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25 सितंबर 2026

मेरा हाल सोडियम-सा है (लम्बी तेवरी, तेवर-शतक)

 

मेरा हाल सोडियम-सा है  

(लम्बी तेवरी, तेवर-शतक) 


+रमेशराज

……………


सृजन काल - 1986


इस निजाम ने जन कूटा है
हर मन दुःख से भरा लेखनी । 1


गर्दन भले रखा आरा है
सच बोलूंगा सदा लेखनी । 2


मैंने हँस-हँस जहर पिया है
मैं ‘मीरा-सा’ रहा लेखनी । 3


मेरा स्वर कुछ बुझा-बुझा है
मैं मुफ़लिस की सदा लेखनी । 4


मेरे हिस्से में पिंजरा है
तड़पे मन का ‘सुआ’ लेखनी । 5


मेरा ‘पर’ जब-जब बाँधा है
आसमान को तका लेखनी । 6


मन के भीतर घाव हुआ है
मैं दर्दों से भरा लेखनी । 7


आदमखोरों से लड़ना है
तुझको चाकू बना लेखनी । 8


हर अल्फ़ाज़ आग जैसा है
कविता में जो रखा लेखनी । 9


छल सरपंच बना बैठा है
इस पै अँगुली उठा लेखनी । 10


जो सोया भूखा-प्यासा है
उसको रोटी जुटा लेखनी । 11


हर मन अंगारे जैसा है
तू दे थोड़ी हवा लेखनी । 12


इसका दम्भ तोड़ देना है
ये है खूनी किला लेखनी । 13


तुझसे जन्मों का नाता है
तू मेरी चिरसखा लेखनी । 14


मुझको क्रान्ति-गीत गाना है
मैं शायर सिरफिरा लेखनी । 15


मुझमें क्रान्ति-भरा किस्सा है
मुझको आगे बढ़ा लेखनी । 16


मुझमें डाइनामाइट-सा है
इक दिन दूंगा दिखा लेखनी । 17


सच हर युग ऐसा धागा है
जिसने हर दुःख सिया लेखनी । 18


कुम्भकरण जैसा सोया है
तू विरोध को जगा लेखनी । 19


मुझ में जोश तोप जैसा है
तू जुल्मी को उड़ा लेखनी । 20


‘सोच’ आग-सा धधक रहा है
मन कंचन-सा तपा लेखनी । 21


ये ख़याल मन उभर रहा है
मैं रोटी, तू तवा लेखनी । 22


जिबह कबूतर खुशियों का है
पंखों को फड़फड़ा लेखनी । 23


सिसके निश-दिन मानवता है
शेष नहीं कहकहा लेखनी । 24


हर कोई बस कायर-सा है
बार-बार ये लगा लेखनी । 25


यहाँ बोलबाला छल का है
सबने सबको ठगा लेखनी । 26


खामोशी से कब टूटा है
शोषण का सिलसिला लेखनी । 27


खल पल-पल कर जुल्म रहा है
इसके चाँटे जमा लेखनी । 28


घर के आगे ‘क्रान्ति’ लिखा है
मेरा इतना पता लेखनी । 29


जिन पाँवों में कम्पन-सा है
बल दे, कर दे खड़ा लेखनी । 30


‘झिंगुरी’ को गाली देता है
क्रोधित ‘होरी’ मिला लेखनी । 31


मैंने ‘गोबर’ को देखा है
नक्सलवादी हुआ लेखनी । 32


‘धनिया’ ने ‘दाता’ पीटा है
दिया मज़ा है चखा लेखनी । 33


खूनी उत्सव रोज हुआ है
ये कैसी है प्रथा लेखनी । 34


घुलता साँसों में विष-सा है
कैसी है ये हवा लेखनी । 35


महज पतन की ही चर्चा है
सामाजिक-दुर्दशा लेखनी । 36


जन चिल्ला-चिल्ला हारा है
बहरों की है सभा लेखनी । 37


अपने को नेता कहता है
जो साजिश में लगा लेखनी । 38


वही आज ऊँचा पहुँचा है
जो गुण्डों का सगा लेखनी । 39


सुख तो एक अदद लगता है
दर्द हुआ सौ गुना लेखनी । 40


धर्मराज फिर से खेला है
आदर्शों का जुआ लेखनी । 41


जो मक्कार और झूठा है
वो ही हर युग पुजा लेखनी । 42


राजा रसगुल्ले खाता है
भूखी है पर प्रजा लेखनी । 43


जज़्बातों से वो खेला है
सबका बनकर सगा लेखनी । 44


सुन वसंत तब ही आया है
पात-पात जब गिरा लेखनी । 45


मुझमें ‘दुःख’ ऐसे तनता है
मैं फोड़े-सा पका लेखनी । 46


कैसे कह दूँ अंगारा है
जो भीतर तक बुझा लेखनी । 47


मेरा हाल ‘सोडियम’-सा है
मैं पानी में जला लेखनी । 48


भले आज तम का जल्वा है
लेकिन ये कब टिका लेखनी । 49


कैसा नाटक रचा हुआ है
लोग रहे सच छुपा लेखनी । 50


उसका अभिनंदन करना है
जो अपने बल उठा लेखनी । 51


जन के लिये न्याय बहरा है
चीख-चीख कर बता लेखनी । 52


जिनको भी अपना समझा है
वे करते सब दगा लेखनी । 53


अनाचार से नित लड़ना है
फड़क रही हैं भुजा लेखनी । 54


अंधकार कुछ तो टूटा है
बार-बार ये लगा लेखनी । 55


तू चलती, लगता चलता है
साँसों का सिलसिला लेखनी । 56


जीवन-भर संघर्ष किया है
मैं दर्दों में जिया लेखनी । 57


और नहीं जग में तुझ-सा है
जो दे उत्तर सुझा लेखनी । 58


कैसे सत्य कहा जाता है
सीख तुझी से लिया लेखनी । 59


उन हाथों में अब छाला है
कल थी जिन पै हिना लेखनी । 60


चक्रब्यूह ये प्रश्नों का है
अभिमन्यु-सा घिरा लेखनी । 61


आकर मन जो दर्द बसा है
कब टाले से टला लेखनी । 62


मन तहखानों में पहुँचा है
जब भी सीढ़ी चढ़ा लेखनी । 63


टुकड़े-टुकड़े महज रखा है
नेता ने सच सदा लेखनी । 64


छल स्वागत में खड़ा मिला है
जिस-जिस द्वारे गया लेखनी । 65


जिसमें प्रभा-भरा जज़्बा है
वह हर दीपक बुझा लेखनी । 66


जिसको सच का नभ छूना है
पाकर खुश है गुफा लेखनी । 67


‘बादल देगा जल’ चर्चा है
मौसम फिर नम हुआ लेखनी । 68


पग मेरा अंगद जैसा है
अड़ा जहाँ, कब डिगा लेखनी । 69


प्रस्तुत उनको ही करना है
जिन शब्दों में प्रभा लेखनी । 70


मुंसिफ के हाथों देखा है
अदालतों में छुरा लेखनी । 71


शान्तिदूत खुद को कहता है
मन में नफ़रत बसा लेखनी । 72


सबको पंगु बना बैठा है
ये पश्चिम का नशा लेखनी । 73


उसके साथ आज थाना है
जो चोरों का सगा लेखनी । 74


अनाचार बनकर बैठा है
ईमानों का सखा लेखनी । 75


सच जब भी शूली लटका है
‘भगत सिंह’-सा हँसा लेखनी । 76


मल्टीनेशन जाल बिछा है
जन कपोत-सा फँसा लेखनी । 77


घर-घर में पूजा जाता है
अब बिनलौनी मठा लेखनी । 78


नयी सभ्यता का पिंजरा है
इसमें खुश हर सुआ लेखनी । 79


जिसमें दम सबका घुटता है
भाती वो ही हवा लेखनी । 80


मृग जैसा मन भटक रहा है
ये पश्चिम की तृषा लेखनी । 81


पल्लू थाम गाँव पहुँचा है
महानगर का नशा लेखनी । 82


जिधर झूठ का भार रखा है
उधर झुकी है तुला लेखनी । 83


आज आस्था पर हमला है
मूल्य धर्म का गिरा लेखनी । 84


देव-देव सहमा-सहमा है
असुर लूटते मजा लेखनी । 85


अब रामों सँग सूपनखा है
त्यागी सबने सिया लेखनी । 86


आज कायरों कर गीता है
अजब देश में हवा लेखनी । 87


चीरहरण खुद कर डाला है
द्रौपदि अब बेहया लेखनी । 88


मनमेाहन गद्दी बैठा है
किन्तु कंस-सा लगा लेखनी । 89


जहाँ नाचती मर्यादा है
डिस्को का क्लब खुला लेखनी । 90


सबको लूट बना दाता है
जो मंचों पर दिखा लेखनी । 91


मानव जब मति से अंधा है
क्या कर लेगा दिया लेखनी । 92


हमने बगुलों को पूजा है
हंस उपेक्षित हुआ लेखनी । 93


छल का रूप साधु जैसा है
तिलक! चीमटा! जटा! लेखनी । 94


वह जो वैरागी दिखता है
माया की लालसा लेखनी । 95


नदी निकट बगुला बैठा है
रूप भगत का बना लेखनी । 96


जनहित में तेवर बदला है
चीख नहीं है वृथा लेखनी । 97


हर तेवर आक्रोश-भरा है
यह सिस्टम नित खला लेखनी । 98


इन तेवरियों से मिलता है
असंतोष का पता लेखनी । 99


तेवर-तेवर अब तीखा है
जन-जन की है व्यथा लेखनी । 100


मन ‘विरोध’ से भरा हुआ है
खल के प्रति अति घृणा लेखनी।101


पूछ न आज तेवरी क्या ?
बनी अग्नि की ऋचा लेखनी । 102
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001

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