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7 अगस्त 2026

रस का सबंध विचार से /रमेशराज

 *रस का संबंध विचार से *

(विवेचनात्मक निबंध )

लेखक -रमेशराज 


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परमपूज्य पिता स्व. लोककवि रामचरन गुप्त के उस सात्विक चिंतन को, जिसके आलोक में मन में सृजनात्मकता का जन्म हुआ

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भूमिका

भावों का सूक्ष्म और व्यापक विवेचन करते हुए रसमर्मज्ञ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं कि 'भावप्रसार के भीतर ज्ञानप्रसार होता है और ज्ञान प्रसार के भीतर भावप्रसार'। रसाचार्य के.के. राजा (वाष्पांजलि, भा.का. सि., पृ.68) इस तथ्य पर जोर देते हैं कि "काव्य का कलापक्ष (विशिष्ट शब्दावली) आश्रय के मन में सीधे घुसकर अर्थनिवेदन करता है।" 

डॉ.नामवर सिंह (कविता के नए प्रतिमान, पृ. 46) यह घोषणा बड़े ही स्पष्ट रूप से करते हैं कि "रसनिर्णय अंततः अर्थनिर्णय पर निर्भर है।" ठीक इसी प्रकार के तथ्यों को डॉ. जगदीश गुप्त अपने 'अर्थ की लय' शीर्षक निबंध में पाठकों के सामने रखते हैं। 

रस के संबंध में अर्थ की सत्ता की स्वीकारोक्ति इस हद तक पहुंच जाती है कि रस की परंपरा से आबद्ध डॉ. नगेन्द्र तो यह घोषणा भी कर देते हैं- 'काव्य या नाट्य प्रस्तुति की आलोचना भी रसात्मक हुआ करती है या रस का अभिषेक आलोचना में भी रहता है (आस्था के चरण, पृ. 91) "क्योंकि मनुष्य का मन किसी वस्तु को ज्यों-की-त्यों ग्रहण करता हुआ नहीं चलता, प्रतिक्रिया करना तो उसका स्वभाव है। (डॉ. राकेश गुप्त का रस विवेचन, पृ. 23)।

उपरोक्त सारे मत, तर्क और तथ्य इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि भाव से लेकर रस की आनंदमयी सत्ता का विचार से कोई-न-कोई नितांत जरूरी और घनिष्ठ संबंध अवश्य है। यह घनिष्ठ संबंध ही किसी काव्य सामग्री या उसके आश्रयों को भावमय और रसमय बनाता है।

रसनिष्पत्ति के बीच विचार की सत्ता रसाभास को जन्म नहीं देती बल्कि काव्य या आश्रयों को रसमय बनाने में अपनी अहं भूमिका निभाती है।

विचारभाव के जनक या पिता होते हैं। अतः काव्य या आश्रय में स्वादी पात्र जैसी कोई स्थिति नहीं होती है जो विचार मन में या काव्य में स्थायित्व ग्रहण कर लेता है अर्थात् सबसे ज्यादा बलशाली बन जाता है यह विवार ही भाव को स्थायी भाव के रूप में ऊर्जस्व बना देता है।

भाव एक प्रकार की ऊर्जा के प्रतीक होते हैं। अनुभाव उनका हर रकार से शक्ति प्रदर्शन होती है। विचार कर का कार्य करते हैं जिससे ऊर्जा पैदा होती है, इस ऊर्जा का दूसरा नाम भाव है।

 जब हम निहत्थे जंगल से गुजर रह होते हैं और यकायक हमारे सामने शेर आ जाता है, तो हमारे रोम-रोम में भय का संचार हो जाता है। जब हम जंगल से शिकार पर बंदूक लेकर गुजर रहे होते हैं और एकाएक हमारे सामने शेर आ जाता है तो हम बड़े ही साहसपूर्वक उसे मार डालने के लिए बंदूक तान लेते हैं। शेर जब पिंजरे में होता है तो हम बड़ी ही उत्सुकता से उसे निहारते हैं, उसकी गुर्राहट सुनना पसंद करते है। पहली स्थिति में हमारे मन में यह विचार घर कर जाता है कि हम निहत्थे हैं और शेर हमें खा जाएया, अतः हम भयग्रस्त हो उठते हैं। दूसरी स्थिति में हमारे मन में यह विचार होता है कि हमारे हाथ में बंदूक है, इसकी एक गोली ही शेर का खात्मा कर देगी, और हम बड़े ही साहस के साथ उसकी हत्या करने में जुट जाते हैं। तीसरी स्थिति में हमारे मन में यह विचार रहता है कि शेर पिंजरे में है यह हमें अब किसी भी प्रकार को हानि नहीं पहुंचा सकता, इसके साथ-साथ शेर के प्रति हमारे पूर्वानुभव पढ़े, लिखे या स्वयं भोगे हुए भी काम करते हैं कि शेर एक घातक जंतु है, एक झपट्टे में किसी भी प्राणी के प्राण ले लेता है। इन सब बातों से शेर को नजदीक से देखने की उत्सुकता जागृत हो जाती है और हमारे भीतर अद्‌भुत रस का संचार हो जाता है। 

आलंबन विभाव के रूप में एक ही शेर के प्रति विचारधाराओं में विभिन्न परिवर्तन आने के कारण यह रसांतर काबिले गौर है, यह सबकुछ विचार की भूमिका पर निर्भर है। उक्त प्रकरण से एक बात और साफ हो जाती है कि महत्वपूर्ण आलंबन विभाव नहीं होता, महत्वपूर्ण होते हैं आलंबन विभाव के गुणधर्म। जिन्हें रसाचायों ने उद्दीपन विभाव के अंतर्गत रखा है। जो आश्रय के अर्थ निर्णय अनुसार आश्रय में रसानुभूति का आलोक पैदा करते हैं।

यह व्याख्या काव्येतर होने के बावजूद काव्य पर भी इसलिए लागू होती है क्योंकि क्यी के अधिकांश स्थलों में इन घटनाओं का सृजन भी ठीक इसी प्रकार होगा, इससे अलग भी अगर कोई स्थिति दर्शायी या समाविष्ट की जाती है तो विचार अपनी भूमिका ठीक उपरोक्त उल्लेखानुसार निभाएगा। श्रक कस कायाकोतरारीनगरे अक्षय का प्रतीक क्षेया।

दुर्भाग्य यह है कि रस की परंपरागत परिपाटी से बंधकर वर्तमान संघर्षशील चुनौतीपूर्ण यथार्थोन्मुखी और जनवादी काव्य का मूल्यांकन किया जाता है, तो इस प्रकार के काव्य को रसहीन घोषित कर दिया जाता है।

जब आचार्य शुक्ल, डॉ. नामवर, डॉ. जगदीश गुप्त, डॉ. राकेश गुप्त, डॉ. नगेन्द्र 'रसनिर्णय' में अर्थनिर्णय की भूमिका को जानते, पहचानते थे तो होना तो यह चाहिए था कि वे इसे आधार मानकर रस में विचार की भूमिका का समावेश कराते। अगर ऐसा हो जाता तो आधुनिक कविता रसाभास, रसहीनता जैसी स्थितियों से अवश्य उबर जाती और इसका परिणाम यह होता है कि काव्य में विचार-प्रधान कविता के लिए 'बुद्धि रस' जैसे शिगूफे भी सामने न आते। हां, इसके लिए कुछ नए रसों की खोज अवश्य करनी पड़ती। यह कार्य भी कोई अटपटा अशास्त्रीय नहीं होता क्योंकि रस परंपरा में रसाचार्यों ने आगे चलकर कई नए रसों को जोड़ा है। रस तालिका पहले भी अधूरी धी और आज भी अधूरी है।

इस पुस्तक का उद्देश्य रस के संबंध में विचार की भूमिका को तो स्पष्ट करना है ही, इसके साथ-साथ रस तत्त्वों के रूप में नए रसों की ओर संकेत करना भी है। आधुनिक काव्य के रसात्मकबोध को स्पष्ट करने के लिए कौन-कौन-से रसतत्त्व या रस हैं, उनका जिक्र 'विचार और रस' नामक अपनी अगली पुस्तक में किया जाएगा।

यह पुस्तक पाठकों, रस मर्मज्ञों के ज्ञान में यदि थोड़ी-सी भी वृद्धि कर सकी या रस' को समझने में तनिक भी सहायक हो सकी, यह मेरे लिए गर्व का विषय होगा।

- रमेशराज







*यथार्थवादी के रस-तत्त्व* 

+रमेशराज

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    काव्य के रसात्मक-विवेचन को लेकर आदि आचार्य भरतमुनि ने काव्य के लिये, जिस भाव-सत्ता को रस-निष्पत्ति के सूत्र में पिरोया था, वह भाव-सत्ता, रस-तत्त्वों के रूप में [ रति, शोक,हास, क्रोध, निर्वेद, वत्सल, भक्ति आदि स्थायी भावों के संचारी भावों सहित ] न पहले पूर्ण थी, न अब है। अतः भावों के रूप में रस-तत्त्वों की इस अपूर्ण तालिका के आधार पर ही काव्य की सम्पूर्ण रसात्मक सामग्री को परखा जाना अशास्त्रीय और कोरा कल्पनामय ही सिद्ध होगा। रीतिकालीन काव्योपरांत कविता ने जिस प्रकार अपनी वैचारिक प्रक्रिया को बदला है, उससे उसकी रस-प्रक्रिया भी परम्परागत रस-प्रक्रिया से काफी भिन्न हो गयी है। उसमें रस-तत्त्व के रूप में ऐसे अनेक भाव जुड़ गये हैं, जिनको पहचाने बिना वर्तमान यथार्थोन्मुखी कविता का रस-विवेचन नहीं किया जा सकता।

    वर्तमान कविता की स्थिति यह है कि एक तरफ जहां इसमें लोक या समाज की पीडि़त, शोषित, दलित, आतंकित, संत्रस्त, भयातुर अवस्था का अनुभव इसे शोक और करुणा से सराबोर किये रहता है, वहीं लोक या समाज को हानि पहुंचाने वाले वर्ग के प्रति इसकी भावात्मकता इसे ‘असंतोष’, ‘आक्रोश’, ‘विरोध’, ‘विद्रोह’ आदि से सिक्त रहती है।

अतः वर्तमान यथार्थोन्मुखी कविता को जिन रस-तत्त्वों के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है, वह परम्परागत रस तत्त्वों के साथ-साथ नये रस तत्त्वों के रूप में निम्न ठहरते हैं-

1.करुणा-

काव्य के संदर्भ में करुणा एक ऐसा रस-तत्त्व है, जिसका सम्बन्ध लोक या मानव की शोकाकुल दशाओं, भाव-भंगिमाओं के माध्यम से दर्शायी गयी दुःखानुभूति से होता है। इस दुःखानुभूति को एक कवि या रचनाकार उन अनुभवों से प्राप्त करता है जो लोक या जगत की पीड़ा, छटपटाहट, शोषण, यातना, त्रासदी, तनाव, क्षोभ, अश्रुपात आदि से जुड़े होते हैं। लेकिन यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह दुःखानुभूति को दुःखानुभूति के रूप में सुरक्षित नहीं रखना चाहता, अपितु उसे हर हालत में सुखात्मक बनाना चाहता है। कवि-कर्म में यह दुःखानुभूति ‘लोक-रक्षा के विचार’ से अभिसिक्त होकर प्रकट होती है। दुःखानुभूति में जुड़े ‘लोक-रक्षा’ के विचार से उत्पन्न भाव या तत्त्व का नाम ही ‘करुणा’ है। वर्तमान यथार्थोंन्मुखी कविता का करुणा एक ऐसा प्रधान रस-तत्त्व है, जिसका बीज-रूप अपनी विकास या गति की अवस्था में काव्य की हर प्रकार की रस-प्रक्रिया का अंग बनता चला जाता है। काव्य में आये अन्य प्रकार के रस-तत्त्व जैसे दया आदि भाव भी करुणा के इस बीज-रूप से किसी न किसी रूप में अपना सम्बन्ध बनाये रहते हैं। कुल मिलकार करुणा एक ऐसा बीज-भाव या प्रधान रसतत्त्व है, जिसका यदि दुःखानुभूति से सीधा-सीधा सम्बन्ध है तो लोक को पीड़ा-यातना देने वाले वर्ग के प्रति उभरे क्षोभ, असंतोष, आक्रोश, विरोध, विद्रोह आदि भावों के मूल में भी यही करुणा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से अपनी मुख्य भूमिका निभाती है।

    अतः वर्तमान यथार्थोंन्मुखी कविता की रस-प्रक्रिया को समझने के लिये शोषित वर्ग के प्रति, कवि के उन रागात्मक सम्बन्धों को समझना नितांत आवश्यक है जो परोक्ष-अपरोक्ष करुणा से सिक्त रहते हैं।

2. आक्रोश-

वर्तमान कविता में रसतत्त्व के रूप में ‘आक्रोश’ एक ऐसा भाव है, जो क्रूर-अमानवीय व्यवस्था के शिकार लोक या मानव की उस आन्तरिक दशा का परिचय देता है, जिसमें दलित या पीडि़त वर्ग, शोषक और आताताई वर्ग के प्रति घृणा, अनास्था, विरति आदि के लावे से भरा हुआ ज्वालामुखी बन जाता है। लेकिन यह लावा रौद्रता के रूप में उफन कर बाहर नहीं आता। दलित, पीडि़त वर्ग की इस प्रकार की भाव-दशा के अनुभाव उसकी सुर्ख आंखों, अनवरत चुप्पी, तमतमाते चेहरे, तनी हुई मुट्ठियों आदि के रूप में साफ-साफ अनुभव किये जा सकते हैं। डॉ. स्वर्ण किरण के अनुसार-‘आक्रोश वस्तुतः व्यक्ति की आन्तरिक घृणा का मूर्त्तरूप है’;1

    ‘‘हमारे साथ अन्याय हो रहा है, हम इस अन्याय को कब तक झेलते रहें? अब अन्यायी का खत्मा होना ही चाहिए’’ जैसे अनेक विचार अपनी ऊर्जस्व अवस्था में उक्त भाव का निर्माण करते हैं। कुल मिलाकर क्रोध से अलग, आक्रोश मानव की एक ऐसी भावत्मक दशा है, जिसमें क्रोध सिर्फ आन्तरिक अवस्था तक ही सीमित रहता है। रौद्रता के रस-परिपाक के रूप में यह दशा कभी भी परिलक्षित नहीं होती।

    वस्तुतः आक्रोश का रसात्मक-बोध ऐसे ‘विरोध’ को प्रकट करता है जिसका रस परिपाक ‘वचनों की कटुता, शत्रुपक्ष की निन्दा, भर्त्सना, कोसने का सतत् क्रम जैसे अनेक अनुभावों के माध्यम से अनुभूत किया जा सकता है।

सारांश रूप में हम कह सकते हैं कि ‘शत्रु के निरन्तर आघात, प्रहार झेलने के बावजूद, शत्रु को नष्ट न कर पाने की विवशता के विचार से उत्पन्न ऊर्जा का नाम ‘आक्रोश’ है।

3. विरोध-

पीड़ादायक, यातनामय हालात से जन्य ‘आक्रोश’ की वैचारिक प्रक्रिया जब त्रासद हालात से उबरने के लिए नयी दशा ग्रहण करती है तो इस वैचारिक प्रक्रिया के द्वारा एक नये रस-तत्त्व का निर्माण होता है जिसे ‘विरोध’ कहा जाता है। आक्रोश का उद्भव विवशता, भय, छटपटाहट आदि की स्थिति में होता है, जबकि ‘विरोध’ की वैचारिक प्रक्रिया में साहस नामक तत्त्व और जुड़ जाता है। या हम यह भी कह सकते हैं कि आक्रोश का आगे का चरण ‘विरोध’ है। मन इस विरोध की स्थिति में [लगातार आक्रोशित रहने के कारण] पीड़ा देने वाले वर्ग के प्रति साहस के साथ उसका मुकाबला करने के लिए तैयार होने लगता है। उक्त तथ्यों को ‘दर्शन बेजार’ की निम्न तेवरी के माध्यम से इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

‘‘कह रहा हूं विवश हो ये तथ्य में

पल रही है वेदना आतिथ्य में।

जो विदूषक मंच पर हंसता रहा

सिसकियां भरता वही नेपथ्य में।

नर्तकी के पांव घायल हो रहे

देखता एय्याश कब यह नृत्य में।

सिर्फ समझौता नहीं है जि़दगी

एक जलती आग भी है सत्य में।

आदमी को अर्थ दे जीने के जो

लाइए तासीर ऐसी कथ्य में।’’

    उपरोक्त तेवरी में एक सामाजिक या आश्रय के रूप में कवि, आलम्बनगत उद्दीपन विभाव [सामाजिक विकृतियां, विसंगतियां] से उत्पन्न क्षोभ, शोकादि के माध्यम से जिन तथ्यों को उजागर करने के लिए विवश हुआ है, वह-विवशता उसके मन में उद्बुद्ध आक्रोश की परिचायक है, जिसमें साहस जैसा तत्त्व जुड़ जाने के कारण ‘विरोध’ का रस-परिपाक स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है।

    आश्रय के रूप में कवि जब एक विदूषक की मंच और नेपथ्य की जि़न्दगी के बीच एक त्रासदी अनुभव करता है तो उसे लगता है कि कहीं न कहीं ऐसा कुछ जरूर घट रहा है जिसमें आदमी को अपने भीतर एक संग्राम झेलते हुए भी मंच पर हंसने का नाटक करना पड़ रहा है। ठीक इसी तरह की स्थिति उस नर्तकी की भी है, जिसे किसी न किसी मजबूरी ने नृत्य करने पर विवश किया है। स्थिति यह है कि नृत्य के दौरान उसके पांव घायल हो चुके हैं, लेनिक नृत्य का आनंद भोगने वाले एय्याश को इतनी फुर्सत कहां कि नर्तकी के घायल होते हुए पांव देख सके। विदूषक और नर्तकी के प्रति करुणा-भरी दृष्टि रखने वाले कवि में, जीवन की विभिन्न स्तरों पर घटने वाली इस त्रासदी की अर्थमीमांसा यहां उसे मात्र आक्रोश से ही सिक्त नहीं कर रही है, बल्कि कवि के मन का यह आक्रोश उसे विवश जीवन के उन बिन्दुओं पर भी लाकर खड़ा कर रहा है, जिसमें जीवन का अर्थ मात्र एक समझौता या विवशता ही बनकर न रह जाए, बल्कि सत्य में जलती ऐसी आग भी हो जो असत्य को जला सके। इसके लिए जरूरी यह है कि कथ्य अर्थात कर्म में ऐसी तासीर लायी जाये, जो जीवन को त्रासदियों के दमघोंटू माहौल से उबार सके।

    आक्रोश से आगे की यह वैचारिक प्रक्रिया जिस विचार को ऊर्जस्व बनाती है, उसका उद्बोधन यहां भाव के रूप में ‘विरोध’ को ध्वनित करता है। विरोध की यह ऊर्जा ‘जो कुछ घट रहा है, गलत घट रहा है और ऐसा कुछ घटना नहीं चाहिए’ के रूप में कवि के मानसिक तंतुओं को उद्वेलित करती है और इसी कारण कवि जीवन को नये अर्थ देने के लिये कथ्य में सत्योन्मुखी तासीर लाने का आह्वान करता है।

    उक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि रस तत्त्व के रूप में ‘विरोध’ आश्रय को अपनी वैचारिक प्रक्रिया के दौरान जिस प्रकार ऊर्जस्व बनाता है, उसके माध्यम से गलत आचरणों के प्रति मात्र वह आक्रोशित ही नहीं रहता, बल्कि ‘हर गलत’ के प्रति जूझने या साहस दिखाने के लिए प्रेरित भी करता है।

4. असंतोष-

हम सब [सामाजिक प्राणी होने के नाते] एक दूसरे के प्रति कोई न कोई अपेक्षा रखते हुए जीते आ रहे हैं। जब कोई मनुष्य अपनी अपेक्षा के अनुकूल दूसरी मनुष्य को व्यवहार करता हुआ नहीं पाता है तो पहले मनुष्य में दूसरे मनुष्य के व्यवहार के प्रति ‘असंतोष’ का भाव जाग्रत हो जाता है। अपेक्षाओं के स्तर पर असंतोष की इस प्रक्रिया का स्वरूप हमें समाज के कई स्तरों पर दिखायी देता है। उद्योगपतियों से जिस प्रकार अच्छा या अधिक वेतन या अनेक सुविधाएं पाने की अपेक्षा मजदूर वर्ग रखता है, ठीक इसी प्रकार की अपेक्षाएं सरकार से सरकारी कर्मचारी रखते हैं। उद्योगपतियों या सरकार द्वारा उचित या अधिक वेतन न दिये जाने पर मजदूर या सरकारी कर्मचारियों की आये दिन होती हड़तालों, प्रदर्शनों में व्याप्त असंतोष को स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। ‘‘ जो कुछ हमें मिल रहा है या सुविधा के नाम पर प्राप्त हो रहा है, वह उचित और पर्याप्त नहीं है’’ जैसे अनेक विचारों से निर्मित होने वाला असंतोष आज की कविता में महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण किये हुए है। इस असंतोष की स्थिति आक्रोश से निम्न संदर्भों में भिन्न है-

[क] आक्रोश की स्थिति में आश्रयों के मन के भीतर विवशता, भय और दुःख का समावेश हर स्थिति में रहता है जबकि असंतोष रसपरिपाक तक जब पहुंचता है तो उससे भय की सत्ता समाप्त हो जाती है।

[ख] आक्रोश में कटुवचनों का प्रयोग, शत्रुपक्ष की निन्दा, भर्त्सना या शाप देने, कोसने आदि की क्रिया विवशता, असहायता, निरुपायता तक ही सीमित रह जाती है, जबकि असंतोष में विवशता या असहायता मन को जब उद्वेलित या अशांत बनाती है तो शत्रुपक्ष के प्रति हर प्रकार का संघर्ष, चुनौती और साहस में तब्दील हो जाता है।

[ग] आक्रोश और असंतोष की रस-परिपाक सम्बन्धी अवस्था ऊपरी तौर पर एक जैसी भले ही लगें, किन्तु यदि हम सूक्ष्मता के साथ विवेचन करें तो रस-परिपाक तक पहुंचते-पहुंचते ‘असंतोष’ अवज्ञा ललकार, चुनौती में अनुभावित होता है तथा ‘विद्रोह’ का उद्बोधन कराता है, जबकि आक्रोश की स्थिति अवज्ञा, ललकार, चुनौती तक पहुंचने के लिये ‘विरोध’ के रूप में सांकेतिकता में ऊर्जस्व होती है। अर्थ यह कि आक्रोश का रस-पारिपाक  शत्रुपक्ष या कुव्यवस्था से टकराने, जूझने का जहां एक दिशा-संकेत-भर होता है, वहीं ‘असंतोष’ का रस पारिपाक जूझने, टकराने, चुनौती देने, ललकारने जैसी अनेक क्रियाओं का अनुभावन बन जाता है।

रसतत्त्व के रूप में ‘असंतोष’ को श्री योगेन्द्र शर्मा की तेवरी के माध्यम से इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

सर पै बस आकाश की ही छत मिली

जि़न्दगी को इस तरह राहत मिली।

एक सुविधा इस तरह से दी गयी

हर किसी की भावना आहत मिली।

    ‘असंतोष’ के संदर्भ में यदि हम उक्त पंक्तियों का विवेचन करें तो कवि ने यहां आम आदमी की उस जि़न्दगी का जिक्र किया है जिसे आवास के नाम पर कुछ भी नहीं दिया गया है। वह आज भी फुटपाथों पर खुले आकाश के नीचे जाड़ा-पाला, ओला, वर्षा, धूपादि की मार सहते हुए जी रहा है। इसी कारण इस कथित या महज क़ाग़जों पर दी गयी सुविधा ने उसकी भावनाओं को असंतोष से भर डाला है। भावना को ‘आहत’ बताकर दर्शाया गया यह असंतोष कोयले की खानों के बीच कोयला होते मजदूरों को यदि क्रान्ति के लिए प्रेरित कर उठे तो क्या आश्चर्य-

‘कोयल-सी जिन्दगी अब तक जिये हैं

खान के मजदूर जैसे हम रहे हैं।

जब कभी भी क्रान्ति बोयी है समय ने

तिलमिलाते-सोच के पौधे उगे हैं। [गजेन्द्र बेबस]

    तात्पर्य यह कि असंतोष एक ऐसा रसतत्त्व है, जो अपनी ऊर्जस्व अवस्था में मन को इतना उग्र बना डालता है कि लोक या मानव क्रान्ति के लिये विद्रोह से सिक्त होने लगता है।

विद्रोह-

सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक व्यवस्था के समीकरण जब लोक या जगत में असफल या असन्तुलित होने लगते हैं, मनुष्य के अथक प्रयास, संघर्ष आदि के उपरांत भी जब कोई वांछित या अपेक्षित हल नहीं निकल पाता तो असंतुलित समीकरणों से जूझते सामाजिक प्राणी अपने भीतर पनपी असंतोष और अशान्ति की अवस्था को समाप्त करने के लिये [उस हर प्रकार की व्यवस्था, जो उन्हें तोष प्रदान नहीं कर पाती] में परिवर्तन या बदलाव तीव्र इच्छा रखने लगते हैं। परिवर्तन की यह तीव्र इच्छा अपनी विभिन्न प्रकार की वैचारिक प्रक्रियाओं से गुजरते हुए, सिर्फ इस निर्णय की प्रक्रिया बनकर रह जाती है कि ‘अब सीधी अंगुली से घी नहीं निकलने वाला, अर्थात् इस व्यवस्था को बदलने के लिये इसके व्यवस्थापकों से टकराने, युद्ध करने, उनके आदेशों की अवज्ञा करने के अलावा कोई चारा नहीं।’’

    परिवर्तन की तीव्र इच्छा रखने वाली यह वैचारिक प्रक्रिया अपनी उर्जस्व अवस्था में ‘विद्रोह’ नाम से जानी जाती है। व्रिदोह का यह वैचारिक स्वरूप जितना तर्कसंगत, मानवसापेक्ष और लोकहितकारी होगा, उतना ही सत्य शिव और सौन्दर्य की वास्तविक स्थापना के निकट होगा। मार्क्सवादी विचारधारा के तहत रूस में हुआ सशस्त्र विद्रोह, जिसे क्रान्ति के नाम से जाना गया, निस्संदेह मानव मूल्यों की स्थापना पर आधारित था। ठीक इसी प्रकार का विद्रोह सरदार भगतसिंह, चन्द्रशेखर, सूर्यसेन, अशफाक आदि ने अंग्रेजों की आताताई व्यवस्था के विरुद्ध किया था, जिसके मूल में अंग्रेजों की कथित लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति भारतीय जनता का वह असंतोष था, जो विद्रोह के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकार की क्रिया, प्रक्रिया से हल या समाप्त नहीं हो सकता था। लेकिन हमारे राष्ट्र का दुर्भाग्य, क्रान्तिकारियों के सपने साकार न हो सके। आजादी के नाम पर यहां के तस्करों, सेठों, चोर, उचक्कों को आजादी मिली। परिणाम सामने है, जिस प्रकार असंतोष भारतीय जनता में अंग्रेजों की साम्राज्यवादी व्यवस्था के प्रति था, ठीक उसी प्रकार का असंतोष इस वर्तमान व्यवस्था के प्रति जन समुदाय में परिलक्षित होने लगा है। अन्ना हजारे की व्यवस्था को बदलने की मुहिम असंतोष का वर्तमान में सटीक उदाहरण माना जा सकता है।

    साहित्य चूकि समाज का दर्पण होता है, इसलिये आज की कविता वर्तमान व्यवस्था के प्रति असंतोष से सिक्त होने के कारण विद्रोह का स्वर मुखरित कर रही है। तेवरी चूंकि जन मूल्यों, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था रखने वाली काव्य की विधा है, अतः वर्तमान व्यवस्था के प्रति इसका रसात्मकबोध विद्रोह से सिक्त न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। श्री अनिल कुमार ‘अनल’ अपनी एक तेवरी में विद्रोह का परिचय इस प्रकार देते हैं-

देश भर में अब महाभारत लिखो

आदमी को क्रान्ति के कुछ खत लिखो।

बाग में अब चहचहाहट है नहीं

हर परिन्दा है यहां आहत लिखो।

होने लगा आक्रोश लोगों में युवा

बाजुओं में आ गयी ताकत लिखो।

एक पगड़ी-सा उछाला है जिसे

अब नहीं जायेगी वह इज्जत लिखो।

खेलना अंगार से हर दौर में

है हमारी आज भी आदत लिखो।

    तेवरी के संदर्भ में रसतत्त्वों की यह खोज मात्र करुणा, आक्रोश, विद्रोह, असंतोष और विद्रोह तक ही सीमित नहीं रह जाती, इसके अतिरिक्त भी ऐसे अनेक रसतत्त्व तेवरी में उपस्थित होते हैं, जो इस विधा को उर्जस्व बनाये रखने में अपना सहयोग देते हैं, लेकिन इन सहयोगी रसतत्त्वों की व्यापकता में न जाते हुए हम सिर्फ इतना ही कहना चाहेंगे कि जिन तत्त्वों की विवेचना हमने इस आलेख में की है, यह रस तत्त्व वर्तमान कविता या तेवरी के प्रधान रसतत्त्व हैं, जिन्हें पहचाने बिना आधुनिक कविता के रसात्मकबोध को नहीं समझा जा सकता।

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+रमेशराज गुप्त 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001





इक्कीसवीं सदी की कविता में रस

   +रमेशराज 

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हिन्दी कविता के नवें दशक का यदि परम्परागत तरीके से रसात्मक विवेचन करें तो कई ऐसी अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है कि  जिनके रहते रस की परम्परागत कसौटी या तो असफल सिद्ध होगी या परख के नाम पर जो परिणाम मिलेंगे, वह वर्तमान कविता का सही और सारगर्भित रसात्मक आकलन नहीं माने जा सकते। अतः जरूरी यह है कि आदि रसाचार्य भरतमुनि के रसनिष्पत्ति सम्बन्धी सूत्र-‘विभावानुभाव व्यभिचारे संयोगाद रस निष्पत्तिः’ में अन्तर्निहित भावसत्ता का वैचारिक विवेचन किया जाये और यह समझा जाये कि भाव का उद्बोधन किस ज्ञान या बुद्धि अवस्था में होता है। रस को गूंगे का गुड़ बनाकर परोसने से जो गूंगे नहीं है, उनके प्रति तो अन्याय होगा ही।

    वर्तमान कविता पर अक्सर यह आरोप लगाये जाते हैं कि यह कविता विचार प्रधान होने के कारण भावविहीन है | इसमें किसी प्रकार का रस.परिपाक सम्भव नहीं। यह तर्क ऐसे रसमीमांसकों का है, जो रस की अपूर्णता में ही पूर्णता का भ्रम पाले हुए हैं और भाव तथा रस की रट लगाये हुए हैं। उनके मन को यह मूल प्रश्न कभी उद्वेलित नहीं करता कि यह भाव किसके द्वारा और किस प्रकार निर्मित होकर रस.अवस्था तक पहुंचता है। रसों की तालिका में किसी नये रस की बढ़ोत्तरी भी नहीं करना चाहते हैं। जबकि आदि आचार्य मुनि ने जो रसतालिका प्रस्तुत की उसमें बाद में चलकर अनेक रस जोड़े गये। ऐसा इस कारण है कि आज के कथित रसमर्मज्ञ रस के प्रति चिंतक कम, व्यावसायिक ज्यादा हैं। उन्हें इधर.उधर से सामग्री इकट्ठा कर पुस्तक छपवाने और पैसा कमाने में रूचि अधिक है। मौलिक चिन्तन के प्रति उनका रूझान न बराबर है।

    बहरहाल यह तो निश्चित है कि चाहे कविता का परम्परागत स्वरूप रहा हो या कविता का बदला हुआ वर्तमान स्वरूप, सबके भीतर रस की धारा झरने की तरह फूटकर, कल.कल नाद करती हुई नदी बनकर बहती है और हर एक सुधी पाठक के मन को आर्द्र करती है। परम्परागत कविता के रसात्मक आकलन के लिये तो हमारे पास एक बंधी-बंधाई कसौटी है, लेकिन वर्तमान कविता के रसात्मकबोध का हमारे पास कोई मापक नहीं। इसका सीधा.सीधा कारण यह है कि वर्तमान कविता में सामान्यतः उन रसों की निष्पत्ति नहीं होती, जो हमारे पूर्ववर्ती रसाचार्यों द्वारा गिनाये गये हैं। और हम नये रसों की खोज करने में आजतक सामर्थ्यवान नहीं हो पाये हैं। इसलिये अपनी खीज मिटाने के लिये हम तपाक से एक जुमला उछाल देते हैं कि-वर्तमान कविता तो विचार प्रधान कविता है | इसमें भावोद्बोधन का मधुर प्लावन कहां ? वर्तमान कविता को विचार प्रधान कविता सिद्ध करने वालों की महान रसात्मक बुद्धि को पता ही नहीं कि भाव विचार की ऊर्जा होते हैं।

    विचार के बिना भाव का निर्माण किसी प्रकार न पहले सम्भव था और न अब है। यदि परशुराम की ज्ञानेन्द्रियों को यह विचार न उद्वेलित करता कि राम ने शिव का धनुष तोड़ दिया है, तो कैसा क्रोध और किस पर क्रोध। यदि रावण को यह विचार न मंथता कि लक्ष्मण और राम ने उसकी बहिन सूपनखा को अपमानित किया है, तो क्रोध के चरमोत्कर्ष के कैसे होते रावण में दर्शन। यदि राम के मन को यह विचार न स्पर्श न करता कि उनके अनुज को मेघनाद ने मूर्छित कर दिया है और यदि समय रहते चिकित्सा न हुई तो लक्ष्मण का प्राणांत हो सकता है, तो कैसा विलाप,  कैसा शोक।

    अस्तु! विचार के बिना किसी भी प्रकार के भाव का निर्माण सम्भव नहीं। यदि भावोद्बोधन नहीं तो कैसी रसनिष्पत्ति और कैसा रस ? जब रस का मूल आधार विचार ही है तो हम आज की कविता को मात्र वैचारिक कहकर रस के मूल प्रश्न से किनारा कर ही नहीं सकते। इसलिये जरूरी है कि यदि वर्तमान कविता पूर्ववर्ती रसाचायों द्वारा गिनाये गये रसों के आधार पर परखी नहीं जा सकती तो कुछ नये रसों को खोज की जानी चाहिए। वैसे भी यह कोई अप्रत्याशित और अरसात्मक कदम नहीं होगा | क्योंकि आचार्य भरतमुनि द्वारा गिनाये रसों में भी शांतरस, भक्तिरस जैसे कई रसों की बाद में जोड़ा गया है।

    बात चूंकि नवें दशक की कविता के संदर्भ में चल रही है तो मैं यह निवेदन कर दूं कि नवें दशक की कविता की चर्चित विधा ‘तेवरी’ में मैंने अपनी पुस्तक ‘तेवरी में रससमस्या और समधान’ में  दो नये रस विरोधरस और विद्रोहरस की खोज की है जिनके स्थायी भाव क्रमशः ‘आक्रोश’ और ‘असंतोष’ बताये हैं। वर्तमान कविता जिन वैचारिक प्रक्रियाओं से होकर गुजर रही हैए ‘तेवरी’ भी उसी वैचारिक प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है। अतः यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि तेवरी में जिन रसों का उद्बोधन होता है, वही रस वर्तमान कविता में भी उद्बोधित होते हैं।

    कविता में विरोध और विद्रोह रस की निष्पत्ति किस प्रकार और कैसे होती है, इसे समझाने के लिये ‘नवें दशक’ की कुछ कविताओं के उदाहरण प्रस्तुत हैं-

1. विरोध रस-इस रस का मुख्य आलम्बन वर्तमान व्यवस्था या उसके वह अत्याचारी शोषक और आतातायी पात्र हैं, जो शोषित और पीडि़त पात्रों को अपना शिकार बनाते हैं। आलम्बन के रूप में वर्तमान व्यवस्था या उसके पात्रों के धर्म अर्थात् आचरण को देखकर या अनुभव कर दुखी शोषित त्रस्त पात्र जब अपने मन में लगातार त्रासदियों को झेलते हुए यह विचार लाने लगते हैं कि वर्तमान व्यवस्था बड़ी ही बेरहम, अलोकतांत्रिक और गरीबों का खून चूसने वाली व्यवस्था है, तो यह विचार अपनी ऊर्जस्व अवस्था में अपने चरमोत्कर्ष पर ‘आक्रोश’ को जन्म देता है। विभिन्न प्रकार की वैचारिक प्रक्रियाओं से गुजरकर बना यह स्थायी भाव ही ‘विरोध’ को रस की परिपक्व अवस्था तक ले जाता है-

‘उत्तर प्रदेश की हरिजन कन्या हो

या महाभारत की द्रौपदी

दोनों में से किसी का अपमान देखने वाला

चाहे वह भीष्म पितामह हो

या गुरु द्रोणाचार्य या चरणसिंह

मेरे लिये धृतराष्ट्र ही हैं।‘

    ‘विरोध’ शीर्षक से साहित्यिक पत्रिका ‘काव्या’ के अप्रैल.जून.90 [सं- हस्तीमल हस्ती] में प्रकाशित श्री विश्वनाथ की उक्त कविता का यदि हम रसात्मक विवेचन करें तो इस कविता में उत्तर प्रदेश की हरिजन कन्या या महाभारत में हुए द्रौपदी के अपमान को सुनकर, देखकर या अनुभव कर आश्रय रूपी कवि का मन मात्र ऐसे धृतराष्ट्रों के प्रति ही आक्रोश से सिक्त नहीं होता जो आंखों से अंधे हैं। उसके मन में ऐसी वैचारिक ऊर्जा सघन होती है जो भीष्म पितामह से लेकर गुरु द्रोणाचार्य, यहां तक कि  किसान नेता चरणसिंह के प्रति भी ‘आक्रोश’ को जन्म देती है। कारण-कवि के मन में यह विचार कहीं न कहीं ऊर्जस्व अवस्था में है कि धृतराष्ट्र की तरह ही सब के सब नारी अपमान के प्रति आंखें मूदे रहे हैं। ‘नारी अपमान को अनदेखा करने का यह विचार’ कवि को जिस आक्रोश से सिक्त कर रहा है, यह आक्रोश ही विरोधरस का वह परिपाक है, जिसकी रसात्मकता आत्मीयकरण की स्थिति में सुधी पाठकों को आक्रोश से सिक्त कर धृतराष्ट्रों के विरोध की और ले जायेगी।

2. विद्रोह रस- विरोधरस का मूल आलम्बन भी व्यवस्था और उसके वह पात्र होते हैं जो शोषित दलित पात्रों की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते। उनकी सुविधाओं पर ध्यान नहीं देते। परिणामतः मेहनतकश, दलित, शोषित वर्ग में ‘असंतोष’ के ज्वालामुखी सुलगने लगते हैं। ‘असंतोष’, ‘विद्रोह रस’ का स्थायी भाव है। इसके संचारी भावों में दुख, अशांति, क्षोभ, आक्रोश, खिन्नता, उदासी आदि माने जा सकते हैं। इस रस के मुख्य अनुभाव-अवज्ञा, ललकार, चुनौती, फटकार आदि हैं-

तुहमतें मेरे न सर पर दीजिए

झुक न पायेगा कलम कर दीजिए।

सत्य के प्रति और भी होंगे मुखर

आप कितने भी हमें डर दीजिए।

    वर्ष 1988 में प्रकाशित दर्शन बेजार के तेवरी संग्रह-दे श खंडित हो न जाए’ की उपरोक्त ‘तेवरी’ का यदि रसात्मक विवेचन करें तो सत्य और  ईमानदारी की राह पर चलने वाले एक सच्चे इन्सान की यह व्यवस्था उसे इस मार्ग को डिगाने के लिये मात्र डराती-धमकाती ही नहीं, उसका खात्मा भी कर देने चाहती है। ऐसी स्थिति में वह ऐसी घिनौनी व्यवस्था से कोई समझौता कर संतोष या चैन के साथ चुप नहीं बैठ जाता, बल्कि संघर्ष करता है, उसे ललकारता है। कुल मिलाकर उसके मन में व्यवस्थापकों के प्रति ऐसा ‘असंतोष’ जन्म लेता है, जो खुलकर ‘विद्रोह’ में फूट पड़ता है। भले ही उसका सर कलम हो जाये लेकिन वह कह उठता है कि ‘सत्य के प्रति ऐसे हालातों में मुखरता और बढ़ेगी’। व्यवस्थापकों के प्रति ‘असंतोष’ से जन्य यह अवज्ञा और चुनौती से भरी स्थिति ‘विद्रोह’ का ही रस परिपाक है।

    नवें दशक की कविता को समझने के लिये आवश्यक है कि हम निम्न तथ्यों को भी समझने का प्रयास करें कि भाव विचार से जन्य ऊर्जा ही होते हैं। यदि कवि के मन में यह विचार न आया होता कि ‘उत्तर प्रदेश में हरिजन कन्या के साथ अत्याचार हुआ है और महाभारत काल में द्रौपदी का अपमान’ तो उसके मन में आक्रोश का निर्माण किसी प्रकार सम्भव न था। दूसरी तरफ वह निर्णय न लेता कि ‘नारी अपमान को अनदेखा करने वाले भी अंधे घृतराष्ट्र से कम अपराधी नहीं होते’। तभी तो वह भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य या राजनेता चरणसिंह को धृतराष्ट्र की श्रेणी में रखता है। उपरोक्त विवेचन से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि रस की निष्पत्ति आलम्बन से नहीं, आलम्बन के धर्म से होती है। यदि द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह या चरण सिंह ने नारी अपमान के प्रति अपना विरोध प्रकट किया होता या धृतराष्ट्र के नारी अपमान न होने दिया होता तो कवि के मन में आक्रोश की जगह इन्हीं पात्रों के प्रति श्रद्धा जाग उठती।

    काव्य का सम्बन्ध जब दर्शक पाठक या श्रोता से जुड़ता है तो यह कोई आवश्यक नहीं कि उसमें उसी प्रकार के रस की निष्पत्ति हो जो काव्य के पात्रों में या काव्य में अन्तर्निहित है। इसके लिये जरूरी है कि पाठक, दर्शक, श्रोता का आत्म भी ठीक उसी प्रकार का हो जो कवि की आत्माभिव्यक्ति से मेल खाता है। इसी कारण मैं काव्य में साधारणीकरण नहीं, आत्मीयकरण की सार्थकता को ज्यादा सारगर्भित मानता हूं। यह आत्मीयकरण के कारण ही है कि तुलसी के काव्य के प्रति सारी सहृदयता को उड़लने वाले आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य केशव के प्रति इतने हृदयहीन क्यों हो जाते हैं कि उन्हें काव्य का प्रेत कह डालते हैं। जबकि डॉ. विजयपाल सिंह में केशव के प्रति कथित सहृदयता का तत्त्व साफ-साफ झलकता है।

    इसलिये नवें दशक की कविता को रसाभास का शिकार बनाने से पूर्व इसमें अन्तर्निहित इन दो नये रसों के साथ-साथ हमें  साधारणीकरण के मापकों को त्यागकर ‘आत्मीयकरण’ का नया मापक लेना ही पड़ेगा, तभी नवें दशक की कविता का रसात्मक आकलन हो सकता है।

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+रमेशराज गुप्त 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



काव्य में सत्य, शिव और सौंदर्य


+रमेशराज

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सत्य का संबंध लोकमंगल या मानवमंगल की कामनामात्र से ही नहीं, मानव मंगल के लिए काव्य में अपनाए गए उस वैचारिक एवं भावात्मक पक्ष से भी है, जिसमें आचार्य शुक्ल के अनुसार-‘‘उत्साह, क्रोध, करुणा, भय, घृणा आदि की गतिविधि में भी पूरी रमणीयता देखने को मिलती है, कवि जिस प्रकार प्रकाश को फैला हुआ देखकर मुग्ध होता है, उसी प्रकार अंधकार को हटाने में भी सौंदर्य का साक्षात्कार किया जा सकता है।’’

आचार्य शुक्ल ने काव्य में सत्य की स्थापना के लिए काव्य के जिस वैचारिक पक्ष की ओर संकेत किया है, उस मंगलकारी वैचारिकता का पूर्ण दर्शन हमें कबीर की उन रचनाओं में होता है, जिनमें क्रोध आदि के उग्र और प्रचंड भावों के विधान अपनी तह में करुणा का मार्मिक पक्ष संजोए हैं। इसलिए कबीर की दार्शनिक अभिव्यक्ति ही नहीं, खंडनात्मक अभिव्यक्ति में भी सौंदर्य का साक्षात्कार किया जाना चाहिए। लेकिन शैली के महाकाव्य ‘द रिबोल्ट ऑफ़ इस्लाम’ के नायक-नायिका के अत्याचारियों, आतातायियों के प्रति विद्रोही चरित्र की भूमिका की महत्ता स्वीकारने वाले आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, कबीर के धर्म-पाखंडियों पर किए गए प्रहारों को तनिक भी बर्दाश्त नहीं कर पाते? बल्कि उनकी लोकमंगल की सारी-की-सारी साधनावस्था मात्र तुलसी की साधनावस्था बनकर रह जाती है, जिसमें सत्य, शिव और सौंदर्य के नाम पर एक ऐसे मार्ग की खोज की जाती है, जिस पर चलने वाले भक्त के सहयात्री या शुभचिंतक वह मूल्य होते हैं जो संप्रदाय, व्यक्तिवाद, जातिवाद के उन लक्ष्यों तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं, जहां लोक की एक ऐसी कीर्तनियां मुद्रा बन जाती है, जिसमें ‘‘भक्त लोग उपदेश, वाद या तर्क की उपेक्षा चरित्र श्रवण और चरित्र कीर्तन का ही अधिक नाम लिया करते हैं।’’

साहित्य के शिव या मंगलपक्ष को तर्कवाद, उपदेश अर्थात् वैज्ञानिक चिंतन से काटकर सौंदर्य के साक्षात्कार का भला इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है? अवैज्ञानिकों तरीकों से की गई साहित्य की रसपरक, सौंदर्यपरक व्याख्याओं में जब तर्क की गुंजाइश ही नहीं हो तो चाहे जैसे कबीर की रचनाधर्मिता का खंडन किया जा सकता है और चाहे जैसे रामचरितमानस के रचयिता तुलसी को लोकमंगल, मानवमंगल का दृष्टा, चिंतक घोषित किया जा सकता है।

‘काव्य की साधनावस्था, जब लोकमंगल की साधनावस्था है’ जैसा कि आचार्य शुक्ल कहते हैं। वह यह भी मानते हैं कि-‘‘सब प्रकार के शासन में ‘चाहे धर्मशासन हो, चाहे राजशासन या संप्रदायशासन, मनुष्य जाति के भय और लोभ से पूरा काम लिया गया है। दंड का भय और अनुग्रह का लोभ दिखाते हुए राजशासन तथा नर्क का भय और स्वर्ग का लोभ दिखाते हुए धर्मशासन और मतशासन चलाते आ रहे हैं।’’

तब प्रश्न यह है कि आचार्य शुक्ल ने, ढोंगी, सांप्रदायिक, धार्मिक आडंबर से युक्त वर्ग की कलई खोलने वाले कबीर जैसे समाज सुधारक के काव्य को सत्य, शिव और सौंदर्य के पक्ष से क्यों काट डाला? इसी तरह शैली के काव्य की सार्थकता को स्वीकारते हुए टाॅलस्टाय के भ्रातृत्व प्रेम को खारिज करने के पीछे शुक्लजी की क्या मंशा रही है? देखा जाए तो इसके मूल में आचार्य शुक्ल की वह वैचारिक अवधारणाएं रही हैं, जो हर प्रकार के मंगल, लोककल्याणकारी, दयामय या उग्र और प्रचंड भावों के रूप में क्रोध और विद्रोह से युक्त अभिव्यक्ति का साक्षात्मकार अलौकिक शक्तियों जैसे राम-कृष्णादि के क्रियाकलापों में ही कर सौंदर्यसिक्त, रससिक्त होती है।

अतः यह कहना अनुचित न होगा कि आचार्य शुक्ल की सौंदर्य-दृष्टि के पीछे कहीं-न-कहीं ऐसे संस्कार अवश्य कार्य कर रहे हैं, जिनका कथित धार्मिक परंपराओं से कहीं-न-कहीं गहरा जुड़ाव है और यह धार्मिक जुड़ाव ही उनको वास्तविक और लौकिक सौंदर्य की पकड़ से परे कर डालता है।

भक्तिकाल की तरह सत्य के नाम पर जिस असत्य, अमंगल और असौंदर्य की स्थापना रीतिकाल में हुई है, वह व्यक्तिवाद का ऐसा जीता-जागता नमूना है, जिसमें नारी भोगविलास, कामुकता, रतिक्रिया में लीन नायिका का ऐसा बिंब प्रस्तुत करती है, जिसे न तो ब्रज में लगी आग की चिंता है और न भूखे-प्यासे बच्चों की। वह तो सामाजिक-पारिवारिक दायित्वों की उपेक्षा कर सिर्फ कृष्ण से मिलन में ही अपने उत्साह की जोर-आजमाइश करती है। दूसरी तरफ अलौकिक नायक कृष्ण, राधा और गोपियों के साथ ऐसी रस की होली खेलते रहते हैं, जिसमें डाले गये रंग, कपोल-चोली से लेकर जाने कहां-कहां अपना प्रभाव छोड़ते हैं।

    सामाजिक दायित्वों, मर्यादाओं का यह खुला उल्लंघन लोकमंगल के नाम पर कैसे सौंदर्यात्मक मूल्यों की स्थापना करेगा,  इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है, लेकिन इस अमर्यादा, असमाजिकता का जिक्र करने का साहस उन विद्वजनों में भला मिल ही कैसे सकता है, जिनकी बौद्धिक क्षमताओं को कथित अलौकिक शक्तियों का जादू निगल गया हो। वे तो काव्य की सार्थकता, मार्मिकता, उक्ति वैचित्रय, बिंबात्मकता ऐसे ही दृष्टांतों में खोजेंगे कि कोई गोपी पानी भरने के लिए जमुना तट पर जा रही होगी, तथा काली-काली घटाएं घिरेंगी, बरसात होगी और गोपी की यह हालत होगी-

रपट्यौ पग घाट चढ्यौ न गयो

कवि मंडन ह्वै कै विहाल गिरी

चिर जीवहु नन्द कौ बारौ अरी

गहि बांह गरीबन ठाढ़ी करी।

अर्थात् गोपी पनघट पर बरसात के कारण धड़ाम से गिरेगी। नंदलाल कृष्ण जहां कहीं भी होंगे, उन्हें इस घटना का पता तो लग ही जाएगा [ वह अंतर्यामी जो ठहरे ], वे करुणा से द्रवीभूत गोपी के सामने प्रकट होंगे और उसकी बांह पकड़कर उठाएंगे। गोपी इस एहसान से द्रवीभूत होगी। चूंकि बरसात हो रही है, नायक-नायिका आमने-सामने हैं, इसके बाद क्या होगा, अनुमान पाठक स्वयं लगा सकते हैं। बरसात में किस गरीब की छत गिरी, किस गरीब का बच्चा निमोनिया का शिकार हुआ, किसका घर बाढ़ में डूबा? नंद किशोर के मन में ऐसे ब्रजवासियों के प्रति दया और करुणा के भाव क्यों जागृत नहीं होते? क्या उन्होंने गोपियों के साथ रतिक्रियाओं के माध्यम से ही लोकमंगल का ठेका ले रखा है?

कहने का अर्थ यह है कि मात्र रूप या देह भोग के माध्यम से सौंदर्य की स्थापना करने वाले कवि या रसमीमांसक न तो सत्य की स्थापना कर सकते हैं और न शिव की। सत्य शिव की स्थापना के लिए आत्मा के उस सौंदर्य की आवश्यकता पड़ती है जो शारीरिक सौंदर्यात्मकता को लोकमंगलकारी बनाता है। प्रेम की सार्थक और शाश्वत अर्थवत्ता तो कुछ इसी प्रकार के सदंर्भों में देखी जा सकती है जिसमें सामाजिक-पारिवारिक दायित्वों के बीच पसरे संघर्ष की मार्मिकता को साहस और उत्साह, प्रेम के साथ और अधिक प्रगाढ़ करता हुआ चला जाता है-

‘‘पहले की तरह अब भी

अच्छी लगती हैं तुम्हारी बांहें

लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम

उन्हें कुहनियों तक ढकी रखो

पहले की तरह तुम मुझे

अब भी विदा करती हो

लेकिन मेरी छाती पर खुली बटन

बंद कर देती हो।’’

सुदामा पांडेय धूमिल की ‘गृहयुद्ध’  शीर्षक से लिखी गई उक्त कविता में नायक-नायिका जिस सत्य की ओर इशारा करते है, वह सत्य हमें अजगरी व्यवस्था के उस चेहरे की पहचान कराता है, जो महंगाई के रूप में परिवार की सुख-शांति, प्रेम को निगलता जा रहा है। नायिका पारिवारिक संघर्षों में इतनी चुक गई है कि नायक उसकी कमजोर बांहों [ जो उसे अब भी अच्छी लगती हैं ] को कुहनियों तक ढंक देना चाहता था और नायक का शरीर इतनी दुर्बलता का शिकार हो गया है कि नायिका उसे काम पर भेजने से पूर्व, विदा करते समय, उसकी छाती के बटन रोज बंद कर देती है ताकि उसकी छाती पर उभरी पसलियां किसी को न दिखें।

उक्त कविता में कवि प्रेम के लिजलिजे कोरे रूप सौंदर्य से कोई प्रेम की सुखात्मक अनुभूति ग्रहण नहीं करता, बल्कि उसे तो वास्तविक सुख की अनुभूति कर्मक्षेत्र में होती है। वास्तविकता तो यही है कि एक-दूसरे के सुख-दुख में हिस्सेदारी करने वाले पात्रों की आपसी सूझबूझ ही एक ऐसे राग तत्त्व का निर्माण करती है, जिसकी रसात्मकता शाश्वत और अखंड सौंदर्य की पूर्णता की ओर ले जाती है, जिसमें नायिका की आंखें आंखें नहीं रह जातीं, बल्कि गरीबी की मार से लड़खड़ाते नायक के लिए सहारा देने वाले हाथ बन जाती हैं-

‘‘पत्नी की आंखें, आंखे नहीं हैं, जो मुझे थामे हुए हैं।’’

प्रेम के चरमोत्कर्ष की भावात्मक अभिव्यक्ति भला इससे बढ़कर और क्या हो सकती है, जो किसी भी प्रकार के आश्चर्यपूर्ण प्रसादन, अवसादन या कुतूहल मात्र को जन्म न देकर ऐसे आनंद की सृष्टि करती है, जो रस के नाम पर पाठक या श्रोता को पलायनवादिता या व्यभिचार का विष नहीं देती। वह तो पाठक या श्रोता के मन में ऐसे माधुर्य का प्लावन करती है, जिसके कारण स्वार्थमय जीवन की शुष्कता और विरसता विलुप्त हो जाती है। अगर सही अर्थों में देखा जाय तो यही कविता का कवितापन है, सत्य है, मंगलकारी तत्त्व है तथा चिरसौंदर्य की स्थापना का एक महत्वपूर्ण पहलू है।

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रमेशराज गुप्त 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001


काव्य का आस्वादन


+रमेशराज

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काव्य में संदर्भ में, पुराने काव्यशास्त्रिायों से लेकर वर्तमान काव्यशास्त्री ‘आस्वादन’ शब्द का प्रयोग किसी-न-किसी रूप में करते आ रहे हैं। स्वाद का सीधा संबंध जिह्वा से होता है। लेकिन काव्य के संदर्भ में आस्वादन की प्रक्रिया मात्र स्वादेंद्रियों तक ही सीमित नहीं रहती। उसकी प्रक्रिया हर प्रकार की इंद्रियों द्वारा संपन्न होती है। चूंकि इंद्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान का अनुभव अंततः मस्तिष्क द्वारा ही होता है, अतः हर प्रकार का इंद्रियबोध आस्वादन का विषय बन जाता है। इसलिए काव्यशस्त्रिायों ने अगर किसी भी प्रकार की सामग्री को आस्वादन का विषय बनाया है तो इसमें कोई अचरज नहीं। लेकिन काव्य में आस्वादन सामग्री क्या है तथा इसके आस्वादन की प्रक्रिया किस प्रकार संभव होती है? इन प्रश्नों का समाधान जब तक वैज्ञानिक तरीकों से नहीं किया जाता, तब तक आस्वादन की समस्या, समस्या बनी रहेगी।

    काव्य में आस्वादन सामग्री के रूप में किसी विशेष समाज की विशेष मान्यताएँ, आस्थाएँ, परंपराएँ कवि के अनुभव एवं उसकी वैचारिक अवधारणाओं के साथ निहित होते हैं, जिनका आस्वादन एक सामाजिक छंदों, अलंकारों, भाषा-प्रयोगों, ध्वनियों आदि के माध्यम से करता है। यदि हम भारतीय सामग्री का विवेचन करें तो यह सामग्री हमें धार्मिक, सामाजिक, सांप्रदायिक, व्यक्तिवादी, राष्ट्रीय एवं मानवीय मूल्यों के रूप में आदिकाल से लेकर वर्तमान काल की मान्यताओं को अपने भीतर विचारधाराओं के रूप में सहेजे हुए मिलती है। रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्यों का आस्वादन [ भारतीय जनमानस की धर्म के प्रति आस्था होने के कारण ] जितना किया गया है, उतना किसी अन्य भारतीय ग्रंथ का नहीं। इन महाकाव्यों के समांतर मुस्लिम संप्रदाय के बीच ‘कुरान’ का आस्वादन भी सर्वाधिक है। हिंदू तथा मुस्लिम संप्रदायों के उक्त महाकाव्यों में आस्वादन के कारणों का यदि हम पता लगाएँ तो इनके आस्वादन के पीछे इन संप्रदायों के वे धार्मिक संस्कार रहे हैं, जिनके अंतर्गत दोनों संप्रदायों ने ईश्वर के अवतार के रूप में किसी-न-किसी राजा या पैगंबर में आत्म-सुरक्षा की तलाश की है। आत्म-सुरक्षा के उक्त विचारों के कारण ही यह महाकाव्य आस्वादन का विषय बने हैं।

    लेकिन किसी कृति का आस्वादन रुचिकर और रसमय है, मात्र इसी आधार पर उस कृति का सही मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। मूल्यांकन की कसौटी तो यह होनी चाहिए कि कृति के आस्वादनोपरांत लोक या समाज पर उसका क्या प्रभाव दिखलायी दिया? उस कृति से लोक को कितनी और किस प्रकार की आत्म-सुरक्षा मिली?

काव्य में प्रस्तुत आस्वादन सामग्री कितनी भी रोचक, चटपटी, अलंकारों से लैस और किसी संप्रदाय, जाति, वर्ग आदि को कितना भी तुष्ट करने वाली हो, परंतु यदि उसका आस्वादन कुप्रभावी है तो वह सामग्री अपनी समस्त विशेताओं के बावजूद अमंगलकारी, अमानवीय ही मूल्यांकित की जानी चाहिए। ‘ढोर गँवार सूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी’ जैसी आस्वादन सामग्री को धार्मिक और सांप्रदायिक आस्थाओं से जोड़कर हमारे कथित रसवादी, पाठक या श्रोता के कथित हृदय में चाहे जिस भक्तिरस या ईश्वर-रस की वर्षा कराएँ, लेकिन आस्वादनोपरांत लोक या समाज की जो रसदशा बनेगी, वह कितनी मंगलकारी और लोकोन्मुखी होगी? इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है। यह रसदशा हमें उस अमानवीयता की ओर ले जाएगी, जिसमें वजह-बेवजह पशु, शूद्र और नारी को गँवार समझकर प्रताड़ित किया जाता रहेगा और इस प्रताड़ना के सारे-के-सारे अधिकार हर अत्याचारी पुरुष के पक्ष में चले जाएँगे। ‘होगा वही राम रचि राखा’ जैसी काव्य-सामग्री के आस्वादन को एक तथाकथित भक्तिभाव से ओतप्रोत समाज भले ही रसिकता और कथित सहृदयता के साथ स्वीकार ले, लेकिन वह सामाजिक जिसमें जरा-सी भी बुद्धि का समावेश है, उसको उक्त आस्वादन सामग्री की रसात्मकता, सौंदर्यात्मकता में साम्राज्यवाद की दुर्गंध आने लगेगी। जिसे आज का कवि इस प्रकार अभिव्यक्ति दे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए-

1. कैसी मशाल लेके चले तीरगी में आप

जो रोशनी थी, वो भी सलामत नहीं रही।

2. जो भी आता है मसीहा बनकर

सलीब हमको सौंप जाता है।

3. रात-भर रामधुन के हल्ले में

जाने क्या-क्या हुआ मुहल्ले में?


यदि आस्वादन सामग्री कथित रस-परिपाक के स्थान पर तर्क और विचार की कसौटी पर परखे जाने की सामर्थ्य से युक्त मानवीय मूल्यों से लैस और लोक-जीवन की मूल समस्याओं का हल खोजने वाली है तो वह आस्वादनोपरांत मानव में छुपे संघर्ष के तत्त्वों को कुरेदेगी, उन्हें अत्याचारी षड्यंत्रकारी वर्ग के प्रति विरोध और विद्रोह से सिक्त करेगी। शोषण, यातना, अराजकताविहीन समाज के निर्माण-कार्य में सहयोग प्रदान करेगी। इसलिए किसी भी काव्य-सामग्री का आस्वादन लोकमंगल को साधनावस्था के नाम पर किसी अलौकिक ब्रह्मस्वरूप, रामस्वरूप, ईसा-स्वरूप, पैगंबरस्वरूप को यदि तलाशने के लिए प्रेरित करता है तो यह तलाश मानवीय मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में निरर्थक ही रहेगी। मानव द्वारा मानवस्वरूप की स्थापना ही लोक या समाज को लोकोन्मुखी, समाजोन्मुखी मंगलकारी व्यवस्था दे सकती है। कुल मिलाकर किसी भी काव्य-सामग्री के आस्वादन के माध्यम से, संप्रदाय, जाति, साम्राज्य, अनाचार और अनीति को खत्म करने का प्रयास ही सही अर्थों में मुक्ति और मोक्ष का प्रयास होगा।

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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



*रसनिष्पत्ति सामाजिक के संस्कारों से बंधकर होती है*

+रमेशराज

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एक कवि द्वारा सृजित काव्य जिन परिस्थितियों में एक सामाजिक द्वारा आस्वाद्य होता है, उसके लिए उस सामाजिक का काव्य-सामग्री के प्रति रुचि लेना परामावश्यक है। सामाजिक की रुचि का विषय, किसी काव्य-सामग्री को पढ़कर मात्र रस या आनंद ग्रहण करना ही नहीं होता,  वह उस काव्य-सामग्री में वर्णित मूल्यों का विवेचन करने, उसके सामाजिक प्रभाव देखने, उसमें कुछ नया खोजने या पाने की दृष्टि से भी काव्य का अध्ययन करता है। किसी भी काव्य-सामग्री की सार्थकता या निरर्थकता का संबंध आस्वादक या सामाजिक की वैचारिक अवधारणाओं पर निर्भर रहता है और आस्वादक की पूर्व निर्धारित वैचारिक अवधारणाएं उसके मन में विभिन्न प्रकार की रसात्मकता पैदा करती हैं।

एक सुधी पाठक के मन में उसकी वैचारिक अवधारणाओं के अनुसार किस  प्रकार और कैसी रसात्मकबोध की स्थिति बनती है, इसके लिए एक प्रामाणिक सुधी पाठक के रूप में यदि हम आचार्य रामचंद्र शुक्ल की विवेचना करें और उस रस-दशा के निर्माण में उनके संस्कारों अर्थात् जीवन-मूल्यों के योगदान को परखें तो यह तथ्य खुलकर सामने आ जाते हैं कि किसी भी सामाजिक में समस्त प्रकार का भावोद्बोधन विचारों के द्वारा ही संपन्न होता है। आचार्य शुक्ल रामायण के आस्वादनोपरांत भक्तिरस से सिक्त होते हुए कहते हैं-‘‘ आदिकाव्य के भीतर  लोकमंगल की शक्ति के उदय का आभास ताड़का और मारीच के दमन के प्रसंग में ही मिल जाता है। पंचवटी में वह शक्ति जोर पकड़ती दिखाई देती है। सीता-हरण होने पर उसमें आत्मगौरव और दाम्पत्य प्रेम की प्रेरणा बीच में प्रकट होकर, उस विराट मंगलोन्मुखी गति में समन्वित हो जाती है।1

आदिकाव्य रामायण के प्रति आचार्य शुक्ल की भक्ति और श्रद्धा  से युक्त बनी मनोदशाओं के कारण को यदि हम खोजें तो-

1. आचार्य शुक्ल आदि काव्य के नायक राम को भगवान का वह स्वरूप मानते हैं, जो समय-समय पर अवतार लेकर दुष्टों का विनाश करता है, वे कहते हैं-‘‘यदि राम द्वारा रावण का वध तथा दमन न हो सकता तो भी राम की गतिविधि का पूरा सौंदर्य रहता, पर उनमें भगवान की पूर्ण कला का दर्शन न होता, क्योंकि भगवान की शक्ति अमोघ है।’’

2. आचार्य शुक्ल की लोकमंगल के लिए किए गए सुकार्यों के प्रति यह अवधारणा है कि-‘‘यदि करुणा किसी व्यक्ति की विशेषता पर अवलंबित होगी कि पीडि़त व्यक्ति हमारा कुटुम्बी, मित्र आदि है तो उस करुणा के द्वारा प्रवर्तित उग्र व तीक्ष्ण भावों में उतनी सुंदरता न होगी। पर बीज रूप में अंतस्संज्ञा में स्थित करुणा यदि इस ढब की होगी कि इतने पुरवासी, इतने देशवासी या इतने मनुष्य पीड़ा पा रहे हैं तो उसके द्वारा प्रवर्तित तीक्ष्ण या उग्र भावों का सौंदर्य उत्तरोत्तर अधिक होगा।’’1

मतलब यह है कि आचार्य शुक्ल को सौंदर्य का उत्तरोत्तर अनुभव ऐसे कार्यों से ही प्राप्त हो सकता है, जिनमें नायक किसी व्यक्ति विशेष पर आए संकट के प्रति करुणाद्र न होकर समूचे लोक पर आए संकट के प्रति करुणाद्र होता है और बचाने के प्रयास करता है। इससे सीधा अर्थ यह निकलता है कि आचार्य शुक्ल की वैचारिक अवधारणाओं की तुष्टि करुणा के उदात्त और मानवीय स्वरूप से होती है। चूंकि करुणा का लोकहितकारी रूप उन्हें आदि काव्य रामायण के नायक राम में दिखलाई देता है, अतः स्वाभाविक रूप से राम के प्रति श्रद्धा और भक्ति उनके मन में उद्बुद्ध हो जाती है।

लेकिन टॉलस्टॉय की कृतियों में जब उन्हें इसी प्रकार के लोककल्याणकारी और मानवीय तत्त्वों के दर्शन होते हैं तो उनके मन में संवेदनात्मक रसात्मकबोध का निर्माण नहीं होता, बल्कि उनके मन में प्रतिवेदनात्मक रस की स्थिति इस प्रकार बनती है-

‘‘टॉलस्टॉय के मनुष्य से मनुष्य में भ्रातृ प्रेम संचार को ही एकमात्र काव्य-तत्त्व कहने का बहुत कुछ कारण सांप्रदायिक था... टॉलस्टॉय के अनुयायी प्रयत्न पक्ष को लेते अवश्य हैं पर केवल पीडि़तों की सेवा सुश्रूषा की दौड़-ध्ूप... आततायियों पर प्रभाव डालने के लिए साधुता के लोकोत्तर प्रदर्शन, त्याग, कष्ट, सहिष्णुता इत्यादि में ही उसका सौंदर्य तलाश करते हैं। साधुता की इस मृदुल गति को वे आध्यात्मिक शक्ति कहते हैं। आध्यात्मिक शब्द की मेरी समझ में काव्य या कला के क्षेत्र में कोई जरूरत नहीं है।’’

मनुष्य जाति के संकट और दुख में करुणाद्र होकर उसे बचाने के प्रयत्न पक्ष में उत्तरोत्तर सौंदर्य का विकास महसूस करने वाले आचार्य शुक्ल आखिर टॉलस्टॉय की मनुष्य से मनुष्य के बीच भ्रातृ-प्रेम की प्रक्रिया [ जिसमें त्याग, कष्ट, सहिष्णुता, पीडि़तों की सेवा-सुश्रूषा आदि के रूप में  करुणा के बहुआयामी, सौंदर्यातिरेक से पूर्ण दर्शन होते हैं ] को इतना बेमानी, सारहीन, सांप्रदायिक क्यों ठहरा देते हैं? उनके इस प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध के पीछे ऐसे कौन-से कारण हैं जो टॉलस्टॉय के काव्य में किसी प्रकार का करुणात्मक, रत्यात्मक, हर्षात्मक तत्त्वों के दर्शन नहीं होने देते। उत्तर के लिए हमें शुक्लजी के जीवन-मूल्यों को बारीकी से फिर  समझना पड़ेगा।

1. चूंकि आचार्य शुक्ल की सारी-की-सारी वैचारिक अवधारणाएं ईश्वरवादी हैं अर्थात् उनकी रागात्मकता का विषय वह आलौकिक शक्ति है, जो समूचे लोक या मानव जाति की पीड़ाओं, संकटों के प्रति करुणाद्र होकर दुष्टों, अत्याचारियों आदि से रक्षा करता है, अतः शुक्लजी को [ राम को ईश्वरीय अंश या स्वरूप मानने के कारण ] आदि काव्य के नायक राम की समस्त व्यावहारिकता में तो कल्याणकारी, मानवतावादी तत्त्वों के दर्शन हो जाते हैं लेकिन जब यही गुण उन्हें काव्य के स्तर पर लोक के प्राणियों में दृष्टिगोचर होते हैं तो वे [ लौकिक प्राणियों का ईश्वरीय स्वरूप न बन पाने के कारण ] उन गुणों को लोक-कल्याणकारी नहीं मान पाते हैं।

2. चूंकि शुक्लजी अध्यात्म की सारी-की-सारी व्याख्याओं, मान्यताओं, आस्थाओं आदि को ईश्वर और भक्त या आत्म-परमात्मा के मध्य ही लेते हैं, फलतः टॉलस्टॉय के आध्यात्मकवाद को [ जिसमें भ्रातृ-प्रेम का संचार हो ] उनके संस्कार ग्रहण नहीं कर पाते हैं। अतः वे इस भ्रातृ-प्रेम के प्रति प्रतिवेदनात्मक रूप में आक्रोश की अभिव्यक्ति इस प्रकार करते हैं –

‘‘ आध्यात्मिक शब्द की मेरी समझ में काव्य-कला के क्षेत्र में कोई जरूरत नहीं है।’’

ईश्वर-संबंधी सत्ता के लोक-मंगलकारी स्वरूप की स्थापना करने के लिए आचार्य शुक्ल यह कैसी रहस्यमयी बात कह जाते हैं ? जबकि कथित अध्यात्म की स्थापना काव्य या कला के क्षेत्र में ही हुई है। काव्य या कला के क्षेत्र से इतर कहीं भी अध्यात्म जैसे शब्द का कोई अस्त्वि नहीं है।

खैर... हम यहां सिर्फ यह बताना चाहते हैं कि एक सुधी पाठक अपने संस्कारों से बंधकर किस प्रकार संवेदनात्मक या प्रतिवेदनात्मक-रसात्मक अवस्थाएं करता है। यह संस्कारों के रूप में मूल्यबोध का ही परिणाम है कि कृष्ण, राम, लक्ष्मण और ब्राह्मणों के क्रिया-कलापों से रागात्मक संबंध स्थापित करने वाले आचार्य शुक्ल जब-जब यह अनुभव करते हैं कि अमुक काव्य-कृति में उक्त पात्रों के प्रति लेखक ने न्याय बरतते हुए इनके स्वरूप के निखारा है तो वह श्रद्धा-भक्ति से सिक्त हो उठते हैं। लेकिन जब उन्हें यह लगता है कि अमुक काव्य में उक्त पात्रों को गिराने या नीचा दिखाने की कोशिश की गई है तो उन पात्रों एवं लेखक के प्रति उनके रसात्मकबोध की स्थिति एकदम उलट जाती है। जिसका अनुमान उनके वाचिक अनुभावों से इस प्रकार लगाया जा सकता है-

‘‘माइकेल मधुसूदन ने मेघनाद को अपने काव्य का रूप-गुण-संपन्न नायक बनाया, पर लक्ष्मण को वे कुरूप न कर सके। उन्होंने जो उलटपफेर किया, वह कला या काव्यानुभूति की किसी भी प्रकार की प्रेरणा नहीं। बल्कि एक पुरानी धारणा को तोड़ने की बहादुरी दिखाने के लिए। इसी प्रकार बंग भाषा के एक दूसरे कवि नवीनचंद्र के अपने ‘कुरुक्षेत्र’ नामक ग्रंथ में कृष्ण का आदर्श ही बदल दिया। उसमें वे ब्राह्मणों के अत्याचार से पीडि़त जनता के लिए उठ खड़े हुए क्षत्रिय महात्मा के रूप में हैं। अपने समय की किसी खास हवा की झोंक में प्राचीन आर्ष काव्यों में पूर्णतया निर्दिष्ट स्वरूप वाले आदर्श पात्रों को एकदम कोई नया, मनमाना रूप देना भारती के पवित्र मंदिर में व्यर्थ की गड़बड़ मचाना है।’’

माइकेल मधुसूदन एवं बंगकवि नवीनचंद के काव्य का आस्वादन आचार्य शुक्ल को मूल्यों, संस्कारों, वैचारिक निर्णयों के अंतर्विरोधों के कारण क्यों प्रतिवेदनात्मक रसात्मक-अवस्था की ओर ले जाता है, जबकि वह यह भी अनुभव करते हैं कि माइकेल मधुसूदन ने लक्ष्मण को कुरुप नहीं किया है। नवीनचंद ने कृष्ण के माध्यम से पीडि़त जनता का उद्धार  करवाया है। कारण स्पष्ट है कि वे लक्ष्मण के आगे मेघनाद के चरित्र को रूप-गुण संपन्न देखना ही नहीं चाहते हैं और नवीनचंद्र की कृति के  ब्राह्मणों को वे दयालु, श्रद्धालु, लोकमंगलकारी रूप में ही मानते हैं , इसलिए कृष्ण का क्षत्रिय होकर भी महात्मा रूप में अवतरित होना उन्हें गवारा नहीं होता। परिणामतः वे अपनी बौखलाहट का निशाना सारी-की-सारी काव्य-सामग्री को बना डालते हैं।

बहरहाल इस रसात्मक विवेचन से यह निष्कर्ष तो निकल ही आता है कि किसी पाठक, श्रोता या दर्शक में रसनिष्पत्ति उसके संस्कारों से बंधकर होती है। वह जैसा काव्य के प्रति निर्णय लेता हो, उसकी रसात्मक अवस्था उसी के अनुरुप बन जाती है।

सन्दर्भ-

1.काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था, आचार्य शुक्ल, भा.का.सि.,         पृष्ठ-26

2. भा. का. सि., पृष्ठ-24   

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रमेशराज गुप्त 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



डॉ. राकेश गुप्त का रस-सिद्धांत


[ विचार, संस्कार और रस-3 ]


+रमेशराज

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रसमर्मज्ञ डॉ. राकेश गुप्त रसास्वादक के संस्कारों के संबंध में चर्चा करते हुए लिखते हैं कि ‘‘एक ओर कवि की परिवेश होता है, दूसरी ओर सहृदय का। कवि ने जिन परिस्थितियों, परंपराओं और संस्कारों से बंधकर काव्य की रचना की है, सहृदय जब तक सामंजस्य नहीं कर लेता, तब तक वह रचना उसके लिए आस्वाद्य नहीं हो सकती। वर्ग-संघर्ष को साहित्य का प्राण मानने वाले मार्क्सवादी पाठक बिहारी के काव्य का आस्वादन नहीं कर सकता।’’1

डॉ. राकेश गुप्त के उक्त कथन से एक आस्वादक के बारे में रसात्मकबोध संबंधी जो तथ्य उभरते हैं, उनके अनुसार एक कवि अपनी परिस्थितियों, परंपराओं और संस्कारों से बंधकर जो काव्य-रचना करता है, वह काव्य-रचना आस्वादक के लिए तभी आस्वाद्य होगी, जबकि कवि के संस्कारों द्वारा सृजित काव्य-रचना के संस्कारों, जीवन-मूल्यों, मान्यताओं से आस्वादक के संस्कार, जीवन-मूल्य, आस्थाएं, परम्पराएं आदि मेल खायें। काव्य के मूल्य जब आस्वादक के मूल्यों से मेल खा जाते हैं, तभी उसमें रुचि और रमणीयता जैसे तत्वों का समावेश होता है। सारतः कवि जिन मूल्यों या संस्कारों के माध्यम से काव्य में रसात्मकता की स्थिति लाता है, एक आस्वादक भी उन्हीं मूल्यों से बंधकर रसात्मकबोध ग्रहण करता है।

    रस आचार्य भरतमुनि भी इस तथ्य पर पूरी तरह सचेत थे कि ‘‘भिन्न-भिन्न रुचियों के लोग भिन्न-भिन्न प्रकार के दृश्यों से तुष्ट होते हैं। तरुणजन काम से, विरागी मोक्ष से, शूर वीभत्स से और वीर रौद्र से तुष्ट होते हैं।2

इसका अर्थ यह हुआ कि एक सामाजिकों या कथित सहृदयों की जिस प्रकार की मनोवृत्तियां बन जाती है, वह अपनी मानसिकतानुसार विविध विषयों से तुष्ट होते हैं। कारण स्पष्ट है- तरुणजन काम से इसलिए तुष्ट होते हैं क्योंकि उनके मन में नारी भोग का विचार रहता है। ठीक इसी तरह समाज को माया, मोहजाल मानने वाला विरागी, समाज से विरक्त होने में इसलिए तुष्ट होता है क्योंकि वह यह मानकर चलता है कि उसे ईश्वर के सामीप्य से ही मोक्ष मिलेगा। शूर या वीर वीभत्स और रौद्रता से भरे कार्य करके इसलिए तुष्ट होते हैं ताकि समाज उन्हें श्रद्धा के साथ देखे या उनके भय खाए या वे ऐसे कृत्य कर पराजितों पर शासन कर सकें। शूर या वीरों की यही मानसिकता, उन्हें शौर्य और वीरता से भरे काव्य के प्रति रससिक्त करने में सहायक होती है।

आचार्यों की आस्वादन के संबंध में रसात्मक व्याख्या की एक कमजोर और दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि जब रसों के नाम गिनाने की बात आती है तो उसकी व्याख्या में वे भी रस समेट लिए जाते हैं जिनका रमणीयता या रागात्मकता से सीधा-सीधा कोई संबंध नहीं होता। लेकिन जब आश्रय में रसनिष्पत्ति संबंधी सिद्धांत गढ़ा जाता है तो उसके अंतर्गत काव्य का सिर्फ रमणीय पक्ष ही लिया जाता है।

जब डॉ. गुप्त यह तथ्य स्पष्ट रूप से स्वीकारते हैं कि काव्य के प्रति पाठक के प्रतिक्रिया ही पाठक का रसात्मकबोध होती है और इस रसात्मकबोध की स्थिति में पाठक संवेदनात्मक या प्रतिवेदनात्मक दोनों में से किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया कर सकता है।’’1  तब पहला प्रश्न तो विचारने योग्य यह हो जाता है कि क्या प्रतिक्रिया को रस माना जाए या रस के अंतर्गत प्रतिक्रिया को अनुभाव की श्रेणी में रखा जाए। हमारे विचार से प्रतिक्रिया अनुभाव ही ठहरती है, प्रतिक्रिया चूंकि भावोद्बोधन के  कारण होती है अतः डॉ. गुप्त का प्रतिक्रिया सिद्धांत चाहे अधूरा ही सही, लेकिन रस के क्षेत्र में प्रतिवेदनात्मक प्रतिक्रिया के माध्यम से एक नया आयाम यह जरूर खोलता है कि किसी भी काव्य-सामग्री के पाठन के समय मात्र पाठक संवेदनात्मक रसात्मकता से ही सिक्त नहीं होता, उसका रसात्मकबोध प्रतिवेदनात्मक भी हो सकता है।

डॉ. राकेश गुप्त के प्रतिक्रिया सिद्धांत को सार्थक और संशोधित  स्वरूप में ग्रहण करने के उपरांत अब दूसरा विचारणीय प्रश्न यह है कि जब पाठक प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध से भी अभिभूत होता है तो क्या मार्क्सवादी पाठक बिहारी के काव्य का आस्वादन नहीं कर सकता? एक प्रबुद्ध आस्वादक बिहारी से लेकर घनानंद, विद्यापति, केशव, सूर, तुलसी, कबीर, निराला, धूमिल, मुक्तिबोध आदि के मार्क्सवादी या गैर मार्क्सवादी हर प्रकार के काव्य का आस्वादन करता है। लेकिन यदि वह मार्क्सवाद या वर्ग-संघर्ष में विश्वास रखने वाला है तो वर्ग-संघर्ष को क्षीण करने वाला साहित्य उसे विरोध, विद्रोह, जुगुप्सा, क्रोध आदि से सिक्त करेगा। ठीक इसी प्रकार रीतिकालीन, भक्तिकालीन काव्य में रति रखने वाले पाठक को मार्क्सवादी काव्य में कोई रमणीय तत्त्व अनुभव नहीं होगा। वह भी काव्य में वर्णित मार्क्सवादी मूल्यों के प्रति विरोधादि से सिक्त हो उठेगा। इसलिए रस के संबंध में महत्वपूर्ण आस्वादन नहीं, आस्वादन की प्रक्रिया के समय उत्पन्न आश्रय की वह भाव अवस्था है जो उसकी संवेदनात्मक, प्रतिवेदनात्मक प्रतिक्रियाओं में उजागर होती है। फिर भी एक पाठक, श्रोता या दर्शक की प्रतिवेदनात्मक व्याख्या के प्रति इतना सूक्ष्म और सार्थक चिंतन करने वाले डॉ. राकेश गुप्त एक मार्क्सवादी पाठक की बिहारी के काव्य के प्रति आस्वादन की समस्या को इतने सतही संदर्भों में पता नहीं क्यों ले बैठे? हमें ऐसा लगता कि काव्य के आस्वादन के प्रति उनकी दृष्टि कोमल और परंपरावादी रही है, जबकि आस्वादन के विवेचन के संबंध में उनकी दृष्टि वैज्ञानिक है। डॉ. राकेश गुप्त के प्रतिक्रिया सिद्धांत को पुनः उठाते हुए कि काव्य का अध्ययन करते हुए पाठक के मन में मनौवैज्ञानिक प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ अनुभूतियां या भावनाएं जागती हैं... जागी हुई भावनाएं कविता में वर्णित भावना से सदा मेल नहीं खातीं, कभी उनका रूप संवेदनात्मक होता है और कभी प्रतिवेदनात्मक’ के माध्यम से हम यह कहना चाहेंगे कि रस की स्थिति आश्रयों की रुचियों के अनुसार जब अपने संवेदनात्मक पक्ष में उभरती है तो आश्रय, काव्य में वर्णित मूल्यों, पात्रों, आदि से तादात्म्य स्थापित करते हैं, उस काव्य के प्रति अपनी रुचि में प्रगाढ़ता लाते हैं, और इस स्थिति में सारा-का-सारा काव्य उन्हें रमणीय अनुभव होता है। लेनिक जब काव्य के आस्वादकों को यह अनुभव होता है कि प्रस्तुत सामग्री उनके संस्कारों अर्थात् जीवन-मूल्यों, आस्थाओं, परंपराओं-धारणाओं आदि के विपरीत जा रही है तो उनके मन में उस काव्य-सामग्री के प्रति विरोध की ऊर्जा उत्पन्न हो जाती है, जिसका रसात्मकबोध रति के विरोधी भावों जैसे क्रोध, आक्रोश, असंतोष, घृणा आदि के अंतर्गत देखा जा सकता है।

सन्दर्भ –

1.  डॉ. राकेश गुप्त का रस विवेचन पृष्ठ-26

2.  वही , पृष्ठ-28

3.  वही , पृष्ठ-65 व् 193

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रमेशराज गुप्त 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



विचार, संस्कार और रस [ दो ]

   

+रमेशराज

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काव्य के रसतत्त्वों एवं उनके रसात्मकबोध को तय करने वाली समस्त प्रक्रिया का निर्माण कवि के संस्कारों द्वारा ही संपन्न होता है। संस्कारों के विभिन्न रूपों [ धार्मिक, सामाजिक, मानवतावादी, व्यक्तिवादी संस्कार ] में से एक कवि जिस प्रकार के वैचारिक मूल्यों द्वारा संस्कारित होता है, वह उन्हीं मूल्यों के अनुसार अपने परिवेश, अपने समाज के घटनाक्रमों, पात्रों आदि को काव्याभिव्यक्ति का विषय बनाता है। नारी के मादक स्वरूप पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले रीतिकालीन कवियों को नारी के नुकीले नयनों, रूप की चिलकचौंध, आलिंगन के समय कंपन, स्वेद आदि में जो आनंद की प्राप्ति होती है, यह आनंदातिरेक इन कवियों द्वारा नारी के प्रति अपनाई गई ऐसी मूल्यवत्त्ता से प्राप्त होता है, जिसकी वैचारिक अवधारणाएँ, नारी को भोग-विलास की वस्तु मानने में अंतर्निहित हैं। इसलिए यदि बिहारी नायिका के स्तन-मन-नैन नितंब में चंचलता और बढ़ोत्तरी देखते हैं तो यह अप्रत्याशित नहीं है। कारण स्पष्ट है कि बिहारी के संस्कार शृंगार के नाम पर नारी की नग्नता पर मोहित हैं और रति के नाम पर पलकों पर पीक लगाते हैं।

    छायावादी कवि यदि काव्याभिव्यक्ति के माध्यम से नारी के कपोल चूमते-चूमते प्रसूनों, पल्लवों, दूब और जल को चूमने लग जाते हैं, तो यह उनके ऐसे व्यक्तिवादी संस्कारों के कारण होता है।

बिहारी-सतसई के अधिकांश स्थलों में बिहारी जिस प्रकार के रसात्मकबोध से सिक्त होकर, जिस प्रकार की रचनात्मक प्रक्रिया से गुजरते हैं, वह सारी-की-सारी प्रक्रिया यौनाकर्षण की प्रक्रिया है | यह रसदशा जिन मूल्यों या संस्कारों द्वारा उद्बुद्ध होती है, वह मूल्य नारी-भोग के ऐसे जीते-जागते नमूने हैं, जो वर्तमान में कवि द्वारा इस प्रकार अभिव्यक्ति पाते हैं-

फैल रही है परिधि स्तनों की

हसरतें अब जवान हैं

आओ दोस्तों और साथियो

आओ मेरे झंडे के नीचे।

उँगलियों से कह दो,

आज रियायत करें तनिक भी

किंतु पेश आएँ, मुनासिब बेरहमी से।

[ कु. शान्ता सिन्हा ]

    लेकिन जिन कवियों के संस्कार नारी को भोग-विलास की मूल्यवत्ता से हटकर, नारी को स्वाभिमानी, संघर्षशील, पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करने वाली नायिका के जीवन-मूल्यों से जोड़कर जाँचने, परखने या भोगने के रहे हैं, ऐसे कवि यदि नारी-आकर्षण से किसी प्रकार की रसदशा ग्रहण करते हैं तो वह रसदशा कुछ इस प्रकार की होती है-

हम घर के दरवाजे बनकर अब बेहद खुश हैं

प्यार मिला देता है हमको साँकल के स्वर में।’

    उक्त उदाहरणों के माध्यम से जो बात स्पष्ट करनी है, वह सिर्फ इतनी-सी है कि एक कवि अपने परिवेश के प्रति जिस प्रकार की संस्कारित मूल्य-दृष्टि अपनाता है, वह मूल्य दृष्टि ही काव्य में रसात्मकता का विषय बनती है। आचार्य तुलसी जहाँ ब्राह्मणों, संतों, साधुओं आदि के हवन, पूजन गंगा-स्नान को गौरवशाली सत्योन्मुखी परंपरा का प्रतीक मानकार श्रद्धा  और भक्ति जैसे रसात्मकबोध को जन्म देते हैं, वहीं कबीर को यह सारी-की-सारी परंपराएँ ढोंग, आडंबर, शोषण से युक्त विकृत रुढि़याँ नजर आती हैं। काव्य के स्तर पर रसात्मकता का यह अंतर निस्संदेह कबीर और तुलसी के मूल्यबोधें का अंतर है।

मूल्यबोध् और रस-संबंधी उक्त व्याख्या के अनुसार जो तथ्य उभरकर आते हैं, वह निम्न हैं-

1. किसी भी कवि द्वारा काव्य के सृजन की प्रक्रिया उसकी परिवेश के प्रति अपनायी गई संस्कारित मूल्य-दृष्टि के द्वारा ही संपन्न होती है।

2. कवि की मान्यताएँ, धारणाएँ, आस्थाएँ आदि ही उसके संस्कारों का स्वरूप हुआ करते हैं, जो उसके जीवन-मूल्य होते हैं।

3. किसी कवि में जिस प्रकार के संस्कार होते हैं, उस कवि में उन्हीं संस्कारों के अनुसार भाव, संचारीभाव, स्थायीभाव उद्बुद्ध हुआ करते हैं, जो अंततः उसकी सृजनात्मकता के माध्यम से पाठकों, श्रोताओं, दर्शकों के सामने आते हैं।

4. कवि के मन में संस्कार रूप में स्थायीभाव नहीं, मूल्य या विचार रहते हैं। कवि इन्हीं मूल्यों या विचारों के अनुसार विभिन्न प्रकार की भाव-अवस्थाएँ ग्रहण करता है। बात को थोड़ा स्पष्ट करने के लिए एक राष्ट्रीय मूल्यों को सर्वोपरि मानने वाले कवि की काव्याभिव्यक्ति इस प्रकार की होगी-

न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना

मुझे वर दे यही माता रहूँ भारत पै दीवाना।

भवन में रोशनी मेरे रहे हिंदी चरागों की

स्वदेशी ही रहे बाजा बजाना, राग का गाना।

    उक्त पंक्तियों में राष्ट्र के प्रति भक्ति का भाव कवि की राष्ट्र संबंधी  उन वैचारिक अवधारणाओं द्वारा संपन्न हुआ है, जो अंग्रेजों की कुनीतियों, अत्याचारों, दमन, शोषण आदि का अनुभव करने पर राष्ट्र को आजाद कराने के लिए जन्मीं। राष्ट्र को आजाद कराने की यही वैचारिक अवधारणाएँ अंग्रेजी साम्राज्य से टक्कर लेने के लिए वतन पर जान कुर्बान कर देने की प्रेरणा जब कवि को देती हैं तो उसकी रचनात्मक अभिव्यक्ति पाठकों के समक्ष इस प्रकार आती है-

सरपफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।

    राष्ट्रीय-मूल्यों को सर्वोपरि मानने वाले कवि अमर क्रांतिकारी रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ जिस समय उक्त प्रकार के काव्यात्मक मूल्य राष्ट्र को प्रदान कर रहे थे, वह अंग्रेजों की भारतीयों पर लगातार किए जाने वाले अत्याचारों का समय था। उस समय जिन कवियों को राष्ट्र के इस सिसकते परिवेश से कुछ लेना-देना नहीं था, उनकी चेतना में नदी, झरनों, पहाड़ों, फूलों के प्रतीक और उपमान तैर रहे थे। ऐसे सारे-के-सारे कवि पृथ्वी के रूप में नारी के ऊपर झुके पुरुष जैसे लग रहे मेघों से भाव, संचारीभाव और स्थायीभाव ग्रहण कर रहे थे-

घिर आया नभ

उमड़ आये मेघ काले

भूमि के कंपित उरोजों पर झुका-सा

विशद् श्वांसाहत चिरातुर

छा गया इन्द्र का नील वक्ष।

                 -सावन मेघ, अज्ञेय

    उपरोक्त उदाहरणों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि ‘‘किसी भी साहित्यिक कृति का संबंध कृतिकार के व्यक्तित्व से है। कृतिकार का रागात्मक जीवन और उसके आधार पर निर्मित जीवन-दर्शन कृति में अनिवार्यतः प्रतिफलित होता है।’’

सन्दर्भ-

1.  आस्था के चरण, डॉ. नगेन्द्र, पृष्ठ-80 

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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



विचार, संस्कार और रस [ एक ]


+रमेशराज

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    समूची मानवजाति की रागात्मक चेतना का विकास विशिष्ट स्थान, समाज, देश और काल की उन परिस्थितियों के बीच हुआ है, जिन्होंने उसकी चेतना को विभिन्न तरीकों से झकझोरा या रिझाया है। मानव का इस परिस्थितियों के प्रति समायोजित होने की स्थिति में रत्यात्मकता के रूप में रमणीयता तथा असमायोजन की स्थिति में पलायन या परिस्थितियों को बदल डालने की प्रक्रिया आदिकाल से चल रही है और जब तक मानव-अस्तित्व है, यह प्रक्रिया चलती रहेगी।

    परिस्थितियों के अनुसार मानव के अस्तित्व की सुरक्षा का चक्र जैसी-जैसी वैचारिक प्रक्रिया से होकर गुजरता है, उसी वैचारिक प्रक्रिया के अनुसार उसमें विभिन्न प्रकार की रागात्मकवृत्तियों का निर्माण तथा विकास होता चलता है। मानव अपनी सुरक्षा के लिए, परिस्थिति, परिवेश या काल में जैसी वैचारिक-प्रक्रिया अपनाता है, वह प्रक्रिया ही उसके रस या आनंद का विषय बनती है।

    मानव की यह वैचारिक-प्रक्रिया किस प्रकार रस और आनंद की अवस्था तक पहुँचती है, इसको समझने के लिए हमें मानव के गतिशील एवं सुप्त संस्कारों को समझना आवश्यक है। सामान्यतः संस्कार शब्द का अर्थ विवाह आदि के कृत्य, शुद्धि-सुधार, पवित्रता के कर्म आदि से लिया जाता है। यदि हम शब्द के अर्थ की गहराई में जाएँ तो संस्कार मानव की उस आत्मिक व्यवस्था के द्योतक हैं, जिनके मूल में मानव में नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का समावेश होता है। संस्कार हमें यह सिखलाते हैं कि मानव, अपने समाज के प्रति कैसा व्यवहार करे। लेकिन संस्कारों का उद्भव एवं विकास चूँकि विभिन्न देशों, जातियों, संप्रदायों एवं परिवेशों के बीच हुआ है, इसलिए संस्कारों संबंधी नैतिक मूल्यवत्ता भी इन्हीं दायरों में सिमटती हुई विकसित हुई है? जिसका परिणाम यह हुआ है कि एक समाज की नैतिकता, दूसरे समाज की नैतिकता के, एक संप्रदाय की सांप्रदायिकता, दूसरे संपदाय की सांप्रदायिकता के, एक समाज की धार्मिकता, दूसरे समाज की धार्मिकता के, एक राष्ट्र की राष्ट्रीयता, दूसरे राष्ट्र की राष्ट्रीयता के, एक वर्ग की आर्थिकता, दूसरे वर्ग की आर्थिकता के युग-युग से आड़े आती रही है। और जब तक लोक या समाज में इस प्रकार के दायरे कायम रहेंगे, यह समस्या, समस्या ही बनी रहेगी। इसलिए संस्कारों के दायरों पर कतिपय प्रकाश डालना यहाँ अभीष्ट होगा।

1.  धार्मिक संस्कार-

धर्म का अर्थ मनुष्य के उस व्यवहार से है, जो नैतिक, सामाजिक एवं मानवीय मूल्यों से युक्त हो, लेकिन धर्म शब्द संप्रदायों की सीमाओं में कैद होकर सिर्फ अलौकिक शक्तियों संबंधी क्रियाकलापों तक रूढ़ है। इसलिए विभिन्न संप्रदाय, विभिन्न दैवीय शक्तियों के प्रति किस प्रकार की पूजा-पद्यति तथा उनके किस प्रकार के स्वरूपों को अपनाकर चलते हैं, यह स्वीकारोक्तियाँ ही उनके धार्मिक स्वरूपों को स्पष्ट करने में सहायक हो सकती हैं। अतः विस्तार में न जाकर यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि जैसे हिंदू-संप्रदाय के धार्मिक संस्कारों का विकास सगुण, निर्गुण, शैव, वैष्णव, सनातन, आर्य जैसे कई संप्रदायों, उपसंप्रदायों से होकर गुजरा है, ठीक उसी प्रकार इस्लाम, ईसाई, बौद्ध संप्रदायों से लेकर विश्व के अन्य संप्रदायों का विकास भी विभिन्न उपसंप्रदायों आदि में विकसित हुआ है। इन संप्रदायों के धार्मिक-संस्कार चूँकि दूसरे संप्रदायों के धार्मिक संस्कारों से विपरीत एवं भिन्न हैं, इसलिए इन संप्रदायों की रूढ़ धार्मिकता, अन्य संप्रदायों की रूढ़ धार्मिकता को ग्रहण करने, या स्वीकारने में अवरोधक का कार्य करती है, जिसका परिणाम आज विभिन्न संप्रदायों का हिंसक-रक्तपिपासु रूप हम सबके लिए चिंता का विषय बना हुआ है। बहरहाल एक सांप्रदायिक मनुष्य को उसकी संप्रदाय-संबंधी  काव्य-सामग्री जहाँ रति और भक्ति जैसे रमणीय तथ्यों की ओर ले जाएगी, वहीं उसे दूसरे संप्रदाय की काव्य-सामग्री प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध से सिक्त करेगी। बाबरी मस्जिद प्रकार इसका ज्वलंत  प्रमाण है।

2.  सामाजिक संस्कार-

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज की रीति-रिवाज, मर्यादा, परंपरा आदि के अनुसार ऐसे सामाजिक संस्कार ग्रहण करता है जो उसे उस समाज के साथ तालमेल बिठाने में सहायक हुआ करते हैं। माँ, बहिन, बेटी, पिता, पुत्र से लेकर पति-पत्नी, चाचा-ताऊ , मौसा-मौसी तक के सारे-के-सारे मानवीय रिश्ते मनुष्य के उन वैचारिक मूल्यों की देन हैं, जिन्हें वह जन्म के बाद संस्कार के रूप में ग्रहण करता है और इन रिश्तों की सार्थकता के अनुसार आजीवन अपने व्यवहार को मर्यादित किए रहता है। मनुष्य के व्यवहार के इस संस्कार रूप का परिणाम यह है कि मनुष्य अपनी प्रेमिका या पत्नी के साथ तो संभोग जैसी प्रक्रिया से आसानी से गुजर जाता है, परंतु बहिन, बेटी या माँ के साथ उक्त प्रकार का विचार भी उसे जुगुप्सा से सराबोर कर डालता है। पूरा-का-पूरा हिंदी साहित्य इस बात का प्रमाण है कि आदिकाल में शकुन्तला-दुष्यन्त, भक्तिकाल में राम-सीता, रीतिकाल में राधा-कृष्ण या आधुनिक काव्य के नारी-पुरुष पात्र, प्रेमी-प्रेमिका के स्वरूप में ही रति या शृंगार संबंधी  क्रियाकलापों से गुजरे हैं, उनमें चुंबन, मिलन, विहँसन जैसे अनुभाव अन्य रिश्तों के साथ जागृत नहीं हुए हैं, यदि ऐसी अवस्था आई भी है तो उसका स्वरूप संभोग के स्वरूप से विपरीत है या स्वीकार नहीं किया गया है।

3.  आर्थिक संस्कार-

हमारा संपूर्ण भारतीय समाज या राष्ट्र पूंजीवादी व्यवस्था के कारण आर्थिक संबंधों पर आधरित है। आज ऐसा लगता है जैसे सामाजिक संबंधों की सार्थकता मात्र आर्थिक संबंधों की सार्थकता बनकर रह गई है, इसलिए पूरा का पूरा भारतीय समाज ऐसे आर्थिक चरित्र को अपनाता जा रहा है जिसके बीच मानवीय मूल्यवत्ता मृतप्रायः हो गयी है। धन एकत्रित करने की आपाधापी ने मनुष्य को ऐसे आर्थिक संस्कारों से ग्रस्त कर डाला है जो मनुष्य को शोषण, लूट-खसोट, डकैती, राहजनी और फरेब के रास्तों पर बढ़ने को प्रेरित करते हैं, जिसका परिणाम यह है कि चाहे ‘माया महा ठगिनि हम जानी’ जैसे उपदेश देनेवाले धर्म के ठेकेदार हों, चाहे समाजवाद या साम्यवाद का ढिंढोरा पीटने वाले नेता हों, सबके सब आदर्शवादी नारों, उपदेशों के बल पर अपने आर्थिकपक्ष को मजबूत करने में लगे हुए हैं। आर्थिक संस्कारों का वर्तमान स्वरूप इतना जटिल, क्लिष्ट और घिनौना हो चुका है कि उस पर जितना प्रकाश डाला जाए उतना ही कम है। जबकि आर्थिक संस्कारों का आदिकाल स्वरूप सिर्फ जीवनसुरक्षा या संततिसुरक्षा के सत्प्रयासों तक ही सीमित था, जिसका अपवाद रूप राजा या महाराजा या उनसे जुड़े कुछ खास व्यक्तियों, महाजनों आदि में जरूर मिलता है। लेकिन आज स्थिति यह है कि आर्थिक संस्कारों का राजा-महाराजाओं से शुरू हुआ संक्रामक रोग जनसामान्य में भी घुसपैंठ कर चुका है। आर्थिक संस्कारों के वर्तमान स्वरूप की देन यह है कि धन के बल पर व्यवसायी से लेकर राजनेताओं तक सारी साम्राज्यवादी ताकतें आम आदमी का चरित्र, उसकी इज्जत खरीदने में कमजोर वर्ग पर अनाचार, अत्याचार, अन्याय करने में सीना ठोंककर शान के साथ लगी हुई है। दहेज जैसी कुप्रथा भी इन्हीं आर्थिक संस्कारों की देन है। कुल मिलाकर आर्थिक संस्कारों का यह अजगरी चेहरा आज आदमी की सुख-शांति से लेकर उसकी सत्योन्मुखी संवेदनशीलता को निगलता जा रहा है। आर्थिक संस्कारों के कारण वर्तमान साहित्य में उभरा वर्ग-संघर्ष और दलित वर्ग की पीड़ा का करुणामय स्वरूप, कवि के माध्यम से आर्थिक संस्कारों की घिनौनी वृत्तियों से मुक्त कराने के लिए जिस प्रकार की चिंतन शैली और अभिव्यक्ति को अपना रहा है, उसकी रसात्मकता, आक्रोश, विरोध और विद्रोह आदि के रूप में देखी जा सकती है।

4.  राजनीतिक संस्कार-

गाँव के मुखियाओं, कबीले के सरदारों, राजा-महाराजाओं की आदिकालिक व्यवस्था से लेकर वर्तमान व्यवस्था चाहे जो रही हो, उसके मूल में जिस प्रकार के राजनीतिक संस्कारों की व्यवस्था अंतर्निहित है, उसकी प्रमुख कार्यप्रणाली या समस्त वैचारिक प्रक्रिया, जनता पर शासन करने की ही रही है। उक्त कार्य एक जाति, एक व्यक्ति या एक समाज ने, दूसरे व्यक्ति, दूसरी जाति, दूसरे समाज को शासित करने के लिए अपनी बौद्धिक, आर्थिक और शारीरिक क्षमताओं के बल पर किया है। यह राजनीतिक संस्कारों का ही परिणाम है कि अंग्रेजों ने पूरे विश्व को शासित करने का प्रयास किया। हिटलर ने पूरे विश्व की समस्त जातियों से, अपनी जाति को श्रेष्ठ और शासक माना। गलत राजनीतिक संस्कारों से ग्रस्त शासक, न्याय और सुरक्षा के नाम पर जनसामान्य का शोषण, उस पर अत्याचार युग-युग से करते आए हैं। शासकों के घिनौने संस्कारों का स्वरूप वर्तमान में भी ज्यों-का-त्यों विद्यमान है। वर्तमान कविता में गलत राजनीति के प्रति जिस प्रकार विरोध, विद्रोह, प्रहार और चुनौती के स्वर मुखरित हो रहे हैं, वह मानव की एक ऐसी आंतरिक छटपटाहट के द्योतक हैं जो मानव को हर हालत में इस शोषक राजनीतिक व्यवस्था से मुक्त देखना चाहते हैं।

5.  राष्ट्रीय संस्कार-

हर राष्ट्र की सुरक्षा, एकता, अखंडता, ऐसे राष्ट्रीय चिंतकों की सूझ-बूझ और वैचारिक प्रक्रिया पर निर्भर हुआ करती है, जो राष्ट्र के अस्तित्व को जाति, धर्म , व्यक्ति, संप्रदाय आदि से ऊपर उठाकर मूल्यांकित करते हैं। एक राष्ट्रीय संस्कारों से ओत-प्रोत व्यक्ति या नागरिक की विशेषता यह होती है वह उठते-बैठते, जीते-मरते सिर्फ राष्ट्र के अस्तित्व की सुरक्षा के बारे में सोचता है। अमरक्रांतिकारी भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशपफाक, सूर्यसेन तिलक, सुभाष आदि राष्ट्रीय संस्कारों से युक्त ऐसे महानायकों के ज्वलंत प्रमाण हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए असह्य कष्ट झेले, हँसकर फाँसी पर चढ़े या सीने पर गोलियाँ खायीं। राष्ट्रीय संस्कारों की ओजपूर्ण अभिव्यक्ति जिस प्रकार भगतसिंह, बिस्मिल, अशपफाक आदि के साहित्य में हुई है, ऐसे प्रमाण अत्यंत दुर्लभ हैं।

6.  व्यक्तिवादी संस्कार-

जब किसी व्यक्ति की वैचारिक अवधारणाएँ समाज, राष्ट्र या मानव के स्थान पर स्वअस्तित्व की पुष्टि या पोषण करने लगती हैं तो उस व्यक्ति में ऐसे संस्कारों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जो नितांत स्वार्थपरक, वैयक्तिक होती है। एक व्यक्तिवादी संस्कारों से ग्रस्त व्यक्ति की विशेषता यह होती है कि वह छल-प्रपंच, झूठ, अनैतिकता, व्यभिचार, थोथे दंभ का सहारा लेकर सामाजिक, राष्ट्रीय और मानवीय मूल्यों की हत्या करने में हर समय लगा रहता है। ऐसा व्यक्ति चारित्रिक पतन के ऐसे बदबूदार तहखानों में जीता है, जिसमें घिनौनी मानसिकता के कीड़े हर समय बुदबुदाते रहते हैं।

वर्तमान समय में भारतीय फिल्म निर्माता, अपराध-कथा लेखक या कविसम्मेलनों के चुटकुलेबाज अपनी अर्थपूर्ति के लिए रसात्मकता के नाम पर, जिस प्रकार का गैर-मानवीय जहर दे रहे हैं, ठीक उसी प्रकार का जहर आदिकाल से लेकर अब तक हमारे धर्म के ठेकेदारों, तथाकथित रसवादियों ने दिया। यह व्यक्तिवादी संस्कारों का ही परिणाम है कि-

नर्तकी के पाँव घायल हो रहे

देखता एय्याश कब यह नृत्य में।

    व्यक्तिवादी संस्कारों की शिकार सारी-की-सारी साम्राज्यवादी ताकतें, चाहे वे धर्मगुरु , पुजारी-पंडे, महाजन, उद्योगपति, दुकानदार, पक्ष-विपक्ष के नेता, सरकारी मशीनरी के नुमाइंदे हों, अधिकांशतः अनैतिकता का सहारा लेकर पूरे राष्ट्र को तहस-नहस करने पर तुले हैं। यह व्यक्तिगत संस्कारों का ही परिणाम है कि एक बलात्कारी को बलात्कार में, डकैत को डकैती डालने, तस्कर को तस्करी जैसे अमानवीय कृत्यों में सुखानुभूति होती है। कुल मिलाकर व्यक्तिवादी संस्कारों से ग्रस्त व्यक्ति का सुख, दूसरों को हर स्तर पर दुःखानुभूति से ही सिक्त करता है। इसी तथ्य की मार्मिक अभिव्यक्ति महाकवि रहीम अपने एक दोहे के माध्यम से इस प्रकार करते हैं-

कह रहीम कैसे निभै बेर-केर कौ संग

वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग।

7.  मानवीय संस्कार-

मानवीय संस्कार, मानव के ऐसे मूल्य हैं, जिनकी अर्थवत्ता समूचे विश्व को बिना किसी भेदभाव के एक रागात्मकता के साथ जोड़ती या मूल्यांकित करती है। मानवीय संस्कारों के अंतर्गत समूचे लोक की मंगलकामना एक ऐसी वैचारिक प्रक्रिया ग्रहण करती है, जिसमें व्यक्तिगत विद्वेष, अत्याचार, बर्बरता, शोषण, उत्पीड़न जैसी अमानवीयता का किंचित स्थान नहीं होता। मानवीय मूल्यों से संस्कारित व्यक्ति का सुख-दुःख समूचे लोक के सुख-दुःख से जुड़ जाता है। लोक में ऐसे अनेक महान् पुरुष हमें मिल जायेंगे, जिन्होंने अपना जीवन-राग, मानव-राग बनाकर जीया। कार्ल मार्क्स की समूची संवेदनशीलता विश्व के उन शोषित और पीडि़त जनों के पक्ष में उभरी, जो शोषक वर्ग के हमेशा से शिकार होते आए हैं।

         आधुनिक भारतीय साहित्य का रुझान जिस प्रकार मानवीय मूल्यों की ओर बढ़ा है, वह रुझान प्रमुख रूप से कबीर से प्रारंभ हुआ था और भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, निराला, धूमिल, गुलेरी, रेणु से लेकर आज जाने कितने युवा और प्रतिष्ठित साहित्यकारों में हैं, जो भारतीय समाज को मानवीय मूल्यों से संस्कारित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

    इस लेख में संस्कारों के विभिन्न रूपों पर प्रकाश डालने के पीछे हमारा मकसद यह बताना रहा है कि संस्कार मूलतः हमारे वे वैचारिक मूल्य होते हैं, जिनके द्वारा हमारी रागात्मकवृत्तियों का निर्माण होता है। वीरगाथाकालीन काव्य में राजाओं के व्यक्तिवादी चिंतन ने जहाँ वीरता के नाम पर मानवता को रौंदा, वहाँ भक्तिकाल में राजाओं के स्वरूप दैवीय शक्तियों के प्रतीक बनकर, श्रद्धा और भक्ति के पात्र हो गए। रीतिकाल, छायावाद, प्रयोगवाद का साहित्य नारी को भोग-विलास का शृंगारपरक वर्णन बना। इसी तरह इस सबसे अलग भारतेंदु, द्विवेदी और वर्तमानकाल सत्योन्मुखी व्यवस्था की स्थापनार्थ व्यक्तिवादी मूल्यों के विरोध में संघर्ष की गाथा बना है। इसके पीछे साहित्य के मूल में कवि के वह संस्कार कार्य कर रहे हैं, जिनकी वैचारिक ऊर्जा अंततः किसी-न-किसी रस में तब्दील होती है।

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रमेशराज गुप्त 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



काव्य का आस्वादन


+रमेशराज

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काव्य में संदर्भ में, पुराने काव्यशास्त्रिायों से लेकर वर्तमान काव्यशास्त्री ‘आस्वादन’ शब्द का प्रयोग किसी-न-किसी रूप में करते आ रहे हैं। स्वाद का सीधा संबंध जिह्वा से होता है। लेकिन काव्य के संदर्भ में आस्वादन की प्रक्रिया मात्र स्वादेंद्रियों तक ही सीमित नहीं रहती। उसकी प्रक्रिया हर प्रकार की इंद्रियों द्वारा संपन्न होती है। चूंकि इंद्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान का अनुभव अंततः मस्तिष्क द्वारा ही होता है, अतः हर प्रकार का इंद्रियबोध आस्वादन का विषय बन जाता है। इसलिए काव्यशस्त्रिायों ने अगर किसी भी प्रकार की सामग्री को आस्वादन का विषय बनाया है तो इसमें कोई अचरज नहीं। लेकिन काव्य में आस्वादन सामग्री क्या है तथा इसके आस्वादन की प्रक्रिया किस प्रकार संभव होती है? इन प्रश्नों का समाधान जब तक वैज्ञानिक तरीकों से नहीं किया जाता, तब तक आस्वादन की समस्या, समस्या बनी रहेगी।

    काव्य में आस्वादन सामग्री के रूप में किसी विशेष समाज की विशेष मान्यताएँ, आस्थाएँ, परंपराएँ कवि के अनुभव एवं उसकी वैचारिक अवधारणाओं के साथ निहित होते हैं, जिनका आस्वादन एक सामाजिक छंदों, अलंकारों, भाषा-प्रयोगों, ध्वनियों आदि के माध्यम से करता है। यदि हम भारतीय सामग्री का विवेचन करें तो यह सामग्री हमें धार्मिक, सामाजिक, सांप्रदायिक, व्यक्तिवादी, राष्ट्रीय एवं मानवीय मूल्यों के रूप में आदिकाल से लेकर वर्तमान काल की मान्यताओं को अपने भीतर विचारधाराओं के रूप में सहेजे हुए मिलती है। रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्यों का आस्वादन [ भारतीय जनमानस की धर्म के प्रति आस्था होने के कारण ] जितना किया गया है, उतना किसी अन्य भारतीय ग्रंथ का नहीं। इन महाकाव्यों के समांतर मुस्लिम संप्रदाय के बीच ‘कुरान’ का आस्वादन भी सर्वाधिक है। हिंदू तथा मुस्लिम संप्रदायों के उक्त महाकाव्यों में आस्वादन के कारणों का यदि हम पता लगाएँ तो इनके आस्वादन के पीछे इन संप्रदायों के वे धार्मिक संस्कार रहे हैं, जिनके अंतर्गत दोनों संप्रदायों ने ईश्वर के अवतार के रूप में किसी-न-किसी राजा या पैगंबर में आत्म-सुरक्षा की तलाश की है। आत्म-सुरक्षा के उक्त विचारों के कारण ही यह महाकाव्य आस्वादन का विषय बने हैं।

    लेकिन किसी कृति का आस्वादन रुचिकर और रसमय है, मात्र इसी आधार पर उस कृति का सही मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। मूल्यांकन की कसौटी तो यह होनी चाहिए कि कृति के आस्वादनोपरांत लोक या समाज पर उसका क्या प्रभाव दिखलायी दिया? उस कृति से लोक को कितनी और किस प्रकार की आत्म-सुरक्षा मिली?

काव्य में प्रस्तुत आस्वादन सामग्री कितनी भी रोचक, चटपटी, अलंकारों से लैस और किसी संप्रदाय, जाति, वर्ग आदि को कितना भी तुष्ट करने वाली हो, परंतु यदि उसका आस्वादन कुप्रभावी है तो वह सामग्री अपनी समस्त विशेताओं के बावजूद अमंगलकारी, अमानवीय ही मूल्यांकित की जानी चाहिए। ‘ढोर गँवार सूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी’ जैसी आस्वादन सामग्री को धार्मिक और सांप्रदायिक आस्थाओं से जोड़कर हमारे कथित रसवादी, पाठक या श्रोता के कथित हृदय में चाहे जिस भक्तिरस या ईश्वर-रस की वर्षा कराएँ, लेकिन आस्वादनोपरांत लोक या समाज की जो रसदशा बनेगी, वह कितनी मंगलकारी और लोकोन्मुखी होगी? इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है। यह रसदशा हमें उस अमानवीयता की ओर ले जाएगी, जिसमें वजह-बेवजह पशु, शूद्र और नारी को गँवार समझकर प्रताड़ित किया जाता रहेगा और इस प्रताड़ना के सारे-के-सारे अधिकार हर अत्याचारी पुरुष के पक्ष में चले जाएँगे। ‘होगा वही राम रचि राखा’ जैसी काव्य-सामग्री के आस्वादन को एक तथाकथित भक्तिभाव से ओतप्रोत समाज भले ही रसिकता और कथित सहृदयता के साथ स्वीकार ले, लेकिन वह सामाजिक जिसमें जरा-सी भी बुद्धि का समावेश है, उसको उक्त आस्वादन सामग्री की रसात्मकता, सौंदर्यात्मकता में साम्राज्यवाद की दुर्गंध आने लगेगी। जिसे आज का कवि इस प्रकार अभिव्यक्ति दे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए-

1. कैसी मशाल लेके चले तीरगी में आप

जो रोशनी थी, वो भी सलामत नहीं रही।

2. जो भी आता है मसीहा बनकर

सलीब हमको सौंप जाता है।

3. रात-भर रामधुन के हल्ले में

जाने क्या-क्या हुआ मुहल्ले में?

    ठीक इसी प्रकार रीतिकालीन काव्य में वर्णित आत्मा और परमात्मा के रूप में कष्ण और राधा का कथित पवित्र मिलन तब कितना पवित्र रह जाएगा, जबकि आत्मा से परमात्मा के मिलन की एक पाठक यह दशा देखेगा कि आत्मा के बेर जैसे रूप संतरे जैसे होते जा रहे हैं, कुचों के उभार स्तूपाकार हो चले हैं, जाँघों के बिंब केले के उल्टे रखे हुए तने की तरह बन रहे हैं। काव्य-सामग्री के माध्यम से वर्णित उक्त दशा के आस्वादनोपरांत पाठक के मन में कैसी रसवर्षा होगी, और उसक कौन-सा अंग आर्द्र हो उठेगा, क्या हमारे कथित आनंदवादी रसाचार्य इसका उत्तर दे सकते हैं?

यदि आस्वादन सामग्री कथित रस-परिपाक के स्थान पर तर्क और विचार की कसौटी पर परखे जाने की सामर्थ्य से युक्त मानवीय मूल्यों से लैस और लोक-जीवन की मूल समस्याओं का हल खोजने वाली है तो वह आस्वादनोपरांत मानव में छुपे संघर्ष के तत्त्वों को कुरेदेगी, उन्हें अत्याचारी षड्यंत्रकारी वर्ग के प्रति विरोध और विद्रोह से सिक्त करेगी। शोषण, यातना, अराजकताविहीन समाज के निर्माण-कार्य में सहयोग प्रदान करेगी। इसलिए किसी भी काव्य-सामग्री का आस्वादन लोकमंगल को साधनावस्था के नाम पर किसी अलौकिक ब्रह्मस्वरूप, रामस्वरूप, ईसा-स्वरूप, पैगंबरस्वरूप को यदि तलाशने के लिए प्रेरित करता है तो यह तलाश मानवीय मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में निरर्थक ही रहेगी। मानव द्वारा मानवस्वरूप की स्थापना ही लोक या समाज को लोकोन्मुखी, समाजोन्मुखी मंगलकारी व्यवस्था दे सकती है। कुल मिलाकर किसी भी काव्य-सामग्री के आस्वादन के माध्यम से, संप्रदाय, जाति, साम्राज्य, अनाचार और अनीति को खत्म करने का प्रयास ही सही अर्थों में मुक्ति और मोक्ष का प्रयास होगा।

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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



विचार और रस [ तीन ]


+रमेशराज 

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रसाचार्यों द्वारा गिनाए विभिन्न प्रकार के रसों का रसात्मकबोध अंततः इस तथ्य पर आधारित है कि इन रसों की आलंबन सामग्री किस प्रकार की है और वह आश्रयों को किस तरीके से उद्दीप्त करने का प्रयास कर रही है। आलंबन विभावों का आश्रयों को उद्दीप्त करने का तरीका ही, उनके मन में विभिन्न प्रकार के रसों का बोध कराता है।

आलंबन एवं उद्दीपनविभाव का जो परंपरागत ताना-बाना तैयार किया गया है, वह अधूरा इसलिए है कि नायक और नायिका के गुण-धर्म तथा इनसे अलग प्रकृति के जो गुण-धर्म रस-सामग्री के रूप में रसाचार्यों द्वारा बताए गए हैं, वह गुण-धर्म ही रसोद्बोधन के मूल आधार हैं, न कि नायक और नायिका। बात अटपटी अवश्य लग सकती है लेकिन यह एक ऐसी वास्तविकता है जिसको समझे बिना रसात्मकबोध के वैज्ञानिक स्वरूप को किसी भी हालत में नहीं समझा जा सकता है। इसलिए विभिन्न रसों पर चर्चा करने से पूर्व यह समझ लिया जाये कि जिस आश्रय में जिस प्रकार का रस बनता है, उसमें आलंबन और उद्दीपनविभाव के वे कौन-से गुण-धर्म  रहे हैं, जो आश्रय को उस रसदशा तक ले जाने में सहायक हुए हैं?

रस में विचारणीय क्या है-आलंबन या आलंबन के गुणधर्म ? उद्दीपन विभाव या उसके गुणधर्म ? इसकी व्याख्या के लिए हम कुछ रसों की, रससामग्री पर मनोवैज्ञानिक रूप से विचार करते हैं-


[ क ] शृंगार रस-


शृंगार रस की रस-सामग्री के रूप में [ परंपरागत चिंतन के अनुसार ] नायक और नायिका आलंबन होते हैं। लेकिन आलंबन विभाव के अंतर्गत इनकी उत्तम प्रकृति, गुणरूप संपन्न्ता, चिरसाहचर्य एवं श्रेष्ठता के जो गुण-धर्म  जोड़े गए हैं तथा उद्दीपनविभाव के अंतर्गत नायक-नायिका की वेशभूषा, शारीरिक चेष्टाएँ आदि आलंबनगत-उद्दीपनविभाव के रूप में तथा ऋतुसौंदर्य, नदी-तट, चंद्रज्योत्स्ना, वसंत, एकांत, उपवन, कविता, मधुर संगीत, पक्षियों का कलरव आदि प्रकृतिगत उद्दीपनविभाव के रूप में दर्शाए गए हैं | दरअसल ये सब आलंबन या उद्दीपन के गुण आलंबनों को आश्रय के रूप में जब रति की अवस्था में ले जाते हैं तो इस रति के निर्माण के पीछे जो विचार कार्य करता है, उसके अंतर्गत नायिका के प्रति नायक में रति इस कारण जागृत होती है, क्योंकि नायक यह निर्णय ले चुका होता है कि नायिका  प्रकृति श्रेष्ठ, गुणसंपन्न, उत्तम है तथा वह अपने हाव-भावों, वेशभूषा से यह संकेत दे रही है कि चांदनी रात है, नदी का किनारा है, पंछियों का कलरव, एकांत, ऋतु-सौंदर्य मन को मादक बनाए जा रहा है, ऐसे में आओ स्पर्श, आलिंगन और चुंबन आदि का सुख भोगें। नायिका की मोहक भंगिमाओं की संकेतक्रिया से नायक-नायिका की मनःस्थितियों को भाँपकर, ऐसे में यह निर्णय लेता है कि सारी स्थिति-परिस्थिति उसके पक्ष में है और हर तरह से प्रेम को सुरक्षा प्रदान करने वाली हैं, अतः वह नायिका का सामीप्य-सुख भोगने के लिए बेचैन हो उठता है। नायिका के साथ नायक का यह सामीप्य ही उसमें रति को जागृत करता है, जिसकी निष्पत्ति शृंगार के रूप में होती है। आश्रय के रूप में नायिका के प्रति भी उपरोक्त वैचारिक प्रक्रिया उसे रति से सिक्त करती है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि रस-सामग्री के रूप में रसाचार्यों ने चिरसाहचर्य को भी रखा है। यह चिरसाहचर्य ही वह वैचारिक  प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत नायक-नायिका एक-दूसरे के प्रति प्रेमी-प्रेमिका बनने की कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं। प्रेमी-प्रेमिका बनने की यह कसौटी रागात्मक संबंधों की प्रगाढ़ता के बिना किसी प्रकार संभव नहीं। रागात्मक संबंधों  की यह प्रगाढ़ता निस्संदेह उस विचार के कारण जन्म लेती है जिसमें एक-दूसरा, एक-दसरे के आत्म को संतुष्टि और सुरक्षा प्रदान करने का निश्छल और भरसक प्रयास करता है।

    इस प्रकार रति संबंधी उक्त व्याख्या से जो तथ्य उभरकर सामने आते हैं, उन्हें संक्षिप्त रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-

1. नायक और नायिका में रति चिरसाहचर्य से रति इस कारण पैदा होती है, क्योंकि नायक और नायिका लगातार यह विचार करते हैं कि-‘‘ एक-दूसरे का सामीप्य सुख भोगा जाए।’’ ‘सामीप्य सुख’ का यह विचार ही उन्हें एक-दूसरे के प्रति लगातार आकर्षित करता है।

2. नायक-नायिका का चिरसाहचर्य एक-दूसरे के मन में यह धारणाएँ निर्धारित कर देता है कि-‘‘जिसके साथ वह प्रेम-संबंध स्थापित करने जा रहे हैं या कर रहे हैं, वह श्रेष्ठ प्रकृति, उत्तम गुणधर्म वाला है, जो प्रेम में विश्वासघात नहीं कर सकता। उसका प्रेम सच्चा, पवित्र और निश्छल है।’’

3.  नायक-नायिका का प्रेम इस विचार के द्वारा भी तय होता है कि वे जिसे प्रेम कर रहे हैं, उसके साथ चुंबन-विहँसन-आलिंगन [ चाहे चोरी-छुपे ही सही ] असामाजिक नहीं है।’’ अर्थात् उन दोनों के बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं, जो बहिन-भाई, पिता-पुत्री, माँ-बेटे के पावन संबंधों  को अपराधबोध  से ग्रस्त कर सके।

4. काव्य के नायक-नायिका का परकीया-प्रेम, अधिकांशतः उन स्थलों पर उभरा है जहाँ चांदनी रात, नदी का किनारा, पक्क्षियों का कलरव, अर्थात् कुल मिलाकर सामाजिक एकांत हो। इसका कारण भी नायक-नायिका के वे निर्णय हैं, जिनके तहत वे निर्विघ्न, निर्द्वन्द्व होकर रतिक्रिया कर सकें।

    कुल मिलाकर भारतीय काव्य में शृंगाररस की निष्पत्ति नायक-नायिका के उस स्वरूप में निर्धारित है, जिसमें नायक-नायिका के शारीरिक भोग की तीव्र उत्कंठा की शांति, समाज से छुपकर ऐसे स्थलों पर प्राप्त होती है, जहाँ उन्हें रतिक्रिया के समय किसी भी प्रकार की असुविधा , असुरक्षा अनुभव न हो।

    इस प्रकार शृंगाररस का सारा-का-सारा प्रसंग इस बात पर निर्भर है कि नायक और नायिका चोरी-छुपे इंद्रिय भोग का सुख लूटें। इंद्रिय भोग के सुख लूटने के समय नायिका के पिता, भाई या माँ यकायक यदि उस स्थल पर उपस्थित हो जाएँ तो सारा-का-सारा शृंगाररस भय, जुगुप्सा, लज्जा में तब्दील में हो जाता है। ऐसा नायक-नायिका के मन में आए इस विचार के कारण होता है कि वे माता-पिता के सामने सामाजिक-अपराध करते पकड़े गए हैं। अब उनकी खैर नहीं।’’

    उक्त उदाहरणों से यह तो स्पष्ट है ही कि मन में जिस प्रकार का विचार उपस्थित होता है, उसके अनुसार ही उनमें रस की स्थिति देखी जा सकती है। ठीक इसी तरह वियोग शृंगार के अंतर्गत नायक और नायिका में मिलन की उत्कंठा तो तीव्र रहती है, लेकिन ‘मेरा प्रेमी मुझसे बिछुड़ गया है और अब न जाने कब मिलेगा?’ का विचार उनके नयनों में अविरल अश्रुधार, चेहरे पर मलिनता, अंग-प्रत्यंग में जड़ता और मन में दुख का समावेश बनाए रखता है।

अतः काव्य का यह शृंगारिक संयोग और वियोगपक्ष मात्र आलंबन या उद्दीपनविभाव के ही द्वारा तय नहीं किया जा सकता, इसके लिए आवश्यक तत्त्व जहाँ नायक-नायिका के गुणधर्म हैं, वही दूसरी ओर उद्दीपन की गुणधर्मिता भी रतिक्रिया को रसाभास या विपरीत रस में तब्दील कर सकती है। जो नायक-नायिका को तरह-तरह से प्रताडि़त करता हो, यातनाएँ देता हो, उन दोनों के बीच रति का चरमोत्कर्ष शायद ही देखने को मिले। ठीक इसी प्रकार चाँदनी रात, पक्षियों के कलरव और एकांत के बीच यदि कोई प्राकृतिक प्रकोप पैदा हो जाए तो नायक-नायिका की रति भयानक रस में बदल जाएगी।


[ ख ] अन्य रस-


शृंगार रस के विवेचन के उपरांत यदि हम रौद्ररस का विवेचन करें तो नायक में स्थायीभाव क्रोध तभी जागृत होता है जबकि वह विचार करता है कि ‘‘उसके आलंबनविभाव के रूप में जो व्यक्ति उसके सम्मुख है, वह उसे किसी भी प्रकार की हानि पहुंचाने के लिए उद्यत है। यदि इसका विनाश नहीं किया गया तो यह मुझे [ नायक को ] खत्म कर सकता है।’’ यह स्थिति बहुध युद्ध के लिये प्रेरित करती है।

    ठीक इसी प्रकार जब वीर नायक यह अनुभव करता है कि उसके समक्ष एक दीन, दुःखी व्यक्ति या व्यक्ति समूह सहायता के लिए चीख रहा है तो नायक यह विचार कर कि ‘दीनों पर दया करना तो वीरों का धर्म है’, सहायता के लिए उत्साहित हो उठता है। नायक के मन में आया यह उत्साह उसकी वीरता का ही परिचायक है, जिसमें वह दीन और दुःखी व्यक्तियों को बचाने, उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए अपने प्राण तक संकट में डाल देता है।

    नायक जब यह विचार करता है कि ‘‘उसके समक्ष कोई भयंकर वस्तु या व्यक्ति, शत्रु अथवा हिसंक प्राणी, भूत, प्रेतादि उपस्थित है, जिससे वह अपनी सुरक्षा नहीं कर सकता, किसी भी क्षण उसका विनाश हो सकता है’’ तो वह भय से ग्रस्त हो जाता है, जिसका चरमोत्कर्ष भयानक रस के रूप में उसे चिंता, दैत्य, त्रास, मूच्र्छा, आवेग, संभ्रम, शंका आदि से सिक्त कर सकता है।

    अद्भुत रस के अंतर्गत आलंबन एवं उद्दीपनविभाव के गुण-धर्म  अद्भुत, अलौकिक, असाधरण, अवश्य होते हों, लेकिन उन्हें देखकर नायक के मन में किसी भी प्रकार की असुरक्षा या विनाश के विचार जन्म नहीं लेते, अतः नायक या आश्रय सिर्फ आश्चर्य या विस्मय के भाव या उद्बोधित होते हैं, जिसके कारण आलंबनविभाव के प्रति वह अद्भुत रस से सिक्त हो जाते हैं।

    आचार्य भरतमुनि द्वारा बताए गए अन्य रसों का भी यदि हम वैचारिक विवेचन करें तो सारे-के-सारे रसोद्बोधन के पीछे वस्तुओं या व्यक्तियों के गुणधर्म ही अपनी अहम भूमिका निभाते हैं।

आलंबन या उद्दीपनविभाव के गुण-धर्म को आश्रय जिस प्रकार के अर्थ देते जाते हैं, आश्रयों में उसी प्रकार के रस की निष्पत्ति होती चली जाती है।

    रस निष्पत्ति की इन विभिन्न स्थितियों को समझाने के लिए हम रामायण के पात्र राम को आलंबनविभाव के रूप में ले तो उनका बाल्यकाल आश्रय पिता, दशरथ व माता कौशल्या में जहाँ वात्सल्य रस की निष्पत्ति करता है, वहीं राम जब वनवास को जाते हैं तो माँ कौशल्या, पिता दशरथ शोक से ग्रस्त हो जाते हैं। राम जब सुग्रीव-हनुमान आदि के समक्ष मधुर , श्रेष्ठ, मानवीय और प्रभुसमान व्यवहार करते हैं तो सुग्रीव-हनुमान आदि में भक्ति जागृत होती है, जबकि रावण के विनाश के लिए जब इन्हीं भक्तों को प्ररित करते हैं तो भक्तों में वीररस की निष्पत्ति हो जाती है। इस प्रकार यह तथ्य सरलता से समझाया जा सकता है कि आलंबनविभाव किसी भी प्रकार के रस के निर्माण में योगदान नहीं देता, योगदान देते हैं तो आलंबनविभाव के गुण-धर्म, जिनसे अपने निर्णयों के अनुसार कोई भी आश्रय विभिन्न प्रकार के रसों से सिक्त होता है।

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रमेशराज गुप्त 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



रससिद्धान्त मूलतः अर्थसिद्धान्त पर आधारित


[ विचार और रस-2 ]


+रमेशराज

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    आचार्य भरतमुनि ने रस तत्त्वों की खोज करते हुए जिन भावों को रसनिष्पत्ति का मूल आधार माना, वह भाव उन्होंने नाटक के लिये रस-तत्त्वों के रूप में खोजे और अपने ‘विभावानुभाव व्यभिचारे संयोगाद् रसनिष्पतिः’ सूत्र के द्वारा यह बताया कि नाटक के विभिन्न पात्रों में भावों के सहारे किस प्रकार रसोद्बोधन होता है? रसोद्बोधन की इस प्रक्रिया को मंच पर अभिनय करने वाले पात्रों नट-नटी आदि पर लागू करते हुए उन्होंने स्पष्ट कहा कि ‘स्थायीभाव, विभावादि के संयोग से जो रसनिष्पत्ति होती है, वह रंगपीठ पर स्थित आश्रयों के हृदय में होती है, सहृदय तो उसे देखकर हर्षादि को प्राप्त होते हैं।1

    लेकिन रस-शास्त्र का दुर्भाग्य यह रहा कि ‘‘ जो रस-सूत्र रंगपीठ या काव्य में रस के निर्यामक तत्त्वों का निरूपण करने वाला था, उससे सहृदयगत रस का काम लिया जाने लगा।’’

    इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह रही कि भरतमुनि ने काव्य या नाटक की भावों के सहारे जो रसात्मक व्याख्या की, उस व्याख्या से सीधा अर्थ यह लगा लिया गया कि काव्य में जो कुछ भी रसनीय है, वह भावों का ही परिणाम है। ‘काव्यं रसात्मक वाक्यं’ जैसे जुमलों के अंधानुकरण से आज भी स्थिति यह है कि बुद्धितत्त्व रसाभास का कारण बना हुआ है तथा आश्रय को एक निर्जीव-गूंगा, पात्र या एक कैमरा बनाकर रख दिया गया है। होना यह चाहिए था कि आश्रयगत रस की व्याख्या, काव्य या नाटक को रसनीय बनाने वाले तत्वों से अलग रखकर की जाती। क्योंकि, ‘‘काव्य या नाटक में वे कौन से तत्त्व हैं, इस बात के विवेचन से यह बात भिन्न है कि सहृदय के हृदय में उस रसनीय काव्य-प्रस्तुति के द्वारा किस प्रकार का रस-संचार हो रहा है और उसका स्वरूप क्या है।’’2

    यदि हम आश्रयगत रस का विवेचन करें तो उस रस-विवेचन से हमें कई नए तथ्यों के साथ-साथ इस तथ्य की भी जानकारी मिल जाती है कि ‘‘काव्य का कला पक्ष [ विशिष्ट शब्दावली ] आश्रय के मन में सीधे घुसकर अर्थ निवेदित करता है।3’’

    यदि हम इस अर्थ निवेदन की गहराई में जाएँ तो यह तथ्य निर्विवाद है कि हर शब्द अपने में एक सुनिश्चत अर्थ रखता है। विशिष्ट प्रकार के शब्दों के समूह जब पाठक, श्रोता या दर्शकों के एन्द्रिक माध्यमों द्वारा ग्रहण किए जाते हैं तो आश्रय अपने मानसिक स्तर पर उस विशिष्ट शब्दावली को अर्थ प्रदान कर एक विशिष्ट निर्णय लेता है और उसके प्रति उस निर्णयानुसार अपने अनुभावों में, अपनी रसात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।’’ क्योंकि मनुष्य का मन किसी वस्तु को ज्यों-की-त्यों ग्रहण करता हुआ नहीं चलता, प्रतिक्रिया करना तो उसका स्वभव है।’’4

    काव्य में वर्णित सामग्री के प्रति आश्रयों की प्रतिक्रिया के विभिन्न रूप हमें नाटक देखते हुए दर्शकों के बीच जहाँ स्पष्ट पता चल सकते हैं, वहीं आलोचना के क्षेत्र में आलोचकों की आलोच्य सामग्री में इस प्रकार की विभिन्न प्रतिक्रियाओं के विभिन्न रूप पढ़े या सुने जा सकते हैं। इसी कारण डॉ. राकेश गुप्त एवं डॉ. नगेन्द्र इस बात की स्पष्ट घोषणा करते हैं कि ‘‘काव्य या नाट्य प्रस्तुति की आलोचना भी रसात्मक हुआ करती है। 5 ‘‘ रस का अभिषेक आलोचना में भी रहता है।’’6

    अतः काव्य या नाटक प्रस्तुति से एक आश्रय के मन में किस प्रकार की रस-निष्पत्ति कैसे होती है? इसके लिए काव्य या नाटक के आलोचकों, समीक्षकों या रसमर्मज्ञों को ही हम सबसे अधिक प्रामाणिक तौर पर रख सकते हैं, क्योंकि रसनिष्पत्ति के संबंध में अब तक जिन आश्रयों को लिया जाता रहा है, वे ऐसे कल्पित आश्रय रहे हैं, जिनके बारे में रस-निष्पत्ति संबंधी कोई भी सिद्धान्त गढ़कर उन्हें प्रमाण के रूप में किसी भी तरह तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जाता रहा है। ऐसे आश्रयों के लाख प्रमाण देने के बावजूद, हमारे समक्ष ऐसे नाम प्रमाण रूप में नहीं दिए गए हैं, जिसके आधार पर रसाचार्य यह कह सकें कि यह रहे वे आश्रय, जिनमें इस प्रकार के रस की निष्पत्ति हुई है या इनका साधरणीकरण हुआ है।

    ‘कविता के नए प्रतिमान’ [ लेखक डॉ. नामवर सिंह ] पुस्तक के पाँचवें अध्याय में वर्णित ‘मूल्यों का टकरावः उर्वशी विवाद’  को ‘उर्वशी’ काव्यकृति के प्रामाणिक आस्वादकों के रूप में कुछ प्रामाणिक आलोचकों को लेकर आइए तय करें कि उनका इस काव्यकृति के प्रति रसात्मकबोध किस प्रकार का है और डॉ. नामवर सिंह की इस मान्यता को परखने का प्रयास करें कि ‘रस-निर्णय अंततः अर्थ-निर्णय पर निर्भर है।’’ पाठक की कोरी रसानुभूति का विषय नहीं, बल्कि प्रस्तुत काव्य के सूक्ष्म विश्लेषण से संबध  है।’’7

    ‘उर्वशी’ के सुधी पाठक एवं प्रसिद्ध  आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा मानते हैं कि-‘‘ दिनकर उद्दात भावनाओं के कवि हैं, उनके स्वरों में ढलकर उर्वशी की प्राचीन कथा, सहज ही रीतकालीन शृंगार-परंपरा से ऊपर उठ गई है। निराला के बाद मुझे किसी वर्तमान कवि की रचना में मेघमंद्र स्वर सुनने को नहीं मिला। उर्वशी में नारी सौंदर्य के अभिनंदन के अतिरिक्त मातृत्व की प्रतिष्ठा भी की गई है।’’

    उर्वशी काव्य पर डॉ. रामविलास शर्मा की इस संवेदनात्मक प्रतिक्रिया के मूल में, उक्त काव्यकृति के प्रति उद्बुद्ध रति के भाव उनकी जिस रसात्मक अवस्था को उजागर कर रहे हैं, यह रसात्मक अवस्था उर्वशी के आस्वादन से पूर्व दिनकर को उद्दात भावनाओं का कवि तय करने के साथ-साथ, एक प्राचीन कथा के रीतिकालीन काव्य-परंपरा से ऊपर उठ जाने तथा नारी सौंदर्य के अभिनंदन के अतिरिक्त नारी की मातृत्व रूप में प्रतिष्ठा करने के कारण उत्पन्न हुई है। इसका सीधा अर्थ यह है कि डॉ. रामविलास शर्मा की उक्त रसदशा उनकी उन विचारधाराओं की देन है जो भावनाओं के उद्दात स्वरूप, रीतिकालीन भोग-विलास की काव्य-परंपरा की जगह नारी सौंदर्य के अभिनंदन और मातृत्व की प्रतिष्ठा की हामी है। कुल मिलाकर उर्वशी के आस्वादन में डॉ. रामविलास शर्मा को ऐसे सारे तत्त्व दिखलाई दे जाते हैं, जो उनकी निर्णयात्मकता, रसानुभूति या रागात्मक चेतना के आवश्यक अंग हैं, इसी कारण वे संवेदनात्मक रसात्मकबोध से सिक्त हो उठते हैं।

    ‘उर्वशी’ एक प्रणय काव्य होने के बावजूद भारत-भूषण अग्रवाल को इसलिए आनंदानुभूति से सिक्त करती है क्योंकि उर्वशी में उन्हें लिजलिजी कोमलता दिखलाई नहीं देती, उन्हें इस कृति में ओज के विलक्षण सम्मिश्रण के दर्शन होते हैं।

    डॉ. नैमीचंद्र जैन, दिनकर की एक अन्य चर्चित कृति ‘कुरुक्षेत्र’ को तो पढ़कर संवेदनात्मक रसात्मकबोध से सिक्त हो उठते हैं क्योंकि उनकी वैचारिक आस्थाएँ आधुनिक चेतना से युक्त काव्य में प्रति हैं, और यही कारण है कि ‘उर्वशी’ काव्य का आस्वादन उन्हें प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध की अवस्था में ले जाता है और वे इस रसात्मक अवस्था का परिचय इस प्रकार देते हैं-‘‘ कुल मिलाकर उर्वशी में अनावश्यक और अनर्गल मात्रा बहुत है... उर्वशी आधुनिक चेतना का काव्य नहीं है।’’

    प्रगतिशील विचारधारा के आधुनिक कवि एवं प्रखर आलोचक मुक्तिबोध कहते हैं कि-‘‘ मानो पुरुरवा और उर्वशी के रतिकक्ष में भोंपू लगे हों, जो शहर और बाजार में रतिकक्ष के आडंबरपूर्ण कामात्मक संलाप का प्रसारण, विस्तारण कर रहे हों’’      

मुक्तिबोध की उर्वशी काव्यकृति पर इतनी तीखी और प्रतिवेदनात्मक रसात्मकअवस्था के उद्बुद्ध होने के मूल में मुक्तिबोध की वह जीवन-दृष्टि या निर्णयात्मकता है जो रति को गरिमा, गांभीर्य और नैतिक स्वरूप में स्वीकारने की कायल है। चूँकि उक्त कृति उनकी मान्यताओं के विपरीत जाती है, इस कारण उनके मन में रति के विरोधी भावों का उद्बुद्ध हो उठना स्वाभाविक है।

    कुल मिलाकर उर्वशी के इस रसात्मकबोध के प्रसंग में-‘‘ यदि रामविलास शर्मा एक छोर पर हैं तो मुक्तिबोध दूसरे छोर पर। यह केवल संयोग की बात नहीं है। अंतर भाषाबोध का नहीं, मूल्यबोध का भी है।’’9

    उर्वशी की काव्य-सामग्री के आस्वादकों के रूप में डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नैमीचंद जैन, भारतभूषण अग्रवाल एवं मुक्तिबोध से लेकर हमारा उद्देश्य यह दर्शाना है कि आस्वादकों की मान्यताओं , आस्थाओं , वैचारिक अवधारणाओं एवं मूल्यबोधों के कारण किस प्रकार ‘ रसात्मक वाक्यं काव्यं’ और ‘ साधारणीकरण’ जैसे सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ जाती हैं |   

आदि आचार्य भरतमुनि का यह तथ्य निस्संदेह सारगर्भित महसूस होता है कि विभावादि व स्थायी भाव के संयोग से जो रस-निष्पत्ति होती है वह रंगपीठ के आश्रयों के हृदय में होती है। सहृदय तो उसे देखकर हर्षादि को ही प्राप्त होते हैं। कुल मिलाकर इस सारे प्रकरण से यह निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं कि-

1. रससिद्धान्त मूलतः अर्थसिद्धान्त पर आधारित है।

2. किसी भी आश्रय के मन में रसनिष्पत्ति विचारों के कारण उद्बुद्ध हुए भावों से होती है।

3. रस अंततः काव्य-सामग्री के प्रति लिए गए निर्णय की भावावस्था है।

4. आश्रय, किसी भी काव्य-सामग्री के प्रति किसी भी प्रकार का निर्णय अपनी वैचारिक अवधरणाओं, मूल्यों, आस्थाओं के अनुसार लेता है।

5. यदि कोई काव्य-सामग्री पाठक को अपनी विचारधाराओं के अनुरूप लगती है तो उसके प्रति उसमें संवेदनात्मक रसात्मक अवस्था जागृत होती है, इसके विपरीत की स्थिति उसे प्रतिवेदनात्मक रसात्मक अवस्था में ले जाती है।

सन्दर्भ-

1.  डॉ. राकेशगुप्त का रस विवेचन पृष्ठ-24

2.  वाष्पान्जली [ के.के. राजा ] भा.का. सि. पृष्ठ-69

3.  डॉ. राकेशगुप्त का रस विवेचन पृष्ठ-23.

4.  डॉ. राकेशगुप्त का रस विवेचन पृष्ठ-68

5.  आस्था के चरण , डॉ. नगेन्द्र पृष्ठ-91

6.  कविता के नये प्रतिमान , डॉ. नामबर सिंह , पृष्ठ-46

7.  कविता के नये प्रतिमान , डॉ. नामबर सिंह , पृष्ठ-68 

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रमेशराज गुप्त 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



संवेदनात्मक और प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध


विचार और रस [ एक ]


+रमेशराज

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    काव्य के संदर्भ में ‘रस’ शब्द का अर्थ-मधुरता, शीतल पदार्थ, मिठास आदि के साथ-साथ एक अलौकिक आनंद प्रदान करने वाली सामग्री के रूप में लिया जाता रहा है। विचारने का विषय यह है कि ‘विभावानुभाव व्यवभिचारे संयोगाद् रसनिष्पत्तिः’ सूत्र के अनुसार किसी काव्य-सामग्री के आस्वादनोपरांत आश्रय अर्थात् पाठक या श्रोता में जो रसनिष्पत्ति होती है, उसकी एक अवस्था तो यह है कि एक आस्वादक में जिस सामग्री से अखंड, अद्वितीय, चिन्मय और अपनत्व, परत्व की भावना से मुक्त रसदशा बनती है, जबकि उसकी सामग्री के आस्वादन से एक-दूसरे आस्वादक की कोई तथाकथित रसदशा नहीं बन पाती।

    रस आचार्य रामचंद्र शुक्ल की तुलसी के काव्य के साथ जो रसदशा बनती है, उसमें उनकी कथित ‘सहृदयता’ साफ-साफ अनुभव की जा सकती है, लेकिन केशव और कबीर की काव्य-सामग्री का आस्वादन उनके सारे के सारे रसात्मकबोध् को किरकिरा कर डालता है। केशव और कबीर की काव्य सामग्री के आस्वादन में आचार्य शुक्ल इतने हृदयहीन क्यों हो जाते हैं कि केशव को काव्य का प्रेत घोषित कर डालते हैं और कबीर और दादू आदि को हृदयहीन कवि बताने लग जाते हैं, जबकि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को कबीर और डॉ. विजयपाल सिंह को केशव का काव्य घनघोर रसवर्षा करता हुआ जान पड़ता है।

    प्रश्न यह है कि यदि केशव और कबीर के काव्य में कोई रस है तो उसका बोध आचार्य शुक्ल को क्यों नहीं होता है? इस रसाभास का आखिर कारण क्या है? इसका सीधा-सीधा उत्तर यह है कि किसी भी आश्रय की कथित ‘सहृदयता’ उसकी चिंतन प्रक्रिया पर निर्भर करती है, अर्थात् किसी काव्य-सामग्री को वह किन अर्थों, किन संदर्भों में लेता है। जो सामग्री सामाजिक के संस्कारों, वैचारिक अवधारणाओं, जीवन मूल्यों की तुष्टि एवं सुरक्षा प्रदान करेगी, उसके प्रति वह कथित रूप से ‘सहृदय’ हो उठता है। स्थिति यदि इसके विपरीत होती है तो उसके मन में उस सामग्री के प्रति विरक्ति [ कथित हृदयहीनता ] या रसाभास की अवस्था जागृत हो जाएगी।

    अतः काव्य-सामग्री में वर्णित पात्रों के चरित्र, विचारधाराओं, संस्कारों, क्रियाकलापों से पाठक, श्रोता या दर्शक अर्थ ग्रहण करता है, उसी के आधार पर वह कुछ निर्णय भी लेता है, इसी निर्णय के अंतर्गत उसके मन में किसी विशेष प्रकार की ऊर्जा या भाव का निर्माण होता है, जिसे रसाचार्यों ने रसाभास कहा है, यह भी एक रसात्मकबोध की ही अवस्था है, लेकिन यह रसात्मकबोध, किसी भी काव्य-सामग्री के प्रति प्रतिवेदनात्मक क्रिया में क्रोध, घृणा, ईष्र्या आदि के रूप में जागृत होता है। यदि आचार्य शुक्ल केशव को काव्य के प्रेत और हृदयहीन कवि कहते हैं तो उनके वाचिक अनुभावों से यह पता आसानी से लगाया जा सकता है कि उनके मन में केशव की काव्य-रचना की प्रति संवेदनात्मक रसात्मकबोध् से अलग प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध का निर्माण हुआ है।

 इस प्रकार हम कह सकते हैं कि रसात्मकबोध की दो अवस्थाएँ आश्रयों के मन में निर्मित होती हैं-


1. संवेदनात्मक रसात्मकबोध

   

इस प्रकार के रसात्मकबोध की अवस्था में पाठक, श्रोता या दर्शक के मन में ‘रमणीयता’ जैसे तत्त्व का निर्माण होता है। काव्य-सामग्री की सुखानुभूति हषार्दि का संचार करती है। पाठक, श्रोता या दर्शक ऐसी काव्य-सामग्री को बार-बार पढ़ना, देखना या सुनना चाहता है। आल्हा-ऊदल, बुलाकी नाऊ, अकबर-बीरबल आदि के किस्से आज भी लोकजीवन के संवेदनात्मक रसात्मकबोध के आधार बने हुए हैं। ठीक इसी प्रकार हिंसा, सैक्स और फूहड़ प्रेम-प्रधान फ़िल्में , मस्तराम लखनवी, पम्मी दीवानी, गुलशन नन्दा, ओम प्रकाश, कर्नल रंजीत आदि के गैर-साहित्यिक उपन्यास युवावर्ग को विशेष प्रकार की सुखानुभूति से [ आज के दौर में ] सिक्त करते हैं। बच्चों के बीच चित्रकथाओं का प्रचलन लगातार बढ़ रहा है। पाठक का जहाँ तक सार्थक साहित्यिक कृतियों के पठन-पाठन से संबंध का प्रश्न है तो ये साहित्यिक कृतियाँ उन्हीं पाठकों को संवेदनात्मक रसात्मकबोध से सिक्त करती हैं, जो पढ़े-लिखे, जागरूक और मानव-सापेक्ष चिंतन के धनी  होते हैं।

    संवेदनात्मक  रसात्मकबोध के अंतर्गत मात्र स्नेह , प्रेम, रति, वात्सल्य, हास्य, भक्ति आदि के ही भाव ‘रमणीयता’ जैसे तत्त्व का निर्माण करते हों, ऐसा सोचना नितांत गलत है। एक अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार आदि के विरोध में चिंतन करने वाले या कुव्यवस्था में परिवर्तन की छटपटाहट रखने वाले पाठक को ऐसी कृतियाँ ही संवेदनात्मक रसात्मकबोध से सिक्त करेंगी, जो लोक या मानव को पीड़ा से मुक्ति के मार्ग सुझाने में अपना योगदान देती हैं। अतः संवेदनात्मक रसात्मकबोध का आधार वे भाव भी बन जाते हैं, जिनकी रस-प्रक्रिया विरोध, विद्रोह, आक्रोश, करुणादि के द्वारा संपन्न होती है।


2. प्रतिवेदनात्मक रसात्मक बोध


    जब पाठक, श्रोता या दर्शक किसी काव्य-सामग्री का आस्वादन करते हैं, तब वह काव्य-सामग्री यदि आस्वादकों की जीवन-दृष्टि, उनकी संवेदनात्मक मूल्यवत्ता, उनकी रागात्मक चेतना के विपरीत जाती है, तो आस्वादकों में उस सामग्री के प्रति मात्र रमणीयता जैसे तत्त्वों की ही कमी नहीं हो जाती, बल्कि उनके मन में क्रोध, विरोध, विद्रोह आदि का संचार होने लगता है। यदि कोई हिंदी प्रेमी ऐसे साहित्य को पढ़ रहा है, जिसके अंतर्गत हिंदी का विरोध किया गया है तो वह हिंदी प्रेमी ऐसी काव्य-सामग्री के प्रति दुःखानुभूति से सिक्त होकर विरेाध और विद्रोह की प्रतिवेदनात्मक रसात्मक अवस्था में पहुँच जाएगा। यह प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध का ही परिणाम है कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पूरे-के-पूरे रीतिकालीन काव्य को गठरी में बाँधकर किसी नदी में फैंकने की बात कह उठते हैं। गजानन माधव मुक्तिबोध को उर्वशी में सिर्फ एक फूहड़ सैक्स कथा महसूस होती है। ठीक इसी प्रकार प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध की स्थिति आज ऐसे सुधी  श्रोताओं में देखी जा सकती है, जो चाहे किसी मजबूरी के तहत ही सही, आज के फूहड़, अश्लील और डिस्को गीतों को जब सुनते हैं तो गीतकारों से लेकर संगीतकारों को कोसते नजर आते हैं।

    इस प्रकार प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध के प्रति हम यह निष्कर्ष आसानी के साथ निकाल सकते हैं कि जिन वस्तुओं, पात्रों आदि की क्रियाएँ हमें अच्छी और रुचिकर नहीं लगतीं, उनके प्रति हमारे मन में क्रोध, जुगुप्सा, घृणा, विरोध, विद्रोह आदि की प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध की अवस्था जागृत हो जाती है। काव्य के पात्रों में भी इस प्रकार का रसात्मकबोध हमें जगह-जगह दिखलाई पड़ता है। सूपनखा के रत्यात्मक अनुभावों के प्रति राम में प्रतिवेदनात्मक-बोध जब जागृत होता है तो वे क्रोध से सिक्त होकर उसके नाक-कान काट लेते हैं। उर्वशी की नायिका औशीनरी जब पुरुरवा और उर्वशी के मिलन की चर्चाएँ सुनती है तो उसके मन में इन पात्रों की रति-ईष्र्या, डाह, क्रोध और अवसाद बनकर उभरती है।

    एक आस्वादक के संवेदनात्मक, प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध की व्याख्या से यह बात तो स्पष्ट हो ही जाती है कि हर प्रकार के रसात्मकबोध का आधार हमारे वैचारिक संस्कारों की वह पृष्ठभूमि है जिसकी रागात्मक चेतना हमारे जीवन मूल्यों के प्रति सुरक्षा-असुरक्षा पर निर्भर रहती है। संप्रदायों, विभिन्न वादों, विभिन्न जातियों, प्रांतों आदि के बीच बँटा हमारा रसात्मकबोध हमारी आत्मसुरक्षा की ही एक प्रक्रिया का अंग है | किंतु रस को ही काव्य की कसौटी मानकर उसे ‘काव्य की आत्मा’ घोषित कर देने का मतलब होना कि हमें ऐसे सारे खतरे उठाने पड़ेंगे, जिनके तहत अश्लील और अपराध साहित्य भी इस कोटि में आ जाएगा और वे कृतियाँ भी श्रेष्ठ घोषित हो जाएँगी, जिनसे व्यक्तिवाद, संप्रदायवाद, साम्राज्यवाद की जड़ें मजबूत होती हैं। अतः श्रेष्ठ काव्य-सामग्री के रसात्मकबोध को पहचानने के लिए हमें ऐसे किसी मापक की आवश्यकता जरूर पड़ेगी, जो इस रसात्मकता को लोक या मानव-मूल्यों के सापेक्ष परख सके। वर्ना चाहे संवेदनात्मक रसात्मकबोध हो, या प्रतिसंवेदनात्मक रसात्मकबोध, ऐसे खतरे तो पैदा करेगा ही, जिनके अंतर्गत एक व्यभिचारी भी हमें शृंगारी दिखाई देगा और शोषकों के प्रति भोले जनमानस में भक्तिभाव जागृत होता रहेगा या हमारा सारा-का-सारा गुस्सा किसी सही और असहाय पर उबल पड़ेगा। अतः महत्वपूर्ण यह नहीं है कि एक आस्वादक की किसी काव्य-सामग्री कैसी मधुर, शीतल, मिठासभरी और कथित अलौकिक दशा बनी, बल्कि काव्य के रसात्मक मूल्यांकन के संदर्भ में महत्वपूर्ण यह है कि काव्य का आस्वादन किस प्रकार की रसात्मक दशा प्रदान कर रहा है और उसका लोक या मानव के जीवन पर कैसा प्रभाव पड़ेगा?

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रमेशराज गुप्त 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



काव्य में विचार और ऊर्जा


+रमेशराज

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    डॉ. आनंद शंकर बापुभाई ध्रुव अपने ‘कविता’ शीर्षक निबंध में कहते हैं कि-‘जिस कविता में चैतन्य नहीं है अर्थात् जो वाचक को केवल किन्हीं तथ्यों की जानकारी मात्र प्रदान करती है, परंतु आत्मा की गहराई में पहुँचकर उद्वेलन नहीं करती अथवा चेतना की घनता व समत्व उत्पन्न नहीं कर सकती, वह कविता हो ही नहीं सकती। ऐसी जड़ कविताएँ भूगोल, इतिहास अथवा पफार्मूला की संज्ञा पाने योग्य हैं। ‘जानेवरी जाण जो फेब्रुआरी होय अर्थात् जनवरी जानिए पुनि फरवरी  होय’ यह कविता नहीं है, परंतु ‘सहु चलो जीतवा जंग ब्यूगलो वागे’ अर्थात् सब जंग जीतने चलो, बिगुल बज रहे हैं’-यह कविता है।’’1

डॉ. ध्रुव ने कविता के कवितापन को तय करने के लिए कविता के जिस चैतन्यस्वरूप का जिक्र किया है, वह चेतनता, वाचक अर्थात् आश्रय की आत्मा की गहराई में उद्वेलन के रूप में पहचानी जा सकती है। प्रश्न यह है कि कविता में ऐसा क्या तत्त्व होता है जो पाठक को उद्वेलित करता है? इस उद्वेलित करने वाले तत्त्व का स्वरूप क्या है? भूगोल, इतिहास अथवा फार्मूला की संज्ञा पाने वाली कविता जड़ क्यों होती है? इन सारे प्रश्नों का समाधान एक ही है कि कविता के माध्यम से पाठक या आश्रय के मन को किसी न किसी तरह ऊर्जा उद्वेलित करती है। बिना ऊर्जा के पाठक के मन में किसी भी प्रकार का उद्वेलन संभव नहीं, यह एक वैज्ञानिक प्रामाणिकता है। किसी भी प्रकार के कार्य को कराने की क्षमता का नाम चूंकि ऊर्जा है, अतः सोचने का विषय यह है कि वह ऊर्जा काव्य या कविता से किस प्रकार प्राप्त होती है? इसका उत्तर यदि हम डॉ. ध्रुव  के ही तथ्यों में खोजें तो भूगोल, इतिहास और फार्मूला की संज्ञा पाने वाली ‘जनवरी जानिए पुनि फरबरी होय,’ पंक्तियाँ, इसलिए कविता नहीं हो सकतीं, क्योंकि इसमें पाठक के मन को उद्वेलित करने की क्षमता नहीं है। या रसाचार्यों के मतानुसार कहें तो इसके द्वारा पाठक के मन में किसी भी प्रकार की भावात्मकता उद्बुद्ध नहीं होती। अर्थ साफ है कि पाठक के मन में भाव-निर्माण की प्रक्रिया, ऊर्जा के निर्माण की प्रक्रिया होती है। क्योंकि जब तक पाठक के मन में किसी कविता के पाठन से कोई भाव नहीं बनता, तब तक उसकी शारीरिक क्रियाएँ [ अनुभाव ] जागृत नहीं होतीं। क्रोध के समय शत्रु पर प्रहार करना, रति में चुंबन, विहँसन, आलिंगन तथा दया में संकटग्रस्त व्यक्ति या लोक या बचाने या सहायता करने की क्रियाएं भाव या ऊर्जा के द्वारा ही संपन्न होती हैं। अतः ‘जनवरी जानिए पुनि फरबरी होय’ कविता इसलिए नहीं हो सकती, क्योंकि इसके द्वारा पाठक के मन में किसी भी प्रकार के भाव या ऊर्जा के निर्माण की संभावना नहीं, जबकि ‘सब जंग जीते चलो, बिगुल बज रहे हैं’ को कविता की श्रेणी में इसलिए रखा जा सकता है क्योंकि यह पंक्तियाँ सामाजिक को इस तथ्य से अवगत करा रही हैं कि युद्ध का समय हो गया है, बिगुल बज रहे हैं और जंग को जीतना है।’’ उक्त कविता से पाठक के मन में पहुँचा ‘ जंग जीतने का विचार’ पाठक में साहस का संचार करेगा। पाठक के मन में आया यह साहस का भाव, ऊर्जा के रूप में पाठक के मन को उद्वेलित कर डालेगा।

    डॉ. ध्रुव के उपरोक्त तथ्यों की इस मनौवैज्ञानिक व्याख्या से निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं-

1. किसी भी कविता को कविता तभी माना जा सकता है जबकि वह पाठक को कुछ सोचने-विचारने के लिए मजबूर कर सके। इस तथ्य को हम इस प्राकर भी व्याख्यायित कर सकते हैं कि कविता पाठक के मन पर एक ऐसे बल का कार्य करती है, जिसके द्वारा उसके मन में ऊर्जा का समस्त जड़स्वरूप, गतिशीलस्वरूप में तब्दील हो जाता है। [ ऊर्जा के समस्त जड़स्वरूप से यहाँ आशय उन विचारों, भावों एवं स्थायीभावों से है, जो काव्य-सामग्री के वाचन से पूर्व अचेतन अवस्था में आश्रयों के मस्तिष्क में रहते हैं। ]

2. काव्य-सामग्री के वाचन या आस्वादन के समय पाठकों के मन में जब विभिन्न प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं तो वह विचार ही पाठक के मन को विभिन्न प्रकार से ऊर्जस्व बनाते हैं। अतः यह भी कहा जा सकता है कि विचारों से उत्पन्न ऊर्जा का नाम ही भाव है या भाव, विचारों से जन्य एक ऊर्जा है।

3. इस निष्कर्ष से यह तथ्य भी स्पष्ट हो जाता है कि काव्य जब पाठक के मन पर बल का कार्य करता है तो पाठक उस बल के आधार पर कुछ निर्णय लेता है। पाठक द्वारा लिए गए इस निर्णय के अनुसार ही उसके मन में विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं का निर्माण होता है, जिन्हें भाव कहा जाता है। चूंकि ऊर्जा अर्थात् भावों का प्रकटीकरण अनुभावों अर्थात् आश्रय के क्रियाकलापों में होता है अतः यहाँ यह कहना भी अतार्किक न होगा कि अनुभाव शक्ति के द्योतक होते हैं, क्योंकि विज्ञान के अनुसार शक्ति से आशय होता है-कार्य करने की दर।

    डॉ. ध्रुव के तथ्यों के सहारे निकाले गए उक्त निष्कर्षों का आधार चूंकि काव्य चेतनामय होना है, अतः यह बताना भी जरूरी है कि काव्य की सारी की सारी चेतना जहाँ पाठकों को ऊर्जस्व बनाती है, वहीं काव्य का चेतनामय स्वरूप भी पूर्णतः गतिशील ऊर्जा या भाव का क्षेत्र होता है। काव्य में यह गतिशील ऊर्जा हमें आलंबन और आश्रय दोनों ही स्तरों पर देखने को मिलती है। इसी कारण प्रो. श्री कंठय्या मानते हैं कि काव्य का आस्वाद कोई निर्जीव बौद्धिक ज्ञान नहीं है, पाठक को व्यक्तित्व की प्रत्येक शिरा में उसकी मूलवर्ती प्रेरणा का ज्ञान करना पड़ता है।’’1

    काव्य तथा उसके आस्वादन के विषय में आचार्य शुक्ल के तथ्यों की इस मार्मिकता को समझना अत्यंत आवश्यक है कि ‘‘जो भूख के लावण्य, वनस्थली की शुष्मा, नदी या शैलतटी की रमणीयता... जो किसी प्राणी के कष्ट व्यंजक रूप और चेष्टा पर करुणाद्र नहीं होता, जो किसी पर निष्ठुर अत्याचार होते देख क्रोध से नहीं तिलमिलाता, उसे काव्य का प्रभाव ग्रहण करने की क्षमता कभी नहीं हो सकती।2

    आचार्य शुक्ल के काव्य तथा उसके आस्वादकों के विषय में प्रस्तुत किए गए उक्त विचारों से भी यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि किसी भी आश्रय में काव्य से ऊर्जा का समावेश तभी हो सकता है जबकि वह काव्य-जगत से अलग लौकिक जगत की उन सारी क्रियाओं से उद्वेलित होता रहा हो, जो कि काव्य की अभिव्यकित का विषय बनी हैं या बनती हैं। बहरहाल इस विषय की व्यापकता में न जाते हुए अपनी मूल बात पर आएँ कि चाहे काव्य-जगत के पात्र हों या लौकिक-जगत के पात्र, उनके मन में ऊर्जा के रूप में भावों का निर्माण विचार के कारण ही होता है और विचार जब तक किसी प्रकार की गतिशील अवस्था ग्रहण नहीं करते, तब तक आश्रयों के मन में किसी भी प्रकार की भावपरक ऊर्जा का निर्माण नहीं होता। इस बात को समझाने के लिए यदि हम काव्य के वैचारिक एवं भावात्मक स्वरूप पर प्रकाश डालें तो यह बात सरलता से समझ में आ जाएगी कि-

श्रृंगार रस के अंतर्गत जब तक नायिका-नायक एक-दूसरे के प्रति यह विचार नहीं करते कि ‘हमें एक-दूसरे के सामीप्य से असीम सुख मिलेगा’ तब तक उनके मन में रति के रूप में ऐसी कोई ऊर्जा जागृत नहीं हो सकती जो उन्हें चुंबन, आलिंगन तक ले जाए। ठीक इसी प्रकार किसी व्यक्ति पर निष्ठुर अत्याचार होते देख कोई यह विचार नहीं करता कि ‘अमुक व्यक्ति पर निष्ठुर रूप से अत्याचार हो रहा है, यह गलत है, इसे अत्याचारी के अत्याचार से बचाया जाना चाहिए’, तब तक क्रोध के रूप में वह ऐसी कोई ऊर्जस्व अवस्था ग्रहण नहीं कर सकता, जिसके तहत वह अत्याचारी का बढ़कर हाथ पकड़ ले या उसके जबड़े पर दो-चार घूँसे जड़ दे। कभी न समाप्त होने वाला संताप केवल मनुष्य ही झेलता है, कोई पशु नहीं, क्योंकि वह इस विचार के कारण विभिन्न प्रकार से ऊर्जस्व बना रहता है कि-‘अमुक व्यक्ति ने मेरा अपमान किया है, मुझे यातना दी है, मरा धन लूटा है, मेरी मानहानि की है’

    जब तक मनुष्य के मन में इस प्रकार के विचार स्थायित्व ग्रहण किए रहेंगे, तब तक उसका मन विषाद, क्षोभ, दुःख, आक्रोश, असंतोष, क्रोध आदि के रूप में ऊर्जस्व होता रहेगा। महाभारत की नायिका द्रौपदी का अपमान जब दुःशासन और दुर्योधन ने किया तो वह इस विचार से कि-‘ मेरा भरी सभा में अपमान हुआ है और मैं चैन से तब तक नहीं बैठँूगी, जब तक कि इन दोनों की मृत्यु न देख लूँ।’ वह तब तक क्रोधावस्था की ऊर्जा ग्रहण किए रही, जब तक कि उनका अंत न हो गया । ठीक इसी प्रकार रावण से अपमानित विभीषण ने अपने क्रोध को रावणवध के उपरांत ही शांत किया। यदि छल-कपट से पांडवों का राज्य दुर्योध्न ने न छीना होता तो वह इस ऊर्जस्व अवस्था को ग्रहण न करते कि पूरे कौरव वंश का ही विनाश करना पड़ता।

    सारतः हम कह सकते हैं कि ऊर्जा के गतिशील स्वरूप का जब पाठक आस्वादन करते हैं तो यह गतिशील ऊर्जा उनके मन पर बल का कार्य करती  है, परिणामस्वरूप उनके मन में भी काव्य-सामग्री से तरह-तरह के विचार जन्म लेते हैं, जिनकी गतिशीलता, ऊर्जा के रूप में क्रोध, रति, हास आदि में अनुभावों के माध्यम से देखी या अनुभव की जा सकती है।

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रमेशराज गुप्त 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



काव्य में भाव और ऊर्जा

   

+रमेशराज

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    पाठक, श्रोता या दर्शक जब किसी काव्य-सामग्री का आस्वादन करता है तो उस सामग्री के रसात्मक प्रभाव, आस्वादक के अनुभावों [ स्वेद, स्तंभ, अश्रु, रोमांच, स्वरभंग आदि ] में स्पष्टतः देखे या अनुभव किए जा सकते हैं। सवाल यह है कि इस प्रकार के अनुभावों के प्रगटीकरण के पीछे क्या किसी प्रकार की कोई ऊर्जा कार्य करती है?

    ऊर्जा के बारे में वैज्ञानिकों का मत  है-‘‘जिस कारण से किसी वस्तु में कार्य करने की क्षमता रहती है, उसे ऊर्जा कहते हैं।“ अर्थ यह कि वस्तु या व्यक्ति में निहित वह क्षमता ऊर्जा है जो उससे विभिन्न प्रकार के कार्य संपन्न कराती है।

    काव्य के संदर्भ में वैज्ञानिकों के ऊर्जा संबंधी मत को लागू करते हुए सोचने की बात यह है कि क्या किसी आस्वादन सामग्री के आस्वादन से आश्रयों के मन में जागृत भाव, संचारीभाव, स्थायीभावादि किसी प्रकार की ऊर्जा के द्योतक होते हैं? जो कि आश्रय के अनुभावों से शक्ति के रूप में पहचाने जा सकते हैं?

रसाचार्यों के अनुसार-‘‘भावों का उद्गम यद्यपि आश्रय में होता है, पर उनका संबंध किसी वाह्य वस्तु, विषय या पात्र से होता है। भावों का उद्गम जिस मुख्य पात्र, वस्तु या विषय से होता है, वह काव्य में आलंबन कहा जाता है।’’

अर्थ यह कि भावों के निर्माण में मुख्य भूमिका आलंबन निभाते हैं। अब प्रश्न यह है कि क्या भाव किसी प्रकार की ऊर्जा के स्वरूप हैं?

    काव्य के पात्रों को लें- यह पात्र अपनी-अपनी स्थितियों में कभी आश्रय होते हैं तो कभी आलंबन। आलंबनों के रूप में पात्रों का धर्म अर्थात् उनका व्यवहार, हाव-भाव, चेष्टाएँ, विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ, उनके मन में उद्बुद्ध भावों द्वारा ही सम्पन्न होती हैं। जैसे यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को अपशब्द या गाली दे रहा है, उसे जान से मारने की बात कह रहा है, उसका स्वर-भंग हो रहा है तो इसका कारण उसके मन में उद्बोधित  क्रोध है। उद्बोधित  क्रोध का कारण निश्चित रूप से दूसरे व्यक्ति का वह व्यवहार रहा है, जिससे इस व्यक्ति को मानसिक या शारीरिक पीड़ा हुई। बहरहाल इस व्यक्ति की सारी-की-सारी क्रियाशीलता या कार्य करने की क्षमता का मूल आधार क्रोध है। इसलिए यह बात सप्रमाण कही जा सकती है कि भावों में ही किसी भी कार्य को करने या कराने की क्षमता होती है, अतः भाव एक प्रकार की ऊर्जा ही होते हैं। बात को स्पष्ट करने के लिए यहाँ एक उदाहरण आवश्यक है-

अन्याय के शैतान का सिर धड़ से उड़ा दो

हम जुल्म के खिलाफ हैं, दुनिया को बता दो।

    इन पंक्तियों में आश्रय के रूप में कवि के मन में उत्पन्न विद्रोह का वह भाव है, जिसकी क्षमता के बल पर कवि अन्यायियों, अत्याचारियों के सर धड़ से उड़ाने की बात कह रहा है। विरोध की क्षमता उसे ‘जुल्म के खिलाफ’ दुनिया-भर को यह बताने के लिए प्रेरित कर रही है कि अब अत्याचार को बिल्कुल सहन नहीं किया जाएगा। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कवि के मन में विद्रोह का भाव यहाँ ऊर्जा के रूप में ही कार्य कर रहा है। कवि के मन में यह ऊर्जा, आलंबन स्वरूप वर्तमान आतातायी व्यवस्था के कारण उत्पन्न हुई है। इसका सीधा अर्थ यह है कि एक आश्रय के मन में स्थित ऊर्जा को जब किसी आलंबन द्वारा बल मिल जाता है तो वह गतिज ऊर्जा में तब्दील हो जाता है, जिसे काव्य के क्षेत्र में भाव कहा जाता है।

भाव अर्थात् ऊर्जा के विभिन्न स्वरूप

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1.ध्वन्यात्मक ऊर्जा

    विभाव की उद्दीपन क्रिया के द्वारा जब आश्रय सुखानुभूति से सिक्त होता है तो उसमें रति, उत्साह, हास, स्नेह, प्रेम, हर्ष, मोह, गर्व, आशा, संतोष, धैर्य आदि भावों के रूप में ध्वन्यात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिसके कारण आश्रय का स्पर्श, चुंबन, आलिंगन, हँसना, मीठी-मीठी बातें करना, वाणी का गद्गद् हो जाना, रोमांचित हो उठना जैसे अनुभावों के रूप में अनेक क्रियाएँ प्रारंभ हो जाती है। उदाहरणस्वरूप-

जतीले जाति के सारे प्रबंधें को टटोलेंगे

जनों को सत्य सत्ता की तुला से ठीक तोलेंगे।

बनेंगे न्याय के नेगी, खलों की पोल खोलेंगे

करेंगे प्रेम की पूजा रसीले बोल बोलेंगे।

    उक्त पंक्तियों में जन के प्रति बरते जा रहे सत्ताई भेदभाव के कारण आश्रय [ कवि ] के मन में उत्साह का भाव जागृत हो उठा है और यही वह ध्वन्यात्मक ऊर्जा है जिसके कारण कवि जतीले जाति के प्रबंधों को टटोलते हुए, जनों को सच्चा न्याय दिलाने की कोशिश करता है, खलों की पोल खोलने के लिए अपनी वाणी में ओज पैदा करता है तथा पूरे समाज को प्रेम का पाठ पढ़ाने के लिए रसीले बोल अर्थात् वाणी में मृदुलता लाता है।


2.ऋणात्मक ऊर्जा

    आलंबन के अनाचार, अत्याचार आदि से जब आश्रय के मन में दुःखानुभूति जागृत होती है तो उसका मन शोक, क्रोध, भय, आश्चर्य, विस्मय, शंका, चिंता, आवेग, ग्लानि, विषाद, निराशा, उत्साहहीनता, घृणा, जुगुप्सा आदि भावों के रूप में ऋणात्मक ऊर्जा से सिक्त हो जाता है।

इस प्रकार की ऋणात्मक ऊर्जा की विशेषता यह होती है कि इसके अंतर्गत आश्रय आलंबनों के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करता है, उसके मन से ‘रमणीयता’ जैसा तत्त्व गायब हो जाता है। मन से उत्साह खत्म होने के कारण व्यक्ति कोई संवेदनात्मक या सकारात्मक साहसपूर्ण कार्य करने के प्रति उदासीन हो जाता है। आलंबनों के प्रति यह ऋणात्मक ऊर्जा अनुभवों के रूप में आँखें मींच लेना, थूकना, नाक सिकोड़ना, काँप उठना, मुख का पीला पड़ जाना या घबराहट बढ़ना, आँखें लाल होना, कठोर उक्तियाँ, गर्जन-तर्जन, शस्त्र-संचालन, दाँत पीसना, फड़कना आदि क्रियाएँ जागृत हो जाती हैं। उदाहरण के लिए-

पेट को रोटी नहीं, तन पर कोई कपड़ा नहीं

अब किसी के वास्ते शृंगार कोई क्या करे।

    इन पंक्तियों में गरीबी और भुखमरी की शिकार आश्रय [नायिका ] की अनुभूतियाँ इतनी दुःखात्मक हैं कि उसमें रति के प्रति सारा-का-सारा उत्साह, निराशा-उदासीनता में बदल गया  है। यह उत्साहहीनता एक ऐसी ऋणात्मक ऊर्जा है, जो नारी के मन में रमणीय तत्वों का ह्रास कर रही है।


भाव या ऊर्जा के विभिन्न गतिशील स्वरूप

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    आश्रय जब आलंबनगत उद्दीपन धर्म या प्रकृतिगत उद्दीपन धर्म के प्रति संवेदनशील होता है तो उसमें विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं का संचय होता है। ऊर्जा-संचयन की यह प्रक्रिया निश्चित गति से एक दिशा या भिन्न दिशाओं में उत्तरोत्तर वृद्धि पाती है। ऊर्जा-संचयन की इस प्रक्रिया में विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं का उद्भव होता है। इस उद्भव के उपरांत यह समस्त ऊर्जाएँ एक विशिष्ट प्रकार की ऊर्जा में तब्दील हो जाती हैं। काव्य के अंतर्गत इन विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं को भाव और स्थायी भाव कहा जाता है। ऊर्जा अपने विभिन्न स्वरूपों में किस प्रकार गतिशील होकर एक विशिष्ट प्रकार की ऊर्जा में तब्दील हो जाती है, इसे समझाने के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत है-

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायौ।

भोर भये गैयन के पीछे मधुवन मोहि पठायौ

चार पहर वंशीवट भट्क्यौ, साँझ परे घर आयौ

मैं बालक बँहियन को छोट्यौ, छींकौ कहि विधि पायौ

ग्वाल-बाल सब बैर पड़े हैं, बरबस मुँह लिपटायौ

यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुत ही नाच नचायौ

सूरदास तब विहँसि यशोदा ले उस कंठ लगायौ।

    महाकवि सूरदास के उक्त पद में ऊर्जा या भाव का संचयन दो प्रकार से हो रहा है। प्रथम स्थिति आलंबन के रूप में यशोदा की है, जो कृष्ण की माखन चोरी पकड़े जाने पर, उनसे माखन चोरी उगलवाने या स्वीकारवाने के लिए, गुस्से में धमकी, मार, पिटाई करने पर आमादा है। दूसरी स्थिति श्रीकृष्ण की है, जो यशोदा मैया का क्रोधित रूप देखकर भय से ग्रस्त हो गए हैं, लेकिन अपनी चोरी पकड़े जाने के प्रति अपने बचाव में विभिन्न प्रकार के भावों से सिक्त हो रहे हैं, जिनका प्रगटीकरण उनके वाचिक अनुभावों में हो रहा है।

    पद की प्रथम पंक्ति में श्रीकृष्ण के मन में भय तथा दैन्य के भाव हैं, जो एक ऐसी ऊर्जा का परिचय दे रहे हैं, जिसमें श्रीकृष्ण माखन चोरी न किए जाने का मैया से निवेदन कर रहे हैं।

    पद की दूसरी पंक्ति में श्रीकृष्ण के वाचिक अनुभावों में माखन चोरी के आरोप से बचने के लिए चतुराई के भाव का प्रस्पफुटन हो रहा है जिसकी ऊर्जा भोर होते ही गाय चराने के लिए माँ यशोदा द्वारा मधुवन भेजे जाने जैसे तर्क में व्यक्त हो रही है।

    पद की तीसरी पंक्ति में श्रीकृष्ण के अनुभावों से [ चार पहर वंशीवट भट्क्यौ, साँझ परे घर आयौ ] के तर्क के रूप, थकान और व्यस्तता की ऊर्जा का परिचय मिलता है।

    पद की चौथी पंक्ति में श्रीकृष्ण अपने बालपन, छोटी-छोटी बाँहों और ऊंचे स्थान पर छींके की स्थिति के पीछे विवशता की ऊर्जा को उजागर कर रहे हैं, जिसकी क्षमता माखनचोरी जैसा कार्य नहीं कर सकती।

    पद की पाँचवीं पंक्ति में इन सारे तर्कों के असपफल हो जाने , श्रीकृष्ण एक नया तर्क ग्वाल-बालों द्वारा उनके मुँह पर माखन लिपटा देने के कारण वैरभाव दर्शा रहे हैं, जिसके मूल में असमर्थता एवं निष्छलता की ऊर्जा कार्य कर रही है।

    पद की छठवीं पंक्ति में श्रीकृष्ण के सारे तर्क असपफल हो जाने पर, उनके मन में एक नयी रोष एवं विरक्ति की ऊर्जा का संचयन हो रहा है, जिसका प्रदर्शन लाठी और कंबल फैंकने के कार्य एवं विभिन्न प्रकार से सताए जाने की शिकायत के रूप में हो रहा है।

    उक्त पद की प्रथम पंक्ति से लेकर छठवीं पंक्ति तक भय, दैन्य, थकान, व्यस्तता, रोष, शिकायत, धौंस के माध्यम से जिस प्रकार की ऋणात्मक ऊर्जा के विभिन्न रूप बन रहे हैं, यह ऊर्जाएँ कुल मिलाकर चोरी के आरोप से बचाव की ऊर्जा बनकर उभर रही है, जो शुरू से लेकर अंत तक चतुराईजन्य या झूठजन्य ही हैं।

    सूरदास के इस पद में आश्रय के रूप में यशोदा की दूसरी स्थिति है, जिसके मन में क्रोध की ऊर्जा विद्यमान है, लेकिन जब वह श्रीकृष्ण के बालमुख से चोरी पकड़े जाने के बचाव के प्रति दिए गए श्रीकृष्ण के तर्कों के प्रति चतुरता और चपलता का अनुभव करती है तो क्रोध की सारी-की-सारी ऊर्जा वात्सल्य में तब्दील हो जाती है, वह मुस्कराती हैं और श्रीकृष्ण को गले से लगा लेती हैं।

    सूरदास के उपरोक्त पद के माध्यम से ऊर्जा के गतिशील स्वरूप के विवेचन से हम यह कहना चाहते हैं कि प्राणी के मन में उत्पन्न हुई ऊर्जा का संबंध उसके चिंतन या विचार करने की प्रक्रिया से होता है। जैसे-जैसे उसके मन में विचारों में परिवर्तन आता है, वैसे-वैसे ऊर्जा के विभिन्न रूप बदलते चले जाते हैं।

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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



काव्यानुभव और काव्यानुभूति 


+रमेशराज

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    विभिन्न प्रकार की वस्तुओं या विषयों की उद्दीपन क्रियाओं का इंद्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान-संवेदना, प्रत्यक्षीकरण एवं अर्थग्रहण की प्रक्रिया के उपरांत, एक अनुभव के रूप में, प्राणी मस्तिष्क में उपस्थित होता है। प्राणी विषयों या वस्तुओं की तीव्रता, गुण आदि को इस अनुभव के आधार पर चिंतन की एक निश्चित प्रक्रिया से गुजारते हुए कष्टदायक या कष्टनिवारक मूल्यों के रूप में अपनी चेतना का विषय बना लेता है। यह कष्टदायक या कष्टनिवारक निर्णय प्राणी मस्तिष्क में सुखात्मक या दुःखात्मक स्मृति-चिन्हों के रूप में संग्रहीत होना प्रारंभ कर देते हैं। यही सुखात्मक या दुःखात्मक स्मृति-चिन्ह विभिन्न प्रकार की वस्तुओं या विषयों के प्रति एक सामाजिक की ‘अनुभूति’ की विषय बनते हैं। इस तरह हम यह भी कह सकते हैं, किसी भी प्रकार के कष्टदायक या कष्टनिवारक ज्ञान के प्रति ‘अनुभूति’ सिर्फ दुःखात्मक या सुखात्मक दो ही प्रकार की होती है। इस दुखात्मक या सुखात्मक अनुभूति का आधार, चूंकि वह अनुभव होता है, जिसके कारण हमें, अपमान, घात, प्रतिघात, शोषण, यातना, त्रासदी, पीड़ा, प्रेम, सम्मान, व्यभिचार, बलात्कार, भ्रष्टाचार, संकट, समस्या, सुगंध, दुर्गंध, कटुता, शत्रुता, मित्रता, भाईचारा आदि का ज्ञान होता है, अतः जिन उद्दीपकों के प्रति हमारे अनुभव पीड़ादायक, असुरक्षात्मक होते हैं, उनकी दुःखानुभूति, हमारे मन में विरति ही पैदा नहीं करती, बल्कि, क्रोध, घृणा, विरोध, विद्रोह आदि से भी हमारे मानसिक-धरातल को सिक्त किए रहती है। जिन उद्दीपकों के द्वारा हमारे मन को शांति, सुरक्षा, प्रेम, स्नेह आदि की प्राप्ति होती है, उनके प्रति हमारे मन में रति, श्रद्धा, भक्ति, वात्सल्य आदि रसों की निष्पत्ति हुआ करती है। इस प्रकार अनुभव की सारी-की-सारी प्रक्रिया हमारे उन निर्णयों, विचारों आदि की प्रक्रिया है, जिसकी चिंतना सुखात्मक या दुःखात्मक अनुभूतियों के आधार पर हमें विभिन्न प्रकार के रसाद्बोधन की ओर ले जाती है।

    कृष्णादि के बालरूप का अनुभव [ उनके बाल्यावस्था के क्रियाकलापों के आधार पर ] जहाँ यशोदा मैया को वात्सल्य से सिक्त करता है, वहीं कृष्ण की यौवनावस्था राधादि को रिझाने, बाँसुरी बजाने, नृत्यादि करने के कारणद्ध शंृगार रस में डुबा डालती है। जबकि कृष्ण के अर्जुन को दिए गए उपदेशों का अनुभव, अर्जुन में वीरता, रौद्रता आदि का संचार करता है। जैसा कि हमने ‘विचार और भाव’ शीर्षक लेख में भी कहा है कि मात्र आलंबन के आधार पर किसी भी आश्रय में किसी भी प्रकार के भावों का निर्माण नहीं हो सकता, बल्कि भाव और रस का आधार तो आलंबन का धर्म अर्थात् उसके क्रियाकलाप ही बनते हैं। अतः आलंबन के रूप में कृष्ण के तीन अवस्थाओं में, विभिन्न प्रकार के क्रियाकलाप ही माँ में वात्सल्य, राधा में रति और अर्जुन में रौद्रता जागृत करने में सक्षम हुए हैं।

    पाठक या श्रोता के आस्वादन का विषय जब यही सामग्री बनती है तो वह भी अपने अनुभव से कृष्ण के क्रियाकलापों को वात्सल्यात्मक, शृंगारिक या रौद्रतापूर्ण बना डालता है। जिसके अंतर्गत शृंगार, वात्सल्य तो सुखानुभूति के विषय बन जाते हैं, लेकिन अर्जुन की रौद्रता सुखानुभूति का विषय तब बनती है, जबकि पाठक या श्रोता यह अनुभव करते हैं, इस रौद्रता के द्वारा ही अनीति, अत्याचार के पथ पर चलने वाले कौरव वंश का विनाश होगा।

    एक दूसरे उदाहरण के रूप में यदि हम राम और सीता के आलंबन धर्म अर्थात् उनके क्रियाकलापों को लें तो पाठक या श्रोता को इन क्रियाकलापों के अनुभव [ उनके दाम्पत्य जीवन के कारण ] वह शृंगारिक स्वरूप नहीं प्रदान कर पाते, जैसा अनुभव पाठक, कृष्ण-राधा की रति-क्रियाओं से प्राप्त कर शंृगार से सिक्त होते हैं, क्योंकि सीता के अनुभव हमारे मन में एक आदर्श पत्नी के रूप में उपस्थित रहते हैं, जबकि राधादि के अनुभव एक कामिनी, एक नायिका, एक प्रेमिका के रूप में मन पर आच्छादित होते हैं।

    अनुभवों की यह प्रक्रिया मात्र हमारे व्यक्तिगत अनुभवों पर ही आधरित नहीं होती, हमारे अनुभवों के मूल में लोकानुभव भी अपनी भूमिका निभाते हैं। लोकानुभवों को अपना विषय बनाकर निर्धन और निर्बलवर्ग अंधविश्वास के रूप में आज भी [ विभिन्न धर्मिक कथाओं के आधार पर ] यह अनुभव करता है कि उसके कष्टों, उसके दुःखातिरेक का निवारण सिर्फ ईश्वरीय कृपा द्वारा ही संभव है। वह सोचता है कि त्रासदी, यातना, दुराचार, अनैतिकपन और आदमी की आसुरी आदतों का विनाश करने एक-न एक दिन ईश्वर पृथ्वी पर अवतार लेगा और सारे दुष्टों को चुन-चुनकर मार डालेगा, जैसा कि उसने विगत युगों में किया है। देवी-देवताओं, ईश्वरीय शक्तियों के प्रति सामाजिकों के द्वापर, त्रेता, सतयुग आदि के वैदिक एवं पौराणिक अनुभव, उसे सुखानुभूति से सिक्त किए रहते हैं, इसी कारण उसके मन में अलौकिक शक्तियों के प्रति श्रद्धा और भक्ति आदि के रूप में सुखानुभूतियों का स्थायित्व बना रहता है।

    लेकिन मनुष्य जब यह अनुभव करता है कि अलौकिक शक्तियों के प्रति किया गया जाप, तप, कीर्तन, भजन आदि उसे किसी भी प्रकार यातना से मुक्त नहीं कर पाता, बल्कि धार्मिकता, अलौकिक शक्तियों के यशोगान से शोषण की तलवारें ज्यादा पैनी-धारदार होकर सबका गला काटती हैं तो उसके इस प्रकार शोषण से युक्त त्रासद अनुभव दुःखानुभूति को जन्म देते हैं। एक तरफ जहाँ यह दुःखानुभूति कबीर के साहित्य में विरोध और विद्रोह का रूप धारण करती है, वहीं मार्क्स जैसा साम्यवादी चिंतक धर्म को अफीम बताते हुए, ईश्वरीय शक्ति का निरंतर विरोध करता है। उसके मन में साम्राज्यवादी वर्ग के अत्याचारों से जन्य दलित वर्ग के हालात की दयनीय और कारुणिक दशा, शोषक वर्ग से लड़ने, संघर्ष करने और शोषणविहीन समाज की स्थापना करने हेतु अभिव्यक्ति विषय बनती है।

    ठीक इसी प्रकार नारी की दलित दशा का अनुभव जब द्विवेदी काल के रचनाकारों को दुःखानुभूति से सराबोर करता है तो वह नारी को दलित हालात से मुक्त कराने के लिए ऐसे साहित्य का सृजन करते हैं, जिसके माध्यम से सतीप्रथा, बालविवाह के निर्मूलन पर बल दिया जाता है।

    अनुभव और अनुभूति संबंधी उक्त व्याख्या से हम निम्न निष्कर्ष निकाल सकते हैं-

1. अनुभव हमारी वह मानसिक क्रिया है जिसके अंतर्गत हम वह निर्णय लेते हैं कि इंद्रियों के सामने प्रस्तुत हुई सामग्री, हमारी चेतना पर किस प्रकार का प्रभाव छोड़ती है? स्पर्श इंद्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान हमें जलन, घाव, पीड़ा, चोट आदि का अनुभव कराता है। श्रवण इंद्रियों द्वारा हम अपशब्द, अपमान, कटुवचन, मधुर वचन, नेह, स्नेह, प्रेम, तिरस्कार आदि का अनुभव करते हैं। दृष्टि इंद्रियाँ हमें प्रकाश, अंध्कार, प्राणियों, पौधें की दृश्यात्मक उपस्थिति का अनुभव कराती हैं। स्वादेन्द्रियों द्वारा कड़वे, मीठे, खट्टे, चरपरे, चटपटे स्वादों का अनुभव होता है। घ्राणेन्द्रियाँ सुगंध, दंर्गंध आदि का अनुभव कराती हैं।

2. वस्तुधर्म या आलंबनधर्म का अनुभव जब सामाजिक को किसी प्रकार की सुरक्षा या संतुष्टि प्रदान करता है तो इन अनुभवों से प्राप्त सुखानुभूति तत्काल या कुछ समय पश्चात् उन वस्तुओं के धर्म या क्रियाकलाप में रुचि लेने या उनमें रमणने के लिए प्रेरित करती है, ऐसी वस्तुएँ जो हमारे मन में किसी प्रकार की रति जागृत करती हैं, दरअसल, इसके मूल में उन वस्तुओं का वह धर्म ही होता है, जिनके आधार पर हम उन्हें मित्र की संज्ञा प्रदान करते हैं।

    लेकिन जिन वस्तुओं का अनुभव असुरक्षात्मक, कष्ट-पीड़ादायक एवं शत्रुतापूर्ण होता है, स्मृति-चिन्हों के रूप में मस्तिष्क में संगृहीत हुई उनकी दुःखानुभूति, उन वस्तुओं के प्रति मनुष्य के मन में तब तक रौद्रता, भयावहता, विरोध, विद्रोह आदि का संचार किए रहती है, जब तक कि मनुष्य उन वस्तुओं को शत्रु-रूप में मानता रहता है।

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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



काव्य में सहृदयता

   

+रमेशराज

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    किसी भी प्राणी की हृदय-सम्बन्धी क्रिया, उस प्राणी के शारीरिकश्रम एवं मानसिक संघर्षादि में हुए ऊर्जा के व्यय की पूर्ति करने हेतु, हृदय द्वारा शारीरिक अवयवों जैसे मष्तिष्क, हाथ-पैर आदि के लिए रक्त संचार की सुचारू व्यवस्था प्रदान करना है, ताकि शारीरिक एवं मानसिक क्रियाएँ चुस्ती और तीव्रता के साथ होती रहें।

    भावात्मक या संवेगात्मक अवस्था में मनुष्य के शरीर एवं मानसिक अवयवों में जब उत्तेजना का जन्म होता है, तो इस स्थिति में लगातार ऊर्जा के व्यय से आने वाली शरीरांगों की शिथिलता, घबराहट, कंप, स्वेद आदि असामान्य लक्षणों को संतुलित करने के लिए हृदय को मस्तिष्क द्वारा प्राप्त आदेशों के अनुसार तेजी से रक्त-पूर्ति का कार्य करना पड़ता है, जिसे दिल के धड़कने के रूप में अनुभव किया जा सकता है। संवेगात्मक अवस्था समाप्त होने के उपरांत हृदय की धड़कनें पुनः सामान्य हो जाती हैं।

    चूंकि किसी भी व्यक्ति की इंद्रियों से प्राप्त ज्ञान के प्रति संवेदनाशीलता का सीधा  संबंध उसकी मानसिक क्रियाओं से होता है, जब यह मानसिक क्रियाएँ किसी भी वस्तु सामग्री को अर्थ प्रदान कर देती हैं, तब अपमान, प्रेम, करुणा, ईष्र्या, वात्सल्य, क्रोध, भय आदि के रूप में उत्पन्न ऊर्जा, अनुभावों में तब्दील हो जाती है। संवेदना में अनुभव तत्त्व जुड़ जाने के पश्चात् भाव के रूप में उद्बोधित यह ऊर्जा किस प्रकार अनुभावों में तब्दील होती है और इसका हृदय से क्या सम्बन्ध है? इसे समझाने के लिए एक उदाहरण देना आवश्यक है- जब तक बच्चे को यह अनुभव नहीं होता कि सामने से आता हुआ जानवर शेर है, वह उसका प्राणांत कर सकता है, तब तक उसके मन में भय के भाव जागृत हो ही नहीं सकते। बच्चे को ऐंद्रिक ज्ञान को आधार पर जब यह पता चल जाता है कि उसके सामने शेर खड़ा हुआ है और वह उस पर झपट सकता है तो उससे बचाव के लिए उसकी मानसिक क्रियाओं में तेजी आने लगती है। शेर के यकायक उपस्थित होने के कारण संवेग की अवस्था इतनी अप्रत्याशित होती है कि मस्तिष्क के तीव्रता से लगातार किए जाने वाले चिंतन से ढेर सारी ऊर्जा का यकायक व्यय हो जाता है। इस ऊर्जा-व्यय से उत्पन्न संकट की पूर्ति के लिए मस्तिष्क सुचारू रूप से कार्य करने हेतु अतिरिक्त ऊर्जा की माँग करता है। चूंकि ऊर्जा को प्राप्त करने का एकमात्र स्त्रोत रक्त ही होता है, अतः मस्तिष्क रक्तपूर्ति की माँग अविलंब और तेजी के साथ करने के लिये हृदय को संकेत भेजता है। परिणामस्वरूप हृदय की धड़कन में तेजी आ जाती है।

    हृदय के विभिन्न संवेगों की स्थिति में धड़कते हुए इस स्वरूप के आधार पर ही संभवतः हृदय को सबसे ज्यादा संवेदनशीलता, भावनात्मकता, सौंदर्यबोध और रसात्मकता का आधार माना गया। और कुल मिलाकर यह सिद्ध  कर डाला गया जैसे हर प्रकार के विभाव के प्रति संचारी, स्थायी भावादि की स्थिति हृदय में है, जबकि हृदय तो मात्र एक रक्त-संचार का माध्यम है। उसका संवेदना, भाव, स्थायी भाव आदि के निर्माण से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं।

    काव्य के क्षेत्र में हृदय-तत्त्व की स्थापना का यदि हम विवेचन करें तो इसका सीधा-सीधा कारण नायक-नायिका के मिलन, चुंबन, विहँसन के समय हृदय का तेजी के साथ धड़कना ही रहा है। जिसका सीधा-सीधा अर्थ हमारे रसमर्मज्ञों ने यह लगाया होगा कि मनुष्य की मूल संवेदना, भावात्मकता आदि का मूल आधार हृदय ही है। जबकि किसी भी प्रकार की संवेगावस्था में हृदय की धड़कनों में तेजी आ जाना एक स्वाभाविक एवं आवश्यक प्रक्रिया है।

    नायक और नायिका के कथित प्रेम-मिलन में हृदय इसलिए तेज गति से धड़कता है क्योंकि इस मिलन के मूल में जोश के साथ-साथ सामाजिक भय या व्यक्तिगत भय बना रहता है। लेकिन ज्यों-ज्यों  मिलन की क्रिया पुरानी पड़ती जाती है, उसमें सामाजिक एवं व्यक्तिगत भय का समावेश समाप्त होता चला जाता है। यही कारण है कि नायक और नायिका के मिलन के समय हृदय की धड़कनों में उतनी तेजी नहीं रह पाती, जितनी कि प्रथम मिलन के समय होती है।

    प्रेम के क्षेत्र में रति क्रियाओं के रूप में यदि हम पति-पत्नी के प्रथम मिलन को लें और उसकी तुलना अवैध रूप से मिलने वाले नायक-नायिका मिलन से करें तो पति-पत्नी की धड़कनों में आया ज्वार, नायक-नायिका की धड़कनों के ज्वार से काफी कम रहता है। इसका कारण पति-पत्नी में सामाजिक भय की समाप्ति तथा नायक-नायिका में सामाजिक भय का समावेश ही है।

    इस प्रकार यह भी निष्कर्ष निकलता है कि पाठक, दर्शक या श्रोता की काव्य के प्रति ‘सहृदयता’ भी उसकी धड़कनों के ज्वार-भाटे से नहीं समझी जा सकती। चूंकि काव्य का क्षेत्र मानव के मानसिक स्तर पर उद्बुद्ध  होने वाले भावों, स्थायी भावों का क्षेत्र है, अतः इस स्थिति में श्वेद, कम्प, स्तंभ जैसे सात्विक अनुभावों की तरह ‘सहृदयता’ एक आतंरिक सात्विक अनुभाव ही ठहरती है।

    कोई भी प्राणवान् मनुष्य जब तक कि उसमें प्राण हैं, वह अपनी जैविक क्रियाओं के फलस्वरूप सहृदय तो हर हालत में बना रहेगा। उसमें उद्दीपकों की तीव्रता, स्थिति-परिस्थिति, उसकी मानसिक क्रियाओं की संवेदनात्मक, भावनात्मक प्रस्तुति के रूप में धड़कनों के ज्वार-भाटाओं का प्रमाण भी देगी, लेकिन इन तथ्यों के बावजूद इतना तो माना ही जा सकता है कि काव्य का रसास्वादन एक सहृदय ही ले सकता है। ऐसे सामाजिक से भला क्या उम्मीद रखी जा सकती है, जिसका हृदयांत हो गया हो?

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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



विचार और भाव-2

+रमेशराज

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    रस की स्थापना के लिए रस-शास्त्रियों ने रस-सामग्री के रूप में जिस प्रकार भाव, विभाव, संचारी भाव और स्थायी भाव की चर्चा की है और इन भावों के माध्यम से जिस प्रकार से पाठक या श्रोता के कथित हृदय में रस-निष्पत्ति का एक सूत्र या सिद्धान्त गढ़ा है, उससे यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं होता कि आखिर पाठक या श्रोता की उक्त भावदशा किस प्रकार बनती है और इसके पीछे कौन-कौन से कारक अपनी भूमिका निभाते हैं? इन कारकों की क्रिया-प्रणाली किस प्रकार की है? बल्कि इस सारे झंझट से मुक्ति पाने के लिए पाठक या श्रोता में ‘हृदय-तत्व’ की स्थापना करके, यह सिद्ध कर डाला कि पाठक या श्रोता के हृदय में कुछ भाव या मनोविकार सुप्त-अवस्था में पड़े रहते हैं, जो काव्य के क्षेत्र में स्थायी भाव के नाम से जाने जाते हैं। इन रसाचार्यों ने यह समझाने की कोशिश नहीं की कि हृदय तो एक रक्त-संचार का साधनमात्र है, उसका मनुष्य के भावात्मक पक्ष के निर्माण से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं। हर प्रकार की भावात्मक प्रक्रिया का मूल आधर तो मानसिक-प्रक्रम है। मन के स्तर पर ही भावों की सुप्तावस्था या गतिशील अवस्था स्पष्ट की जा सकती है।

    पाठक, श्रोता या दर्शक की किसी भी काव्य-सामग्री के पठन-पाठन मंचन आदि के द्वारा सामाजिक में भावदशा बनने से पूर्व कई ऐसी मानसिक क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं, जो काव्य तथा आश्रय की अर्थमीमांसा से आबद्ध  रहती हैं। रस-निष्पत्ति के लिए किसी भी पाठक या श्रोता के मन में एक वैचारिक प्रक्रिया का उद्भव होता है और यही वैचारिक प्रक्रिया अपने चरमोत्कर्ष पर एक विशेष प्रकार के भाव [ स्थायी भाव ] में बदल जाती है।

    स्थायी भाव के निर्माण में विभाव अपनी उद्दीप्त भूमिका का निर्वाह करता है। भरतमुनि के अनुसार-‘‘विभाव वाणी और अंगों के आश्रित अनेक अर्थों का विभावन या अनुभव कराते हैं-

वहवोर्था विभोव्यन्ते वागड.भिनयाश्रयाः।

अनेन यस्मात्तेनायं विभावभूति कथ्यते।।

    इसका अर्थ यह हुआ कि नायक और नायिका की वाणी और अंगों से आश्रय जो अर्थ ग्रहण करता है, वह अर्थ ही एक विशेष प्रकार के भाव [ स्थायी भाव ] को जन्म देता है। इस तरह नायक या नायिका की काव्य में वर्णित मनोदशाएँ, प्रवृत्तियाँ, अंग-संचालन की क्रियाएँ और उसके विभिन्न गुणादि आश्रय के मन में भावदशा के निर्माण का आधार बनते हैं। अर्थ यह कि विभाव के रूप में नायक-नायिका की उद्दीपन प्रणाली अर्थात् आलंबन का धर्म ही आश्रय के मन को उद्दीप्त करता है। आश्रय जब आलंबनधर्म को कोई विशेष अर्थ दे लेता है, वही अर्थ या निर्णय भावों का निर्माण करता है। अतः काव्य में वर्णित पात्र या विषय आलंबन जरूर बनते हैं, लेकिन उनकी उद्दीपनक्षमता ही आश्रय के मन को झकझोरती है और उसमें नए-नए रसों का निर्माण करती है। अतः विभाव को परंपरागत तरीके [आलंबनविभाव तथा उद्दीपनविभाव] में वर्गीकृत करने के बजाय आलंबनगत उद्दीपनविभाव तथा प्रकृतिगत उद्दीपनविभाव के रूप में वर्गीकृत किया जाना अधिक  वैज्ञानिक और तर्कसंगत रहेगा। बात को स्पष्ट करने के लिए यहाँ कुछ उदाहरण देना परमाश्यक है-

देख सखि अधरन की लाली।

मनि मरकत में सुभग कलेवर, ऐसे हैं वनमाली

मनौ प्रात की घटा साँवरी, तापर अरुण प्रकाश

ज्यों  दामिनि बिच चमक रहत है, फहरत पीर्त सुवास।’’

    इन पंक्तियों में आश्रय बनी गोपियों के लिए कृष्ण आलंबन जरूर हैं, लेकिन गोपियों के मन में स्थायी भाव रति जागृत करने में उस रूप के विशेष गुण-तत्त्व की भूमिका है, जिसे गोपियाँ श्रीकृष्ण के अधरों पर विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक बिंबों के माध्यम से अनुभव करती हैं। ठीक इसके विपरीत-

तुम्हरे अद्दत तीन तेरह यह देश दशा दरसावें

पै तुमको यदि जन्मधरे की, तब कहुं लाज न आवें।

आरत तुम्हें पुकारत हम सब, सुनत न त्रिभुवनराई

अँगुरी डारि कान में बैठे, धिक्  ऐसी निठुराई।

    इन पंक्तियों में आलंबन तो कृष्ण ही हैं, लेकिन उनके गुण-तत्त्वों की उद्दीपन-प्रक्रिया बदल जाने के कारण आश्रय में स्थायी भाव रति के स्थान पर, स्थायी भाव आक्रोश उद्बुद्ध हो उठा है। इसी स्थायी भाव आक्रोश की स्पष्ट झलक वर्तमान में इस प्रकार मिलती है-

ऊधौ वंशी राग-रस, नेह प्रेम सब व्यर्थ

अब तौ जानें श्याम बस, वोटों का व्यापार।

    उपरोक्त उदाहरणों के आधार पर यह प्रमाणित किया जा सकता है कि एक आश्रय आलंबन की विभिन्न प्रकार की उद्दीपन क्रियाओं से [मात्र आलंबन से नहीं] जिस प्रकार का अर्थ ग्रहण करता है और उन क्रियाओं के प्रति जिस प्रकार के अंतिम निर्णय लेता है, उसमें उसी प्रकार के स्थायी भाव निर्मित हो जाते हैं। स्थायी भावों की बनती और बिगड़ती स्थिति एक नायक की उन विभिन्न अवस्थाओं में देखी जा सकती है, जिनमें कभी वह क्रोध करता है, कभी शोकाकुल होता है, कभी लोक-कल्याण की बात सोचता है तो कभी उसका चरित्र लोकघाती चरित्र बनकर उभरता है। नायकों का इस प्रकार का चरित्र हमारे वर्तमान खंड-काव्यों, उपन्यासों, नाटकों आदि में सर्वत्र मौजूद है। जिसके अनुसार आस्वादकों की स्थायी भावों की जटिल प्रक्रिया को समझा जाना, विश्लेषित किया जाना एवं उसे रस की कोटि में रखना वैचारिक प्रक्रिया से जोड़े बिना संभव नहीं।

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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



विचार और भाव-1  

+रमेशराज

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भाव का सम्पूर्ण क्षेत्र विचार का क्षेत्र है। जो काव्य-मर्मज्ञ काव्य से विचार-सत्ता के अस्तित्व को नकारने की कोशिश करते हैं और उसे सिर्फ भावक्षेत्र की सीमा में बाँध लेना चाहते हैं, ऐसे विद्वजनों को सोचना  चाहिए कि विचार के बिना किसी भी भाव का उद्बुद्ध  होना संभव नहीं है।

    काव्य के बारे में इतना तो तय है कि किसी भी सामाजिक में रसनिष्पत्ति विभाव, संचारी भाव, अनुभाव और स्थायी भाव के संयोग के कारण ही होती है, लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि जब तक सामाजिक, विभाव की क्रियाओं, अनुक्रियाओं, भावों, अनुभावों अर्थात् उसकी समस्त उद्दीपन प्रक्रिया को अर्थ देकर, एक विशेष निर्णय की स्थिति में नहीं पहुँच जाता, तब तक उसके मन में किसी भी प्रकार के भाव का निर्माण नहीं होता।

    रसाचार्य भट्लोलट्ट व शंकुक अपने रसोत्पत्तिवाद में जब नटी और नट में रस की उत्पत्ति का कारण राम और सीता का अनुकरण मानते हैं, तब अनुकरण का अर्थ क्या है? इस प्रश्न को वैज्ञानिक तरीके से सुलझाया जाना आवश्यक नहीं? अनुकरण का  सीधा अर्थ यह निकलता है कि नट और नटी मंच पर जाने या अभिनय करने से पूर्व यह विचार कर लेते हैं कि हमें मंच पर राम और सीता का अभिनय करना है। इसके लिए वह रामकथा का अध्ययन कर, राम और सीता की चारित्रिक विशेषताओं, उनकी विभिन्न पात्रों के प्रति संवेदनशीलता, भावात्मकता एवम् वैचारिक मूल्यवत्ता आदि से अवगत होते हैं। जब नट और नटी यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि अब हम राम और सीता की वैचारिक अवधारणाओं, भावात्मक दशाओं एवम् संवेदनशील मनःस्थितियों को अपने अनुभावों के द्वारा पूर्ण कुशलता के साथ मंच पर प्रदर्शित कर सकते हैं, तभी वह मंच पर अभिनय करने के लिए दर्शकों के सम्मुख आते हैं। मंच पर नट और नटी के मन में यह विचार पूरी तरह छाया रहता है कि हम दर्शकों के समक्ष राम और सीता का अभिनय कर रहे हैं। राम और सीता के अभिनय करने का उक्त विचार ही उन्हें एक ऐसी भाव-दशा में ले जाता है, जिसके कारण वह राम और सीता की भावात्मकता, संवेदनशीलता को जीवंत रूप प्रदान करने में सक्षम हो पाते हैं। दूसरी तरफ यदि मंच के इर्द-गिर्द बैठे हुए दर्शकों को लें तो उनके मन में भी किसी प्रकार की भावदशा का निर्माण इस कारण होता है क्योंकि उनमें पूर्व निर्धारित यह वैचारिक अवधारणाएँ रहती हैं कि रामायण एक पवित्र और धर्मिक ग्रन्थ  है, जिसके पात्र राम और सीता आदर्शवान, ईश्वरीय अंश, अलौकिक या दैवीय शक्ति के प्रतीक हैं, जिनका यशस्वी रूप देखने, सुनने, पढ़ने से लोक-कल्याण हो जाता है या मानव को इस जीवन-मरण की क्रिया से मोक्ष मिल जाता है। लोक-कल्याण और मोक्ष का विचार लेकर जब दर्शक रामायण के पात्र राम और सीता का रूप [ नट और नटी में ] मंच पर देखते हैं तो वह नट और नटी को राम और सीता का रूप मानकर चलते हैं। नट और नटी को राम और सीता मानने का विचार ही सामाजिकों को एक निश्चित भावदशा में ले जाता है।

    किसी भी सामाजिक की नट और नटी के अभिनय के द्वारा बनी राम और सीता संबंधी विभिन्न भावदशाओं में से रति जैसी भावददशा इस कारण नहीं बन पाती क्योंकि सामाजिक के अंदर राम और सीता के प्रति अनेक धर्मिक संस्कार होते हैं जिनके कारण वह सीता और राम के प्रति रति जैसे विचार लाते ही अपराधबोध  से ग्रस्त हो उठता है। रति के विचार से जन्य यह अपराधबोध , राम और सीता को पवित्र पात्र मानने के कारण उत्पन्न होता है।

    इस प्रकार हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि नट और नटी में चूंकि राम और सीता की समस्त जीवन-क्रियाओं को अभिनीत करने का विचार होता है, इसलिए वे रत्यादि भावों को भी आसानी से उद्बुद्ध  कर लेते हैं, जबकि सामाजिक देवी-देवताओं के प्रति अपनी रति को पापमय विचारते हैं, अतः अपराधबोध  से ग्रस्त हो उठते हैं।

लेकिन हमारे रसाचार्यों का आग्रह या दुराग्रह यह रहा है कि उन्हें रसनिष्पत्ति की व्याख्या सिर्फ भावों के सहारे ही करनी है, इसी कारण भट्टनायक भी अपने रस-मत में भावकत्व, भोजकत्व आदि के द्वारा रति, शोक, हास आदि भावों का साधारणीकरण कर डालते हैं। लेकिन इसके मूल में व्यक्ति या सामाजिक के विचार ही कार्य करते हैं, वे इस तथ्य की ओर संकेत करने या सुलझाने के बजाय केवल भावों के माध्यम से सामाजिक को ममत्व-परत्व के बंधनों से अवैज्ञानिक तरीके से मुक्त करा देते हैं, जबकि ऐसा कदापि नहीं होता और न काव्य के आस्वादन के कारण सामाजिक में रजोगुण, तमोगुण के नाश तथा सतोगुण के उद्रेक से रसानुभूति होती है।

भट्टनायक की साधारणीकरण सम्बन्धी व्याख्या के मूल में यदि हम यह जानने का प्रयास करें और उदाहरणस्वरूप रामलीला या कृष्णलील का रसास्वादन करते हुए दर्शकों या श्रोताओं को लें तो जो दर्शक या श्रोता राम और कृष्ण को [ पारिवारिक एवं सांप्रदायिक वातावरण के कारण ] बचपन से ही अपना ईश्वर या देवता तय कर चुके होते हैं, ऐसे दर्शकों या श्रोताओं को कुरान, बाइबिल आदि के कथावाचन में बिठा दिया जाये, तो इनके मन में किसी भी प्रकार से ऐसे भक्ति रस की निष्पत्ति नहीं होगी, जैसी कि राम-कृष्णादि के चरित्र के कथावाचन द्वारा होती है। ठीक यही स्थिति कुरान, बाइबिल आदि के संप्रदायवादियों पर भी लागू होगी। अक्सर यह भी देखा गया है कि जो भक्त लोग कृष्ण लीलादि में राधा और कृष्ण की रति, नृत्यादि को देखकर आत्मविभोर हो उठते हैं, उन परंपरावादी भक्त लोगों को इसी प्रकार के नृत्य से परिपूर्ण यदि किसी कथित अधार्मिक फिल्म या नाटक में बिठा दिया जाये तो ऐसे भक्त लोगों में नायक-नायिका के प्रति भक्ति या रति उद्बुद्ध  होने के स्थान पर जुगुप्सा जागृत हो जाती है। इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि यदि भावों का साधारणीकरण किसी स्थिति में होता भी है तो उसके मूल में सामाजिकों की वैचारिक अवधारणाएँ ही कार्य करती हैं।

    जहाँ तक किसी काव्य-सामग्री के आस्वादन के समय सामाजिक का ममत्व और परत्व की भावना से परे हो जाना होता है तो यह तथ्य भी एकदम निराधार और अतार्किक है। यदि ऐसा ही होता तो रामलीला का आस्वादन करने वाले सामाजिक राम-रावण आदि में कोई अंतर नहीं कर पाते। वास्तविकता तो यह है कि राम के प्रति अपनत्व और रावण के प्रति शत्रुता का विचार ही किसी सामाजिक में विभिन्न प्रकार के भावों का निर्माण कर पाता है। यदि यह परत्व-ममत्व के विचार अपनी भूमिका न निभाएँ तो कोई भी सामाजिक राम के प्रति सतोगुण और रावण के प्रति तमोगुण से ओतप्रोत न हो। कहने का अर्थ यह है कि किसी भी सामाजिक के मन में किसी भी काव्य-सामग्री को जिस प्रकार में समझने, परखने और देखने की वृत्ति होती है, उसके मन में उसी प्रकार के भाव उद्बुद्ध होते हैं। इसलिए अभिनव गुप्त भी भावों की व्याख्या करने में पूर्व रसाचार्यों की तरह असमर्थ जान पड़ते है। क्योंकि किसी भी सामाजिक के मन में स्थायित्व भावों का नहीं, विचारों का ही होता है। सामाजिक के मन में स्थिति स्थायी विचारों को जब कोई सामग्री उद्दीप्त करती है तो सामाजिक काव्य-सामग्री के उद्दीपन के प्रति विभिन्न तरीके से विचारना प्रारंभ कर देता है। सामाजिक का उस काव्य-सामग्री के उद्दीपन पक्ष के प्रति विचारना ही, उसके मन में विभिन्न प्रकार के भावों को उद्बुद्ध  करने में सहायक होता है। विभिन्न भावों में उद्बुद्ध  होने पर, जो भाव स्थायी भाव बनता है, वह सामाजिक की उस वैचारिक प्रक्रिया का अंग होता है, जो काव्य-सामग्री के उद्दीपन पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण व सबल अंग होती है। उदाहरणस्वरूप-भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रामप्रसाद बिस्मिल, अशपफाक उल्ला खां, भगतसिंह जैसे क्रांतिकारी यह विचार कर चुके थे या ये कहें कि यह निर्णय ले चुके थे कि आजादी हमें वीरतापूर्ण कार्य, ओजपूर्ण साहित्य के द्वारा ही मिल सकती है। इस कारण क्रांतिकारियों की मार्क्स , लेनिन, मोपासां के साहित्य को पढ़कर जिस प्रकार की भावना बनती थी, उसका रसात्मक आकलन उनके कार्य और उनके द्वारा रचित साहित्य को पढ़कर आसानी से किया जा सकता है। ठीक इसी प्रकार वर्तमान संदर्भों को किसी सामाजिक के सामने साफ-साफ और चुनौतीपूर्ण तरीकों से प्रस्तुत करने वाली आज की काव्य-सामग्री उसी सामाजिक को किसी संवेदनात्मक भावदशा में ले जा सकती है जो यह विचारता या अनुभव करता है कि वर्तमान व्यवस्था में कोई सड़ांध है, जिसे दूर किया जाना आवश्यक है।

इस विचारधरा के विपरीत यदि हम ऐसे सामाजिक को लें जो एय्यासी  को ही जीवन मानता है, ऐसे सामाजिक के मन में यथार्थवादी या सत्योन्मुखी काव्य-सामग्री के प्रति किसी भी प्रकार की संवेदनात्मक भावदशा नहीं बन सकती। उक्त प्रकार का सामाजिक जब किसी नायक-नायिका के मिलन, चुंबन, विहँसन से ओतप्रोत काव्य-सामग्री का आस्वादन करेगा तो उसके मन में तुरंत स्थायी भाव रति जागृत हो उठेगा।

     इस प्रकार तर्कपूर्ण तरीके से यह बात भी प्रमाणिक रूप से कही जा सकती है कि किसी भी सामाजिक में कथित सहृदयता सिर्फ उसकी वैचारिकता ही है।

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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001



शोध पुस्तक "विचार और रस" की प्रस्तावना-

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रस का सम्बन्ध विचार से

+रमेशराज गुप्त

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किसी भी प्राणी के लिए किसी भी प्रकार के उद्दीपक [स्वाद, ध्वनि, गंध, स्पर्श, दृश्य] के प्रति मानसिकक्रिया का प्रथमचरण संवेदना अर्थात् उद्दीपक की तीव्रता, स्वरूप आदि के समान वेदन [ज्ञान] की स्थिति होती है। जब तक प्राणी इस ज्ञान का प्रत्यक्षीकरण अर्थात् उसे कोई अर्थ नहीं दे पाता, तब तक उस प्राणी के अंदर एक ऐसी स्थिति बनी रहती है, जिसे किसी भी प्रकार स्पष्ट नहीं किया जा सकता। लेकिन जब प्राणी उस उद्दीपक के प्रति जन्मी संवेदना को अर्थ प्रदान कर वैचारिक रूप से ऊर्जस्व होता है तो उसके मन में एक भावदशा उद्बुद्ध  होती है, उसी का प्रकटीकरण अनुभावों से होता है।

संवेदना के बिना किसी भी प्राणी में भावदशा का निर्माण संभव नहीं है। संवेदना का मूल स्त्रोत हमारी इंद्रियाँ हैं, जिनके द्वारा प्राप्त ज्ञान को मानव अपने मस्तिष्क में स्मृति-चिन्हों के रूप में एकत्रित करता रहता है। वस्तुतः यही ज्ञान मनुष्य के अनुभव, अनुभूति और रस आचार्यों द्वारा बताए गए ‘स्थायी भाव’ का विषय बनता है।

    इंद्रियबोध से लेकर अनुभाव, अनुभव और अनुभूति की इस जटिल प्रक्रिया में मनुष्य अपनी चिंतन दृष्टि के सहारे जिस प्रकार के निर्णय लेता है, उसमें उसी प्रकार के भाव जागृत हो जाते हैं। इन भावों की पहचान हम अनुभावों के सहारे करते हैं। प्रेम, हास, उत्साह, क्रोध, भय, घृणा आदि के निर्माण की प्रक्रिया हमारी निर्णय क्षमताओं के अंतर्गत ही देखी जा सकती है। मनुष्य का समूचा मनोव्यवहार इतना जटिल है कि हम किसी भी उद्दीपक को दुःखात्मक या सुखात्मक अनुभूतियों का विषय गणित के नियमों की तरह नहीं बना सकते। उद्दीपक के रूप में कोई भी सामग्री, दुःखात्मक या सुखात्मक, हमारे निर्णयों, वैचारिक अवधारणाओं के अनुसार होती है। अर्थात् अपने इंद्रियबोध के माध्यम से हम जिस प्रकार के निर्णय लेते हैं, हमारे मन में उसी प्रकार के भाव जागृत हो जाते हैं। भिखारी को हाथ पसारे हुए देखकर एक व्यक्ति में करुणा और दया उद्बुद्ध हो सकती है। वह उसकी सहायता के लिए कुछ पैसे उसके कटोरे में कुछ पैसे डाल सकता है, जबकि दूसरे व्यक्ति में भिखारी के प्रति घृणा और क्रोध के भाव जागृत हो सकते हैं, वह उसको समाज का कोढ़ मानकर गालियाँ दे सकता है। इसके विपरीत तीसरे व्यक्ति के मन में भिखारी के कटोरे में पड़े पैसों को देखकर लालच पनप सकता है। वह भिखारी से पैसों को छीनने का विचार बना सकता है। भिखारी के प्रति पनपी उक्त प्रकार की विभिन्न भावदशाएँ, वस्तुतः मनुष्य के उन वैचारिक निर्णयों की देन है, जो संस्कारित मूल्यों के कारण बनते हैं।

    एक शोषक के मन में शोषित व्यक्ति की दयनीय दशा, करुणा के संवेगों का सचार इसलिए नहीं कर पाती, क्योंकि उसके संस्कार शोषक विचारधाराओं के पोषक होते हैं, जबकि एक मानवीयदृष्टि से युक्त लेखक या व्यक्ति शोषितों की दयनीय, निर्बल और असहाय दशा देखकर करुणा से द्रवीभूत हो उठता है।

    किसी भी व्यक्ति के लिए प्रेम जैसी सुखात्मक अनुभूति, आवश्यक नहीं है कि उस व्यक्ति को सुखात्मक अनुभूति की ओर ही ले जाये और उसमें हर स्थिति में कथित रति ही जागृत हो, जिसका परिपाक शृंगार-रस  के रूप दिखायी दे। सच तो यह है कि हर सामाजिक अपनी अवधारणाओं, मान्यताओं के अनुसार ही विभिन्न प्रकार के उद्दीपकों के प्रति भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रेम-तत्वों का निर्धारण करता है और उक्त प्रेम तत्व को अपनी मान्यताओं के आधार पर अनुभाव में प्रकट करता है। हर नारी को देखकर पुरुष में एक ही प्रकार की रसदशा जागृत नहीं हो जाती। माँ, बहिन, पत्नी, प्रेमिका आदि के प्रति प्रकट किया गया प्रेम, मानव के संस्कारित वैचारिक मूल्यों के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार के भावों में उद्बुद्ध होता है।

    कविता चूंकि समाज द्वारा समाज के लिए लिखी गई रागात्मक संबंधों की वैचारिक प्रस्तुति है, अतः उस पर सामाजिक मान्यताओं, परिस्थितियों, आस्थाओं, संस्कारों का प्रभाव न पड़े, ऐसा संभव ही नहीं। भक्तिकालीन कवि गोस्वामी तुलसीदास यदि नारी की संवेदनशीलता को एक ओर रख, उसे प्रताड़ना की अधीकारिणी बना डालते हैं तो रीतिकालीन कवि उसी नारी को एक भोग-विलास की वस्तु मानकर उसके साथ रास रचाते हुए कथित आनंद अवस्था को प्राप्त होते हैं, जबकि मैथिलीशरण गुप्त उसी नारी को अबला, प्रताडि़त, असहाय और दलित अनुभव करते हैं। नारी के प्रति भक्तिकाल में उद्बुद्ध क्रोध करुणा और दया के भाव कवियों की मान्यताओं, वैचारिक अवधारणाओं के कारण ही काव्य में भिन्न-भिन्न रसों का विषय बने हैं।

    वस्तुतः मनुष्य की वृत्तियाँ, प्रवृत्तियाँ उसकी वैचारिक दृष्टि के कारण जन्म लेती हैं, विकसित होती हैं तथा इन्हीं वृत्तियों के अनुसार व्यक्ति में घृणा, वात्सल्य, करुणा, दया, शृंगार आदि की निष्पत्ति होती है। व्यक्ति की इन विचारधाराओं को समझे बिना किसी भी प्रकार की रागात्मकवृत्ति के विश्वव्यापी प्रसार, विस्तार की कल्पना नहीं की जा सकती। काव्य योग की साधना , सच्चे कवि की वाणी तभी बन सकती है जबकि वह कविता जैसे मानवीय मूल्य को चिंतन-मनन की सत्योन्मुखी दृष्टि के साथ प्रस्तुत करे। अगर वह ऐसा करता है तो उसे विधि के बनाए जीवों के प्रति तरह-तरह की आशंकाएँ उत्पन्न होने लगेंगी और वह रीतिकालीन कवि ठाकुर की मान्यता- ‘विधि के बनाए जीव जेते हैं जहाँ के तहाँ, खेलत फिरत तिन्हें खेलन फिरन देव’, को जब अनुभव और तर्क की कसोटी पर परखेगा तो वह अपनी मानवीय संवेदनशीलता के कारण यह कदापि नहीं चाहेगा कि जो जीव जहाँ खेल रहा है, वहीं उसे खेलने दिया जाये। वह बच्चे को आग के, मेमने को शे’र के, शोषित को शोषक के चंगुल से बचाने का प्रयास करेगा। यही बचाने का प्रयास जब शेष प्रकृति के प्राणियों के सुख सौंदर्य के साथ रागात्मक संबंध स्थापित करेगा तो रक्षा, करुणा, दया, विरोध और विद्रोह जैसी रसात्मक अवस्थाओं में उद्बुद्ध हो उठेगा। 

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रमेशराजगुप्त 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001


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