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25 सितंबर 2026

दे लंका में आग लम्बी तेवरी(तेवर-शतक)

 दे लंका में आग 

लम्बी तेवरी (तेवर-शतक)

*रमेशराज

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सिस्टम आदमखोर, जि़न्दगी दूभर है,

कविता को हथियार बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


असुरों के आगे विनती में हर स्वर है,

क्रान्ति-भरे फिर भाव जगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


कान्हा है यदि मौन, भार अब तुझ पर है,

घटता द्रौपदि-चीर बढ़ा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


सुन ले फिर पाश्चात्य-सभ्यता घर-घर है,

श्रेष्ठ सनातन मूल्य बचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


भरा हुआ दुःख से खुशियों का अन्तर है,

मन पर भारी बोझ, हटा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


पापों की बुनियाद खोखली, पल-भर है,

जग को अब ये बात बता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


सच है नाव-सवार, नाव जल-भीतर है,

नैया सच की पार लगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


साँस-साँस पर आज लोटता विषधर है,

दंश न मारे, बीन बजा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


हर पापी के हाथ विष-बुझा खंजर है,

‘सच’ भोला इन्सान, बचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


कहाँ छुपा काले धन वाला अजगर है

मुद्दा संसद बीच उठा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


‘महिषासुर’ भर रहा हृदय में फिर डर है,

माँ दुर्गे को जगा, जगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


संसद में खर्राटे भरे मिनिस्टर है,

इसको तीखा मज़ा चखा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


क्यों जूए-सा बोझ रखा कन्धे पर है,

मत जीवन बदहाल बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


घुड़की देता हुआ समय अब बन्दर है,

मत घुड़की पै माथ नवा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


इस सिस्टम के पास लूट का मंतर है,

मत इसकी बातों में आ तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के |


राम-नाम का ढोंग हृदय के भीतर है,

इस ‘शबरी’ के बेर न खा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


दे लंका में आग जहाँ सब बदतर है,

बन कपीश इस बार दिखा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


आग आँधियों को आयी अब लेकर है,

अपने छप्पर-छान बचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


संवेदन से दूर भावना पत्थर है,

स्पंदन-हित बुद्धि लगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


अब चीज़ों का भाव पहुँच से बाहर है,

क्या पीयेगा दूध-मठा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


हवस अमीरों को धन की अम्बर पर है,

अब इनको औक़ात बता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


ये संसद का बजट वसंती छल-भर है,

बनकर कोयल गीत न गा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


इस निजाम को छेद, भेद ये पल-भर है,

मात-मात-दर-मात न खा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


जीवन का आनंद लीक से हटकर है,

बन कोल्हू का बैल चला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


हर उन्मादी लिये हाथ में खंजर है,

नफरत की दीवार गिरा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


असहायों का यहाँ रुदन में हर स्वर है,

मुस्कानें बस्ती में ला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


द्रौपदि बैठी जिस जंघा के ऊपर है

क्यों न तोड़ता वो जंघा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


जहाँ सरों पर छतें नहीं, बस अम्बर है,

भले झौंपड़ी बने, बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


मुझमें-तुझमें बस इतना ही अन्तर है,

मैं माचिस, बारूद बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


बस थोड़ी ही दूर नूर जल्वागर है,

सोच जहाँ पर आज खड़ा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


इस नुक्कड़-नाटक में परिवर्तन-स्वर है,

मेरे सँग में गोल बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


जिसके भीतर खुशहाली का मंज़र है,

उस चिन्तन को पका, पका तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


जल्लादों की छुरी हमारे सर पर है,

बड़े बुरे हैं हाल, बचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


मेरी मति पर कुंठाओं का पत्थर है,

ऐसे मत आरोप लगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


उड़ी पतंगों के पीछे अब लंगर है,

कहीं न हो ये काम बता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


जहाँ प्रेम का बदला-बदला-सा स्वर है,

वहाँ लगी है आग, बुझा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


ये भी जीने का कोई क्या स्तर है,

कदम प्रगति की ओर बढ़ा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


लेकर कच्ची चली ‘सोहनी’ गागर है,

नदिया भरे उफान, बचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


डाका अबकी बार हमारे हक़ पर है,

दिल्ली को यह बात बता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


देश लूटता धनिक, सांसद, अफसर है,

अब भारी आक्रोश जता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


नदी बनी ये बता भला क्यों पोखर है,

पोखर को फिर नदी बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


अपना बल मत भूल कि तू तो नाहर है,

अंधकार दे चीर, बला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


देख तुझे अँधियार काँपता थर-थर है,

लाया है इस बार प्रभा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


इन्क़लाब का तू ही तो नामाबर है,

परचम सच का उठा, उठा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


महँगाई का बोझ करे तन दुल्लर है,

जमाखोर को सबक सिखा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


वर्षों से ये ही शोषण का मंजर है,

आग-बबूला आज हुआ तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


तू ही तो विष पीने वाला शंकर है,

रच दे फिर इतिहास नया तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


कह दे नेता देश बेचता तस्कर है,

परदा अब की बार उठा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


उसने अपना नाम रखा क्या ‘ईश्वर’ है?

कौन लूटता देश बता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


क्रान्तिकारियों साथ रही जो जलकर है,

वो ही बुझी मशाल जला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


असुरों की चर्चा फिर से अधराधर है,

भय का यह माहौल मिटा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


कैसे मानूँ मेरी पीर निरुत्तर है,

जाने सबका हाल, ‘जगा’ तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


मेघनाद-सा गर्जन, रावण-सा स्वर है,

धूल अधम को चटा, चटा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


आज कंश का मित्र बना मुरलीधर है,

इस रिश्ते से खुश है क्या तू लाँगुरिया? गाल छर असुरों के।


कर में ले तलवार दूसरे खप्पर है,

लाश खलों की आज बिछा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


तेरे ही काँधे पै सच की काँवर है,

चल तेजी से पाँव बढ़ा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


जहाँ दलदली भूमि कीच या गोबर है,

वहाँ नहीं चादरें बिछा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


जिनके सोचों बीच लफंगा-लोफर है,

कर उन बीच न बैठ सभा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


फिर बम का आंतक देख पटरी पर है,

सोच-समझकर कर ट्रेन चला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


कोई बोले ‘अल्ला’ कोई ‘हर-हर’ है,

बढ़ता हुआ फसाद घटा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


बस थोड़ी दूरी पै अमृत-निर्झर है,

वक्ष चीर दे कुछ तम का तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


एक यही तो रूप सत्य है-सुन्दर है,

‘भगत सिंह’ बन आज दिखा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


जहाँ आदमी बेहद दब्बू-कायर है,

वहाँ क्रान्ति की बाँच कथा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


भले दीखती तेरी काया पंजर है,

पहले ऐसा वीर न था तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


छुपा हुआ झाड़ी के पीछे अजगर है,

सच को लेगा लील, भगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के ।


सूखे हुए खेत की खातिर जलधर है,

गहरे तम में अग्नि-शिखा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


है रावण-दरबार तुझे किससे डर है,

अंगद जैसा पाँव जमा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


तू है मौला-मस्त, विकट यायावर है,

इन्क़लाब की बहा हवा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


तू नैतिक मूल्यों का सच्चा बुनकर है

ले-ले शब्दों में पफरसा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


यह तेरा उपचार श्रेष्ठ अति हितकर है,

लगा घाव पर सही दवा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


ख़ामोशी को लादे गया दिसम्बर है,

नया साल खुशहाल बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


राजनीति का कीचड़ भरा सरोवर है,

इसमें सच का कमल खिला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


मुख पर कालिख पोत कुकर्मी ये नर है,

यूँ मत रंग-अबीर लगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


हर कउए की दृष्टि तेरी रोटी पर है,

लंगूरों के बीच घिरा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


दाना तो क्या छूछ न आये घर पर है,

रखा रहा ऐसी मक्का तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


महँगाई के कारण जन-जन को ज्वर है,

जनता का संताप मिटा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


जो हैं आदमखोर उन्हीं से टक्कर है,

गरेबान तक हाथ बढ़ा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


वो जीतेगा जिसकी चोट निरंतर है,

वही पुराने हाथ दिखा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


इत में घोर अभाव उधर मालोजर है,

सबको एक समान बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


वही देश का शत्रु दिखे जो लीडर है,

मत इसका सम्मान करा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


खिले न कोई फूल, डाल पर पतझर है,

कैसे कहूँ वसंत, बता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


फिर ‘गौरी’ घोड़े पर आया चढ़कर है,

तान प्रत्यंचा वाण चला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


सच कहने को मुँह मैंने खोला-भर है,

आगे मेरी बात बढ़ा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


चापलूस औ’ तुझमें भारी अन्तर है,

मत असत्य को माथ नवा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


हर कोई बन गया जहाँ पर मधुकर है,

उन ग़ज़लों के गाँव न जा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


तर आँखों के साथ निर्धनों के घर है,

उस बेटी का ब्याह रचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


अरे उसे पहचान साधु जैसा स्वर है,

पहन गेरुआ वस्त्र ठगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


तब ही नतमस्तक होगा हर अक्षर है,

भाषा को हथियार बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


इस सिस्टम में पाता न्याय अनादर है,

जिसका पहरेदार बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के ।


तेरे घर में चून आज मुट्ठी-भर है,

किसको देगा इसे खिला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


अँधियारा इस बार हमारा रहबर है,

ग़लत दलीलों बीच घिरा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


इन्क़लाबियों की ये क्रान्ति धरोहर है,

अंगारे से राख हटा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


चीजें दीखें साफ कौन नर-किन्नर है,

कर उजियारा और घना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


इस युग में हर नंग दिखे परमेश्वर है,

नंगे को नंगा कह जा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


चटक रंग के साथ खिला गुलमोहर है,

यूँ ही पानी-खाद लगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


जीवन तेरा फूटा हुआ कनस्तर है,

चाहे जैसे रोज बजा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


क्यों जि़न्दा नारी की देह चिता पर है,

मत चलने दे ग़लत-प्रथा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


देखें हम भी तेरा अब क्या तेवर है,

अग्निमुखी चिन्तन में आ तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


सही चोट करने का ये ही अवसर है,

घन को भरकर जोश उठा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


मेरी तेवरियों का विद्रोही-स्वर है,

इनके हर तेवर को गा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


मेरी तेवरियों में पावक गोचर है,

हर तेवर को बना ऋचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।


सौ से ऊपर इस तेवर का नम्बर है,

ऐसी ही तेवरी बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

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15/109,ईसानगर, अलीगढ़

मो.8171455889





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