ख़ुद जिओ
अपने जियें,
और
काल-कवलित
हो जायें।
कितना नाज़ां / स्वार्थी
और वहशी है तू ,
तेरे रिश्ते
रिश्ते हैं
औरों के फ़ालतू।
चलो अब फिर
समझदार,
नेक हो जायें,
अपनी ज़ात
फ़ना होने तक
क्यों बौड़म हो जायें....?
क़ुदरत की
करिश्माई कृति = इंसान
सृजन को
विनाश के
मुहाने पर
लाने वाला =इंसान।
महक फूलों की
दिशा कब
तय कर पाती,
आब -ओ - हवा
सरहदों के
नक़्शे कभी न पढ़ पाती।
अंडे रखने को
तिनके
चुनकर
चुनकर
चिड़िया चोंच में दबाकर ,
सीमांत इलाक़ों में
सीमांत इलाक़ों में
कुछ इधर से
कुछ उधर से लाती।
बहती है नदी
ख़ुद क्या ले पाती,
रौशनी सूरज की
जगमगाती जग को,
तब हरी पत्तियां
भोजन बनातीं,
शुभ्र चाँदनी में रातें
ख़ूब खुलकर खिलखिलातीं ।
ऑक्सीजन
देते-देते पेड़
कभी न हारे हैं ,
इंसान तेरी
पैसे की हवस ने
कितने मज़लूम मासूम मारे हैं।
तमसभरी राह में
कोई लड़खड़ा गया है,
अँधेरा बहुत
अब तो गहरा गया है,
घनेरा आलोचा गया अँधेरा,
घनेरा आलोचा गया अँधेरा,
अब दरवाज़े पर एक दीपक जलायें ,
उकता गया है मन....... चलो
उकता गया है मन....... चलो
नींद आने तक दादी से सुनें कथाऐं।
#रवीन्द्र सिंह यादव