ब्लौग सेतु....

5 नवंबर 2017

ग़ज़ल



अफसान-ऐ-दर्द को नज्मो की तरह गाने की जरूरत नही है।
आश्ना हु मैं हाँ अब तुम्हे कुछ भी  बताने  की  जरूरत नही है।।

बन्द हो चुके  उसके लिए  अब इन  दिनों  इस राह के दरवाजे।
कह दो उसे उसको अब दिल-ए-राह आने की जरूरत नही है।।

हँस कर  हर  दफा  छोड़  देता  है  तुझे  वो बहुत  आसानी  से।
हर बार  की तरह  फिर से लौट कर आने  की जरूरत नही  है।।

हर तरफ ये कैसा  फ़ुसूँ है उस  सितमगर  की  हँसी  यादों  का।
हूँ तलबगार इन सब  का  इनको  मिटाने  की  जरूरत  नही है।।

तू अब कहा भी क्यों नही देता सितमगर के सभी  राज  जनिब।
उसका गम़्माज़ नही 'मित्रा' उससे छुपाने की  जरूरत  नही  है।।


           ---- हिमांशु मित्रा 'रवि' ---

30 अक्टूबर 2017

दर्द से फिर इस दिल को भर दो तुम


मुझको   फिर   से   बेकस  कर   दो  तुम।
दर्द  से  फिर  इस  दिल  को भर  दो  तुम।।

          कर    लो   नफरत    जिंतनी   करनी   है ।
          पर  लो   मुझको    मुरदा   कर   दो   तुम।।

मिल कर तुझसे किस्मत -ए- मुजरिम  हूँ ।
कुछ तो महफ़िल मे  अच्छा  कर  दो  तुम।।

          दिल   की    धड़कन   रुकने    लगती   है।
          इस   गुलशन   को   सहरा   कर  दो   तुम।।

मुझको    कहकर  अपना    इन   सब   से।
मुझको   फिर   से   अपना   कर  लो  तुम।।


               -- हिमांशु मित्रा 'रवि' --

26 अक्टूबर 2017

यादें


यादों का ये  कैसा जाना-अनजाना सफ़र है, 

भरी फूल-ओ-ख़ार से आरज़ू की रहगुज़र है। 


रहनुमा  हो जाता  कोई, 

मिल जाते हैं हम-सफ़र,

रौशनी बन  जाता  कोई,

हो  जाता   कोई   नज़र,

ऐसी लगन बेताबियों की,

हो जाता कोई दरबदर है।



याद   धूप   है  याद  ही  छाँव  है,

तड़प-ओ-ख़लिश का एक गाँव है, 

याद  रात   है  याद  ही   दिन  है,

न फ़लक़-ज़मीं पर होता  पाँव है,

हिय  में  हूक  होती  है  पल-पल,
  
बस  बेक़रारी में चश्म-ए-तर  है। 




सुध  न  तन  की  न  ही मन  की,
   
तसव्वुर में रहती  तस्वीर उनकी,
  
ठौर-ए-वस्ल ताजमहल लगता है,

आब-ए-चश्म गंगाजल लगता है,

बे-ख़ुदी में रहती किसे क्या ख़बर,

कब शब  हुई  कब आयी सहर  है। 




दौर-ए-ग़म   में  भाता  नहीं  मशवरा,

लगता ज्यों चाँदनी रात में हो बारिश,

आये हवा उनके दयार की तो लगता है,

छुपा  है  इसमें  संदेशा और सिफ़ारिश,

ज़माने   की  लाख  बंदिशों  को  तोड़ने,

  बार-बार  दिल  में उठती एक  लहर है।   

#रवीन्द्र सिंह यादव 

24 अक्टूबर 2017

हमरी ताउम्र की पतझर भइली.....डॉ .राकेश श्रीवास्तव

रउवा अइली तो जिन्दगी अइली ;
रउवा गइली तो जिन्दगी गइली .

ना पसीजी कसम ओ विनती से ;
रउवा काहे कठोर हो गइली .

प्रेम की ज्योति बुझइलू रउवा ;
आग हमरी घंघोर हो गइली .

रउवा कोंपल नई उगा लेबू ;
हमरी ताउम्र की पतझर भइली .

हमरी अंखिअंन में ख्वाब फिर न बसें ;
रउवा अंसुअंन का पहरा दे गइली .

दिल - लगी रउवा दिल्लगी समझी ;
दिल की दुर्गति हमार कर गइली .

रउवा खातिर जो मोहब्बत खेला ;
हमरा खातिर तो इबादत रहिली .

हम केहू से नहीं कहा दुखड़ा ;
ढल के ग़ज़लन में , शोर हो गइली .
गोमती नगर ,लखनऊ .
( शब्दार्थ > रउवा = आप / तुम )

23 अक्टूबर 2017

ख़्यालों का सफ़र




अल्फ़ाज़ है कुछ माज़ी के 
दिल कभी भूलता ही नहीं
नये-पुराने घाव भर गए सारे  
दर्द-ओ-ग़म राह ढूँढ़ता ही नहीं। 



उम्र भर साथ चलने का वादा है 
अभी से लड़खड़ा गए हो क्यों ?
प्यास बुझती कहां है इश्क़ में 
साहिल पे आज आ गए हो क्यों ?



गर  न  हों  फ़ासले  दिल में   
तो दूरियों की परवाह किसे
नग़मा-ऐ-वफ़ा गुनगुनाती हो धड़कन
तो सानेहों की परवाह किसे। 



छूकर फूल को महसूस हुआ 
हाथ आपका जैसे छुआ हो 
रूह यों जगमग रौशन हुई
ज्यों रात से सबेरा हुआ हो। 

#रवीन्द्र सिंह यादव     

शब्दार्थ / WORD MEANINGS 
अल्फ़ाज़ = शब्द, शब्द समूह  ( लफ़्ज़ का बहुवचन ) / WORDS 

माज़ी = अतीत ,भूतकाल / PAST 

दर्द-ओ-ग़म= दर्द और ग़म / PAIN AND SORROW 

साहिल =समुद्री किनारा / SEA SHORE ,COAST  

फ़ासले = दूरी / DISTANCE 

सानेहों = त्रासदी (त्रासदियों ) / TRAGEDIES 

रूह= आत्मा / SOUL ,SPIRIT