ब्लौग सेतु....

4 जुलाई 2017

बेबस आवाज

बेबस आवाज

बेबस है एक आवाज 
लोगो के जर्जर तहखाने मे
व्याकुल हो उठती है
जब कभी कोई 
शोर सुनाई देता है
डरी हुई थोड़ी सहमी सी 
इन महानगरों के 
दोहरे आचरण से
जहाँ असत्य का आधिक्य है
जहाँ सत्य का मुद्रा से विनिमय
उसकी आँखों के सामने होता है
जहाँ हर रोज कोई हिंसा किसी
नवजात रूपी अवधारणा 
का हरण कर लेती है
विलुप्ति की कगार पर 
खड़ी होकर 
हर क्षण खोजती है
कुछ दर्रो को 
जहाँ से वो स्वतंत्र होकर
सूर्य की किरणों का 
अवलोकन कर पाए
संचारित हो सके उनमे
प्राणदायक आशाए
पनपती है इसलिये
निरन्तर कि कोई धारणा 
अपवाद न बन जाये
अक्सर उलझ जाती है
परंपरावादी समाज मे
नही सुलझा पाती है खुद को 
धीरे धीरे ह्रसित होकर
स्वयं अपना ही अस्तित्व 
समाप्त कर लेती है


----- हिमांशु मित्रा 'रवि'

प्रकृति का स्वरूप....

 प्रकृति का स्वरूप


परिदृश्य परिवर्तित हो गया इसका 
     जिसकी अठखेलियों का 
सम्मोहन कभी सूर्य की किरणों को 
अल्पकालीन निद्रा मे डूबा देता था
 जिसके आगमन पर चंद्र 
भी बादलों का आवरण हटा देता था
जिसका एहसास मात्र दोहरी शुष्क 
      नयनों को नम कर देता था
जिसका अवलोकन मात्र ही ह्रदय 
    आघात को कम कर देता था 
निश्चित ही ये वही है जिसकी गोद मे 
    बैठ कर पक्षी करलव करते थे
जिसकी सानिध्य मे रहकर घुमक्कड़
  मूर्तियों में रंग को भरते थे
  जिसके एक सूक्ष्म दृश्य से चौपालों का 
  शून्यकाल संतृप्ति मे आ जाता था
    उसके आते ही मौसम का रूप 
      परिवर्तित हो जाता था
       पर शायद उसमे 
      अब  वो  बात  नही
     दिन तो ढलता है पर उसके 
         आगे चाँदनी रात नही 
       निर्रथक समय संयोजित हो जाता है 
        मौसम का रंग भी परिवर्तित हो जाता है
      पर चौपालों का शून्यचक्र नही बढ़ता 
        ये पवन भी शाखों का रूप नही गढ़ता 
         चिंतन न कर हे मानव ! 
         ये तेरी ही परिकल्पनाओं का परिणाम है
         गति देना चाहता था तू जिस जीवन को 
        आज उस पर ही अल्पविराम है
        समय शेष है अब भी तू अपनी
       नगण्य चेष्टाओ को संकुचित कर ले
    बर्हिगमन कर स्वार्थ का अपनी 
       शिराओं से प्रकृति प्रेम के रक्त को भर ले


                     ------ हिमांशु मित्रा 'रवि' 

मेरे नदीम मेरे हमसफर, उदास न हो---साहिर

मेरे नदीम मेरे हमसफर, उदास न हो।
कठिन सही तेरी मंज़िल, मगर उदास न हो।

कदम कदम पे चट्टानें खड़ी रहें, लेकिन
जो चल निकलते हैं दरिया तो फिर नहीं रुकते।
हवाएँ कितना भी टकराएँ आंधियाँ बनकर,
मगर घटाओं के परछम कभी नहीं झुकते।
मेरे नदीम मेरे हमसफर .....

हर एक तलाश के रास्ते में मुश्किलें हैं, मगर
हर एक तलाश मुरादों के रंग लाती है।
हज़ारों चांद सितारों का खून होता है
तब एक सुबह फिज़ाओं पे मुस्कुराती है।
मेरे नदीम मेरे हमसफर ....

जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते
वो ज़िन्दगी में नया रंग ला नहीं सकते।
जो रास्ते के अन्धेरों से हार जाते हैं
वो मंज़िलों के उजालों को पा नहीं सकते।

मेरे नदीम मेरे हमसफर, उदास न हो।
कठिन सही तेरी मंज़िल, मगर उदास न हो |

3 जुलाई 2017

त्रिवेणी: 770

बेहद सारगर्भित रसमय कविता त्रिवेणी: 770

भँवर..........निर्मला शर्मा 'निर्मल'










समुद्र की गहराई तक 
पहुँचने के लिए
मुझे इक भँवर चाहिए। 
लहरों के सहारे 
पार लग जाऊँ 
यह इच्छा नहीं है मेरी,
मुझे तो मंथन चाहिए 
अथाह प्यार चाहिए 
सागर की गहराई का 
जिसमें डूब कर 
उभर जाऊँ मैं।
-निर्मला शर्मा 'निर्मल'