13 अप्रैल 2017

सावरकर ने लिखा 1857 की क्रान्ति का इतिहास +रमेशराज




सावरकर ने लिखा 1857 की क्रान्ति का इतिहास

+रमेशराज
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    भारत माता के वीर समूतों ने अंग्रेजों की दासता की बेडि़याँ काटने के लिए हिन्दुस्तान से बाहर रहकर भी गोरी सरकार के विरुद्ध क्रान्ति का शंखदान किया। गदर पार्टी के क्रान्तिकारी और एक सशक्त सैन्य संगठन आजाद हिन्द फौजको लेकर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने एक तरफ अंग्रेजों को कुचलने के लिए विदेश की युद्ध-भूमि को चुना तो दूसरी ओर विनायक दामोदर सावरकर के गुरु श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन स्थित भारतीय भवनसे अंग्रेजों की अनीतियों, अत्याचार और शोषण के विरुद्ध अपनी आवाज बुलन्द की। लंदन का भारतीय भवनउन दिनों कैसी क्रान्तिकारी गतिविधिायों का केन्द्र था, इसका पता उसमें बैठकर बम बनाने के तरीकोंपर दिये जाने वाले भाषणों से आसानी के साथ लगाया जा सकता है। भारतीय भवन से ही सावरकर ने पंजाब के सपूत मदनलाल धींगरा की उनके हाथ में छुरी गाड़कर कठिन परीक्षा लेने के बाद धींगरा से सर कर्जन वाइली की हत्या करायी। कर्जन सावरकर की आँखों में इसलिये खटक रहा था, क्योंकि वह भारतीय भवन की गुप्त गतिविधियों की जासूसी करता था।
    सावरकर इस तथ्य को भलीभाँति जानते थे कि अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध जारी रखने के लिये बम और पिस्तौलों के साथ-साथ क्रान्तिकारी साहित्य का रचा जाना भी आवश्यक है। साहित्य से ही क्रान्ति की ज्चाला धधकती है। इन्ही सब बातों पर विचार करते हुए उन्होंने ‘1857 के स्वतंत्रता युद्ध का इतिहासरचा। तथ्यों के संकलन की दृष्टि से यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण थी, जिसमें 1857 का गदर केवल एक सैनिक गदर मात्र नहीं था बल्कि भारतीय मानस में उफान लेती आजादी की भावना पूरी तरह प्रतिबिम्बित होती थी।
    ‘1857 के स्वतंत्रता युद्ध का इतिहासनामक पुस्तक सावरकर ने 24 साल की उम्र में लन्दन प्रवास के दौरान मराठी में लिखी, जिसके कुछ अध्यायों का अनुवाद करके वे अंग्रजी में फ्री इण्डिया सोसायटीके सदस्यों को सुनाते थे। पुस्तक की पांडुलिपि को प्रकाशित कराने हेतु जब गुप्त तरीके से भारत भेजा गया तो भारत के मराठी प्रैस मालिकों ने इसे छापने से इन्कार कर दिया। प्रयास फिर भी जारी रहा। अन्त में अभिनव भारतनामक क्रान्तिकारी दल के छापाखाने में यह पुस्तक दे दी गयी। पुस्तक छपने की भनक पुलिस को लग गयी। पुलिस उस छापेखाने की ओर दौड़ पड़ी। अतः पुस्तक को छपने से पूर्व ही वहाँ से उसकी पांण्डुलिपि हटा ली गयी।
    पुस्तक की पांण्डलिपि को छापने के लिये पेरिस, जर्मन आदि में भी अथक प्रयास हुए किन्तु छपने से पूर्व ही पुलिस को भनक लग जाती और प्रकाशन कार्य रुक जाता।
    अन्त में सफलता हाथ लग ही गयी। हालेंड के एक छापेखाने में पुस्तक छपने लगी। फ्रेंच और ब्रिटिश पुलिस को झांसा देने के लिए क्रान्तिकारियों ने यह अफवाह फैला दी कि पुस्तक फ़्रांस में छप रही है।
    जब यह किताब हालैण्ड में छप गयी तो इसकी प्रतियों को गुपचुप तरीके से फ्रांस लाया गया। अभी इस बात पर विचार-विमर्श ही चल रहा था कि इस पुस्तक को भारत और अन्य देशों में कैसे भेजा जाये, उसी समय इसकी जब्ती की घोषणा कई देशों ने कर दी। इस जब्ती की आज्ञा के विरूद्ध सावरकर ने लन्दन टाइम्समें आक्रोश व्यक्त किया। अंग्रेजों की पिट्ठू कई सरकारों की ओर से भले ही पुस्तक की जब्ती के आदेश थे लेकिन पुस्तक पर गलत रैपर लगाकर इसे भारत ही नहीं अन्य देशों में भी भेजा गया। जैसा कि सावरकर सोचते थे, पुस्तक ने क्रान्तिकारियों में फिर से एक नयी आग भर दी।
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