ब्लौग सेतु....

4 नवंबर 2015

मेरे दिल के अंधेरे


                                                                    वक़्त  चलता  रहा  मगर ,
तेरी  यादें  ठहर  गयी  इस  दिल  में 
फिर  वो  हसीं  चेहरा  सामने  आया 
तेरा  ज़िक्र  जब  आया  महफ़िल  में 

तम्मनायों  के  फूल  सूख  चुके  थे  
मेरी  दिल  की  किताब  में 
फिर दिल की कली खिल उठी 
जब तेरी सूरत नज़र  आई   आफताब  में 

की  थी  दुआ  मैंने ये   रब  से  
तेरी  यादों  का  साथ  अब  छूट  जाए 
और रिस्ता जुड़ा था जो दिल से दिल की डोर का                                    
किसी तरह कच्चे धागे  सी  टूट  जाए 

दिल  तोड़  के  चले  जाना  तेरा 
कुछ फर्क नहीं अब तुझ में    कातिल  में 
मेरा  बचना  नामुमकिन  था 
जब  खुद  डुबो  दिया  मुझे  साहिल  ने 

नहीं  मालुम  कब  तक  तेरी  यादें 
अब  रहेगी  साथ  मेरे 
बाहर  की  रोशन  दुनिया  भी 
नहीं  मिटा  सकी  मेरे  दिल  के  अँधेरे 



हितेश  कुमार   शर्मा                                      

4 टिप्‍पणियां:

  1. कविता-मंच के रचनाकार के रूप में आप का स्वागत है।
    हम आशा करते हैं कि कविता-मंच के रचनाकार के रूप में समय-समय पर अपना योगदान देते रहेगे। सुंदर रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (05-11-2015) को "मोर्निग सोशल नेटवर्क" (चर्चा अंक 2151) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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