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17 नवंबर 2015

कैसे भूलूँ तेरी मोहब्बत को (ग़ज़ल) .......हितेश कुमार शर्मा

                                                                                                                          खता   तेरी  को    खता   कहूँ  तो 
मोहब्बत  बदनाम  होती  है 
हसरतें दिल की तमाम पूरी होती  नहीं 
कुछ  कोशिशे  नाकाम  भी  होती  हैं 
इतना  खुशनसीब  कौन  है  ज़माने  में 
जिसका  दिल  कभी  टूटा  नहीं  
आखें  रोक  नहीं  सकी  दर्द     दिल 
यहाँ  तो  रुस्वाई  सरे  आम  होती  है 
वो  चाहे  या    चाहे  ये  फैसला 
उनका  ही  होता  था  मुझ  पर 
मेरे  दिल  ने  ख़ुशी  इज़हार  किया 
जब उनकी  नज़रें  मेहरबान  होती  है 
यूँ  ही  नहीं तम्मनाओ    के  फूल 
खिलते  हैं  दिल  में  हरपल 
मुरझाये  फूलों  से  पूछो 
नहीं  हर  बार  कली  जवान  होती  है 
दिल में उनकी  चाहत का  ये  आलम  है 
कि  बेवफाई  भी  हमसफ़र  लगती  है 
रोक  लेता  हूँ  आंसू  आँखों  में 
नहीं तो ये  मोहब्बत बदनाम  होती  है 
भूलने की कोशिश कर  रहा  हूँ  उनको 
मगर  कैसे भूलूँगा    ये  सोचता  हूँ 
दिल में हसरत कुछ इस तरह परवान है
कि उनकी यादों से मुलाकात सुबह-शाम होती है 
हितेश कुमार शर्मा 

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (18-11-2015) को "ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री" (चर्चा-अंक 2164) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर रचना,

    आप सभी का स्वागत है मेरे इस #हिन्दी #ब्लॉग #मेरे #मन #की के नये #पोस्ट #मेरा #घर पर | ब्लॉग पर आये और अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें |

    http://meremankee.blogspot.in/2015/11/mera-ghar.html

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