ब्लौग सेतु....

14 मई 2015

....खामोश रही तू - संजय भास्कर


खामोश रही तू,
मैंने भी कुछ न कहा,
जो दिल में था हमारे,
दिल में ही रहा
न तूने कुछ कहा
न मैंने कुछ कहा
धड़कनों ने आवाज दी,
निगाहें फिर भी खामोश रही,
ग़म दोनों को होता था जुदाई का,
जिसे हमने खामोशी से सहा
न तूने कुछ कहा
न मैंने कुछ कहा
सोचता हू मै अब,
मौका इज़हार का कब आएगा,
जब दिल में छुपे जज़्बात
लबो पे अल्फाज़ बन सज जाएगा
सोचते ही रह गए हम
......न तूने कुछ कहा
......न मैंने कुछ कहा !

 -  संजय भास्कर 

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (16-05-2015) को "झुकी पलकें...हिन्दी-चीनी भाई-भाई" {चर्चा अंक - 1977} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
    ---------------

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  2. मैं जब कुछ नहीं लिखता
    और सोचता हूँ तुमको...
    तो लिख जाती है
    ऐसी न जाने कितनी
    कवितायें...
    जिनमें शब्द नहीं होते
    बस .................... वाह !

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  3. सोचते ही रह गए हम
    ......न तूने कुछ कहा
    ......न मैंने कुछ कहा !
    बहुत खूब , सुन्दर पंक्तियाँ सुन्दर भाव

    उत्तर देंहटाएं

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