आगे आत्मसमर्पण ,

पूँजी की चौखट पर तर्पण,

ग़रीब फ़रियादी को दुत्कार ,

आसमां से ऊँचा अहंकार , 

मूल्यों-सिद्धांतों को तिलांजलि !

 दे दी शपथ को  भी   श्रद्धांजलि !!

इतने दाग़-धब्बों के साथ,

ख़ाक में मिल गये  हैं, 

ख़ाकी को मिले अलंकरण ..!!!!!!

यक़ीनन हो समर्पित 

जो किये हैं धारण 

ख़ाकी रंग हूबहू

   उन्हें शत-शत नमन।  

#रवीन्द्र सिंह यादव 

3 अक्टूबर 2017

अभावों के होते हैं ख़ूबसूरत स्वभाव

आज एक चित्र देखा मासूम फटेहाल भाई-बहन किसी आसन्न आशंका से डरे हुए हैं और बहन अपने भाई की गोद में उसके चीथड़े हुए वसन थामे अपना चेहरा छुपाये हुए है -


अभावों के होते हैं ख़ूबसूरत  स्वभाव, 
देखती हैं नज़रें भाई-बहन के लगाव। 

हो सुरक्षा का एहसास  तो भाई का दामन ,
ढूंढ़ोगे ममता याद आएगा माई का दामन। 

जीवन हमारा है बना  दुःखों  की चक्की, 
पिसते रहेंगे सब  चाहे हों लकी अनलकी। 

ज़माने से हम भी  हक़  हासिल करेंगे, 
आफ़त पे जीत बे-शक  हासिल करेंगे। 

है प्रभु का शुक्राना  आज सलामत हैं हम, 
किस लमहे की आख़िर ज़मानत हैं हम ?
#रवीन्द्र सिंह यादव 

27 सितंबर 2017

अपनी अस्मिता क़ुर्बान करनी चाहिए थी ?

कुलपति साहब तो क्या 
उस छात्रा को 
संस्थान की अस्मिता के लिए 
अपनी अस्मिता 
क़ुर्बान करनी चाहिए थी ?
बीएचयू  के मुखिया को 
ऐसी बयानबाज़ी करनी चाहिए थी ?


जो बेटियों द्वारा संस्थान की अस्मिता के लिए 

आहूत शुद्धि-यज्ञ को 
सियासी साज़िश बताते हैं
ऐसी विभाजनकारी मानसिकता के 
लोग भी सरकारी कृपा से कुलपति बन जाते हैं।   

सभ्यता की सीढ़ियाँ 
चढ़ता मनुष्य 
पशुओं से अधिक 
पाशविक-व्यवहार पर 
उतर आया है 
घटना का ज़िक्र देख-सुन 
आँखों में लहू उतर आया है। 

साइकिल पर शाम साढ़े छह बजे 
बीएचयू कैंम्पस में हॉस्टल जाती 
17 वर्षीय एक  छात्रा के 
वस्त्रों में 
बाइक पर सवार होकर 
हाथ डालने के संस्कार 
किसी  माँ-बाप ने 
अपने अशिष्ट,मनोरोगी बेटे को दिये  हैं ?


मीडिया प्रबंधन की 
पोल खुल गयी है 
विज्ञापनों के फेर में 
मीडिया-मालिक की ज़ेहनियत  पर 
फ़रेबी-संवेदना की कलई अब  धुल गयी है। 


अफ़सोस कि वाराणसी एक तीर्थ है 
जहाँ  भी मानवता को 
शर्मसार करने वाले भेड़िये पलते हैं 
सर्वविद्या की सांस्कृतिक राजधानी में
वर्जनाओं की फ़ौलादी ज़मीं पर 
सामंतवादी पुरुषसत्ता की टकसाल में 
सांस्कृतिक बेड़ियों के सिक्के ढलते हैं।   


धरने पर बैठी बेटियाँ 
अपनी सुरक्षा के लिए 
सड़क पर रात गुज़ारती हैं
अगली अँधेरी रात में वे निहत्थी हैं फिर भी 
पुरुष-पुलिस की सर पर लाठियां खाती हैं। 

कमाल का मलाल है बनारसी लोगों के मन में   
उन्हें अफ़सोस है कि प्रधानमंत्री के काफ़िले का रुट बदलने से 
उनके द्वार की मिटटी पवित्र न होने पाई ... .!  

सुनो ! 
खोखली मान्यताओं के पहरेदारो 
बेटी  है अब सड़क पर  उतर  आई 
नए मूल्यों की इबारत लिखने से रोक पाओगे ?
सुनो!
पशुओं को भी लज्जित  कर देने वाले दरिंदो 
तुम भी किसी के जीवनसाथी क्या अब बन पाओगे ? 
तुम किसी माई के लाल हो 
किसी बाप की नाक का बाल हो 
तुम भी किसी बहन के  हो  भाई 
या किसी बेटी के  बनोगे  बाप..!  
तुम्हारा ज़मीर जाग जाय तो अच्छा है 
वरना  जीवनभर अंधकार में भटकोगे कचोटेगा  संताप..!  


ख़ुफ़िया-तंत्र को चुल्लूभर पानी काफ़ी है 
हमारी ओर से उसे नहीं कोई माफ़ी है। 
ख़बर है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की 
नींद आज खुल गयी  है 
राष्ट्रीय महिला आयोग की 
न जाने क्यों घिग्घी बंध गयी है ?
#रवीन्द्र सिंह यादव 


शब्दार्थ / पर्यायवाची।   WORD MEANINGS 
कुलपति= विश्वविद्यालय का शीर्ष अधिकारी /VICE  CHANCELLOR  
संस्थान - INSTITUTE 
अस्मिता = गौरव ,गरिमा , अभिमान ,पहचान / PRIDE / MODESTY 
क़ुर्बान= मिटा देना(स्वयं को ) , बलिदान करना , त्याग करना /                             SACRIFICE 
बीएचयू = बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी 
पाशविक व्यवहार= पशुओं जैसा बर्ताव , नृशंस व्यवहार /BEHAVE                                         LIKE ANIMAL, BRUTAL ACTIVITIES 
साइकिल = मानवीय ऊर्जा से चालित दो पहिया वाहन / BICYCLE 
              (BI = दो , CYCLE = चक्र / पहिया अर्थात जिसमें दो पहिये हों )
बाइक = मोटर साइकिल, स्वचालित दो पहिया वाहन / MOTOR                           CYCLE  / BIKE 

अशिष्ट = असभ्य , शिष्टाचार से परे ,बदतमीज़ ,गुस्ताख़ /                                       UNCIVILIZED
फ़रेबी-संवेदना= छुपे ग़लत मक़सद की संवेदना / FALSE                                                 SENSITIVITY 
ज़ेहनियत = मानसिकता / MENTALITY