ब्लौग सेतु....

16 जुलाई 2014

सच-झूठ पर दोहे -- कुंवर कुसुमेश


सच्चाई फुटपाथ पर, बैठी लहू-लुहान.
झूठ निरंतर बढ़ रहा,निर्भय सीना तान.

उन्नति करते जा रहे,अब झूठे-मक्कार.
होगा जाने किस तरह,सच का बेड़ा पार.

झूठ तुम्हारे हो गए,कितने लम्बे पैर.
सच की इज़्ज़त दांव पर, राम करेंगे खैर.

सच के मुँह तक से नहीं, निकल रही आवाज़.
मगर झूठ के शीश पर,हरदम सोहे ताज.

सच पर चलने की हमें,हिम्मत दे अल्लाह.
काँटों से भरपूर है, सच्चाई की राह.



5 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 17/07/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  2. झूठ तुम्हारे हो गए,कितने लम्बे पैर.
    सच की इज़्ज़त दांव पर, राम करेंगे खैर.

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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    1. अत्यंत कसक , व्यंग , और लाचारियों को व्यक्त करता .. सुंदर काव्य प्रतिभा जी बिलकुल सहमत

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  3. Katu satya zamane ke rang badal gaye hai....jhooth ka sikka chalta hai....

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  4. अति सुंदर , सत्य से ओतप्रोत , अनगिनत असंख्य भाव को दर्शाता अदभूत रूप से मन की तड़प को झलकाता काव्य , मन प्रफुल्लित करता ये काव्य

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