ब्लौग सेतु....

16 जुलाई 2014

सच-झूठ पर दोहे -- कुंवर कुसुमेश


सच्चाई फुटपाथ पर, बैठी लहू-लुहान.
झूठ निरंतर बढ़ रहा,निर्भय सीना तान.

उन्नति करते जा रहे,अब झूठे-मक्कार.
होगा जाने किस तरह,सच का बेड़ा पार.

झूठ तुम्हारे हो गए,कितने लम्बे पैर.
सच की इज़्ज़त दांव पर, राम करेंगे खैर.

सच के मुँह तक से नहीं, निकल रही आवाज़.
मगर झूठ के शीश पर,हरदम सोहे ताज.

सच पर चलने की हमें,हिम्मत दे अल्लाह.
काँटों से भरपूर है, सच्चाई की राह.



9 जुलाई 2014

मैं आज भी वही पुराने ज़माने की माँ हूँ -- साधना वैद


तुम्हारे लिए
मैं आज भी वही
पुराने ज़माने की माँ हूँ
मेरी बेटी
तुम चाहे मुझसे कितना भी
नाराज़ हो लो
तुम्हारे लिए
मेरी हिदायतें और
पाबंदियाँ आज भी वही रहेंगी
जो सौ साल पहले थीं
क्योंकि हमारा समाज,
हमारे आस-पास के लोग,
औरत के प्रति
उनकी सोच,
उनका नज़रिया
और उनकी मानसिकता
आज भी वही है
जो कदाचित आदिम युग में
हुआ करती थी !
आज कोई भी रिश्ता
उनके लिए मायने
नहीं रखता !
औरत महज़ एक जिस्म है
उनके तन की भूख
मिटाने के लिए !
एक सिर्फ तुम्हारे प्रबुद्ध
और आधुनिक
हो जाने से
पूरा समाज सभ्य
और उदार विचारों वाला
नहीं बन जाता !
आज भी हमारे आस-पास
तमाम अच्छे लोगों के बीच
ऐसे घिनौने लोग भी
छिपे हुए हैं
जिनकी सोच कभी
नहीं बदल सकती,
औरत को कुत्सित नज़र से
देखने की उनकी गंदी
मानसिकता नहीं बदल सकती
और उनके सामान्य से जिस्मों में
पलने वाला हैवानियत का
राक्षस नहीं मर सकता !
इसीलिये कहती हूँ
अपने दिमाग की खिड़कियाँ खोलो
देह के हिस्से नहीं !
अपने आत्मबल को संचित
करके रखो,
क्योंकि शारीरिक बल में
तुम उन दरिंदों से कभी
मुकाबला नहीं कर पाओगी
जो घात लगाये हर जगह
सरे राह और अब तो
चलती बसों, कारों
और ट्रेनों में भी
तुम्हारे पीछे वहशी कुत्तों
की तरह पड़े रहते हैं !
अगर बदकिस्मती से
तुम्हारे साथ
कोई हादसा हो गया
तो तुम्हें जीने की
कोई राह नहीं मिलेगी बेटी
क्योंकि हम तुम लाख चाहें
कि इस हादसे का असर
तुम्हारे जीवन पर ना पड़े
लोग एक पल के लिए भी
तुम्हें वह हादसा
भूलने नहीं देंगे !
किसीके उलाहने और कटूक्तियाँ
तो किसीके व्यंगबाण,
किसीकी दयादृष्टि और संवेदना
तो किसीके सहानुभूति भरे वचन,
किसीके गुपचुप इशारे और संकेत
तो किसीके जिज्ञासा भरे सवाल
उस भयावह कृत्य को बार-बार
रिवाइंड कर हर पल हर लम्हा
तुम्हें फिर से उन्हें
जीने के लिए
विवश करते रहेंगे,
और तुम फिर कभी
सामान्य नहीं हो सकोगी
महज़ एक ‘ज़िंदा लाश’
बन कर रह जाओगी !
आज मेरे होंठों से निकली ये बातें
ज़रूर तुम्हें ज़हर सी कड़वी
लग रही होंगी
लेकिन बेटी बाद में
तुम्हारी आँखों से बरसते
आँसुओं के तेज़ाब को
मेरे ये होंठ ही पियेंगे
कोई और नहीं !
तुम्हारी राह रोके मेरे ये बाजू
जिन्हें झटक कर तुम आज
बाहर जाना चाहती हो
कल को यही तुम्हारे
रक्षा कवच बन
अपनी बाहों में समेट
तुम्हें पनाह देंगे
कोई और नहीं !
इसलिए आज तुम्हें अपनी
इस ‘दकियानूस’ माँ की
हर बात माननी पड़ेगी !
दुनिया के किसी भी कोने में
तुम चली जाओ
आदमी आज भी हैवान ही
बना हुआ है और
इसका खामियाजा आज भी
औरत को ही उठाना पड़ता है !
शायद ऊपर वाले ने भी
उसे ही अपनी नाइंसाफी का
शिकार बनाया है !


लेखक परिचय -- साधना वैद

4 जुलाई 2014

आज मैं क्या लिखूं? -- संजय भास्कर


आज मैं क्या लिखूं?
हाँ बहुत दिन होगए है,
ख्यालों के बादल भी कम हो गए है,
साफ़ साफ़ सा है विचारों का आसमां
इसी सोच में हूँ की आज मैं क्या लिखूं ?

- संजय भास्कर 


23 जून 2014

मुझें अमरत्व की चाह है -- जानू बरुआ


सेठ बने है, जब फ़िक्र में थे तो लामलेट हो रहें थे |
जिसके भाग्य में लिखा वो बेफिकर होकर झेले...
हमें तो इन्तजार है उस सूरज का ,
जो चमके मेरे प्रताप से ......
और मैं उसकी परछाई में खोकर,
हर्षित हूँ लेकिन उसमें मैं कहीं, ना हूँ ...|

जो मदत-मदत कह रहा ,
उसके हाथ खुले है, उपकार को |
भय भीतर खा रहा ,
फिर भी उसे तो रोटी मिल बांटकर है, खानी |


झूट का भार कमर तोड़ रहा
लेकिन झूटे धन की चाह उसे नहीं....|
अभय मुर्ख, सत्य के अर्थ तलाशने को निकला है... |

कर्म की महत्ता से परिचित है,
उससे सत्य कहता है |
उसे आभास नहीं है,
मैं किस दिशा में हूँ ??

अगर वो मुझसे
कठिन- कठोर परिश्रम मांगेगी,
तो और आगे बढ चलूँगा,
मुझें अमरत्व की चाह है
 " अपने कर्मों से प्रप्ति संभव " |

लेखक परिचय -- जानू बरुआ   


20 जून 2014

हो जाए ऐसा खुदा न खास्ता तो -- वंदना सिंह


हो जाए ऐसा खुदा न खास्ता तो 
याद आये भूला हुआ रास्ता तो 

नींदों में हमें है चलने कि आदत 
अगर शिद्दत से वो पुकारता तो

खामोशियों को जुबां हमने जाना 
कयामत ही होती गर बोलता तो

होता यूँ के टूटते बस भरम ही 
गर जाते में उसको टोकता तो

उसी कि नजर का जवाब हम थे 
आईने में खुद को निहारता तो

मर के भी मैं जी उठूंगा शायद 
दिया अपना जो उसने वास्ता तो