27 अक्तूबर 2015

हश्र ......संगीता स्वरुप ( गीत )




ज़र्द पत्तों की तरह
सारी ख्वाहिशें झर गयी हैं
नव पल्लव के लिए
दरख़्त बूढ़ा हो गया है
टहनियां भी अब
लगी हैं चरमराने
मंद समीर भी
तेज़ झोंका हो गया है
कभी मिलती थी
छाया इस शज़र से
आज ये अपने से
पत्र विहीन हो गया है
अब कोई पथिक भी
नहीं चाहता आसरा
अब ये वृक्ष खुद में
ग़मगीन  हो गया है
ये कहानी कोई
मेरी तेरी नहीं है
उम्र के इस पड़ाव पर
हर एक का यही
हश्र हो गया है ।

साभार लिंक...http://geet7553.blogspot.in/2014/05/blog-post.html

25 अक्तूबर 2015

मिरे क़ातिलों को ख़बर कीजिए...... साहिर लुधियानवी

उनकी पुण्यतिथि पर विशेष
25 अक्टूबर,1980



मैं ज़िंदा हूँ ये मुश्तहर कीजिए 
मिरे क़ातिलों को ख़बर कीजिए 
  
ज़मीं सख़्त है आसमाँ दूर है 
बसर हो सके तो बसर कीजिए

सितम के बहुत से हैं रद्द-ए-अमल
ज़रूरी नहीं चश्म तर कीजिए

वही ज़ुल्म बार-ए-दिगर है तो फिर
वही जुर्म बार-ए-दिगर कीजिए

क़फ़स तोड़ना बाद की बात है
अभी ख़्वाहिश-ए-बाल-ओ-पर कीजिए

-साहिर लुधियानवी
1921-1980

मुश्तहरः घोषणा, रद्द-ए-अमलः प्रतिक्रिया, 
बार-ए-दिगरः दूसरे का भार,  क़फ़सः पिंजरा, 
ख़्वाहिश-ए-बाल-ओ-परः पंख आने का इन्तजार 

23 अक्तूबर 2015

आज कलानिधि दिखे गगन में... - श्रीप्रकाश शुक्ल





सम्पूर्ण कलाओं से परिपूरित,
आज कलानिधि दिखे गगन में
शीतल, शुभ्र ज्योत्स्ना फ़ैली,
अम्बर और अवनि आँगन में


शक्ति, शांति का सुधा कलश,
उलट दिया प्यासी धरती पर
मदहोश हुए जन जन के मन,
उल्लसित हुआ हर कण जगती पर

जब आ टकरायीं शुभ्र रश्मियाँ,
अद्भुत, दिव्य ताज मुख ऊपर
देदीप्यमान हो उठी मुखाभा,
जैसे, तरुणी प्रथम मिलन पर

कितना सुखमय क्षण था यह,
जब औषधेश सामीप्य निकटतम
दुःख और व्याधि स्वतः विच्छेदित,
कर अनन्य आशिष अनुपम।

 - श्रीप्रकाश शुक्ल

22 अक्तूबर 2015

शरद पूर्णिमा पर विशेष...स्मृति आदित्य

















शरद की 
बादामी रात में 
नितांत अकेली 
मैं 
चांद देखा करती हूं 
तुम्हारी 
जरूरत कहां रह जाती है, 

चांद जो होता है 
मेरे पास 
'तुम-सा' 
पर मेरे साथ 
मुझे देखता 
मुझे सुनता 
मेरा चांद
तुम्हारी 
जरूरत कहां रह जाती है। 

ढूंढा करती हूं मैं 
सितारों को 
लेकिन 
मद्धिम रूप में उनकी 
बिसात कहां रह जाती है, 

कुछ-कुछ वैसे ही 
जैसे 
चांद हो जब 
साथ मेरे 
तो तुम्हारी 
जरूरत कहां रह जाती है।
-स्मृति आदित्य
फीचर एडीटर..वेब दुनिया


17 अक्तूबर 2015

एक जश्न ऐसा भी...... रीना मौर्या


आज मैंने देखा सड़क पर
एक नन्हा सांवला बच्चा
प्यारा सा,, खाने की थाली में कुछ ढूंढ़ता हुआ
उस थाली में था भी तो ढ़ेर सारा पकवान .....
वहीँ पास उसकी बहन थी
जो एक सुन्दर से दिए के
साथ खेल रही थी .....
दिए की रोशनी से उसकी आँखे चमचमा रहीं थी
वो छोटी सी झोपड़ी भी दिए के
रोशनी से रोशन हो गयी थी...
वरना दूर सड़क पर की स्ट्रीट लाइट
का सहारा तो था ही...
बगल में बैठी उसकी माँ
अपने बच्चों की ख़ुशी से
फूली नहीं समां रही थी...
थोड़ी ही दूर अगले मोड़ पर एक दावत थी..
सेठ जी के  पोते का मुंडन था...
शायद वहां के सेठ-या सेठानी
इनपर मेहरबान हुए होंगे
तभी तो आज यहाँ भी जश्न का माहौल है...
शायद जब महलों में दिया जलता है
तभी होती है इन झोपड़ियों में रोशनी ....!!

लेखक परिचय -  रीना मौर्या 


7 अक्तूबर 2015

मेरा घर कहाँ है माँ -- मधुलिका पटेल


माँ तुम बचपन से
कहती आई हो
एक दिन मैं अपने घर जाउंगी
और अपने सपने
पूरे कर लूंगी
पर माँ वहाँ जो
मेरे अपने रहते हैं
वो कहते हैं
“यह मेरा घर है
यहाँ सपनों वाली नींद की
सख़्त पाबन्दी है।”

लेखक परिचय -  मधुलिका पटेल