चली वासन्ती मलयन
भ्रमरों का ये अनुगूंजन है
नवकलियों का यौवन
देता निश्छल आमन्त्रण है
कामदेव का रति से
चला प्रणय अनुराग है
बावली बन फिर रही
तितली बैठी पराग है।
वासन्ती रंग रँगी वसुधा
फिजां में छाई बहार है।
फूलों का ओढ़ चादर
प्रेमरस भरा श्रृंगार है।
रस से भीगी है रसा जो
बनी हर कली शबाब है
तुम तितली बन जाओ
बने हम तेरा गुलाब हैं।
फूलों से तितली का जीवन
तितली फूलों का श्रृंगार है
तूम पी लो सारा रस मेरा
हम मुरझाने को तैयार हैं।
©पंकज भूषण पाठक"प्रियम"
भ्रमरों का ये अनुगूंजन है
नवकलियों का यौवन
देता निश्छल आमन्त्रण है
कामदेव का रति से
चला प्रणय अनुराग है
बावली बन फिर रही
तितली बैठी पराग है।
वासन्ती रंग रँगी वसुधा
फिजां में छाई बहार है।
फूलों का ओढ़ चादर
प्रेमरस भरा श्रृंगार है।
रस से भीगी है रसा जो
बनी हर कली शबाब है
तुम तितली बन जाओ
बने हम तेरा गुलाब हैं।
फूलों से तितली का जीवन
तितली फूलों का श्रृंगार है
तूम पी लो सारा रस मेरा
हम मुरझाने को तैयार हैं।
©पंकज भूषण पाठक"प्रियम"
