ब्लौग सेतु....

1 अगस्त 2016

आँखो में कुछ नमी सी...


आँखो में कुछ नमी सी...

आज छत से ..

मैने सूरज को उगते देखा

कई रंगो में ढल कर

इक नई रंग में ढलते देखा

हमारे हिस्से की धूप हमीं तक थी,

मन में कुछ सुकून सी थी..

हमारी कली जो

आज फूल बनकर खिलखिलाएँ हैं,

हमारी शादव्ल,शफ़़फा़फ जौ इन्हीं से है

समेटती हूँ ..इन लम्हो की अहसासो को,

हमारे हिस्से की...

दरीचों के पीछे से झाकती दो आँखे,

रिजक-ए-अहसास हि है.

जो हर गम में भी मुस्काए है..

देखो न..

इन मुस्कराती आँखो में

 फिर कुछ नमी सी है..

खेल है धूप छांव की


पर कुछ सुकून सी है..।
                 ©पम्मी सिंह

(शादव्ल-हराभरा,शफ़फाफ़-उजला,धवल,रिजक-धन दौलत)

8 टिप्‍पणियां:

  1. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 02/08/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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    उत्तर
    1. जी,धन्यवाद
      उपयुक्त शब्दो और अवसर प्रदान करने के लिए.

      हटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (03-08-2016) को "हम और आप" (चर्चा अंक-2423) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    उत्तर
    1. जी,धन्यवाद
      उपयुक्त अवसर प्रदान करने के लिए...

      हटाएं

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