ब्लौग सेतु....

18 मई 2017

तेवरी




|| तेवरी ||
उसकी बातों में जाल नये
होने हैं खड़े बवाल नये |
बागों को उसकी नज़र लगी
अब फूल न देगी डाल नये |
छलना है उसको और अभी
लेकर पूजा के थाल नये |
बिल्डिंग की खातिर ताल अटा
अब ढूंढ रहा वो ताल नये |
आँखों से आँसू छलक रहे
अब और कहें क्या हाल नये |

+रमेशराज 

तेवरी




|| तेवरी ||
खुशियों के मंजर छीनेगा
रोजी-रोटी-घर छीनेगा |
है लालच का ये दौर नया
पंछी तक के पर छीनेगा |
हम जीयें सिर्फ सवालों में
इस खातिर उत्तर छीनेगा |
वो हमको भी गद्दार बता
कबिरा के आखर छीनेगा |
धरती पर उसका कब्जा है
अब नभ से जलधर छीनेगा |
उसको आक्रोश बुरा लगता
शब्दों से पत्थर छीनेगा |

+रमेशराज  

तेवरी




तेवरी 
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सूखा का कोई हल देगा
मत सोचो बादल जल देगा |
जो वृक्ष सियासत ने रोपा
ये नहीं किसी को फल देगा |
बस यही सोचते अब रहिए
वो सबको राहत कल देगा |
ये दौर सभी को चोर बना
सबके मुख कालिख मल देगा |
वो अगर सवालों बीच घिरा
मुद्दे को तुरत बदल देगा |
उसने हर जेब कतर डाली
वो बेकल को क्या कल देगा |

+रमेशराज 

तेवरी




तेवरी 
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गुलशन पै बहस नहीं करता
मधुवन पै बहस नहीं करता
जो भी मरुथल में अब बदला
सावन पै बहस नहीं करता |
कहते हैं इसे न्यूज़-चैनल
ये जन पै बहस नहीं करता |
है इसीलिये वह तहखाना
आँगन पै बहस नहीं करता |
वो बोल रहा है “ ओम शांति “
क्रन्दन पै बहस नहीं करता |
वो करता धड़ से तुरत अलग
गर्दन पै बहस नहीं करता |
वो मौतों का व्यापारी है
जीवन पै बहस नहीं करता |
वो लिए सियासी दुर्गंधें
चन्दन पै बहस नहीं करता |

+रमेशराज  

तेवरी




|| तेवरी ||
जिनको देना जल कहाँ गये
सत्ता के बादल कहाँ गये ?
कड़वापन कौन परोस गया
मीठे-मीठे फल कहाँ गये ?
जनता थामे प्रश्नावलियां
सब सरकारी हल कहाँ गये ?
जो अरि का सर पल में काटें
उन वीरों के बल कहाँ गये ?
क्या सबको सांप सूंघ बैठा
प्रतिपक्षी सब दल कहाँ गये ?
कल तक तो यहाँ कतारें थीं
चौराहों के नल कहाँ गये ?
तुम दानी कर्ण बने क्यों थे
अब कहते कुण्डल कहाँ गये ?

+रमेशराज