ब्लौग सेतु....

25 सितंबर 2026

मन के घाव नये न ये ( लंबी तेवरी - तेवर शतक)

 मन के घाव नये न ये

( लंबी तेवरी - तेवर शतक)


*************

सदा न मिलती हार, सदा न रहते द्वन्द्व यूँ

ऐसे घुटना टेक ना, ऐसे घुट ना यार। 1 


काल न देखे काल, भाल न देखे भाल को 

भीमकाय तू है भले मत गरूर कर यार। 2


खल की बातें मान, बढ़ा मान किसका भला 

विष में मिलकर दूध भी विष हो आखिरकार। 3


रिश्वत को लाचार, अब पूरी सरकार ही 

फाइल को सरका रही, इंच-इंच दो चार। 4


दिखे विश्व-बाजार, रंग और बदरंग अब 

इत में हाहाकार है, उत में हा! हा! कार ! 5



फिल्मी गाने  गात, गुण्डे गोदें गात को

खून-खराबा बढ़ रहा, भारी अत्याचार। 6


लील गयी सरकार, सखी स्वदेशी काम को 

बेकारी इतनी बढ़ी, बेका री! घरबार। 7


नहिं महँकावै प्यार तानसेन अब तान से 

जिसमें हो बस तान ही, बसता नहीं दयार। 8


धन की आज अपार, करे लूट धन्वन्तरी  

फिर बाही धन बनत री कोठी बँगला कार। 9 


करे शुद्ध व्यापार, जो शासन के नाम पर 

मूल ब्याज बाकी लिखे, अब बा की सरकार। 10



विज्ञापन हित यार, फैशन-शो में जीतकर 

बड़ी चटपटी, चट पटी नारि विश्व-बाजार। 11


घर में आखिरकार, क्लब से लौटी नारि का 

हुआ आगमन, आग मन पिय के भरी अपार। 12


जीतें आखिकार, एक रहे तो युद्ध हम 

मन का आज मिलान कर, मिला न कर तू यार! 13


चापलूस लाचार, युद्ध लड़ेगा क्या भला 

चाटतु जो तलवा रहे उसे न दो तलवार। 14


भीषण हाहाकार, जित देखो उत पाप ही 

अब तो ले अवतार तू जनता को अब तार। 15



इज्जत यूँ न उतार, तू मजदूर-गरीब की 

रोजनामचा मत दिखा, रोज ना मचा रार। 16


हो जा फिर तैयार, दुश्मन से तू युद्ध को 

इतना अब तै यार है, जीत बनेगी हार। 17


आज सिया-सी जान, फँसी सियासी चाल में 

छल-प्रपंच सँग आज फिर रावण की हुंकार। 18


साधा रण को ध्यान, साधारण इस बात पर

‘क्यों आया वह सामने मूँछ तान इस बार।’ 19


कुल खोयी कुल-आन, करि दुष्कर्म कपूत ने 

पिता सदा गर्वित रहे पहन मान के हार। 20



जान गयी यह जान ‘साथ छोड़ तोता भगा’

माँ का स्वारथ-मोह सँग था बेटे से प्यार। 21


गति जिनका हो मान, कबहु न दुर्गति डालिए 

शोभित गति की तान में पहिया और सितार। 22


मान मिलौ नहिं मान, तजि घर बसि ससुराल में 

सुना कान से का न रे उसने आखिरकार। 23


मुर्गी का दरवा न, मुंसिफ का दरवान है 

चोरी की चतुराइयाँ इत मूरख बेकार। 24


अर्थ-भेद नहिं जान, शब्दों में अन्तर भले 

समझदार को ‘नादिया’, ‘नदिया’ एक प्रकार। 25



हाथ गये पड़ ताल, गहन जाँच-पड़ताल में 

लिखी दरोगा यूँ रपट अबला की भर प्यार। 26


जैसी भी हों नाल, सुख ही देंगी दुःख नहीं

छाती तक मत ला इन्हें, बस पाँवों पर वार।27


उत डाली झट माल, जिधर माल ही माल था

देख लखपती को हुई अब की ‘सिया’ निसार। 28


नेता जी का जाल, नेताजी बनकर हुआ

अब तो इसके साथ हैं सारे ठग-मक्कार। 29


नेताजी का लाल, करता धरती लाल अब 

जहाँ भीड़ मिलती घनी, बम से करे प्रहार। 30



नेताजी की ढाल, उस की नित रक्षा करे 

नकली सिक्के ढाल वह, है करोड़पति यार। 31


पंछी के हर हाल, पर वो पर तो नोंचता 

भले न पिंजरे में रखे, भले न करे प्रहार। 32


घर में सहज सहेज, काका अब का का रखें 

बिखर रहा है आजकल पूरा ही घरबार। 33


परमारथ का इत्र, पास रहे जिसके सदा

ता से समझौता करौ, समझौ ता को यार। 34


लीला पूरा देश, खल का लीला देखिए

ओढ़ रामनामी हुए क्या कौतुक इस बार। 35



कर्जदार की आँख, बही न देखें क्यों बही 

लाला के कारण बढ़े निर्धन-मन दुःख-भार। 36


सोचें सत्ताधीश, कलम होय कैसे कलम 

लगे खोलने नित नये घोटाले अखबार। 37


सम्पति लिखे सिहाय, पगलायी सरकार ये 

ऐसी जनगणना करे जनगण नाहिं शुमार। 38


झट बा दल में जाय, सत्ता के बादल जिधर  

हर नेता अब दल-बदल करता आखिरकार। 39


अब का राम सिहाय, सूपनखा को देखकर 

पढ़े मर्सिया, मर सिया क्यों न जाय इस बार। 40



घर में दाम न लाय, घर को नर बेघर करे 

परनारी दामन लिपट करता धन-बौछार। 41


उत ते जित तू जाय, उत्तेजित होगा वहीं

अब तो चारों ओर है शोषण सदा बहार। 42


ज़िन्दा चिनता बाय, यह जिसकी चिन्ता करे

सत्ता को पाकर बना नेता अति खूँख्वार। 43


ले बन्दूक सम्हाल, ‘हो न हार’ यह सोचकर

नेता का सुत हर तरह ‘होनहार’ है यार। 44


‘बाबाजी’ कहलाय, बाबा जी को लूटकर 

धन पाये प्रवचन सुना, पैर छुवा हर बार। 45


गोरी परि चित जाय, धन से परिचित हो जहाँ

इसके लिये सराय की प्रगतिशीलता सार। 46



मुखियाजी का न्याय, देखा हमने गाँव में 

‘गिरजा’ से ‘गिरि जा’ कहै, अरु टपकावै लार। 47


यह कामुक व्यवसाय जनता को अस लीलता

अब भारी अश्लीलता इण्टरनेट सवार। 48


कहा बनै इत राय, जब ‘लघुता’ इतराय तो 

प्रभुता के बिन मद बढै, फूलै बिना बहार। 49


थिरकें गुरु के हाथ, नित शिष्या के बदन पर 

विद्यालय में बन गयी, विद्या लय का सार। 50



सत्ता बा नर हाथ, जो रचता उत्पात नव

इसके सँग गीदड़ चतुर बैठे पाँव पसार। 51


गह रे! मेरा हाथ, गहरे तम के बीच तू

नव प्रकाश लाना हमें, मेंटेंगे अंधियार। 52


झट गुण्डों के हाथ, नेता  ने ता से गहे

बूथ-कैप्चरिंग हो सके छल-बल से हर बार। 53


लिये कैमरे हाथ, आज पूछते कै मरे?

कल के हत्याकांड के जो गुण्डे सरदार। 54


विजय-पराजय हाथ, लगे कर्म-दुष्कर्म से 

जनमे जय के साथ में एक न इस संसार। 55



लालायित इन्सान, ‘धन को ला-ला इत’ कहे 

धन-लिप्सा का आजकल सब पर भूत सवार। 56


हर रिश्ता अन्जान, उसके दर से हो गया

जिस दर से उसने किया अहंकार-व्यवहार। 57


बिन कद बढ़े न मान, अगर कद रहै,  कदर है 

जो दधीचि-सा, कर्ण-सा उसका ही सत्कार। 58


नतमस्तक इन्सान, नगरवधू के सामने 

घर की केसर छोड़कर कुलटा के सर प्यार। 59 


हम दोनों ने कीन, अजब संग्रह  संग रह

 केवल दोनों ने चुने खार, खार-दर-खार। 60



झट आँखें नम कीन, मिली नहीं नमकीन तो 

लघु बिटिया ने बाप का लखा न दुःख का भार। 61


खल की मीठी बात, सज्जन को खलती सदा

उसी बात का दुष्टजन करते है सत्कार। 62


झट गोरी का गात, दावत में दाबत कई 

नगरवधू का कर रहे यूँ स्वागत-सत्कार। 63


मची खलबली रात, लखि थाने में खल बली

भारी-भरकम पुलिस का काँप उठा दरबार। 64


स्याही देगी नूर, स्याही अगर डराय तो 

घने तिमिर से जूझ तू कलम हाथ ले यार। 65



बन्धु घूर को घूर, कहो न केवल गन्दगी

यही खाद का काम भी देता आखिरकार। 66


देता इत नासूर, वो बस इतना सूर है

लड़ै न कबहू धींग से, रहै दूर ही यार। 67


अब को रहै सहास, आँसू आँखन कोर है

धीरे-धीरे बन गया दुःख जीवन का सार। 68


सत् ता के नहिं पास, जो सत्ता के पास है 

हैं नेता के अब महज झूठ भरे उद्गार। 69


नत अर्जुन के पास, जब तक रण का पास है

तब तक यह गुंजित करे नभ में धनु-टंकार। 70



नये न ये एहसास, मन में घाव नये न ये 

जीवन बीता झेलते दुःखदर्दों के वार। 71


जो खुदगर्ज अ-नेक, ऐसे मित्र अनेक हैं

धन को लखि वन्दन करें, माया लखि सत्कार। 72


को रे! मन नहिं मैल, कोरे-कोरे देखकर,  

सबको ही इस जगत में है नोटों से प्यार। 73


जमा बड़ा नहिं एक, भारी जहाँ जमाबड़ा 

नेता सहता कब मिला गोली की बौछार। 74


चलि उठि करि तू युद्ध, पड़ौ रहैगो भूमि का?

यह कायर की भूमिका करे क्रान्ति बेकार। 75



अब कमान ले बुद्ध, तू यश-शौर्य कमा न ले 

कायरता को त्यागना होगा रे इस बार। 76


चलो करो तुम युद्ध, आज सामना दुष्ट से 

नर हो, न रहो खौफ में, हो न और लाचार। 77


जो हो संत स्वभाव, अंतर के अंतर घटें 

धन माया मद मोह मन अलगावों का सार। 78


माखन-शहद-सुभाव, भीतर  भी तर ही मिलें 

इनके आस्वादन-समय बढ़े चाव हर बार। 79


कुछ हसीन-से ख्वाब, कुछ खुशियाँ-रंगीनियाँ 

रखिए का जी के लिये मदिरा खुशबूदार। 80



पल-पल घेरें खूब, खल निर्बल को आजकल 

दिखें लुटेरे हर तरफ सत्य सत्य लुटे रे यार! 81


सह मत जता विरोध अनाचार या पाप से 

अरे वधिक-जल्लाद से क्यों तू सहमत यार। 82


झट रच डाले फूल, पेड़ बेकली क्यों रहें 

जहाँ अहम् की बेकली वे बन बैठे खार। 83


चलें न दामन थाम, जेबहि दाम न होय तो

बिन माया के मित्रा अब लोगों को बेकार। 84


मसलन.. मसल न फूल, क्यों करता ये काम तू 

जग को अपना ही समझ, रह जग के अनुसार। 85



तब समान तर नैन, मन जो हुए समान्तर

दोनों को अलगाव ने दिया दुखों का भार। 86


काले-काले रंग, मन को काला ही करें 

धन-माया-मद-मोह तू का ले रे मन यार। 87


जो मन हलका होय, जीवन का हल का मिले?

दुःख ही क्या अब तो दिये सुख ने कष्ट अपार। 88 


‘ना रे! ना रे! बोल, अबलाएँ मिन्नत करें

नारे खोलन में सुनें गुण्डे नहीं पुकार। 89


जिसको कहें शराब, बोतल में वो तल नहीं

माँग रह हैं भीख-सी अहले-तलब गँवार। 90



शुभ है हत्याकाण्ड, मत हो हत या काण्ड में

बिन संशय अर्जुन करो पापमुक्त संसार। 91


खो दी गयी सुरीति, खाई-सी खोदी गयी 

घर के जब रिश्ते बँटे थर-थर काँपा प्यार। 92


प्रीति भरे संदेश, कर हमला  हम ला सके

अपहृत खुशियों को छुड़ा लाये हम इस बार। 93


बस ताने बन्दूक, नेता उलटा हो तुरत

भाषण के हो जायँ जब अस्त्र-शस्त्र बेकार। 94


सभी हुए खामोश, तुरत ठहाके गुम हुए

विषयों में विष यों घुला चुप सब आखिरकार। 95


यहाँ दोश-बर-दोश, अब कोई मिलता नहीं, 

मन चंचल-सा बुत हुआ, साबुत रहा न प्यार। 96



चलें जाम पर जाम ‘रम्भा’ सँग रम भा रही 

बदचलनी के दौर में लोग हुए मक्कार। 97


सूपनखा के संग, अब का लक्ष्मण खुश बहुत

अरी उर्मिला  उर मिला रामा रहे पुकार। 98


एक बसी आगोश, एक उर्वशी उर बसी 

कबिरा अब तो साधु का चकलाघर संसार। 99


नगरबधू की बात, आज हीर-सी,  ही  रसी, 

रांझा लूटे मस्तियाँ कोठे पर मक्कार। 100


पापी सत्ता-ईश, अब तो सत्ताईस हैं 

होते अत्याचार अति,  जनता है लाचार। 101


उधर बन्द  ना जीभ, इधर वन्दना मिन्नतें,  

पीट रहे हैं निबल को बलशाली कर वार। 102

 

और न गरजें आप बंधु निबल के सामने 

पाप आपका आ पका कहे तेवरीकार। 103 

---------------------------------------

+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

स्वागत है आप का इस ब्लौग पर, ये रचना कैसी लगी? टिप्पणी द्वारा अवगत कराएं...