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18 अप्रैल 2017

मस्ती का त्योहार है होली +रमेशराज




मस्ती का त्योहार है होली

+रमेशराज
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    होली शरारत, नटखटपन, मनोविनोद, व्यंग्य-व्यंजना, हँसी-ठठ्ठा, मजाक-ठिठोली, अबीर, रंग, रोली से भरा हुआ एक ऐसा त्योहार है जो रंगों की बौछार के मध्य अद्भुत आनंद प्रदान करता है। कुमकुम और गुलाल से रंगे हुए गाल गवाही देते हैं कि हर तरफ मस्ती ही मस्ती है। बूढ़े या जवान सबके अधरों पर बस एक ही तान-होली है भई होली है।
    इस त्योहार से पन्द्रह दिन पूर्व और पन्द्रह दिन बाद तक हर कोई अद्भुत आनंद से भरा हुआ बस एक ही टेर लगाता है-होली खेल री गुजरिया, डालूँ में रंग या ही ठाँव री!
 होली खेलने वाली हुरियारिन होली खेलते हुए मादक चितवन के वाणों के प्रहार सहते हुए कहती है-मति मारै दृगन के तीर, होरी में मेरे लगि जायेगी।
    होली पर इतनी मस्ती क्यों छाती है? इसका सीधा-सीधा सम्बन्ध शीतलहर की ठिठुरन के बाद रोम-रोम को गुनगुनी सिहरन प्रदान करने वाले बदले हुए मौसम से होने के साथ-साथ किसान की पकी हुई फसल से भी है।
    इस पर्व का प्राचीन नाम वांसती नव सस्येष्टि है अर्थात् वसंत ऋतु के नये अनाज से किया हुआ यज्ञ। तिनके की अग्नि में भुने हुए [अधपके ] शमोधान्य [ फली वाले अन्न ] को होलक कहते हैं। होली होलक का अपभ्रंश हैं।
    पौराणिक मतानुसार होलिका हरिणकश्यपु नामक दैत्य की बहन थी। उसे वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी। हरिणकश्यपु का एक पुत्र प्रहलाद विष्णु का उपासक था। प्रहलाद कहता था - कथं पाखण्ड माश्रित्य पूजयामि च शंकरम।अर्थात् मैं पाखण्ड का सहारा लेकर शंकर की पूजा क्यों करूँ ? मैं तो विष्णु की पूजा करूँगा।’’
    हरिणकश्यपु ने प्रहलाद की इस विष्णु-भक्ति से कुपित होकर एक दिन अपनी बहिन होलिका से प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठने को कहा। होलिका ने ऐसा ही किया। विष्णु की कृपा से होलिका तो अग्नि में जलकर भस्म हो गयी किन्तु प्रहलाद बच गया।
    उक्त पौराणिक कथा से इतर यदि हम इस त्योहार के प्रचलन पर विचार करें तो किसी भी प्रकार के अन्न की ऊपरी परत को होलिका कहा जाता है और उसी अन्न की भीतरी परत [ गिद्दी ] को प्रहलाद बोलते हैं | होलिका को माता इसलिए माना जाता है क्योंकि वह इसी गिद्दी [ गूदा ] की रक्षा करती है। यदि यह परत न हो तो चना, मटर, जौ आदि का विकास नहीं हो सकता। जब हम गेंहूँ-जौ आदि को भूनते हैं तो उसके ऊपर की परत अर्थात् होलिका जल जाती है और गिद्दी अर्थात् प्रहलाद बचा रहता है। अधजले अन्न को होलिका कहा जाता है। सम्भवतः इसी कारण इस पर्व का नाम होलिकोत्सव है।
    होलिकोत्सव फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। होली वाले दिन घर-घर भैंरोजी और हनुमान की पूजा होती है। पकवान, मिष्ठान, नमकीन सेब, गुजिया, पड़ाके, टिकिया आदि स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किये जाते हैं। छोटी होली वाले दिन शाम को घर में तथा सार्वजनिक स्थल पर रखी होली की पूजा सूत पिरोकर और फेरे लगाकर की जाती है। रात्रि बेला में होली में आग लगाकर लोग कच्ची गेंहूँ और जौ की बालियाँ भूनते हैं और भुनी हुई बालियों को एक दूसरे को भेंट कर गले मिलते हैं। ज्यों-ज्यों रात्रि ढलती है और बाद में सूरज अपनी गर्मी बिखेरता है, यह सारा मिलने-मिलाने का कार्यक्रम एक-दूसरे को रंगों  से सराबोर करने में तब्दील हो जाता है। पुरुष, नारियों पर पिचकारियों और बाल्टियों से रंग उलीचते हैं, नारियाँ पुरुषों पर डंडों की बौछार करती हैं। होली का पर्व हर हृदय पर प्यार की बौछार करता है। यह त्योहार वर्ण-जाति, ऊंच-नीच के भेद मिटाने वाला ऐसा पर्व है जिसमें हर कोई भाईचारे एवं आपसी प्रेम से आद्र होता है।
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लक्ष्मी-पूजन का अर्थ है- विकारों से मुक्ति +रमेशराज




लक्ष्मी-पूजन का अर्थ है- विकारों से मुक्ति 

+रमेशराज
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कार्तिक मास की अमावस्या को पूरी धूमधाम से मनाये जाने वाले त्योहार दीपावली का सम्बन्ध भगवान श्री रामचन्द्रजी का वनवास के दौरान अत्याचारी रावण को मारकर अयोध्या लौटने से है। जिस समय श्री राम चैदह वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या पहुँचे तो उनके आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने दीपमालाएँ जलाकर महोत्सव मनाया।
इस त्योहार का दूसरा सम्बन्ध घरों की साफ-सफाई कर माँ लक्ष्मी को अपने-अपने घर पूजा-अर्चना कर बुलाने से है। माँ लक्ष्मी मनुष्य जाति खासकर हिन्दुओं को धन-वैभव, प्रसन्नता और सुख-शान्ति प्रदान करने वाले देवी हैं। इन्हें प्रसन्न करने के लिए हिन्दू लोग अपने-अपने घर के नियत स्थान तथा अपने प्रतिष्ठान पर माँ सरस्वती, हनुमानजी, अन्य देवों के साथ-साथ श्री गणेश का पूजन दीप जलाकर जल, रोली, चावल, खील-बताशे, अबीर, गुलाल, फूल, नारियल, धूप आदि से परिवारीजनों के साथ करते हैं।
सर्वप्रथम सद्बुद्धि-ज्ञान के देवता श्री गणेश का पूजन किया जाता है, तत्पश्चात् माँ लक्ष्मी तथा अन्य देवी-देवताओं का। अन्त में पान के पत्ते पर हलवा रख उसमें चाँदी का एक सिक्का डाल, इस सबको माँ लक्ष्मी को भोग प्रदान करते हुए उनके मुख पर चिपका दिया जाता है। साथ ही एक बड़े-से दीपक में घी डालकर उसे पूरी रात जलाने को रख दिया जाता है।
    माँ लक्ष्मी पूजन उन प्रतिष्ठानों या दुकानों में भी किया जाता है, जिनके बूते परिवार की रोजी-रोटी चलायी जाती है। इन स्थानों पर सभी व्यवसायी पुराने बहीखातों के स्थान पर नये बहीखाते बनाते हैं, जिस पर शुभ-लाभ, स्वास्तिक के चिन्ह और ‘श्री             लक्ष्मी सदा सहाय’ रोली-हल्दी आदि से लिखा जाता है। सभी व्यवसायी अपने इन नये खातों का पूजन करते हैं।
लक्ष्मी-पूजन का यह समस्त विधान उसी माँ लक्ष्मी से निरन्तर धन-वैभव प्राप्त करने का अनुष्ठान होता है, जिसके बूते जीवन में चमक, शांति और यश बढ़ते हैं।
    माँ लक्ष्मी उन्हीं को ऋण मुक्ता’, ‘दारिद्रयहारिणीभी कहा जाता है। माँ लक्ष्मी उन्हीं साधकों को ऋण और दारिद्रय से मुक्त बनाती हैं, जो विकारों और आलस्य से विहीन होते हैं। जुआरियों, शराबियों, व्यभिचारियों, फिजूलखर्चियों आडम्बरियों या कामचोरों की पूजा-अर्चना से माँ लक्ष्मी कभी प्रसन्न नहीं होतीं।
    माँ लक्ष्मी से पूर्व ज्ञान और बुद्धि के देवता श्री गणेश का पूजन भी इसी कारण किया जाता है कि वह ऐसा ज्ञान या बुद्धि प्रदान करें, जिसके आलोक में उपकार की भावना पुष्पित-पल्लवित हो। अहंकार रूपी अंधकार का विनाश हो।
    माँ लक्ष्मी के पूजनोपरांत माँ सरस्वती की आराधना उन्हीं लोगों को फलदायी होती है, जो अपनी सृजनात्मकता के माध्यम से समाज में प्रेम, भाईचारे और मंगल की ज्योति जलाते हैं।
    माँ लक्ष्मी पूजन के समय पुरुषवर्ग हनुमानजी की पूजा इसलिए करता है ताकि वह भी श्रीराम जैसे सत्धारी का साथ देकर असुरों के विनाश में सहायक बन सके।
    दीपावली के दिन जुआ खेलने वालों, व्यभिचारियों, कामासुरों, अहंकारियों से माँ लक्ष्मी इतनी कुपित होती हैं कि वह ऐसे लोगों को सदा-सदा के लिये पतन, दरिद्रता, असफलता और अपयश के गर्त में धकेल देती हैं। अतः श्री लक्ष्मी-पूजन के समय हर किसी को विकारों से मुक्त होने का संकल्प लेना चाहिए। 
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धनतेरस जुआ कदापि न खेलें +रमेशराज



धनतेरस जुआ कदापि न खेलें

+रमेशराज
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कार्तिक बदी त्रयोदसी मनाये जाने वाले त्यौहार धनतेरसको धन्वन्तरि जयंतीके नाम से भी जाना जाता है। इस दिन ही धन्वन्तरि वैद्य समुन्द्र से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इस दिन हर परिवार में कुछ न कुछ इसलिए खरीदकर लाया जाता है क्योंकि इसी दिन देवी लक्ष्मी का घर में आवास माना जाता है।
इस दिन हर दुकानदार के क्रय-विक्रय का सारा कारोबार नकद नारायण के बूते चलता है। इसलिये विभिन्न वस्तुओं की नकद खरीद-फरोख्त करते समय यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि यह खरीद आपकी जेब पर भारी न पड़े।
इस दिन गृहणियाँ अपनी-अपनी सामर्थ्य अनुसार पुराने बर्तनों को हटाकर नये बर्तनों से रसोई को सजा सकती हैं।
दार्शनिक, वैज्ञानिक, साहित्यिक और संगीत की अभिरुचि के लोग माँ सरस्वती की मिट्टी, चाँदी की मूर्ति या चित्र खरीदकर अपने घर के अध्ययन या साधना कक्ष में माँ सरस्वती को विराजमान कर सकते हैं। माँ सरस्वती भी लक्ष्मीजी की तरह माँ भगवती का ही एक रूप हैं, जो मनुष्य को आत्म-प्रकाश से भरती हैं। अतः आत्म-प्रकाश को वरीयता देने वाले व्यक्ति इस दिन अच्छी-अच्छी पुस्तकें खरीदकर अपनी अलमारियाँ सजा सकते हैं।
विभिन्न देवी-देवताओं की चाँदी की मूर्तियाँ खरीदकर घर के छोटे-से मंदिर को सजाने वाले व्यक्ति माँ लक्ष्मी से विशेष कृपा की आकांक्षा कर सकते हैं। मिट्टी की बनी हुई मूर्तियों से साधारण परिवार के लोग भी देवी-देवताओं की प्रतिष्ठा कर उनसे वरदान प्राप्त कर सकते हैं।
घर की शोभा बढ़ाने वाली हर वस्तु को धनतेरस के दिन खरीदा जा सकता है। वस्तु को खरीदने से पूर्व उसकी गुणवत्ता और मूल्य को परखा जाना अत्यंत आवश्यक है।
धनतेरस पर खरीदारी अवश्य करें, लेकिन अनावश्यक खरीदारी से बचें। मसलन यदि आपके घर में अच्छी पार्किंग की व्यवस्था नहीं है तो कार का खरीदा जाना आपको मुश्किल पैदा कर सकता है।
धनतेरस पर धन जुटाने की चाह में जुआ कदापि न खेलें। आपका यह कर्म माँ लक्ष्मी को नहीं, लक्ष्मी को बड़ी बहन दरिद्राका आपके घर में स्थायी वास करा देगा।
ठीक इसी प्रकार चोरी, डकैती, फिरौती, घटतौली, मिलावटखोरी से कमाया धन भी आपके मन को प्रसन्न रखने के बजाय किसी न किसी अशुभ घड़ी में डाल सकता है और आपके घर दरिद्रता वास कर सकती है, इसलिए धनतेरस के दिन ऐसे अपकार्यों से बचते हुए केवल शुभ ही शुभ कर्म करें और संध्याकालीन रात्रिवेला में घर की देहरी पर दीपक रखकर केवल अपने ही घर तक नहीं, दूसरों के घर तक भी उसके प्रकाश को जाने दें। आपकी देहरी पर रखे दीपक की रोशनी जब गली या दूसरे के घर तक जायेगी तो माँ लक्ष्मी अवश्य ही आपके घर पधारेगीं।
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सम्पर्क- 15/109, ईसानगर, निकट थानासासनीगेट, अलीगढ़
मोबा.- 9634551630


विष का कलश लिये धन्वन्तरि +रमेशराज




विष का कलश लिये धन्वन्तरि

+रमेशराज
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कार्तिक बदी त्रयोदशी को कृष्ण पक्ष में रात को घर की देहरी पर दीप प्रज्वलित कर अँधियारे पर प्रकाश की जीत का शंखनाद करने वाले त्योहार का नाम धनतेरस है। माना जाता है कि समस्त प्राणी जगत की रुग्ण काया का उपचार करने हेतु इसी दिन समुद्र-मन्थन के समय अमृतकलश लेकर वैद्य धनवन्तरि प्रकट हुए थे।
वैद्य धन्वन्तरि ने विभिन्न सरल और जटिल रोगों-व्याधियों के उपचार हेतु अमृत स्वरूपा अनेक औषधियों की खोज की। उपचार के अचूक विधान प्रस्तुत किये। उन जड़ी-बूटियों की पहचान करायी, जिनसे जीवनीशक्ति का ह्रास होने से रोका जा सके। कैंसर, तपैदिक, दमा, मधुमेह जैसी असाध्य बीमारियों को साध्य बनाया। धनवन्तरि लोभी-लालची नहीं थे। चिकित्सा के क्षेत्र में उनका योगदान मंगलकारी और समाजसेवा से ओत-प्रोत है। इसीलिये चिकित्सा के क्षेत्र में उन्हें वह गौरव और अमरता प्राप्त है, जो उन्हें देवतुल्य बनाती है।
आज भी ऐसे अनेक वैद्य या चिकित्सक हैं, जो मानवीय संवेदना से जुड़े हैं। गरीब, असहाय, निराश्रितों का इलाज सहानुभूतिपूर्वक करते हैं। ऐसे चिकित्सकों के चिकित्सालय से कोई भी निराश नहीं लौटता।
परसेवा को समर्पित ऐसे देवतुल्य धन्वतरियों के विपरीत आज ऐसे धन्वतरियों की भी पूरी की पूरी फौज दिखायी होती है, जिनके पास रोगी के लिये गिद्ध दृष्टि उपलब्ध है। मन में लोभ और लालच कुलाँचें भरता है। समाजसेवा के नाम पर समाज का आर्थिक दोहन करने में लगे ऐसे ज्ञानवान डिग्रीधारी ब्रह्मराक्षसों के लिये हर रोगी उनकी ऐसी प्रयोगशाला बन चुका है, जिसमें अनावश्यक अत्याधिक खर्चीली जाँचें सिर्फ धन ऐंठने को करायी जाती हैं। अपने ही अस्पताल में स्थापित की गयी औषधियों की दूकान से मरीज को महँगी से महँगी दवाएँ दी जाती हैं। मरीज का सही उपचार करना इनका उद्देश्य नहीं। ये मरीज और उसके तीमारदारों को  गिद्ध की तरह नोचते रहना चाहते हैं। भले ही समुद्र-मंथन के समय इनके आदि पिता अमृत कलश लेकर प्रकट हुए हों, किन्तु उसी आदि पिता की आधुनिक सन्तानें आज उस अमृत कलश को त्याग कर अपनी आत्मा को एक ऐसे विष कलश से भरे हुए हैं, जिससे रिसकर बाहर निकलने वाली हर बूँद आदमी को स्वस्थ करने के स्थान पर बीमार अधिक बनाती है। इलाज कराने वाला मरीज भले ही अपनी आर्थिक विवशता का रोना रोये, ये बिलकुल नहीं पसीजते। सरकारी डाक्टर भी चोरी-छुपे अपना एक ऐसा अस्प्ताल चलाते हैं, जिसमें मरीज की जेब  को काटा जाता है।
    वैद्य धनवन्तरि के प्रतीक पुत्रों का आलम यह है कि कोई आपरेशन के दौरान मरीज के पेट में केंची, तौलिया छोड़कर पेट सीं देता है तो कोई फंगसग्रस्त ग्लूकोज की बोतलें चढ़ाकर मरीज को मरणासन्न स्थिति में ला देता है। किसी अस्पताल में मरीज की मृत्यु हो जाने के बाद भी आइसीयू में मृत शरीर का दो-दो दिन तक इलाज चलता है तो किसी अस्पताल में गर्भपात और भ्रूणलिंग परीक्षण की वैधानिक चेतावनी का बोर्ड टँगा होने के बावजूद चेतावनी की अवैध तरीके से धज्जियाँ उड़ायी जाती हैं।
कार्तिक बदी त्रयोदशी के कृष्णपक्ष में ऐसे लोभी-लालची आज के धनवन्तरि क्या अपनी देहरी पर ऐसा दीपक रखेंगे जिसकी रौशनी किसी गरीब, असहाय, निराश्रित मरीज तक जा सके? शायद नहीं। यह कार्य तो वही त्यागी, समाजसेवी, दयावान, मंगल भावना से भरे हुए डॉक्टर करेंगे, जिन्हें परसेवा से परमानन्द की प्राप्ति होती है।
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भगवान विष्णु ने कहा-“हम नहीं मनुष्य के कर्म बोलेंगे“ +रमेशराज



भगवान विष्णु ने कहा-“हम नहीं मनुष्य के कर्म बोलेंगे“

+रमेशराज
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नारदजी ने भगवान विष्णु से कहा कि, ‘‘प्रभु आज कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी है। आज के दिन पृथ्वी लोकवासी साक्षात स्वर्ग प्राप्ति के लिये क्या-क्या उपाय कर रहे हैं, उन्हें देखना चाहता हूँ।’’
भगवान विष्णु से आज्ञा पाकर नारदजी पृथ्वीलोक पहुँचे तो देखते हैं कि एक हलवाई सिथेंटिक दूध और नकली खोवा बना रहा है। एक व्यापारी टायरों की प्लास्टिक को पीसकर उससे धूप-बाती बनवा रहा है। एक तस्कर नकली नोटों को बाजार में खपा रहा है। एक नेता नकली दारू खिंचवा रहा है। एक चरमपंथी मानव-बम बनाने के तरीके और धर्म की महत्ता समझा रहा है।
नारदजी पृथ्वीलोक पर जहाँ-जहाँ पहुँचे, वहाँ-वहाँ मानव नामक जन्तु को उन्होंने केवल काली करतूतों में ही लिप्त पाया तो ऋषि का मन भारी दुःख और विषाद से भर गया। वे पुनः बैकुण्ठ धाम पहुंचे और भगवान विष्णु को पृथ्वी लोक का हाल बताया।
भगवान विष्णु ने नारद को समझाया-‘‘ ऋषिवर, यह कलियुग है, कलि अर्थात् पाप का युग। तुमने जिस हलवाई को सिथेंटिक दूध और नकली खोवा बनाते देखा है, उसने मुझे प्रसन्न रखने के लिए एक दर्जन मंदिरों का निर्माण कराया है। जो व्यापारी टायरों की प्लास्टिक पीसकर धूपबत्ती बनवा रहा था, वह अनेक धार्मिक संस्थाओं के अध्यक्ष पद पर विराजमान है। जो तस्कर नकली नोटों को बाजार में खफा रहा है, उसके चार अनाथ आश्रम हैं और आठ नारी-निकेतन बनवा रहा है। नकली दारू का कारोबार करने वाले नेता का भी अनेक मंदिरों में भारी चंदा पहुँचता है। चरमपंथी भी कई धार्मिक संस्थानों से जुड़ा है। आपने पृथ्वीलोक पर जिन-जिन मनुष्यों का सूक्ष्म अवलोकन किया है, वे सब सपरिवार साक्षात स्वर्ग को भोग रहे हैं। आलीशान कोठियाँ, वातानुकूलित कमरे, अनेक सुविधायुक्त वाहन, इनका मन हमेशा प्रसन्न रखते हैं।’’
भगवान विष्णु की बात सुनकर नारद ने सवाल किया-‘‘क्या प्रभु! इनके लिये स्वर्ग के द्वार खोलेंगे?’’
भगवान विष्णु बोले-‘‘हम नहीं, इनके कर्म बोलेंगे।’’
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