30 अप्रैल 2017

हम हिंदुस्तानी


राजेश त्रिपाठी

नहीं झुके हैं नहीं झुकेंगे हम वीर बलिदानी
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी।।
   वीर शहीदों के बलिदानों से हमने पायी थी आजादी।
  दिल बोझिल है, आंखें नम, देश की लख बरबादी।।
   केसर क्यारी सिसक रही धधक रहा कश्मीर है।
   भू-स्वर्ग दोजख बन बैठा सही ना जाती पीर है।।
बच्चों के हाथों में पत्थर, लख होती हैरानी।
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी।
   भेज रहा आतंक की खेपें, ऐसा है शैतान।
   पाक तो जैसे खो चुका है धर्म और ईमान।।
   देश-विरुद्ध देश के बच्चों को जो बहकाये।
  ‘ कश्मीर चाहे आजादी’ हरदम बांग लगाये।।
कश्मीरियों के लिए बहाता आंख से नकली पानी।
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तनी ।।
   भूल रहा शैतान इसने हमसे युद्ध में मुंह की खाई है।
  अपना हर जवान भगत सिंह, हर बाला लक्ष्मीबाई है।।
  घर-घर में अब्दुल हमीद हैं, जर्रे-जर्रे में बतरा हैं।
  मातृभूमि हित लुटा सकते खून का कतरा कतरा हैं।।
भारत के हित कुरबान कर चुके अपनी जो जवानी।
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी।।
   कश्मीर से कन्याकुमारी तक अपना भारत एक है।
  हिंदू, मुसलिम, सिख,ईसाई इसके सारे बंदे नेक है।।
  सबके मन में भारत है दिल में इनके तिरंगा है।
  सब धर्मों को देता आदर मेरा भारत सतरंगा है।।
कुचल डालिए इसे छेड़ने की हर इक कारस्तानी।
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी।।
   जहां हुए तुलसी, कबीर, जायसी औ रहीम रसखान।
  गंगा-जमनी तहजीब जहां , मेरी जान ये हिंदुस्तान।।
  बच्चा-बच्चा वीर है इसका घर-घर में आजाद हैं।
  इसीलिए ये देश हमारा, देखो शाद और आबाद है।।
पूरी दुनिया गाती अब तक जिसकी शौर्य कहानी।
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी।।
  आओ इस पुनीत दिवस पर हम कसम ये खायें।
  हिमालय से तन जायेंगे गर देश पर आयें बाधाएं।।
  अपना पल-पल ऋणी है इसका ये अपना आधार है।
  यह है तो हम है इससे हम सबको बेहद प्यार है।।
जो भी हमसे टकरायेगा उसको पड़ेगी मुंह की खानी।
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी ।।

29 अप्रैल 2017

शनासाई सी ये पच्चीस..


ये है हमारी रूदाद..

शनासाई सी ये पच्चीस वर्ष शरीके-सफर के साथ


सबात लगाते हुए


असबात कभी अच्छी कभी बुरी की..


ताउम्र बेशर्त शिद्दत से निभाते रहे..


सोचती हूँ ये जिंदगी रोज़ नई रंगो में ढलती क्यूँ हैं..

कई दफ़ा कहा..


कभी इक रंग में ढला करो..


गो एक हाथ से खोया तो दूसरे से पाया


हादिसे शायद इस कदर ही गुज़र जाती है..


शादाबों का मलबूस पहन


तरासती हूँ उस उफक को जो धूंध से परे हो..


मामूल है ये जिंस्त हर ख्वाब-तराशी के लिए


सबब है उल्फत की जिनमें सराबोर है चंद


मदहोशियाँ,सरगोशियाँ,गुस्ताखियाँ और बदमाशियाँ


वाकई.. पर मौत को वजह नहीं बनाने आई हूँ।

                                                             ©पम्मी सिंह 
                                                                  

(रूदाद-story,शनासाई-acquaintances,

सबात-stability,असाबात-दावा,गो-यद्यपि


शादाबों-greenblooming,मलबूस-पोशाक dress,उफक-क्षितिज, मामूल-आशावादी,सबब-कारण, उल्फत-प्रेम)

18 अप्रैल 2017

इन रावणों को कौन मारेगा? -रमेशराज




इन रावणों को कौन मारेगा?

-रमेशराज
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क्वार सुदी दशमी को बेहद उल्हास के साथ मनाये जाने वाले उत्सव का नाम दशहरा है। इसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने अत्याचारी, कामातुर, भोगविलासी रावण पर चढ़ाई कर उस पर विजय ही प्राप्त नहीं की, बल्कि उसका वध कर सम्पूर्ण भारतवर्ष को उसकी काली छाया से मुक्त कराया। भारतीय संस्कृति में रावण अधर्म और बुराई का प्रतीक है। इस प्रतीक को प्रतीकार्थ में ही हम सब उसके तथा उसके अनीति की राह पर चलने वाले भाई कुम्भकरण, मेघनाद आदि के पुतले बनाकर उनका सार्वजनिक स्थल पर दहन कर अपने पावन कर्त्तव्य की इतिश्री करते हैं।
यह त्रेता नहीं, कलियुग है। इस युग में वह पापी भी राम बनकर रावण-कुम्भकरण के पुतले फूँकता दिखाई देता है, जो स्त्री जाति को पैरों की जूती समझता है। जाने कितनी दामिनियोंका शीलभंग करता है। राम बनने का नाटक करने वालों में ऐसे कितने ही कथित संत हैं, जो बहिन-बेटियों पर कालाजादू कर अपने सम्मोहन में फँसाते है और अपनी पाप की कुटिया में ले जाकर उनके साथ कुकर्म करते हैं। रावण के कुकर्म का उसी का भाई विभीषण भागीदार नहीं बनता, लेकिन राम का वेश धारण किये आज के कथित रामों का पूरा का पूरा कुनबा इस कुकर्म में साझेदार बनता है।
रावण और उसके कुकर्मी भाइयों-साथियों के पुतलों का दहन करने वालों में आज वे लोग भी शरीक हैं, जो पटरियों पर लेटे हुए गरीब वर्ग के लोगों को मदिरा में धुत्त होकर तेज गति से कार चलाते हुए कुचलते हैं। दबंग और रहीशजादे, अफसरों और नेताओं के ये बेटे राह चलती लड़कियों पर फब्तियाँ कसते हैं, बलात्कार करते है लेकिन कानून के शिकंजे से बिल्कुल नहीं डरते हैं।
रावण-दहन के जश्न में अग्निवाण चलाने को आतुर वे माननीय भी हैं जो सम्वैधानिक सदनों में ब्लूफिल्म देखते हैं, असहाय नारी का शील भंग करते हैं। शहीदों के आयोजनों में देशभक्ति के गीत गाती लड़कियों के संग नृत्य करते हुए उनके गालों पर हाथ फेरते हैं। अपनी दयनीय आयु के बावजूद अश्लील हरकतें करते हैं।
रावण को फूँकने वाले वे कानून के रखवाले या कानून बनाने वाले वे मंत्री और विधायक भी हैं, जो जनता के मिड डे मील, मनरेगा, और समाज कल्याण की अनेक योजनाओं में कमीशन डकार कर धनकुबेर बनते हैं। ये न चारे को छोड़ते हैं न कफन, यूरिया, सीमेंट, तोप को। इन सब के माध्यम से आने वाला कमीशन इनकी तोंद फुलाता है। इन्हें अपार वैभव में डुलाता है।
समाजसेवीजन भले ही इनकी काली करतूतों का पर्दाफाश करें लेकिन ये कालेधन पर साँप की तरह कुण्डली मारे फुंकारते रहते हैं। कॉमनवेल्थ गेम, टूजी स्पेक्ट्रम, कोयला खदानों, अवैध खनन के माध्यम से अकूत कमाई करने वाले ये रावण, सीता का हरण भी करते हैं और सुग्रीव नहीं बाली को बल प्रदान करते हैं। ऐसे ही सैकड़ो कलंकों में इनका दामन यहाँ तक कि मुँह और आत्मा कालिख से पुत गये हों, लेकिन ये राम बनकर, रावण पर अग्निवाण चलाकर रामराज्यका सपना जनता के बीच बाँटते हैं।
क्या जनता इन रावणों को पहचानती है। यदि पहचानती है तो दशहरे पर इन्हीं रावणों के हाथों रावणों और उसके कुटुम्ब का  पुतला दहन क्यों कराती है। आज रावण ही रावण के पुतले का दहन कर रहा है। इस राम बने रावण का पुतला दहन कब होगा?
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पितरों के सदसंकल्पों की पूर्ति ही श्राद्ध +रमेशराज




पितरों के सदसंकल्पों की पूर्ति ही श्राद्ध

+रमेशराज
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श्राद्ध प्रकाशमें बृहस्पति कहते हैं कि सच्चे मन और आत्म-पवित्रता के साथ तैयार किये गये शुद्ध पकवान, दूध, दही, घी, तिल, कुश, जल आदि का उचित पात्र को दिया गया दान ही पितर के मन को प्रसन्न करता है। श्राद्ध पक्ष में मनुष्य द्वारा किये गये सुकार्य ही पितरों को लौकिक आवागमन से मुक्ति दिलाकर देवत्व की संज्ञा से विभूषित कराते हैं। पितरों को प्रेतयौनि से छुटकारा दिलाना है और अपने जीवन को शन्तिमय बनाना है तो श्राद्ध पक्ष में मन को पवित्र बनाने के साथ-साथ परोपकार से युक्त करने पर ही यह सम्भव है।
पितर प्रेत-योनि में अनायास नहीं भटकते। उनके अन्दर भटकती अतृत्त इच्छाएँ, मनोकमानाएँ और अधूरे संकल्प उन्हें मोक्ष प्राप्त कराने में बाधा बनते है। जिन लोगों ने मृत्यु से पूर्व तरह-तरह के अपराध किये हों, ऐसे लोग भी मृत्यु के उपरांत प्रेत यौनि में अशांत हुए विचरण करते हैं। प्रेतात्मा बने हुए व्यक्ति का मन पश्चाताप की उस तपन का अनुभव करता है, जिसके कारण-अकारण किसी अन्य व्यक्ति, परिवार या समाज को उसने दुःख पहुँचाया था। पश्चाताप की भट्टी में तपकर प्रेतात्माएँ निर्मल हो जाती हैं। प्रेतात्माओं की यही निर्मलता उनकी सन्तान को सुकार्यों के लिये प्रेरित करती है।
प्रेत-योनि में भटकती कोई भी आत्मा यह नहीं चाहेगी कि कुपथ पर चलने के कारण उसका जो यह अतृप्त या अमोक्ष  स्वरूप बना है, इस स्वरूप को आगे चलकर उनकी संताने भी अपनायें। अतः वही पितर अधिकांशतः कुपित, अशांत, उद्विग्न और अपनी संतान को शाप देने वाले होते हैं, जिनकी संताने मनुष्य  जीवन में अहंकारी, स्वार्थी, कृतघ्न और क्रूर होती हैं।
क्रूरता, स्वार्थ, कृतघ्नता और अहंकारपूर्ण व्यवहार से मुक्त होकर सदाचार, परोपकार की ओर आगे बढ़ने का नाम श्राद्धकर्म है। अतः पितरों में श्रद्धा रखने का अर्थ ही है कि श्राद्ध कर्म के समय यह संकल्प लिया जाये कि हे स्वार्गवासी मात-पिताओं हम ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगे, जिससे तुम्हारी आत्मा को ठेस लगे। हम केवल उसी मार्ग पर चलेंगे, जो परोपकार और मानव मंगल की रौशनी से परिपूर्ण हो।
श्राद्ध के दिनों में वचितों, गरीबों को भोजन कराने से, निर्बल का बल बन जाने से, अनीति और अत्याचार का विरोध करने से, असहायों की सहायता करने से परमात्मा प्रसन्न होता है। आपके मन की सच्ची पुकार को सुनता है। आपके सुकार्यों को देखकर वह इतना द्रवीभूत हो उठता है कि वह आपके पितरों की भटकती हुई आत्माओं के लिये तो मोक्ष के द्वार खोलता ही है साथ ही आपके जीवन को वैभव और यश से भर देता है।
अतः श्राद्ध पक्ष में पितृ-आवाहन-पूजन के साथ-साथ देव तर्पणमभी करना चाहिए। जल, वायु, अग्नि, यहाँ तक बुद्धि , प्रतिभा, करुणा, दया, प्रसन्नता पवित्रता आदि उसी परमात्मा के अंश हैं, जिनके बल पर हम उन्नति के सोपान चढ़ते हैं। सद्कर्मों में श्रद्धा रखते हुए सुमार्ग की ओर अग्रसर होना ही एक मात्र ऐसा उपाय है, जिससे पितर पक्ष मोक्ष को प्राप्त होता है और उसमें देवांश समाहित हो जाता है। यदि पितर देवतुल्य हो जाते हैं  तो आपके अशांत जीवन में शांति का समावेश हर हाल में हो जायेगा।
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नारी-शक्ति के प्रतीक हैं दुर्गा के नौ रूप +रमेशराज




नारी-शक्ति के प्रतीक हैं दुर्गा के नौ रूप

+रमेशराज
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ग्रीष्म ऋतु में चैत्रमास की अमावस्या के दूसरे दिन प्रारंभ होकर नौ दिन तक मनाए जाने वाले व्रत नवरात्र नवदुर्गा अर्थात न्यौरता में नारी-शक्ति की उपवास रखकर पूजा-अर्चना की जाती है। नारी यदि सुन्दरता की अद्भुत मूर्ति मानी गयी है तो इसी नारी ने समय-समय पर रणचंडी का वेश धारण कर असुरों-पापियों-दैत्यों का विनाश भी किया है।
जिस समय देवासुर संग्राम दौरान राक्षसों द्वारा बार-बार युद्ध में पराजित देवता अत्यंत दुखी और भयभीत थे। यहां तक कि दैत्यराज शम्भु-निशम्भु या महिषासुर ने भारी प्रहार कर देवराज इन्द्र तथा अन्य देवताओं को स्वर्ग से बाहर कर दिया तो समस्त देवता अपने प्राणों की रक्षा के लिए भगवान विष्णु, देवताओं के देव शिव और जगत के पालनहार ब्रह्मा से इस विपत्ति से मुक्ति पाने के लिए प्रार्थना करने लगे। समस्या के हल के लिए देवताओं ने एक प्रकाशपुंज को प्रकट किया। इस प्रकाशपुंज ने नारी शक्ति के रूप में देवी भगवती दुर्गा का स्वरूप धारण किया। दैत्यराज शम्भु-निशम्भु और महिषासुर के विनाश के लिए देवताओं ने इस स्वरूप की स्तुति की और अपने-अपने अमोध अस्त्र-शस्त्र प्रदान कर महारूप योगमाया भगवती से दैत्यराजों के वध के लिए प्रार्थना की।  योगमाया भगवती दुर्गा ने दैत्यों का वध करने के लिए अकेले ही प्रस्थान किया। दैत्यों का मां भगवती दुर्गा से नौ दिन भयंकर युद्ध हुआ। इन नौ दिनों में असुरों के वरद शक्ति के रूप को नष्ट करने के लिए मां भगवती ने अपने ही नौ प्रतिरूप युद्ध क्षेत्रा में खड़े किये। इन प्रतिरूपों में जयंती, मंगलाकाली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री स्वाहा, सुधा ने अपने अस्त्रा-शस्त्रों के प्रहार से दैत्यों में हाहाकार उत्पन्न कर दिया। नौ दिन के इस संग्राम में शम्भु-निशम्भु और महिषासुर का तो वध हुआ ही, इनके साथ-साथ रक्तबीज, धूमकेतु और अनेक दैत्य भी धराशायी हो गये। दैत्यों के वधोपरांत समस्त ब्रह्मलोक में शांति की स्थापना हो गयी। देवताओं को अपना खोया हुआ स्वर्गलोक वापस मिल गया।
नारी शक्ति की इस महिमा के आराधन-पूजन के लिए चैत्रमास में लगातार रखे जाने वाले निराहार व्रत के दिनों में आदि शक्ति देवी दुर्गे, भवानी, जगदम्बा की पूजा द्वितीया के दिन की जाती है। चैत्र शुक्ल तृतीया को सुहागिन स्त्रियां व्रत रख मां पार्वती से अपने सुहाग की रक्षा की कामना करती हैं। चतुर्थी को गणपति की पूजा कर विघ्न विनाशों को समाप्त करने की कामना की जाती है। अष्टमी के दिन अशोक वृक्ष का पूजन होता है। यह माना जाता है कि इसी दिन हनुमानजी ने लंका में अशोक वाटिका पहुंचकर सीताजी को भगवान राम का संदेश व अंगूठी दी थी।
चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी को रामनवमी भी कहा जाता है। इसी तिथि को मर्यादा पुरूषोत्तम राम का महारानी कौशल्या की कोख से जन्म हुआ था। इस दिन भगवान श्रीराम, रामायण आदि की पूजा की जाती है।
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शिव ही बनाते हैं मधुमय जीवन +रमेशराज




शिव ही बनाते हैं मधुमय जीवन

+रमेशराज
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शिव समस्त देवों के देव माने गये हैं, क्योंकि वे मनुष्य ही नहीं, प्राणी जीवन में जो भी व्यवधान, कष्ट या दुःख आते हैं, उनका निराकरण वे सहज भाव से करते हैं। वे प्रकृति की झोली हरियाली, फूल, फल, जल और सुगन्ध से भरते हैं।
सम्पूर्ण जगत के पालनहार शिव अन्य के हिस्से का हलाहल स्वंय पी जाते हैं। उनकी लटों में पावन गंगा विराजमान है जो सतत् प्रवाहित होकर प्रकृति को स्पंदित करती रहती है। अन्य देवों या प्राणियों से अलग शिव के तीन नेत्र हैं। दो नेत्र तो सिर्फ ऐन्द्रिक-बोध कराते हैं, जबकि तीसरा नेत्र आत्मज्ञान या आत्मबोध में अभिसिक्त होता है। त्रिनेत्रधारी शिव का यही आत्मबोध संसार को मंगलमय बनाकर मधुरता प्रदान करता है। शिव आत्मबोध के रूप में धर्मबोध के भी प्रदाता हैं। धर्म-बोध हमें परम शांति की ओर अग्रसर करता है। शिव द्वारा प्रदत्त पथ शैव धर्म के नाम से जाना जाता है। शिव के हाथ में डमरू है। शिव में नृत्यात्मकता है। शिव राग-रागनियों के उत्पत्तिकर्ता हैं। काल-छंद के रचयिता हैं। शिव सात स्वरों के जन्मदाता हैं। उन्हीं सात स्वरों में समस्त प्रकृति ही नहीं, मनुष्य भी अपने आंतरिक भावों को अनुभावों से गुंजित करता है।
शिव जितने दयावान, निर्मल, भोले-भाले हैं, उतने ही रौद्र। असहायों पर अपनी असीम कृपा लुटाने वाले शिव, दुष्टों असुरों, अहंकारियों, पापियों के प्रति अत्यंत कठोर और आक्रामक रहते हैं। एक पंचाग वर्ष की समस्त बारह शिवरात्रियों में से फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का दिन महाशिव रात्रि के रूप में माना और मनाया जाता है। इसी दिन रात्रि को भगवान शिव का ब्रह्मा से रूद्र के रूप में अवतरण हुआ। प्रलय काल में भगवान शिव ने ताण्डव नृत्य करते हुए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने तीसरे नेत्र की भीषण ज्वाला से भस्म किया था, इसीलिए महाशिव रात्रि को काल रात्रि भी कहा जाता है।
इसी कालरात्रि में ब्रहमांड की सारी जड़ता समाप्त हुई। वायु का संचार हुआ। मेघ बरसे। तत्पश्चात् जड़ पृथ्वी पर पौधे उगे। वे पुष्पित-पल्लवित हुए। मादक सुगन्ध ने वातावरण में अपनी उपस्थित दर्ज करायी।
महाशिव रात्रि को पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध की दशा इस तरह की बन जाती है कि मानव शरीर में ऊर्जा ऊपर की प्रस्थान करने लगती है। सुधिजन, मुनिजन, सज्जन इस ऊर्जा का संचयन कर अपने आत्म को और प्रकाशवान बनाने के लिये  तपस्यालीन होते हैं। प्रभु-उपासकों के लिये महाशिवरात्रि अत्यंत महत्वपूर्ण है।
महाशिव रात्रि को ऊर्जा संचयन करने का सीधा अर्थ यह है कि शिव आराधक अपने को शिवमय बनाकर अपने जीवन को जगत कल्याण की ओर उन्मुख करते हैं। ज्ञानी लोग अपने ज्ञान का प्रसार-प्रचार पापाचार को समाप्त करने में करते हैं तो सामान्य जन शिव आराधना कर पारिवारिक और सामाजिक दायित्यों का निर्वाह करने में संकल्पबद्ध होते हैं।
महाशिव रात्रि को कंधों पर रखी जाने वाली काँवर जिसके आगे-पीछे रखी गंगाजल के बड़े-छोटे कांच के दो कलश श्रवण कुमार के अंधे माँ-बाप की तीर्थ यात्रा कराने का प्रतीक रूप हैं। काँवरियों की सेवा में जुटे भक्तजन उन्हें दूध पिलाते, खाना खिलाते हुए ऐसे लगते हैं, जैसे महाशिव रात्रि में हर किसी ने मानव मंगल और परोपकार के लिये साक्षात शिव का रूप धारण कर लिया हो।
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शिव-स्वरूप है मंगलकारी +रमेशराज




शिव-स्वरूप है मंगलकारी

+रमेशराज
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शास्त्रों की मान्यतानुसार पावन गंगा को अपनी लटों में धारण करने वाले, समस्त देवों के देव, अन्यन्त निर्मल, भोलेभाले महादेव शिव जितने उदार, परोपकारी, सौम्य और दयाभाव से भरे हुए हैं, उतने ही वे रौद्र रूप हैं। अन्य देवताओं के दो नेत्र हैं तो शिव त्रिनेत्रधारी हैं। शिव का तीसरा नेत्र जब भी खुलता है तो उससे निकलने वाली ज्वाला से समस्त अनिष्टकारी वातावरण जलकर राख हो जाता है।
तन पर मृगछाल, भस्मी लपेटे हुए, एक हाथ में त्रिशूल तो दूसरे हाथ में डमरू थामे, आक-धतूरे का सेवन करने वाले शिव स्वयं हलाहल पीकर दूसरों को अमृत पिलाते हैं। ब्रह्मा यदि विकाररहित ज्ञान के पुंज हैं तो महादेव शिव जगत को सत् और असत् में भेद कराकर कल्याण की ओर ले जाने वाले देव हैं।
शिव अर्थात् मंगलकारी विधान के रचयिता। शिव से सम्बन्धित शिवरात्रिलौकिक व्यवहार में तत्पुरुष समास है जिसका अर्थ है शिव की रात्रि। सत्यार्थ प्रकाशके प्रथम समुल्लास में परमेश्वर के सौ नामों में शंकर या शिव का अर्थ इस प्रकार प्रकट किया गया है-यः शं कल्याण, सुखं करोति स शंकरअर्थात् जो कल्याण करने वाला एवं सुख प्रदानकर्ता है, उसी ईश्वर का नाम शंकर है। शिव कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं जिनके सिर पर गंगा और माथे पर अर्धचन्द्रमा है। वृषभ या नादिया उनकी सवारी है। गले में मुण्ड की माला है और सर्प लिपटे रहते हैं।
अमर कोष व्याख्या रामाश्रयी टीका पृ. 35 के अनुसार- पृत्यय से लस श्लेषण क्रीडनयो धातु से कैलाश की सिद्धि होती है- कम इति जलम् ब्रह्म व तस्मिन के जले ब्रह्माणि लासः लसनमस्य इति कैलाशःअर्थात् क से अभिप्राय ब्रह्मजल से है क्योंकि क नाम ब्रह्म का है। परमयोगी साधक महादेव शिव परमानंद प्राप्त करने के लिये इसी कैलाश पर वास करते हैं।
शिव के वेश, स्वभाव और परिवेश के प्रति ध्यान दें तो वे तो वे जहाँ वास करते हैं, वह पर्वत है। पर्वत दृढ़ता का प्रतीक है। साधक पर्वत की भाँति ही अपने व्रत, कर्म और साधना में अडिग होता है। शिव का तीसरा नेत्र जो माथे पर स्थिति है वह ज्ञान नेत्रा का प्रतीक है। इसी नेत्र से कामाचार का प्रत्यूह जलकर राख होता है। अर्थ यह कि शिव कामांध होकर कभी अनाचार नहीं करते।
महादेव के माथे पर गंगाजी हैं। मस्तकवर्ती यह गंगा ज्ञानगंगा है | इनके सिर पर अर्धचन्द्रमा है जो आनंद, आशा और सौहार्द्र का प्रतीक है। शिव के चारों ओर विषधर लिपटे हुए हैं जो काम, क्रोध, मोह, मद, ईष्र्या, द्वेष, पक्षपात आदि के प्रतीक हैं। महादेव इन्हें अपने अन्तःकरण से न लिपटाते हुए अनासक्त भाव से विचरण करते हैं। शिव के एक हाथ में त्रिशूल तीन कष्टों दैविक, दैहिक, भौतिक का प्रतीक है। परमयोगी इन तीनों शूल रूपी कष्टों को अपने वश में किये रहते हैं और इसी त्रिशूल से असुरों का विनाश कर जगत के कष्ट को हरते हैं।
शिव के बायें हाथ में डमरू विराजमान है। डमरू शब्द संस्कृत के दमरूशब्द का तद्भव शब्द है जो दम[ दमन करना ] और रू अर्थात् दमन के समय उत्पन्न होने वाली ध्वनि को प्रकट करता है। अर्थ यह कि शिव महान संयमी है। शिव को नीलकंठ भी कहते हैं। नीलकंठ अर्थात् विष के समान कटुतर बातों को जो कंठ से नीचे नहीं जाने देता अर्थात् महादेव का हृदय अत्यंत निर्मल है। 
शिव अपने शरीर पर इसलिए भस्म लपेटे रहते हैं ताकि इस संसार को बता सकें कि यह शरीर भस्म होने के लिये है अतः इससे मोह रखना व्यर्थ है।
शिव की सवार नादियानाद शब्द की ध्वनि को प्रकट करता है। नादिया को वृषभ की कहते है। जिसका प्रतीकार्थ है सुखों की वर्षा करने वाला।
शिव की पत्नी उमा हैं। इनका नाम उमा इसलिये है क्योंकि उ ब्रह्मीयते, ज्ञायते, यया, सा, ब्रह्म, विद्या उमा है जो प्रकाशवती होने से हेमवती है। शिव इसी हेमवती उमा अर्थात् हिमालय की पुत्री  पार्वती से पाणिग्रहण कर ब्रह्मविद्या के ज्ञाता होकर ब्रह्म-प्राप्ति में सफल होते हैं।
अर्थ यह है कि शिव सत्य स्वरूप हैं। सुख की वर्षा करने वाले, महाज्ञानी, पूर्ण योगी और सच्चे साधक हैं। शिव के इसी लोक मंगलकारी स्वरूप की पूजा महाशिव रात्रि के दिन भक्तगण करते हैं।
मान्यता है कि सृष्टि के प्रारम्भ हेतु फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन मध्य रात्रि को भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतार हुआ था। प्रलय काल में भगवान शिव ने ताण्डव करते हुए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने तीसरे नेत्र की भीषण ज्वाला से भस्म कर दिया था। इसी कारण इस दिन को महाशिव रात्रि या कालरात्रि कहा जाता है।
महाशिव रात्रि से पूर्व काँवरिये अपनी-अपनी काँवर लेकर मोक्षदायिनी, पापहरणी गंगा के तट पर जाकर अपनी-अपनी काँवर को रंग-विरंगे वस्त्रों, चमकते दर्पणों, मूँगे-मोतियों, बहुरंगी रूमालों, धार्मिक चित्रों से सजाते हैं। गंगा स्नान करते हैं और गंगाजल के कलश काँवर के दोनों पलड़ों में रख, पैरों में घुँघरू बाँध अपने इष्ट देव शिव पर गंगाजल चढ़ाने हेतु निकल पड़ते हैं।
टोल बनाकर नाचते-गाते, बम-बम भोले के नारे लगाते हुए काँवरिये जब सड़कों, पगडंण्डियों से होकर गुजरते हैं तो पूरा वातावरण शिव-भक्तिमय हो जाता है। जो लोग काँवर नहीं ला पाते, वे सड़कों के किनारे तम्बू तानकर दूध, चाय, मिष्ठानों और फलों से काँवरियों का स्वागत-सत्कार कर पुण्य कमाते हैं।
महाशिवरात्रि के दिन माताएँ-बहिनें निराहार व्रत रखती हैं और काले तिल से स्नान कर रात्रि-बेला में पत्र-पुष्प, वस्त्र आदि से मंडप तैयार कर वेदी पर कलश की स्थापना के उपरान्त गौरी-शंकर और नन्दी की पूजा करती हैं।
अतः कहना उचित होगा कि महाशिव रात्रि पर्व समस्त जगत की भलाई के लिए हर मन में मंगल भाव जगाने और जगत को सुन्दरतम बनाने का एक सत्बोध पर्व है।
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हर घर में नहीं आती लक्ष्मी +रमेशराज




हर घर में नहीं आती लक्ष्मी

+रमेशराज
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दरिद्रता जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। आदमी यदि दरिद्र हो तो उसे धन-प्राप्ति के लिये दूसरों के समक्ष याचना करनी पड़ती है। भिक्षा का सहारा लेना पड़ता है। धनहीन व्यक्ति को कोई भी सम्मान से नहीं देखता। धन के अभाव में न व्यक्ति अच्छा-सा मकान बनवा पाता है और न अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला पाता है। धन नहीं तो घर में अशांति ही अशांति, कलह ही कलह, समस्याएँ ही समस्याएँ। धन नहीं तो प्रसन्न मन नहीं। धनाभाव आदमी के सिर्फ घाव ही घाव करता है। बीमार पड़ने पर अच्छे क्या, सामान्य चिकित्सालय में भी इलाज कराना दूभर।
इसीलिए धन प्रदान करने वाली देवी लक्ष्मी की पूजा-आराधना-उपासना-साधना करना आवश्यक है। पुराणों में वर्णन मिलता है कि जब समुद्रमन्थन से देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं तो भगवान विष्णु के साथ उनका पारिग्रहण हुआ। भगवान विष्णु की प्रिया लक्ष्मी जिस किसी पर भी अपनी कृपा कर देती है, उसका जीवन में धन-वैभव से भर जाता है। जिस किसी पर भी लक्ष्मी की कृपा हो जाये, उसे सेठ-साहूकार, सरकारी अधिकारी, लोकप्रिय नेता या एक बड़ा व्यापार बनने में देर नहीं लगती। आलीशान भवनों, लक्जरी कारों का स्वामी बनाती है लक्ष्मी। सम्मान, शौर्य और यश दिलाती है लक्ष्मी।
पर काँटे का सवाल यह है कि किसके घर आती है लक्ष्मी? किस पर अपनी कृपा बरसाती है लक्ष्मी? कार्तिक मास की अमावस्या जो दीपोत्सव, दीपावली, दिवाली के नाम से जानी जाती है, इस दिन भगवती माँ लक्ष्मी का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हर कोई बड़ी ही श्रद्धा के साथ रात्रि बेला में देवी लक्ष्मी का सपरिवार पूजन करता है। माँ लक्ष्मी से निवेदन करता है कि वह उसके घर पधारकर सदा के लिए वास करें। श्रद्धापूर्वक पूजन करने के बावजूद अनेक व्यक्ति देवी लक्ष्मी की कृपा को प्राप्त नहीं कर पाते। ऐसा आखिर क्यों होता है? माँ लक्ष्मी का वास हर किसी के घर में क्यों नहीं होता?
इसका उत्तर यह है कि जो लोग मेहनती, सद्बुद्धि से युक्त, फुर्तीले, अच्छी योजनाएं बनाने वाले, दूरदर्शी, सदाचारी और परोपकारी होते हैं, मां लक्ष्मी को वही प्रसन्न करने में सफल हो पाते हैं।
जिन परिवारों में पति-पत्नी के बीच कलह होती रहती है, उन परिवारों से लक्ष्मी कभी प्रसन्न नहीं होती और न उनके घर वास करती है। ऐसे परिवार माँ लक्ष्मी का चाहे जिस विधि-विधान से पूजन कर लें, किन्तु लक्ष्मी की कृपा से वंचित ही रहते हैं।
जुआरी, सट्टेबाज, चोर, देशद्रोही, अहंकारी, व्यभिचारी माँ लक्ष्मी की पूजन कितने भी मनोयोग से कर लें, लेकिन माँ उन पर दया नहीं करती। ऐसे व्यक्तियों के घर वे अपनी बड़ी बहिन दरिद्राको भेज देती हैं, जो उन्हें समय-समय पर धन की हानि ही नहीं दिलाती, उन्हें अपयश का भागीदार भी बना देती है। भारी अपमान करा देती है। कारा में डलवा देती है। अवैध कमायी पर गुलछर्रे उड़ाने वालों की मति पर बैठी देवी लक्ष्मी की बहिन दरिद्रा’  ऐसे व्यक्तियों से किसी न किसी दिन ऐसा कार्य जरूर करवा देती है जिससे उनकी सम्पूर्ण समाज में छवि धूमिल हो जाती है। कलमाणी, ए. राजा, रेड्डी बन्धु जैसे ख्याति प्राप्त और उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों का जो हश्र हुआ है, उसके मूल में माँ लक्ष्मी  का कोप और दरिद्रा का वास स्पष्ट देखा जा सकता है। जो लोग सदाचारी, मेहनती, देशभक्त, लोकमंगल की भावना से ओत-प्रोत और अच्छे योजनाकार होते हैं, ऐसे व्यक्त्यिों की पूजा-अर्चना ही माँ लक्ष्मी तक पहुँचती है। माँ ऐसे व्यक्त्यिों से ही प्रसन्न होकर उनके कारोबार में दिन-दूनी और रात चैगुनी वृद्धि करती है। मिलावटखोर, तस्कर और चोर अपनी जीवन का हर भोर अन्ततः अंधेरे में तब्दील कर लेते हैं। जबकि सदाचरण के मार्ग को अपनाने वाले व्यक्ति की आराधना से माँ इतनी प्रसन्न होती हैं कि उसे न कभी धन-हानि होती है न मान-हानि। सदाचारी पर माँ की कृपा का चक्र जीवन-भर चलता है जबकि दुराचारी माँ लक्ष्मी का भले ही अनन्य भक्त हो, उसे अंततः दरिद्राके साथ ही रहना पड़ता है।
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द्रौपदी ने भी रखा था ‘करवा चौथ’ का व्रत +रमेशराज




द्रौपदी ने भी रखा था करवा चौथका व्रत

+रमेशराज
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कार्तिक वदी चतुर्थी के दिन रखे जाने वाले व्रत का नाम करवाचौथहै। यह भारतीय स्त्रियों का मुख्य त्यौहार है। इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां पति की रक्षार्थ परमपिता परमेश्वर का ध्यान करती हैं, दुआएँ मांगती हैं। दिनभर निराहार और निर्जला व्रत रखते हुए सायंकाल को सोलह शृंगार कर, घर में पूड़ी पकवान बना, अपने नजदीक के मंदिर में जाती है और वहां देव-अर्चना करती हैं। रात्रि में अपने घर एक पटे पर बैठकर जल से भरा हुआ लोटा रखती हैं। मिट्टी या खांड के करवे पर बायना काढ़ा जाता है। करवे में गेंहू, रोली, चीनी और रुपया रख उसे टक्कन से बन्द कर दिया जाता है। इसके बाद गेंहू के तेरह दाने लेकर गणेश पूजन के उपरांत व्रत की कहानी सुनायी जाती है। कहानी सुनने या सुनाने के बाद करवे पर हाथ फेरकर पानी का लोटा अलग रख दिया जाता है। इसके उपरांत सास के चरण स्पर्श कर सदा सुहागनका आशीर्वाद लिया जाता है। रात्रि बेला में चन्द्रमा के प्रकट होने पर चन्द्रदर्शन किया जाता है और चन्द्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। इसके उपरांत स्त्रियां अपने-अपने पति के साथ प्रेमपूर्वक भोजन करती हैं।
एक बार पाण्डु पुत्र अर्जुन तपस्या करने के लिए नीलगिरि नामक पर्वत पर चले गये। इधर पांडवों पर अनेक विपत्तियां आने लगीं। द्रौपदी ने शोकाकुल होते हुए भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया। श्रीकृष्ण द्रौपदी की पुकार सुन वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने द्रौपदी को इस समस्या के निवारण हेतु करवाचौथ का व्रत रखने को कहा। उन्होंने बतलाया कि विपत्ति के समय करवाचौथके व्रत की महत्ता भगवान शिव ने पार्वती को भी समझायी थी। यह कहकर श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को प्राचीनकाल के एक गुणी, धर्मपरायण ब्राह्मण की कथा सुनायी। श्रीकृष्ण बोले-‘‘ हे पांचाली! प्राचीन काल में एक ब्राह्मण के चार पुत्र और एक सुशीला पुत्री थी। पुत्री  के विवाहित होने पर करवा चतुर्थी के दिन उस ब्राह्मण की पुत्री ने व्रत रखा। परन्तु व्रत के दौरान चन्द्रोदय से पूर्व ही वह क्षुधा से इतनी पीडि़त हुई कि उसने अपने दयालु भाइयों द्वारा बनाये गये नकली चाँद के दर्शन कर भोजन कर लिया। भोजन करते ही उसके पति का देहांत हो गया। इससे दुःखी हो उसने अन्न-जल का त्याग कर दिया। उसी रात इन्द्राणी देवी भू विचरण करने आयीं। ब्राह्मण कन्या को रोते-विलखते देख इन्द्राणी ने उसे उपाय बताया कि यदि तू पुनः विधिवत रूप से करवा चौथ का व्रत रखेगी तो तेरा पति जीवित हो जायेगा। ब्राह्मण कन्या ने वर्ष भर प्रत्येक चतुर्थी पर व्रत रखा और उसका पति जीवित हो गया।’’
भगवान श्रीकृष्ण की इस कथा को सुन द्रौपदी ने भी करवाचौथ के दिन विधिविधान से व्रत रखा तो पांडवों पर आयी समस्त विपत्तियां एक-एक कर किनारा कर गयीं। यही नहीं उसी दिन उसके पति अर्जुन भी सकुशल घर लौट आये।
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बड़ी मादक होती है ब्रज की होली +रमेशराज




बड़ी मादक होती है ब्रज की होली

+रमेशराज
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तरह-तरह के गीले और सूखे रंगों की बौछार के साथ बड़ी ही धूम-धाम से मनाये जाने वाले त्योहार का नाम होलीहै। होली का सम्बन्ध एक ओर गेंहू-जौ की पकी हुई फसल को निहारकर प्राप्त होने वाले आनंद से है तो दूसरी ओर इससे जुड़ी भक्त प्रहलाद की एक कथा भी है। माना जाता है कि एक नास्तिक, अहंकारी, दुराचारी राजा हिरण कश्यप अपने पुत्र प्रहलाद से इसलिये कुपित रहता था क्योंकि वह केवल अपने को ही सर्वशक्तिमान यहां तक कि भगवान मानता ही नहीं, मनवाना भी चाहता था। हिरण कश्यप की प्रजा तो उसके आगे नतमस्तक थी, किन्तु उसका पुत्र प्रहलाद धार्मिक प्रवृत्ति का और ईश्वर में व्यापक आस्था रखने वाला था। अपने पिता के स्थान पर वह ईश्वर को ही सर्वशक्तिमान मानता था। पुत्र की यही बात हिरणकश्यप को बुरी लगती थी। इसी कारण वह पुत्र का विरोधी ही नहीं उसके प्रति आक्रामक और हिंसक भी हो उठा। पुत्रा को मृत्युदण्ड देने के उसने कई उपाय किये, किन्तु सफल न हो सका। हिरण कश्यप की बहिन होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। वह प्रहलाद को लेकर धधकती आग पर बैठ गयी। अपने भक्त पर ईश्वर की कृपा देखिए कि भक्त प्रहलाद तो बच गया किन्तु अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त करने वाली होलिका जल गयी। इस दृश्य को देखकर जन समूह ने अपार खुशी मनायी। लोग वाद्ययंत्रों के साथ नाचे-कूदे-उछले-गाये। तभी से होली का त्योहार हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन अन्त्यंत मादकता और मस्ती के साथ मनाया जाता है।
इस दिन की बरसाने की लठामार होली इतनी रोचक और मस्ती प्रदान करने वाली होती है कि क्या कहने ! पुरुष नारियों पर बाल्टियां और पिचकारी भरकर रंगों की बौछार करते हैं तो नारियां रंग में भीगते हुए पुरुषों पर लाठियों से प्रहार करती हैं। होली खेलते हुए मादक चितवनों के वाणों के प्रहार इस त्योहार के अवसर पर जैसा मधुरस प्रदान करते हैं वह वर्णनातीत है।
ब्रज के लोक-साहित्य में कृष्ण और राधा के माध्यम बनाकर होली के गीतों को भी बड़े ही रोचक, रसमय तरीकों से लोक कवियों ने रचा है। इन रसाद्र गीतों को रसिया भी बोला जाता है। होली के अवसर पर लोग रसिया का लुत्फ, हुरियारे बनकर उठाते हैं । वे रंगों में सराबोर होते हुए, विजया के मद में डूबे, धमाल मचाते हैं और ढोल-ढोलक, हारमोनियम, तसला, चीमटा बजाते हुए इन रसीले गीतों को गाते हैं। शोर-शराबे, हो-हल्ले के साथ निकलने वाली चौपाई और रात्रिबेला में होने वाले फूलडोल अर्थात् रसिया-दंगल में गाये जाने वाले इन रसभरे गीतों से पूरा वातावरण होलीमय हो जाता है।
होली शरारतों, नटखटपन, हंसी-ठठ्ठा, मनोविनोद, व्यंग्य-व्यंजना, मजाक, ठिठोली के साथ खेले जाने वाला ऐसा त्यौहार है, जिसमें पिचकारी रंगों की वर्षा कर, एक दूसरे का तन तो भिगोती ही है, इस अवसर पर नयनों के वाण भी चलते हैं। वाण खाकर होली खेलने वाला मुस्कराता है। होली आयी रे’, होली आयी रेचिल्लाता है। वाणों की पीड़ा उसके मन को रसाद्र करती है। उसमें अद्भुत मस्ती भरती है-
मेरे मन में उठती पीर
चलावै गोरी तीर, अचक ही नैनन के।
होली का अवसर हो और होली खेलने में धींगामुश्ती, उठापटक, खींचातानी न हो तो होली कैसी होली। एक हुरियारे ने होली खेलते-खेलते हुरियारिन की कैसी दुर्दशा की है उसी के शब्दों में-
होली के खिलाड़, सारी चूनर दीनी फाड़
मोतिन माल गले की तोरी, लहंगा-फरिया रंग में बोरी
दुलरौ तिलरौ तोड़ौ हार।
होली खेलने वाली नारि जब होली खेलने के लिये मस्ती में आती है तो लोक-लाज की सारी मर्यादाओं को तोड़कर होली खेलती है। अपने से बड़े जेठ या ससुर को भी वह वह देवर के समान प्यार पगे शब्द लाला’ ‘लालाकहकर पुकारती है और स्पष्ट करती है-
लोक-लाज खूंटी पै लालाघरि दई होरी पै।
होली खेलते हुए रंगों भरी पिचकारियों से निकलती रंगों की बौछार होली खेलने वाली नारि में मधुरस का संचार करती है-
पिचकारी के लगत ही मो मन उठी तरंग
जैसे मिसरी कन्द की मानो पी लई भंग।
होलिका-दहन के उपरांत असल उत्सव शुरू होता है। युवा वर्ग के हुरियारे भारी उमंग के साथ नृत्य करते, ढोल बजाते, होली के गाने गाते गेंहू की भुनी बालें लेकर घर-घर जाते हैं। एक-दूसरे के गले मिलते हैं। अपनों से बड़ों के चरण-स्पर्श करते हैं। बच्चे पिचकारियां और रंग से भरी बाल्टियां लेकर छतों पर चढ़ जाते हैं और टोल बनाकर आते हरियारों पर रंगों की बौछार करते हैं। फटी हुई पेंट-कमीज पहने, तरह-तरह की मूंछ-दाड़ी, जटाजूट और मुखौटे लगाये हुरियारे जब घर में बैठी नारियों को होली खेलने के लिये उकसाते हैं तो उनके मन की इच्छा को भांपते हुए उन पर रंग-भरी बाल्टियां-दर-बाल्टियां उड़ेल देते हैं। प्रतिक्रिया में हुरियारिन डंडा लेकर गली में निकल आती हैं और डंडे का प्रहार हुरियारों पर करती हैं। डंडों की मार अनूठा प्यार उत्पन्न करती है। चोट मिठास देती है। हुरियारिन कभी-कभी किसी हुरियारे को पकड़ लेती हैं और उसे अजीबोगरीब वेशभूषा पहनाकर कैसी दुर्दशा करती हैं, यह भी बड़े आनंददायी क्षण होते हैं- 
सखियन पकरे नन्द के लाला काजर मिस्सा दई लगाय
साड़ी और लहंगा पहनाऔ सीस ओढ़न दयौ उढ़ाय
हाथन मेंहदी, पांयन बिछुआ, पायल, झुमके भी पहनाय
देख-देख लाला की सूरत नर और नारि रहे मुस्काय।
कुल मिलाकर होली का पर्व सौहार्द्र तो पैदा करता ही है, वर्ण-जाति, वैर, द्वेश आदि को भी प्रेम-हास, परिहास और व्यंग्य-विनोद के माध्यम से समाप्त करने में अपनी सद्भाव की भूमिका निभाता है।
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