ब्लौग सेतु....

30 दिसंबर 2016

आनेवाली मुस्कराहटों ...

लो गई..
उतार चढ़ाव से भरी
ये साल भी गई...
गुजरता पल,कुछ बची हुई उम्मीदे
आनेवाली मुस्कराहटों का सबब होगा,
इस पिंदार के साथ हम बढ़ चले।

जरा ठहरो..देखो
इन दरीचों से आती शुआएं...
जिनमें असिर ..
इन गुजरते लम्हों की कसक, कुछ ठहराव और अलविदा कहने का...,
पयाम...नव उम्मीद के झलक
कुसुम के महक का,

जी शाकिर हूँ ..
कुछ  चापों की आहटों से
न न न न इन रूनझून खनक से...,

हाँ..
कुछ गलतियों को कील पर टांग आई..,

बस जरा सा..
हँसते हुए ख्वाबों ने कान के पास आकर हौले से बोला..
क्या जाने कल क्या हो?
कोमल मन के ख्याल अच्छी हि होनी चाहिए..।
                                                                  ©  पम्मी सिंह  
                                                     
        (पिंदार-self thought,शाकिर- oblige )                                          

29 दिसंबर 2016

आत्ममुग्ध-सा चला आ रहा है .....डॉ. सरस्वती माथुर


नदी-खेत-पोखर पर
चिड़िया-सा चहचहा रहा है

यह मंजुल प्रकाश भर
पंखड़ियों को धरा पर
बिखरा रहा है

जाफ़रानी हवाओं-सा
डाल-डाल. पात-पात पर
तितली-सा मंडरा रहा है

वसुधा में कर परिवर्तन
कोमल वत्सल-सा
शांत अविरल-सा
नदी, बादल
समुद्र, पहाड़ पर
ओस कण की
वंदनवार सजाकर
आत्ममुग्ध-सा
चला आ रहा है *

-डॉ. सरस्वती माथुर

17 दिसंबर 2016

गीत


   सीरत कुछ की काली देखी
           राजेश त्रिपाठी
हमने  इस जग की हरदम रीत निराली देखी।
सूरत देखी साफ, मगर सीरत* कुछ की काली देखी।।
     कुछ खाये-अघाये इतने  खा-खा कर  जो बने हैं रोगी।
     शील, सौम्यता खो  गयी  बने आज ज्यादातर भोगी।।
     परमार्थ का भाव खो गया  सभी बन गये  सुविधावादी।
     पानी पीकर देश को कोसें चाहें गाली देने की आजादी।।
ऐसे लोगों में गुरूर भरा कंठ तक, तर्क की कोठी खाली देखी।
अपनी बात  मनाने को  लड़ते, आदत अजब  निराली देखी।।
     कितना लूटें, कितना समेंटे बस इनका यही  है धंधा।
     ये अपनों तक को ना छोड़ें मानस इनका होता गंदा।।
     मक्कर से ये दुनिया चलाते इनकी ऐसी होती चालें।
     लाख जतन कर बच ना पाये जिस पर फंदा डालें।।
पैसे के हित कुछ भी करते हरकत चौंकानेवाली देखी।
सूरत देखी साफ, मगर सीरत कुछ  की काली देखी।।
     खून-पसीना एक कर जो बनाते हैं भवन निराले।
     अक्सर खाली पेट ही देखा मिलने नहीं निवाले।।
     ठंडे घऱों में श्रीमंत राजते वैभव से भरा खजाना।
     कभी-कभी श्रमिकों के घर होता एक न दाना ।।
उसकी जिंदगी  की झोली देखी अक्सर रहती खाली।
सूरत देखी साफ, मगर सीरत कुछ की काली देखी।।
     धूप, शीत, बरसात  झेल कर खेती करे किसान।
     मौसम, महाजन की मार से जो रहता हलकान।।
     उसका श्रम कभी-कभी  जाता एकदम  बेकार ।
     जब उसे पड़ती है झेलनी सूखे-बाढ़  की मार।।
फसल के सही दाम कम मिलते उसकी थैली रहती खाली।
सूरत  देखी  साफ, मगर सीरत  कुछ की  काली देखी।।
     सब होवैं खुशहाल यहां सबको मिले सही सम्मान।
     सच कहें तो तभी बनेगा अपना पावन देश महान।।
     कोई  कमाये कोई खाये कोई हरदम करता फांका।
     इसका मतलब किसी के हक पर डाले कोई डाका।।
यह हालत ज्यादा अरसे तक अब नहीं है चलनेवाली।
सूरत देखी साफ, मगर सीरत कुछ की काली देखी।।
सीरत*= स्वभाव, चरित्र, प्रकृति

      
      

      
      


15 दिसंबर 2016

प्रतिघात किया करो...अजय कुमार झा

सुनो !
आरुषी,
प्रियदर्शनी ,
निर्भया ,
करुणा ,
सुनो लड़कियों
तुम यूं न मरा करो ,

हत्या कर दो ,
या अंग भंग ,
फुफकार उठो ,
डसो ज़हर से,
बन करैत,
बेझिझक , 
बेधड़क ,
प्रतिवाद , 
प्रतिकार ,
प्रतिघात , किया करो
-अजय कुमार झा

8 दिसंबर 2016

हितवाणी -4

कोरे कागज दिल पर , प्रेम लकीर खींच 
मैली गठरी हुई तेरी ,  देख नयन  मीच 
तन मैल धोयी के , उज्जवल दियो  बनाए 
मन दर्पण होये कैसे , कुछ तो करो  उपाय 
वक़्त पहिया चले सदा , देखे ऊंच न नीच 
पर निंदा से मन मैला,  हुई कीच ही  कीच 
मैले मन के मंदिर में , प्रभु  को दियो  बिठाय 
बेआवाज जब लाठी पड़े ,  आगे  कौन  सहाय 
अग्नि तेरी दौलत की , बुझा न सके कोई और 
एक झटका काल का , छिनता अंतिम कौर 
समझ सको तो समझ लो , हितवाणी के बोल 
स्वर्ण सज़ा तन तेरा,  बिकता  फिर  बेमोल 
हितेश कुमार शर्मा