अफसान-ऐ-दर्द को नज्मो की तरह गाने की जरूरत नही है।
आश्ना हु मैं हाँ अब तुम्हे कुछ भी बताने की जरूरत नही है।।
बन्द हो चुके उसके लिए अब इन दिनों इस राह के दरवाजे।
कह दो उसे उसको अब दिल-ए-राह आने की जरूरत नही है।।
हँस कर हर दफा छोड़ देता है तुझे वो बहुत आसानी से।
हर बार की तरह फिर से लौट कर आने की जरूरत नही है।।
हर तरफ ये कैसा फ़ुसूँ है उस सितमगर की हँसी यादों का।
हूँ तलबगार इन सब का इनको मिटाने की जरूरत नही है।।
तू अब कहा भी क्यों नही देता सितमगर के सभी राज जनिब।
उसका गम़्माज़ नही 'मित्रा' उससे छुपाने की जरूरत नही है।।
---- हिमांशु मित्रा 'रवि' ---