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16 अप्रैल 2015

कविता/ मरा हुआ आदमी-Brijesh Neeraj




इस तंत्र की सारी मक्कारियाँ
समझता है आदमी
आदमी देख और समझ रहा है
जिस तरह होती है सौदेबाज़ी
भूख और रोटी की
जैसे रचे जाते हैं
धर्म और जाति के प्रपंच
गढ़े जाते हैं
शब्दों के फरेब

लेकिन व्यवस्था के सारे छल-प्रपंचों के बीच
रोटी की जद्दोजहद में
आदमी को मौका ही नहीं मिलता
कुछ सोचने और बोलने का
और इसी रस्साकसी में
एक दिन मर जाता है आदमी

साहेब!
असल में आदमी मरता नहीं है
मार दिया जाता है
वादों और नारों के बोझ तले

लोकतांत्रिक शांतिकाल में
यह एक साजिश है
तंत्र की अपने लोक के खिलाफ
उसे खामोश रखने के लिए

कब कौन आदमी जिन्दा रह पाया है
किसी युद्धग्रस्त शांत देश में
जहाँ रोज गढ़े जाते हैं
हथियारों की तरह नारे
आदमी के लिए
आदमी के विरुद्ध
लेकिन हर मरे हुए आदमी के भीतर
सुलग रही है एक चिता
जो धीरे-धीरे आँच पकड़ेगी

हवा धीरे-धीरे तेज़ हो रही है
बृजेश नीरज

16 टिप्‍पणियां:

  1. आपको सूचित किया जा रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शनिवार (18-04-2015) को "कुछ फर्ज निभाना बाकी है" (चर्चा - 1949) पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. इस धीरे धीरे तेज हो रही हवा को आंधी में परिवर्तित होते हुए देखना है

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    1. जी बिलकुल! प्रतिरोध की सफलता इसी में है!

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  4. वाह ! मन के भावों की कशमकश को रचना मे बहुत सुंदर ढंग से उकेरा है

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  5. जहाँ रोज गढ़े जाते हैं
    हथियारों की तरह नारे
    आदमी के लिए
    आदमी के विरुद्ध ---------हवा तेज हो रही है -----सत्य बयान , बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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