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7 अगस्त 2016

 तुम तक दिल के भावों को लाऊँ कैसे —--महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’ 

तुम तक दिल के भावों को लाऊँ कैसे
तुमसे उल्फ़त है ये समझाऊँ कैसे
शब्दों में जो पूछा वो तो समझा है
नज़रों का मतलब लेकिन पाऊँ कैसे
मैंने मन में शक को ना हरगिज़ पाला
दिलबर का शक ख़ारिज करवाऊँ कैसे
जीवन पथ में मिल कर हमको चलना था
आधे रस्ते से अब मुड़ जाऊँ कैसे
मैंने बंधन को कर्तव्य ख़लिश समझा
मन में दूजे को मैं बिठलाऊँ कैसे.

महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’
द्वारा एक मंच  गुगल समुह पर...
दिनांक 7 अगस्त 2016

9 अगस्त 2013

बाबुल बालापन में ही क्यों मेरी करी सगाई है... रचनाकार महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’




बरस अठारह से पहले तो शादी सख्त मनाही है 

बारह क्लास अभी पढ़ना है तकि मैं कुछ बन पाऊँ 

फिर बंधन की सोचूँ बोलो इसमें कौन बुराई है 

रिश्ता मेरा रखो चाहे तोड़ो ये सब तुम जानो

शादी जल्दी न करने की मैंने कसम उठाई है 

वैसे भी मैं अपने कानूनी हक खूब समझती हूँ

कच्ची कली अभी हूँ मैं, न रुत खिलने की आई है 

मुझको ज़ोर-
जबर्दस्ती से डोली नहीं बिठा देना

फूटेगी तो पछताओगे, कच्ची अभी सुराही है 

मैं भी हार नहीं मानूँगी कोर्ट-कचहरी जाऊँगी

अन्याय से लड़ने को ही मुंसिफ़ और सिपाही है 

और ख़लिश दरकार नहीं कुछ, थोड़ी सी आज़ादी दो

क्या मन-मरज़ी करने को बस केवल मेरा भाई है. 

--
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश