ब्लौग सेतु....

3 मार्च 2014

मुझे इंतजार है



-राजेश त्रिपाठी
हां मुझे इंतजार है
कश्मीरी पंडितों की घर वापसी का
बरसों से उजड़े उनके घरों के
फिर आबाद  होने का
मुझे इंतजार है
दहशतजदा आंखों में
मुसकानों के
फूल खिलने का
बिछड़े दिलों के मिलने का
भटके युवा कदमों के घर वापसी का
केसर क्यारी के
बेखौफ लहलहाने का
मुझे इंतजार है
मसजिदों से अजान
मंदिरों से आरती के स्वर
एक साथ गूंजने का
मुझे इंतजार है
भारत की गंगा-जमुनी
संस्कृति के सरसने
नफरत की आग बुझने का
मुझे इंतजार है
कश्मीर की कराह,
असम का आर्तनाद,
कालाहांडी की करुणा
इनके अवसान का
मुझे इंतजार है
मुझे इंतजार है
उस दिन का
जब आंखों में आंसू
ना होंठों में रंजिश हो
हर तरफ खुशी का गुजर हो
हां मुझे इंतजार है
उस दिन का
जब मैं गर्व से कह सकूं
सारे जहां से अच्छा
हिंदोस्तां हमारा।

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी कविता का एक-एक शब्द दिल को छू गया ।

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    1. प्रिय संजय जी बहुत-बहुत आभार। हृदय को प्रफुल्लित कर गया आपका प्यार। एक संवेदनशील नागरिक की तरह मुझे भी देश की हर पीड़ा, हर दंश कचोटता है। कश्मीर से कन्याकुमारी और देश के हर कोने के नागरिकों की पीड़ा हम सबकी पीड़ा है। हमने इस भारत के एक और नेक होने का सपना देखा था लेकिन आज हर एक के चेहरे पर मुसकान देखने की इच्छा दिवा स्वप्न या कहें दुस्स्वप्न बन कर रही गयी है। इसके लिए किसे दोष दें। इस स्थिति से उबरने के लिए समाज को ही जागना होगा। अभी जागे तो ठीक नहीं बहुत देर हो जायेगी।

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  2. अर्थपूर्ण रचना , दिल को छुते शब्द ! आपकी विशेषता है |

    सुन्दर रचना !!!!!

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    1. समीर जी आभार। आप जैसे सुधी और विज्ञ पाठकों का प्रोत्साहन ही तो हमारा सबसे बड़ा संबल है। आज देश में हर तरफ जो कोहराम, जो अव्वस्था है, समाज के हर तबके में जो असंतोष है वह एक दिन में नहीं जन्मा। मुसलसल उपेक्षा ने ही इसे जन्म दिया है। देश की सीमाएं सुरक्षित नहीं, लोग सुखी नहीं क्या किसी देश में ऐसी ही आजादी होती है।बस ऐसे ही प्रेम-भाव बनाये रखिएगा।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (04-03-2014) को "कभी पलट कर देखना" (चर्चा मंच-1541) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. श्रद्धेय शास्ऱी जी प्रणाम। आपको मेरे भाव अच्छे लगे यह मेरा सौभाग्य है। आपने इन्हें व्यापक फलक देने के लिए चर्चा मंच से जोड़ा यह आपका प्यार और मेरे लिए आशीष के समान है। यों ही हमारा हौसला बढ़ाते रहिए, कलम से क्रांति तो शायद नहीं हो सकती लेकिन हमारे पास अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए इसके अलावा और कोई साधन भी तो नहीं है। बस स्नेह और आशीष बनाये रखिएगा यही प्रार्थना है।

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  4. अर्थपूर्ण गहरी अभिव्यक्ति ...
    शायद फॉर किसी गांधी की जरूरत है देश को ...

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    1. प्रिय दिगंबर जी आपका आभार। मेरे विचारों के समर्थन के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया । देश के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। मुश्किल ये है कि यह देख हम मुसका रहे हैं। इसको प्रगति का पथ मान बैठे लोग। समाज में गहरे जड़ें जमा चुका ये रोग। अब न गांधी, न नहेरू न पटेल आयेंगे। अब तो देश के युवा ही इस उलझन को सुलझायेंगे। आइए करें उस दिन का इंतजार। जब इस देश में आयेगी समता की बहाऱ।

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  5. कविता आईना दिखा रही है ,प्रतिबिंबिंत कर ही है वह सब जो 'अपने को सारे जहाँ से अच्छा' मानने मे बाधक हो गया है.इस 'इंतज़ार' के पूरा होने का इंतज़ार हमें भी है .

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    1. आदरणीय प्रतिभा जी इस सराहना को मैं आशीर्वाद मानता हूं। हमें और शायद सारे देश को यह इंतजार है कि हालात बदलें पर स्वार्थ की राजनीति देश को किस रसातल की ओर ले जा रही है यह तो किसी से छिपा नहीं। उम्मीद यही करें कि अनाचार के इस घटाटोप अंधेेरे में कोई तो किरण फूटेगी जो हमारे इंतजार को खत्म करेगी। बस आप और हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि यह जल्द हो ताकि पीड़ित मानवता का दुख लाघव हो।

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