ब्लौग सेतु....

18 मई 2017

वर्णिक छंद में तेवरी




|| वर्णिक छंद में तेवरी ||
+राजभा राजभा राजभा राजभा +
 छंद से मिलती जुलती बहर फ़ायलुन फ़ायलुन फ़ायलुन फ़ायलुन
.........................................................................
आपने नूर की क्या नदी लूट ली
गीत के नैन की रोशनी लूट ली |

क्या यही आपकी है समालोचना
शब्द के अर्थ की ज़िन्दगी लूट ली |

ऐ कहारों कहो क्या हुआ हादिसा
आपने तो नहीं पालकी लूट ली |

पांडवो आज भी आपकी भूल से 
कौरवों ने सुनो द्रौपदी लूट ली |

+रमेशराज

लोकशैली में एक तेवरी




लोकशैली में एक तेवरी 
--------------------------------
सडकों पै मारपिटाई करते बर्बर आतताई
होते सरेआम उत्पात दरोगा  ठाड़ो  देखै |

हाथों में छुरी तमंचे जन को लूट रहे नित गुंडे
गोदें चाहे जिसका गात दरोगा ठाड़ो देखै |

गलियों में खड़े लफंगे ताकें नारीतन को नंगे
अब है चीरहरण दिनरात दरोगा ठाड़ो देखै |

देती है आग दिखाई बस्ती को फूंकें दंगाई
धर्म पै अति हिंसक जज़्बात दरोगा ठाड़ो देखै |

+रमेशराज 

हज़ल




हज़ल 
----------------------
बोलै मति हमकूँ ठलुआ
हमतौ चाकी के गलुआ

प्रेम-बाँसुरी बजा रहे हम
हमकूँ कहियो मत कलुआ 

बूँद-बूँद यूँ दिन-भर टपकें
नैना सरकारी नलुआ

साली मुस्का ऐसे बोली
जीजा तुम रहे रहलुआ 

द्यौरानी भी यार जेठ को
होली पै बोलै ललुआ

+ रमेशराज +

तेवरी




|| तेवरी ||
जनता की थाली बम भोले
अब खाली-खाली बम भोले |
श्रम जिसके खून-पसीने में
उसको ही गाली बम भोले |
इस युग के सब गाँधीवादी
कर लिए दुनाली बम भोले |
अब केवल दिए सियासत ने
हकखोर-मवाली बम भोले |
छलिया की सूरत संतों-सी
अति भोली-भाली बम भोले |
अबला की चीख़ें सुनी नहीं
बस गाय बचा ली बम भोले |

+रमेशराज   

तेवरी




|| तेवरी ||
मैं भी अगर भाट बन जाता
गुण्डों को सेवक बतलाता |
कोयल के बदले कौवों को
सच्चा स्वर-सम्राट सुझाता |
सारे के सारे खलनायक
मेरे होते भाग्य-विधाता |
ज़हर घोलता नित समाज में
सज्जन को पल-पल गरियाता |
धन-दौलत की कमी न होती
पुरस्कार पाकर मुस्काता |

+रमेशराज