ब्लौग सेतु....

9 मई 2014

मुद्दतों हुए माँ से मिले

मुद्दतों पहले एक शाम बिन बताये घर पहुँचा था
माँ आज भी शाम को चार रोटी अधिक बनाती है!

मुद्दतों पहले मजाक़ में ही माँ से कहा था, कि
तेरे आज के उपवास ने मुझे एक दुर्घटना से बचा लिया
माँ आज भी हर रविवार को उपवास रखती है !

मुद्दतों पहले जिस खिलौने के टूटने पर मैं खूब रोया था
माँ आज भी उस टूटे खिलौने को मेज पर सजा के रखती है !

मुद्दतों पहले मैंने माँ के जिस साड़ी में आसूँ पोछे थे
माँ आज भी उस साड़ी पर हाथ फेर रोया करती है !

मुद्दतों पहले मेरे बीमार होने पर
माँ ने बगल के दरगाह में मन्नत मांगी थी
माँ आज भी हर शाम उस दरगाह में सजदा करने जाती है !

मुद्दतों हुए माँ से मिले, उसकी आखों से वो दुनिया देखे
जिसमें परियां होती थी, राजा रानी की अठखेलियाँ होती थी
फिर एक सुहानी नींद होती थी !

मुद्दतों हुए माँ से मिले!

5 मई 2014

तभी कहेंगे देश महान!

दाने-दाने को मोहताज हैं, जहां बहुत इनसान।
पीड़ा का पर्याय जिंदगी, हर इक है हलकान।।
भेदभाव की दीवारों ने, बुना जहर का जाल।
भाईचारा नहीं रहा अब, द्वैष से सब बेहाल।।
    नेता हों या शासक जिसके बेच रहे ईमान।
    जिस देश में ऐसा हो, उसे कैसे कहें महान।।
जहां आज तलक आधी आबादी भूखी सोती है।
रावण है मदमस्त, जहां सीताएं पीड़ित रोती हैं।।
सच्चे झेलें कष्ट, जहां झूठे की इज्जत होती है।
किसी देश में क्या ऐसी भी आजादी होती है।।
    युवा हाथ बेकार जहां, मरते जहां किसान।
    जिस देश में ऐसा हो, उसे कैसे कहें महान।।
लफ्फाजी है, भाषणबाजी है, बड़े-बड़े आश्वासन।
गाली-गलौज है, मारपीट है, खो रहा अनुशासन।।
अब चुनाव ऐसे होते हैं, जैसे होता कोई समर।
जर्रे-जर्रे में जहर घुल गया, ऐसा हुआ असर।।   
    सच्चे की हो सांसत, पूजा जाता हो शैतान।
    जिस देश में ऐसा हो, उसे कैसे कहें महान।।
वादों के बियाबान में जनता खोज रही सुविधाएं।
ये वादे वे स्वप्नमहल हैं, चुनाव हुए ढह जाएं।।
आंसू हैं, आर्तनाद हैं, दिशा-दिशा में दावानल।
शांति पुनः स्थापित हो, है कोई जो करे पहल।।
    स्वार्थ-नीति में जहां हों डूबे सत्ता के 'भगवान'।
    जिस देश में ऐसा हो, उसे कैसे कहें महान।।
देश पड़ोसी आंख तरेरें, हम रह जाते हैं खामोश।
इस बुजदिली से उनका, बढ़ता और भी जोश ।।
जो पिद्दी से देश वे भी इससे, बन बैठे हैं शेर।
जाने माकूल जवाब देने में, क्यों होती है देर।।
    सीमाओं पर जहां हमेशा  हमले के इम्कान।
    जिस देश में ऐसा हो, उसे कैसे कहें महान।।
देश महान है, देश पूज्य है, देश है देव  समान।
हम चाहेंगे भला ही इसका, हो सार्विक कल्याण।।
पर हालात रुलाते हमको, जितनी बढ़ती जाती पीर।
अनाचार से त्रस्त सभी हैं, चाहे कायर या हो धीर।।
    संकट के बादल हों छाये, घिरे हुए तूफान।
    जिस देश में ऐसा हो, उसे कैसे कहें महान।।
शासन में शुचिता आए, जनमुखी हों जिसके काम।
जल,थल,नभ रहें सुरक्षित, देश बने सुख का धाम।।
भेदभाव मिट जायें जग से,फिर हो सबमें भाईचारा।
डर का विनाश हो जाये, लहरे निडर तिरंगा प्यारा।।
    देश का हर नागरिक सुखी हो, हो गरीब या धनवान।
    मुक्त हो जीवन, मुक्त हो वाणी, तभी कहेंगे देश महान।।
                                                      -राजेश त्रिपाठी


असम - क्या हाथों में हथियार जरूरी है

ये कैसी मजबूरी है
अपनी मर्ज़ी से जी भी न सकते
अपनी मर्जी से मर भी न सकते

कहते है उनके सोच में आंधी है
तूफानों से लोहा लेते
जंगलों में अपना बाग बनाते
उनके पत्थर पानी एक है
मगर
ये दर तो उनका है
हम तो घास चरने वाले हैं
तो फिर क्यूँ
अपनी मर्ज़ी से मैदान चुन भी न सकते
अपनी मर्ज़ी से कहीं टहल भी न सकते
ये कैसी मजबूरी है

आकाश का रंग वो बताते हैं लाल
चेहरे पर रंग लगाते हैं लाल
बन्दुक की पिचकारी करती है सब लाल
उनकी सोच है लाल
मगर
हमें तो आकाश दीखता है नीला
घास का मैदान दूर तक है हरा
तो फिर क्यूँ
अपनी मर्ज़ी से रंग चुन भी न सकते
अपनी मर्ज़ी से होली खेल भी न सकते
ये कैसी मजबूरी है

वो बताते है धरती का यह हिस्सा अपना है
नदी का पानी हो रहा जूठा है
पहाड़ की छाव छीनी जा रही है
जंगल के रस लुटे जा रहे हैं
मगर
हमने तो छाझा रह्ना सिखा है
मिल बाँट कर खाना-पीना सिखा है
तो फिर क्यूँ
अपनी मर्ज़ी से कहीं रह भी न सकते
अपनी मर्ज़ी से कुछ चुन भी न सकते
ये कैसी मजबूरी है

वो चेहरे को अच्छा और बूरा बताते हैं
ये अपनों का और ये हानिकारक कौम का
ये हमें घाव को हरा रखना सिखाते हैँ
बदले में जलना और जलाना सिखाते हैं
मगर
हमें तो अपनों के साथ सुख-दुःख बाँटने आता है
जरूरत पे एक दूसरे के काम अाना आता है
तो फिर क्यूँ
अपनी मर्ज़ी से अपना पराया मान भी न सकते
अपनी मर्ज़ी से बेहिचक कुछ कह भी न सकते
ये कैसी मजबूरी है

ये कैसी मजबूरी है
क्या अमन पसन्द कमजोरी है
ये कैसी मजबूरी है
क्या हाथों में हथियार जरूरी है

2 मई 2014

तेरी खुशबू के लिये

झगड़ रहीं थीं दिशायें
जिनके बीच
सहमी खड़ी थी हवा
अपने आगोश में
लिए तेरी खुशबू

रो रहें थें सजे रास्ते
चुप थें बातूनी पत्ते

खुशी से लहरा रहे थें
तो केवल कुछ घास के तिनके
जिनपे खड़ी थी हवा
लिए तेरी खुशबू

29 अप्रैल 2014

क्या पाया क्या खोया हमने


                      राजेश त्रिपाठी
     
आओ करें हिसाब, क्या पाया क्या खोया हमने।
    कैसे-कैसे जुल्म सहे, किस-किस पर रोया हमने।।
संबंधों के गणित के कैसे-कैसे बदले समीकरण हैं।
किस-किस ने ठगा और कहां हमारी मात हुई है।।
कहां-कहां विश्वास है टूटा, किस लमहे घात हुई है।
मानवता कब-कब रोयी, आंखों से बरसात हुई है।।
     कब-कब टूटे किसी सुहागन के सिंदूरी सपने।
     कब-कब उसको शृंगार लगे शूल से चुभने।।
कब किसी मजलूम को हमने जुल्म में पिसते पाया है।
कब इनसान ने किया ऐसा, हैवान भी तब शरमाया है।।
यहां आदमी की अब बस पैसों से होती पहचान है।
हर एक ने बेच जिया यहां, जैसे अपना ईमान है।।
     गम की कहानी अब आंखों से बन आंसू लगी बहने।
     जाने अब सीधे इंसा को कितने गम होंगे सहने।।
आदमी का जीना मुहाल है, हर सिम्त नफरतों का अंधेरा घना है।
जिस तरफ देखो उस तरफ, जैसे मुश्किलों का माहौल तना है।।
हे प्रभु क्या हो रहा है, क्या यही वह गांधी का हिंदोस्तान  है।
जहां सच्चा इंसां रो रहा , मस्ती से जी रहा वहां शैतान है।।
     आओ अगर हो सके तो हम गढ़ें फिर नये सपने।
     जिससे मुल्क में फिर चैन की बंशी लगे बजने।।