ब्लौग सेतु....

8 फ़रवरी 2014

गीत

पीर प्रवाहित है रग -रग में ,
दर्द समाहित है नस -नस में ,
मुझमें पीड़ा समाधिस्थ है ,
प्राण नियंत्रण से बाहर है //

रेचक करना  भूल गई हूँ ,
कुम्भक की विधि याद नहीं है,
कैसे ध्यान -धारणा हो अब ,
नाड़ी शोधन ज्ञात नहीं है
प्रियतम प्रेम प्रयाण से पहले
योग सुभग इक़ सपना भर है //

विचलित चित्त न धीरज जाने ,
विरहा की गति चरम हुई है ,
ब्रह्मरन्ध्र तुममें विलीन है ,
साँसों की गति विषम हुई है /
आयुष लेकर क्या करना है ,
बहुत निकट नटवर नागर है //

आठों प्रहर साधनामय हैं ,
शुभ संकेत प्रदर्शित होते /
चारों धाम मिले मन भीतर ,
अचल सुहाग समर्पित होके /
अंतर्ज्योतित अभयानंदित ,
ह्रदय सुखद दुख का सागर है //

   @-भावना 

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (09-02-2014) को "तुमसे प्यार है... " (चर्चा मंच-1518) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. कभी कभी पीड़ दर्द कितना सुखदायी होता है
    जब यही नटवर नागर से मिलन की राह बन जाए
    बहुत सुन्दर !

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  3. पीर प्रवाहित है रग -रग में ,
    दर्द समाहित है नस -नस में ,
    मुझमें पीड़ा समाधिस्थ है ,
    प्राण नियंत्रण से बाहर है //

    रेचक करना भूल गई हूँ ,
    कुम्भक की विधि याद नहीं है,
    कैसे ध्यान -धारणा हो अब ,
    नाड़ी शोधन ज्ञात नहीं है
    प्रियतम प्रेम प्रयाण से पहले
    योग सुभग इक़ सपना भर है //

    विचलित चित्त न धीरज जाने ,
    विरहा की गति चरम हुई है ,
    ब्रह्मरन्ध्र तुममें विलीन है ,
    साँसों की गति विषम हुई है /
    आयुष लेकर क्या करना है ,
    बहुत निकट नटवर नागर है //


    बेहद की सुन्दर रचना है कोमल शब्दावली।

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  4. गीत
    पीर प्रवाहित है रग -रग में ,
    दर्द समाहित है नस -नस में ,
    मुझमें पीड़ा समाधिस्थ है ,
    प्राण नियंत्रण से बाहर है।
    रेचक करना भूल गई हूँ ,
    कुम्भक की विधि याद नहीं है,
    कैसे ध्यान -धारणा हो अब...
    कविता मंच पर भावना तिवारी

    सुन्दर भाव विरेचक गीत

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