ब्लौग सेतु....

20 नवंबर 2013

जीने की अभिलाषा

राजेश त्रिपाठी





एक अंकुर
चीर कर पाषाण का दिल
 बढ़ रहा आकाश छूने।
 जमाने के थपेड़ों से
 निडर और बेखौफ।
 उसके अस्त्र हैं दृढ़ विश्वास, 
अटूट लगन और 
बड़ा होने की उत्कट चाह। 
इसीलिए वह बना पाया
 पत्थर में भी राह। 
 उसका सपना है 
एक वृक्ष बनना, 
 आसमान को चीर
 ऊंचे और ऊंचे तनना। 
 बनना धूप में 
किसी तपते की छांह,
 अपने फलों से बुझाना
 किसी के पेट की आग।
 इसीलिए जाड़ा, गरमी,
 बारिश की मार सह रहा है वह
 जैसे दूसरों के लिए जीने की
 सीख दे रहा है वह।
 है नन्हा पर बड़े दिलवाला,
 इसीलिए बड़े सपने
 देख रहा है एक अंकुर।

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर है भाई साहब भावाभि -व्यक्ति।

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  2. आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 25/11/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
    सूचनार्थ।

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