| शुभ प्रभात, शुभ दिवस की मंगल बेला | |
| घर-घर दीप प्रज्जवलित करती सुन्दर बाला | |
| हर्ष उल्लास की छटा अदुतिया फैलाती खुशहाली | |
| जगमग करते दीपों से रोशन हुई निशा काली | |
| सुन्दर तोरण द्धार सजे और आँगन रंगोली | |
| हाथों में मिष्ठान उपहार और मधुर हुई बोली | |
| सुन्दर सुन्दर वस्त्रों से सुशोभित हर नर और नारी | |
| मनमोहक पुष्पों से महकी उपवन की हर क्वारी | |
| भीनी -भीनी खुश्बू से महकता घर का कोना कोना | |
| प्रदेश से प्रियतम के आगमन का सत्य हुआ सपना सलोना | |
| प्रसन्नता के पुष्प खिले ,आज बच्चों के मन में | |
| हाथ पटाखे लिए एकत्रित हुए घर के आँगन में | |
| मुस्कराहट संग होता उपहारों का आदान प्रदान | |
| सबकी भिन्न-भिन्न पोशाक और भिन्न-भिन्न है शान | |
| लक्ष्मी पूजन कर मांगते सुख समृद्धि का वरदान | |
दिवाली के शुभ पर्व पर रोशन हुआ मेरा
हिंदुस्तान
|
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9 नवंबर 2015
शुभ दिवाली ..............हितेश कुमार शर्मा
5 नवंबर 2015
आज की दिवाली ............हितेश कुमार शर्मा
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दिवाली क्यों मानते
हैं, करो ये
स्मरण
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उपहारों की
चकाचौंध में, भूले
अपनापन
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हर एक करता
है दिवाली का बेसब्री से इंतज़ार
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मन में
चाहत , कि हो उपहारों
की बौछार
|
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उपहार देने
की चाहत का ,एक ही है
उसूल
|
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| उसकी कीमत से कई गुना, करना है वसूल | |||
| आधुनिक दिवाली का क्या हो गया है स्वरुप | |||
| दिखावे में है सौंदर्य और राम आदर्श हुए करूप | |||
| प्रभु राम की अयोध्या वापसी से हुआ था इसका आगाज़ | |||
| क्या आज की पीढ़ी को है इसका जरा सा अंदाज | |||
| आज का बेटा राम नहीं, और न ही दरसरथ हुए बाप | |||
| सत्य, मर्यादा ,और संस्कार हुए बीते दिनों की बात | |||
| धन दौलत के लिए ही करते लक्ष्मी पूजा | |||
| ये सबका भगवान और नहीं कोई दूजा | |||
| इस शुभ पर्व का कुछ इस तरह हो रहा सत्यानास | |||
| लेंन देंन के चक्कर में, राम नाम लगता है उपहास | |||
| आओ इस बार की दिवाली कुछ अलग सी मनाये हम | |||
| इस मंगल बेला पर , प्रेम दीप जलायें हम | |||
| हितेश कुमार शर्मा | |||
4 नवंबर 2015
कविता
ऐसा हिंदोस्तान चाहिए
राजेश त्रिपाठी
राम को चोट लगे तो रहीम
को आंसू आये।
रहीम को रंज
हो तो राम
सो न पाये ।।
गंगा-जमनी तहजीब जहां हरदम विराज
करे । सभी के लिए दिलों में
मोहब्बत परवाज करे ।।
रस्मों में फर्क
हो पर दिलों
में नहीं ।
फिरकावाराना वारदात ना
हो पाये कहीं ।।
मंदिरों में शंखनाद हो, मसजिदों में गूंजे अजान। एकजहती की आला मिसाल बने हिंदोस्तान ।।
ऐसे भी हालात इन दिनों मुल्क में पाये गये हैं । अपने कभी
थे पल भर
में वे पराये हुए हैं ।।
भाई यहां देखो भाई
का गला काट रहा है। सियासत
का गंदा खेल
दिलों को बांट
रहा है ।।
बरसों से सभी कौम
के लोग साथ रहते आये हैं।फिर क्या
हुआ जो बढ़ रहे नफरतों के साये हैं।।
क्यों शहर दर शहर खूंरेजी, कत्ल बवाल है। क्यों मजहबों के बीच दीवारें उठीं क्या मलाल
है ।।
हिंदोस्तानी हूं
मैं, दिल में उठता सवाल है। जो भाई का घर फूंक रहा,वह भी न बचेगा खयाल है।।
मुल्क की
दुश्मन हैं जो ताकतें हमें बांट रही
हैं । उनकी सियासत चल रही वो चांदी काट रही हैं ।।
आपस में सब
भाई हैं सब हिंदोस्तानी
हैं । सबके दर्द एक हैं सबकी इक जैसी कहानी है ।।
हर हिंदोस्तानी को
कसम है, है खुदा का वास्ता । हम मोहब्बत
से जियें बस यही है सच्चा रास्ता ।।
पैगंबर से लेकर धर्मगुरु तक ने दिया प्रेम का संदेश। प्रेम
जगत का सार है कुछ इससे नहीं विशेष ।।
गिले-शिकवे भूल कर यह अहद कर लें आज । मुल्क
में अम्नोअमान हो लायेंगे
मोहब्बतों का राज ।।
दिशा दिशा में दावानल क्यों,चप्पे चप्पे हाहाकार। शैतानी
हैं कौन ताकतें करतीं नफरत का व्यापार ।।
ना तख्त,ना ताज, ना ऐश का सामान चाहिए।एकजहती, अमन का
राज हो ऐसा हिंदोस्तान चाहिए ।।
मेरे दिल के अंधेरे
वक़्त चलता रहा मगर ,
| |
तेरी
यादें ठहर गयी
इस दिल में
| |
फिर
वो हसीं चेहरा
सामने आया
| |
तेरा
ज़िक्र जब आया
महफ़िल में
| |
तम्मनायों
के फूल सूख
चुके थे
| |
मेरी
दिल की किताब
में
| |
फिर दिल की कली खिल उठी
| |
जब तेरी सूरत नज़र आई
आफताब में
| |
की
थी दुआ मैंने ये
रब से
| |
तेरी
यादों का साथ
अब छूट जाए
| |
और रिस्ता जुड़ा था जो दिल से दिल की
डोर का
| |
किसी तरह कच्चे धागे सी
टूट जाए
| |
दिल
तोड़ के चले
जाना तेरा
| |
कुछ फर्क नहीं अब तुझ में र
कातिल में
| |
मेरा
बचना नामुमकिन था
| |
जब
खुद डुबो दिया
मुझे साहिल ने
| |
नहीं
मालुम कब तक
तेरी यादें
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अब
रहेगी साथ मेरे
| |
बाहर
की रोशन दुनिया
भी
| |
नहीं
मिटा सकी मेरे
दिल के अँधेरे
|
2 नवंबर 2015
मैं कहना चाहता हूं------कुल दीप ठाकुर
मैं कहना चाहता हूं, इक बातदिवाने से,
कुछ भी हासिल न होगा, व्यर्थ में आँसु बहाने से।
उसे तुझ से प्यार होता, तेरा जीवन तबाह न करति,
पत्थर दिल नहीं पिघलते, किसी के रोने और मिट जाने से।
सूख रहा है एक गुल, बुलबुल की याद में,
हस्ति तेरी मिट जायेगी, गुल तेरे मुर्झाने से।
शमा को तुझसे प्यार नहीं, मत जा तु उसके पास।
जलाकर राख कर देगा, कहता हूँ परवाने से।
भोली भाली एक चकोरी, चाँद को पाना चाहाति है,
दिल नहीं है चाँद के पास, क्या लाभ है उसे चाहने से।
किसी को भी इतना मत चाहो, जी न पाओ उसके बिना,
जीवन नहीं मरा करता है, किसी के दूर जाने से।
कुछ भी हासिल न होगा, व्यर्थ में आँसु बहाने से।
उसे तुझ से प्यार होता, तेरा जीवन तबाह न करति,
पत्थर दिल नहीं पिघलते, किसी के रोने और मिट जाने से।
सूख रहा है एक गुल, बुलबुल की याद में,
हस्ति तेरी मिट जायेगी, गुल तेरे मुर्झाने से।
शमा को तुझसे प्यार नहीं, मत जा तु उसके पास।
जलाकर राख कर देगा, कहता हूँ परवाने से।
भोली भाली एक चकोरी, चाँद को पाना चाहाति है,
दिल नहीं है चाँद के पास, क्या लाभ है उसे चाहने से।
किसी को भी इतना मत चाहो, जी न पाओ उसके बिना,
जीवन नहीं मरा करता है, किसी के दूर जाने से।
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