तू एक बार आ और उम्मीद जगा दे
इस तरह ख़ामोश रहकर न सजा दे
तू इश्क़ में कर ऐतबार एक बार इश्क़ पर
वह इश्क़ ही नहीं है जो इश्क़ को दगा दे
गीत ऐसा लिख जिसे सुनकर ज़माना जगे
और साज ऐसा बना जो मुर्दों को उठा दे
तेरा मुस्कुरा के जाना चुपके से शरमाना
ख़ुदा काश किसी को न ए क़यामत की अदा दे
ऐसी तो कोई जीत चाहिए ही नहीं ‘मनीष’ को
जो उसको जिताए किसी दूजे को हरा दे
