
अचानक नहीं होता
आंतक का आगमन।
विश्वास की मजबूत
धरा को नफ़रत से सींचकर
रौंपे जाते हैं आंतक के विषैले बीज।
नहीं करते जो मौसम
के आने का इंतज़ार
फूट पड़ते हैं रातों-रात।
बिना खाए सूर्य की गर्माहट,
प्रतिक्षण विकसित
भय की पत्तियां
माघ के पाले की
ठंड से भी नहीं झरती,
न ही झुलसती है आंतक की पौध।
जेठ की दोपहरी में तपाती
गर्म हवा के थपेड़ो से।
विद्वेष की दुर्गन्ध
छिटकते हुए पुष्प नहीं
रक्त फूटता है
आंतक की फुनगी से
और हो जाती है
धरती स्याह।

- शोध छात्रा हेमलता यादव
