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9 अगस्त 2026

यथार्थवादी कविता के रस-तत्त्व* +रमेशराज

यथार्थवादी कविता के रस-तत्त्व* 
+रमेशराज
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    काव्य के रसात्मक-विवेचन को लेकर आदि आचार्य भरतमुनि ने काव्य के लिये, जिस भाव-सत्ता को रस-निष्पत्ति के सूत्र में पिरोया था, वह भाव-सत्ता, रस-तत्त्वों के रूप में [ रति, शोक,हास, क्रोध, निर्वेद, वत्सल, भक्ति आदि स्थायी भावों के संचारी भावों सहित ] न पहले पूर्ण थी, न अब है। अतः भावों के रूप में रस-तत्त्वों की इस अपूर्ण तालिका के आधार पर ही काव्य की सम्पूर्ण रसात्मक सामग्री को परखा जाना अशास्त्रीय और कोरा कल्पनामय ही सिद्ध होगा। रीतिकालीन काव्योपरांत कविता ने जिस प्रकार अपनी वैचारिक प्रक्रिया को बदला है, उससे उसकी रस-प्रक्रिया भी परम्परागत रस-प्रक्रिया से काफी भिन्न हो गयी है। उसमें रस-तत्त्व के रूप में ऐसे अनेक भाव जुड़ गये हैं, जिनको पहचाने बिना वर्तमान यथार्थोन्मुखी कविता का रस-विवेचन नहीं किया जा सकता।
    वर्तमान कविता की स्थिति यह है कि एक तरफ जहां इसमें लोक या समाज की पीडि़त, शोषित, दलित, आतंकित, संत्रस्त, भयातुर अवस्था का अनुभव इसे शोक और करुणा से सराबोर किये रहता है, वहीं लोक या समाज को हानि पहुंचाने वाले वर्ग के प्रति इसकी भावात्मकता इसे ‘असंतोष’, ‘आक्रोश’, ‘विरोध’, ‘विद्रोह’ आदि से सिक्त रहती है।
अतः वर्तमान यथार्थोन्मुखी कविता को जिन रस-तत्त्वों के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है, वह परम्परागत रस तत्त्वों के साथ-साथ नये रस तत्त्वों के रूप में निम्न ठहरते हैं-
1.करुणा-
काव्य के संदर्भ में करुणा एक ऐसा रस-तत्त्व है, जिसका सम्बन्ध लोक या मानव की शोकाकुल दशाओं, भाव-भंगिमाओं के माध्यम से दर्शायी गयी दुःखानुभूति से होता है। इस दुःखानुभूति को एक कवि या रचनाकार उन अनुभवों से प्राप्त करता है जो लोक या जगत की पीड़ा, छटपटाहट, शोषण, यातना, त्रासदी, तनाव, क्षोभ, अश्रुपात आदि से जुड़े होते हैं। लेकिन यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह दुःखानुभूति को दुःखानुभूति के रूप में सुरक्षित नहीं रखना चाहता, अपितु उसे हर हालत में सुखात्मक बनाना चाहता है। कवि-कर्म में यह दुःखानुभूति ‘लोक-रक्षा के विचार’ से अभिसिक्त होकर प्रकट होती है। दुःखानुभूति में जुड़े ‘लोक-रक्षा’ के विचार से उत्पन्न भाव या तत्त्व का नाम ही ‘करुणा’ है। वर्तमान यथार्थोंन्मुखी कविता का करुणा एक ऐसा प्रधान रस-तत्त्व है, जिसका बीज-रूप अपनी विकास या गति की अवस्था में काव्य की हर प्रकार की रस-प्रक्रिया का अंग बनता चला जाता है। काव्य में आये अन्य प्रकार के रस-तत्त्व जैसे दया आदि भाव भी करुणा के इस बीज-रूप से किसी न किसी रूप में अपना सम्बन्ध बनाये रहते हैं। कुल मिलकार करुणा एक ऐसा बीज-भाव या प्रधान रसतत्त्व है, जिसका यदि दुःखानुभूति से सीधा-सीधा सम्बन्ध है तो लोक को पीड़ा-यातना देने वाले वर्ग के प्रति उभरे क्षोभ, असंतोष, आक्रोश, विरोध, विद्रोह आदि भावों के मूल में भी यही करुणा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से अपनी मुख्य भूमिका निभाती है।
    अतः वर्तमान यथार्थोंन्मुखी कविता की रस-प्रक्रिया को समझने के लिये शोषित वर्ग के प्रति, कवि के उन रागात्मक सम्बन्धों को समझना नितांत आवश्यक है जो परोक्ष-अपरोक्ष करुणा से सिक्त रहते हैं।
2. आक्रोश-
वर्तमान कविता में रसतत्त्व के रूप में ‘आक्रोश’ एक ऐसा भाव है, जो क्रूर-अमानवीय व्यवस्था के शिकार लोक या मानव की उस आन्तरिक दशा का परिचय देता है, जिसमें दलित या पीडि़त वर्ग, शोषक और आताताई वर्ग के प्रति घृणा, अनास्था, विरति आदि के लावे से भरा हुआ ज्वालामुखी बन जाता है। लेकिन यह लावा रौद्रता के रूप में उफन कर बाहर नहीं आता। दलित, पीडि़त वर्ग की इस प्रकार की भाव-दशा के अनुभाव उसकी सुर्ख आंखों, अनवरत चुप्पी, तमतमाते चेहरे, तनी हुई मुट्ठियों आदि के रूप में साफ-साफ अनुभव किये जा सकते हैं। डॉ. स्वर्ण किरण के अनुसार-‘आक्रोश वस्तुतः व्यक्ति की आन्तरिक घृणा का मूर्त्तरूप है’;1
    ‘‘हमारे साथ अन्याय हो रहा है, हम इस अन्याय को कब तक झेलते रहें? अब अन्यायी का खत्मा होना ही चाहिए’’ जैसे अनेक विचार अपनी ऊर्जस्व अवस्था में उक्त भाव का निर्माण करते हैं। कुल मिलाकर क्रोध से अलग, आक्रोश मानव की एक ऐसी भावत्मक दशा है, जिसमें क्रोध सिर्फ आन्तरिक अवस्था तक ही सीमित रहता है। रौद्रता के रस-परिपाक के रूप में यह दशा कभी भी परिलक्षित नहीं होती।
    वस्तुतः आक्रोश का रसात्मक-बोध ऐसे ‘विरोध’ को प्रकट करता है जिसका रस परिपाक ‘वचनों की कटुता, शत्रुपक्ष की निन्दा, भर्त्सना, कोसने का सतत् क्रम जैसे अनेक अनुभावों के माध्यम से अनुभूत किया जा सकता है।
सारांश रूप में हम कह सकते हैं कि ‘शत्रु के निरन्तर आघात, प्रहार झेलने के बावजूद, शत्रु को नष्ट न कर पाने की विवशता के विचार से उत्पन्न ऊर्जा का नाम ‘आक्रोश’ है।
3. विरोध-
पीड़ादायक, यातनामय हालात से जन्य ‘आक्रोश’ की वैचारिक प्रक्रिया जब त्रासद हालात से उबरने के लिए नयी दशा ग्रहण करती है तो इस वैचारिक प्रक्रिया के द्वारा एक नये रस-तत्त्व का निर्माण होता है जिसे ‘विरोध’ कहा जाता है। आक्रोश का उद्भव विवशता, भय, छटपटाहट आदि की स्थिति में होता है, जबकि ‘विरोध’ की वैचारिक प्रक्रिया में साहस नामक तत्त्व और जुड़ जाता है। या हम यह भी कह सकते हैं कि आक्रोश का आगे का चरण ‘विरोध’ है। मन इस विरोध की स्थिति में [लगातार आक्रोशित रहने के कारण] पीड़ा देने वाले वर्ग के प्रति साहस के साथ उसका मुकाबला करने के लिए तैयार होने लगता है। उक्त तथ्यों को ‘दर्शन बेजार’ की निम्न तेवरी के माध्यम से इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-
‘‘कह रहा हूं विवश हो ये तथ्य में
पल रही है वेदना आतिथ्य में।
जो विदूषक मंच पर हंसता रहा
सिसकियां भरता वही नेपथ्य में।
नर्तकी के पांव घायल हो रहे
देखता एय्याश कब यह नृत्य में।
सिर्फ समझौता नहीं है जि़दगी
एक जलती आग भी है सत्य में।
आदमी को अर्थ दे जीने के जो
लाइए तासीर ऐसी कथ्य में।’’
    उपरोक्त तेवरी में एक सामाजिक या आश्रय के रूप में कवि, आलम्बनगत उद्दीपन विभाव [सामाजिक विकृतियां, विसंगतियां] से उत्पन्न क्षोभ, शोकादि के माध्यम से जिन तथ्यों को उजागर करने के लिए विवश हुआ है, वह-विवशता उसके मन में उद्बुद्ध आक्रोश की परिचायक है, जिसमें साहस जैसा तत्त्व जुड़ जाने के कारण ‘विरोध’ का रस-परिपाक स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है।
    आश्रय के रूप में कवि जब एक विदूषक की मंच और नेपथ्य की जि़न्दगी के बीच एक त्रासदी अनुभव करता है तो उसे लगता है कि कहीं न कहीं ऐसा कुछ जरूर घट रहा है जिसमें आदमी को अपने भीतर एक संग्राम झेलते हुए भी मंच पर हंसने का नाटक करना पड़ रहा है। ठीक इसी तरह की स्थिति उस नर्तकी की भी है, जिसे किसी न किसी मजबूरी ने नृत्य करने पर विवश किया है। स्थिति यह है कि नृत्य के दौरान उसके पांव घायल हो चुके हैं, लेनिक नृत्य का आनंद भोगने वाले एय्याश को इतनी फुर्सत कहां कि नर्तकी के घायल होते हुए पांव देख सके। विदूषक और नर्तकी के प्रति करुणा-भरी दृष्टि रखने वाले कवि में, जीवन की विभिन्न स्तरों पर घटने वाली इस त्रासदी की अर्थमीमांसा यहां उसे मात्र आक्रोश से ही सिक्त नहीं कर रही है, बल्कि कवि के मन का यह आक्रोश उसे विवश जीवन के उन बिन्दुओं पर भी लाकर खड़ा कर रहा है, जिसमें जीवन का अर्थ मात्र एक समझौता या विवशता ही बनकर न रह जाए, बल्कि सत्य में जलती ऐसी आग भी हो जो असत्य को जला सके। इसके लिए जरूरी यह है कि कथ्य अर्थात कर्म में ऐसी तासीर लायी जाये, जो जीवन को त्रासदियों के दमघोंटू माहौल से उबार सके।
    आक्रोश से आगे की यह वैचारिक प्रक्रिया जिस विचार को ऊर्जस्व बनाती है, उसका उद्बोधन यहां भाव के रूप में ‘विरोध’ को ध्वनित करता है। विरोध की यह ऊर्जा ‘जो कुछ घट रहा है, गलत घट रहा है और ऐसा कुछ घटना नहीं चाहिए’ के रूप में कवि के मानसिक तंतुओं को उद्वेलित करती है और इसी कारण कवि जीवन को नये अर्थ देने के लिये कथ्य में सत्योन्मुखी तासीर लाने का आह्वान करता है।
    उक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि रस तत्त्व के रूप में ‘विरोध’ आश्रय को अपनी वैचारिक प्रक्रिया के दौरान जिस प्रकार ऊर्जस्व बनाता है, उसके माध्यम से गलत आचरणों के प्रति मात्र वह आक्रोशित ही नहीं रहता, बल्कि ‘हर गलत’ के प्रति जूझने या साहस दिखाने के लिए प्रेरित भी करता है।
4. असंतोष-
हम सब [सामाजिक प्राणी होने के नाते] एक दूसरे के प्रति कोई न कोई अपेक्षा रखते हुए जीते आ रहे हैं। जब कोई मनुष्य अपनी अपेक्षा के अनुकूल दूसरी मनुष्य को व्यवहार करता हुआ नहीं पाता है तो पहले मनुष्य में दूसरे मनुष्य के व्यवहार के प्रति ‘असंतोष’ का भाव जाग्रत हो जाता है। अपेक्षाओं के स्तर पर असंतोष की इस प्रक्रिया का स्वरूप हमें समाज के कई स्तरों पर दिखायी देता है। उद्योगपतियों से जिस प्रकार अच्छा या अधिक वेतन या अनेक सुविधाएं पाने की अपेक्षा मजदूर वर्ग रखता है, ठीक इसी प्रकार की अपेक्षाएं सरकार से सरकारी कर्मचारी रखते हैं। उद्योगपतियों या सरकार द्वारा उचित या अधिक वेतन न दिये जाने पर मजदूर या सरकारी कर्मचारियों की आये दिन होती हड़तालों, प्रदर्शनों में व्याप्त असंतोष को स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। ‘‘ जो कुछ हमें मिल रहा है या सुविधा के नाम पर प्राप्त हो रहा है, वह उचित और पर्याप्त नहीं है’’ जैसे अनेक विचारों से निर्मित होने वाला असंतोष आज की कविता में महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण किये हुए है। इस असंतोष की स्थिति आक्रोश से निम्न संदर्भों में भिन्न है-
[क] आक्रोश की स्थिति में आश्रयों के मन के भीतर विवशता, भय और दुःख का समावेश हर स्थिति में रहता है जबकि असंतोष रसपरिपाक तक जब पहुंचता है तो उससे भय की सत्ता समाप्त हो जाती है।
[ख] आक्रोश में कटुवचनों का प्रयोग, शत्रुपक्ष की निन्दा, भर्त्सना या शाप देने, कोसने आदि की क्रिया विवशता, असहायता, निरुपायता तक ही सीमित रह जाती है, जबकि असंतोष में विवशता या असहायता मन को जब उद्वेलित या अशांत बनाती है तो शत्रुपक्ष के प्रति हर प्रकार का संघर्ष, चुनौती और साहस में तब्दील हो जाता है।
[ग] आक्रोश और असंतोष की रस-परिपाक सम्बन्धी अवस्था ऊपरी तौर पर एक जैसी भले ही लगें, किन्तु यदि हम सूक्ष्मता के साथ विवेचन करें तो रस-परिपाक तक पहुंचते-पहुंचते ‘असंतोष’ अवज्ञा ललकार, चुनौती में अनुभावित होता है तथा ‘विद्रोह’ का उद्बोधन कराता है, जबकि आक्रोश की स्थिति अवज्ञा, ललकार, चुनौती तक पहुंचने के लिये ‘विरोध’ के रूप में सांकेतिकता में ऊर्जस्व होती है। अर्थ यह कि आक्रोश का रस-पारिपाक  शत्रुपक्ष या कुव्यवस्था से टकराने, जूझने का जहां एक दिशा-संकेत-भर होता है, वहीं ‘असंतोष’ का रस पारिपाक जूझने, टकराने, चुनौती देने, ललकारने जैसी अनेक क्रियाओं का अनुभावन बन जाता है।
रसतत्त्व के रूप में ‘असंतोष’ को श्री योगेन्द्र शर्मा की तेवरी के माध्यम से इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-
सर पै बस आकाश की ही छत मिली
जि़न्दगी को इस तरह राहत मिली।
एक सुविधा इस तरह से दी गयी
हर किसी की भावना आहत मिली।
    ‘असंतोष’ के संदर्भ में यदि हम उक्त पंक्तियों का विवेचन करें तो कवि ने यहां आम आदमी की उस जि़न्दगी का जिक्र किया है जिसे आवास के नाम पर कुछ भी नहीं दिया गया है। वह आज भी फुटपाथों पर खुले आकाश के नीचे जाड़ा-पाला, ओला, वर्षा, धूपादि की मार सहते हुए जी रहा है। इसी कारण इस कथित या महज क़ाग़जों पर दी गयी सुविधा ने उसकी भावनाओं को असंतोष से भर डाला है। भावना को ‘आहत’ बताकर दर्शाया गया यह असंतोष कोयले की खानों के बीच कोयला होते मजदूरों को यदि क्रान्ति के लिए प्रेरित कर उठे तो क्या आश्चर्य-
‘कोयल-सी जिन्दगी अब तक जिये हैं
खान के मजदूर जैसे हम रहे हैं।
जब कभी भी क्रान्ति बोयी है समय ने
तिलमिलाते-सोच के पौधे उगे हैं। [गजेन्द्र बेबस]
    तात्पर्य यह कि असंतोष एक ऐसा रसतत्त्व है, जो अपनी ऊर्जस्व अवस्था में मन को इतना उग्र बना डालता है कि लोक या मानव क्रान्ति के लिये विद्रोह से सिक्त होने लगता है।
विद्रोह-
सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक व्यवस्था के समीकरण जब लोक या जगत में असफल या असन्तुलित होने लगते हैं, मनुष्य के अथक प्रयास, संघर्ष आदि के उपरांत भी जब कोई वांछित या अपेक्षित हल नहीं निकल पाता तो असंतुलित समीकरणों से जूझते सामाजिक प्राणी अपने भीतर पनपी असंतोष और अशान्ति की अवस्था को समाप्त करने के लिये [उस हर प्रकार की व्यवस्था, जो उन्हें तोष प्रदान नहीं कर पाती] में परिवर्तन या बदलाव तीव्र इच्छा रखने लगते हैं। परिवर्तन की यह तीव्र इच्छा अपनी विभिन्न प्रकार की वैचारिक प्रक्रियाओं से गुजरते हुए, सिर्फ इस निर्णय की प्रक्रिया बनकर रह जाती है कि ‘अब सीधी अंगुली से घी नहीं निकलने वाला, अर्थात् इस व्यवस्था को बदलने के लिये इसके व्यवस्थापकों से टकराने, युद्ध करने, उनके आदेशों की अवज्ञा करने के अलावा कोई चारा नहीं।’’
    परिवर्तन की तीव्र इच्छा रखने वाली यह वैचारिक प्रक्रिया अपनी उर्जस्व अवस्था में ‘विद्रोह’ नाम से जानी जाती है। व्रिदोह का यह वैचारिक स्वरूप जितना तर्कसंगत, मानवसापेक्ष और लोकहितकारी होगा, उतना ही सत्य शिव और सौन्दर्य की वास्तविक स्थापना के निकट होगा। मार्क्सवादी विचारधारा के तहत रूस में हुआ सशस्त्र विद्रोह, जिसे क्रान्ति के नाम से जाना गया, निस्संदेह मानव मूल्यों की स्थापना पर आधारित था। ठीक इसी प्रकार का विद्रोह सरदार भगतसिंह, चन्द्रशेखर, सूर्यसेन, अशफाक आदि ने अंग्रेजों की आताताई व्यवस्था के विरुद्ध किया था, जिसके मूल में अंग्रेजों की कथित लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति भारतीय जनता का वह असंतोष था, जो विद्रोह के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकार की क्रिया, प्रक्रिया से हल या समाप्त नहीं हो सकता था। लेकिन हमारे राष्ट्र का दुर्भाग्य, क्रान्तिकारियों के सपने साकार न हो सके। आजादी के नाम पर यहां के तस्करों, सेठों, चोर, उचक्कों को आजादी मिली। परिणाम सामने है, जिस प्रकार असंतोष भारतीय जनता में अंग्रेजों की साम्राज्यवादी व्यवस्था के प्रति था, ठीक उसी प्रकार का असंतोष इस वर्तमान व्यवस्था के प्रति जन समुदाय में परिलक्षित होने लगा है। अन्ना हजारे की व्यवस्था को बदलने की मुहिम असंतोष का वर्तमान में सटीक उदाहरण माना जा सकता है।
    साहित्य चूकि समाज का दर्पण होता है, इसलिये आज की कविता वर्तमान व्यवस्था के प्रति असंतोष से सिक्त होने के कारण विद्रोह का स्वर मुखरित कर रही है। तेवरी चूंकि जन मूल्यों, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था रखने वाली काव्य की विधा है, अतः वर्तमान व्यवस्था के प्रति इसका रसात्मकबोध विद्रोह से सिक्त न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। श्री अनिल कुमार ‘अनल’ अपनी एक तेवरी में विद्रोह का परिचय इस प्रकार देते हैं-
देश भर में अब महाभारत लिखो
आदमी को क्रान्ति के कुछ खत लिखो।
बाग में अब चहचहाहट है नहीं
हर परिन्दा है यहां आहत लिखो।
होने लगा आक्रोश लोगों में युवा
बाजुओं में आ गयी ताकत लिखो।
एक पगड़ी-सा उछाला है जिसे
अब नहीं जायेगी वह इज्जत लिखो।
खेलना अंगार से हर दौर में
है हमारी आज भी आदत लिखो।
    तेवरी के संदर्भ में रसतत्त्वों की यह खोज मात्र करुणा, आक्रोश, विद्रोह, असंतोष और विद्रोह तक ही सीमित नहीं रह जाती, इसके अतिरिक्त भी ऐसे अनेक रसतत्त्व तेवरी में उपस्थित होते हैं, जो इस विधा को उर्जस्व बनाये रखने में अपना सहयोग देते हैं, लेकिन इन सहयोगी रसतत्त्वों की व्यापकता में न जाते हुए हम सिर्फ इतना ही कहना चाहेंगे कि जिन तत्त्वों की विवेचना हमने इस आलेख में की है, यह रस तत्त्व वर्तमान कविता या तेवरी के प्रधान रसतत्त्व हैं, जिन्हें पहचाने बिना आधुनिक कविता के रसात्मकबोध को नहीं समझा जा सकता।
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+रमेशराज गुप्त 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001

16 नवंबर 2022

महिला शक्ति: (लेखिका-श्रीमती अक्की वर्मा)

                  (श्रीमती अक्की वर्म्मण:लेखन्या:)

प्राचीनयुगात् अस्माकं समाजे स्त्रीणां विशिष्टं स्थानं वर्तते। यथा ऋग्वैदिककालेषु लोपामुद्रा, घोषा, सिकता, आपला एवं विश्वास इति विदूषी स्त्रीणां वर्णनं विद्यते। अस्मासु पौराणिक ग्रंथेषु नार्ये उक्तं च- "यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता: " ताथापि व्यंगम् इदं दृश्यताम् नारीणां सशक्तिकरणस्य आवश्यकता अनुभूयते । स्त्रीयैव मानववर्गस्य अस्तित्वः भुता इति मन्यते। सरलशब्देषु महिला सशक्तिकरणं परिभाषितं कर्त्तु शक्यते। स्वजीवने निर्णय ग्रहणस्य या शक्ति नारीषु वर्तते, तस्याः शक्ते: बोधः उपयोगश्च एका नारी कुर्यात समाजे तस्याः वास्तविक अधिकारं प्राप्ताय सक्षमनिणार्यैव महिला सशक्तिकरण अस्ति।

17 मार्च 2022

होली का एक रोमांचक संस्मरण

 *संस्मरण*

होली पर शहीद ऊधम सिंह की तरह मैं भी फांसी पर लटक जाता

*रमेशराज

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अपने अलीगढ़ की जन्मस्थली गांव एसी में होली के अवसर पर शहीद ऊधम सिंह पर खुद ही रचकर एक नाटक का मंचन किया। 

घटना 1973 की है, तब मैं बी. ए. कर रहा था । नाटक का मंचन गांव के ही रामवीर ढुलकिया के चबूतरे पर हुआ था।

कविमित्र  महेशकुमार पाठक व डॉ दिनेश कुमार पाठक के पिताश्री ने सूत्रधार की भूमिका निभाई थी। अब वे इस संसार में नहीं हैं, उन्हें नमन। मैंने शहीद ऊधम सिंह की भूमिका निभाई।महेश को क्या भूमिका मिली थी, याद नहीं आ रहा।

नाटक के अंतिम दृश्य को सजीव बनाने के लिये लोहे की गिररी पर रस्सी का फंदा बांधकर उसे एक बल्ली पर लटका दिया था। उसकी डोर गांव के चक्की वाले मुंशी जी के लड़के धर्मवीर के हाथ में थी। फांसी के दृश्य पर उस नासमझ ने रस्सी को थोड़ा खींचने के स्थान पर अधिक खींच दिया। परिणाम स्वरूप गिररी से लटकी रस्सी का फंदा इतना तन गया कि मैं जमीन से ऊपर हवा में लटक गया।

ईश्वर की कृपा इतनी रही कि जितनी तेजी से यह कार्य हुआ, उतनी ही फुर्ती से मैंने गले और रस्सी के बीच अपने हाथ फंसा लिए, फलस्वरूप रस्सी का सारा तनाव, खिंचाव मेरे हाथ झेल गए। गर्दन दवाब से मुक्त रही। अगर ऐसा न हुआ होता तो ऊधम सिंह की तरह फांसी मुझे भी लग जाती।

बचपन के मित्र महेश की याद बहुत आती है। हम दोनों की पूरे गांव में चर्चित और अमर जोड़ी थी। कोरोना के ग्रास के उपरांत मित्र की अब तो स्मृतियां ही शेष हैं।

20 फ़रवरी 2022

रमेशराज की वर्णिक छन्दों में तेवरियाँ

  *रति वर्णवृत्त में तेवरी* 

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खल हैं सखी

मल हैं सखी।


जन से करें

छल हैं सखी।


सब विष-भरे

फल हैं सखी।


सुख के कहाँ

पल हैं सखी।


नयना हुए

नल हैं सखी।

*रमेशराज



*विमोहा वर्णिक छंद में तेवरी

***********

आन को रोइए

मान को रोइए।


बारहा खो रही

शान को रोइए।


कौन दे रोटियां

दान को रोइए।


पीर को जो सुने

कान को रोइए।


चीख़ ही चीख़ हैं

गान को रोइए।

*रमेशराज



*विमोहा वर्णिक छंद में तेवरी

**********

आज ये हाल हैं

जाल ही जाल हैं।


लापता है नदी

सूखते ताल हैं।


सन्त हैं नाम के

खींचते खाल हैं।


क्या गली क्या मकां

खून से लाल हैं।


गर्दनों पे छुरी

थाप को गाल हैं।

*रमेशराज



*तेवरी ( राजभा राजभा )

**********

आपदा शारदे

ले बचा शारदे!


घोंटती है गला

ये हवा शारदे!


मातमी मातमी

है फ़िजा शारदे!


खत्म हो खत्म हो

ये निशा शारदे!


डाल पे गा उठे

कोकिला शारदे।

* रमेशराज



* रति वर्णवृत्त में रमेशराज की एक तेवरी

*******

हम हीन हैं

अति दीन हैं।


सब बस्तियां 

ग़मगीन हैं।


उत जाल-से

जित मीन हैं।


चुप बाँसुरी

गुम बीन हैं।


दुःख से भरे

अब सीन हैं।

*रमेशराज



*विमोहा वर्णवर्त्त में तेवरी

**********

ज़िन्दगी लापता

रोशनी लापता।


फूल जैसी दिखे

वो खुशी लापता।


होंठ नाशाद हैं

बाँसुरी लापता।


लोग हैवान-से

आदमी लापता।


प्यार की मानिए

है नदी लापता।

*रमेशराज



*रति वर्णवृत्त में तेवरी* 

**********

खल हैं सखी

मल हैं सखी।


जन से करें

छल हैं सखी।


सब विष-भरे

फल हैं सखी।


सुख के कहाँ

पल हैं सखी।


नयना दिखें

नल हैं सखी।

*रमेशराज



*।।तेवरी।।तिलका वर्णिक छंद ।।सलगा सलगा।।

**********

हर बार मिले

बस प्यार मिले।


बढ़ते दुःख का

उपचार मिले।


नित फूल खिलें

जित खार मिले।


मन के मरु को 

जलधार मिले।

*रमेशराज



*विमोहा वर्णिक छंद में तेवरी ।।राजभा राजभा।।

**********

प्रेम की थाह में

आदमी डाह में।


रोशनी लापता

तीरगी राह में।


जो रहे वाह में

आज हैं आह में।


प्रेम की ये दशा

देह है चाह में।


क्या मिला सोचिए

आपको दाह में।

*रमेशराज



*।। तेवरी।। विमोहा वर्णिक छंद..राजभा राजभा

**************

आग ही आग है

बेसुरा राग है।


बस्तियां राख हैं

गाइये फ़ाग है।


खो गये हैं गुणा

भाग ही भाग है।


आह का डाह का

दंशता नाग है।


है खिजां ही खिजां

सूखता बाग है।

*रमेशराज



*।। तेवरी।। विमोहा वर्णिक छंद..राजभा राजभा

**************

आग ही आग है

बेसुरा राग है।


बस्तियां राख हैं

गाइये फ़ाग है।


खो गये हैं गुणा

भाग ही भाग है।


आह का डाह का

दंशता नाग है।


है खिजां ही खिजां

सूखता बाग है।

*रमेशराज



*तेवरी।।तिलका वर्णिक छंद।।सलगा सलगा

**********

बचना ग़म से

इस मातम से।


यह दौर बुरा 

सब हैं यम-से।


अब तो रहते

नयना नम-से।


अब लोग दिखें

जग में बम-से।


हम 'गौतम' हैं

मिलना हम से।

*रमेशराज



*तेवरी ।। राजभा राजभा।।

********************

आप तो आप हैं

बॉस हैं, बाप हैं।


आप हैं तो यहाँ

पाप ही पाप हैं।


आप है बर्फ़-से

आप ही भाप हैं।


मौत के मातमी

आपसे जाप हैं।


वक़्त के गाल पे

आप ही थाप हैं।

*रमेशराज



*तेवरी ।। राजभा राजभा।।

********************

आप तो आप हैं

बॉस हैं, बाप हैं।


आप हैं तो यहाँ

पाप ही पाप हैं।


आप है बर्फ़-से

आप ही भाप हैं।


मौत के मातमी

आपसे जाप हैं।


वक़्त के गाल पे

आप ही थाप हैं।

*रमेशराज



*तिलका वर्णिक छंद में तेवरी*।सलगा सलगा।

**********

मुसकान गयी

मधुतान गयी।


अब बेघर हैं

हर शान गयी।


इतने बदले

पहचान गयी।


दुःख ही दुःख हैं

सुख-खान गयी।


तम से लड़ते

अब जान गयी।

*रमेशराज*



**तेवरी*

आप महान

सुनो श्रीमान।


पहले लूट

करो फिर दान।


माईबाप

आपसे प्रान।


आप पहाड़

गए हम जान।


गर्दभ-राग

आपकी शान।


नेता-रूप!!

धन्य भगवान।

*रमेशराज

*********

सम्पर्क-15/109, ईसानगर, अलीगढ़-उत्तर प्रदेश





10 नवंबर 2021

रमेशराज की 11 तेवरियाँ

  रमेशराज की 11 तेवरियाँ

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1.

दोनों ही कान्हा के प्रिय हैं

मीरा हो या रसखान। नादान।।


जो निर्बल का बल बनता है

उसके वश में भगवान। नादान।।


तुझको विश्वास मुखौटों पे

सच्चाई कुछ तो जान। नादान।।


ये सम्प्रदाय का चक्कर है

तू धर्म इसे मत मान। नादान।।


पर्दे के पीछे प्रेत यही

इन देवों को पहचान। नादान।।


जो चुगलखोर है, बच उससे

रख यूँ मत कच्चे कान। नादान।।


तू द्वैत जान, अद्वैत समझ

व्रत का मतलब रमजान। नादान।।

*रमेशराज*


2.

*********

सुलझाने बैठें क्या गुत्थी

जब इसका ओर न छोर। हर ओर।।


करनी थी जिन्हें लोकरक्षा

बन बैठे आदमखोर।हर ओर।।


सड़कों पे पउआबाज़ दिखें

लम्पट-गुण्डों का शोर।हर ओर।।


सद्भावों की नदियां सूखीं

अब ग़ायब हुई हिलोर।हर ओर।।


कोयल की कूक मिले गुमसुम

नित नाचें आज न मोर।हर ओर।।

*रमेशराज*


3.

**********

छल का बल का ये दौर मगर

तू अपने नेक उसूल। मत भूल।।


वह मुस्कानों से ठग लेगा

उसके हाथों में फूल। मत भूल।।


ये जंगल ही कुछ ऐसा है

मिलने हैं अभी बबूल। मत भूल।।


कोशिश कर उलझन सुलझेगी

मिल सकता कोई टूल। मत भूल।।


करले संघर्ष, जीत निश्चित

बदले सब कुछ आमूल। मत भूल।।

*रमेशराज*


4.

*तेवरी*

**********

जो सच की खातिर ज़िन्दा है

उसका ही काम तमाम। हे राम!!


खुशियों पर नज़र जिधर डालें

हर सू है क़त्लेआम। हे राम!!


जो रखता चाह उजालों की

उसके हिस्से में शाम। हे राम!!


जिनको प्यारी थी आज़ादी

बन बैठे सभी ग़ुलाम। हे राम!!


कोई छलिया, कोई डाकू

अब किसको करें प्रणाम।हे राम!!

*रमेशराज*


5.

**********

दोनों ही कान्हा के प्रिय हैं

मीरा हो या रसखान। नादान।।


जो निर्बल का बल बनता है

उसके वश में भगवान। नादान।।


तुझको विश्वास मुखौटों पे

सच्चाई कुछ तो जान। नादान।।


ये सम्प्रदाय का चक्कर है

तू धर्म इसे मत मान। नादान।।


पर्दे के पीछे प्रेत यही

इन देवों को पहचान। नादान।।


जो चुगलखोर है, बच उससे

रख यूँ मत कच्चे कान। नादान।।


तू द्वैत जान, अद्वैत समझ

व्रत का मतलब रमजान। नादान।।

*रमेशराज*


6.

**********

बाक़ी तो साफ़-सफ़ाई है

बस पड़ी हुई है पीक।सब ठीक।।


घबरा मत नाव न डूबेगी

बस छेद हुआ बारीक।सब ठीक।।


जीना है इन्हीं हादसों में

तू मार न ऐसे कीक।सब ठीक।।


दीखेगा साँप न तुझे कभी

बस पीटे जा तू लीक।सब ठीक।।


उसपे तेरी हर उलझन का

उत्तर है यही सटीक।सब ठीक।।

*रमेशराज*


7.

*********

अबला की लाज लूटने को

रहते हैं सदा अधीर। हम वीर।।


बलशाली को नित शीश झुका

निर्बल पे साधें तीर। हम वीर।।


उस मल को निर्मल सिद्ध करें

जिस दल की खाते खीर। हम वीर।।


हम से ही ज़िन्दा भीड़तंत्र

सज्जन को देते पीर। हम वीर।।


गरियाने को कविता मानें

हैं ऐसे ग़ालिब-मीर। हम वीर।।


जिस बस्ती में सद्भाव दिखे

झट उसको डालें चीर। हम वीर।।


तुम ठाठ-बाट पे मत जाओ

अपना है नाम फ़कीर। हम वीर।।

*रमेशराज*


8.

**********

तब ही क़िस्मत तेरी बदले

जब रहे हौसला संग। लड़ जंग।।


आनन्द छंद मकरंद लुटे

 सब दीख रहा है भंग। लड़ जंग।।


कुछ तो सचेत हो जा प्यारे

वर्ना जीवन बदरंग। लड़ जंग।।


रणकौशल को मत भूल अरे

इतना भी नहीं अपंग। लड़ जंग।।


फिर तोड़ भगीरथ हर पत्थर

तुझको लानी है गंग। लड़ जंग।।

*रमेशराज*


9.

*तेवरी*

*********

जिसमें दिखती हो स्पर्धा

अच्छी है ऐसी होड़। मत छोड़।।


नफ़रत के बदले प्रेम बढ़ा

बिखरे रिश्तों को जोड़। मत छोड़।।


गद्दार वतन में जितने हैं

नीबू-सा उन्हें निचोड़। मत छोड़।।


अति कर बैठे हैं व्यभिचारी

हर घड़ा पाप का फोड़।मत छोड़।।


चलना है नंगे पांव तुझे

जितने काँटे हैं तोड़।मत छोड़।।


वर्ना ये कष्ट बहुत देगा

पापी की बाँह मरोड़।मत छोड़।।

*रमेशराज*


10.


*तेवरी*

**********

कल तेरी जीत सुनिश्चित है

रहना होगा तैयार। मत हार।।


माना तूफ़ां में नाव फँसी

नदिया करनी है पार।मत हार।


इस तीखेपन को क़ायम रख

हारेगा हर गद्दार। मत हार।।


पापी के सम्मुख इतना कर

रख आँखों में अंगार। मत हार।।


तू ईसा है-गुरु नानक है

तू सच का है अवतार। मत हार।।


होता है अक्सर होता है

जीवन का मतलब ख़ार। मत हार।।


साहस को थोड़ा ज़िन्दा रख

पैने कर ले औजार। मत हार।।


दीपक-सा जलकर देख ज़रा

ये भागेगा अँधियार। मत हार।।

*रमेशराज*


11.

*********

तूफ़ां के आगे फिर तूफ़ां

ये नाव न जानी पार। इसबार।।


जीते ठग चोर जेबकतरे

हम गए बाजियां हार।इसबार।।


हर तीर वक्ष पर सहने को

रहना होगा तैयार।इसबार।।


उसका निज़ाम है चीखो मत

वर्ना पड़नी है मार।इसबार।।


ये खत्म नहीं होगी पीड़ा

कर चाहे जो उपचार।इसबार।।


मिलने तुझको अब तो तय है

फूलों के बदले खार।इसबार।


तूने सरपंच बनाये जो

निकले सारे गद्दार।इसबार।।


परिवर्तन वाले सोचों की

पैनी कर प्यारे धार। इसबार।।

*रमेशराज*

9 जनवरी 2021

टेलीग्राम पर हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिये गूंज शब्दों की....समुह का शुभ-आरंभ......

आज मुझे लगता है कि साहित्य पढ़ने व साहित्य को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिये सोशल मिडिया पर सबसे अच्छा माध्यम टेलिग्राम है। इसी लिये मैंने साहित्य प्रेमियों के लिये गूंज शब्दों की नाम से एक ग्रुप बनाया है। आप अभी इस चैनल को सबसक्राइब करके इस समुह को अपना सहियोग दें। गूंज शब्दों की  समुह पर आप का स्वागत व अभिनंदन है।   इस समुह  परहिन्दी साहित्य के प्रमुख रचनाकार एव कवियो कि अनमोल कृतियों को   संकलन करने का प्रयास किया जा रहा  है साथ ही हिंदी के पाठकों के लिये सर्वोतम साहित्य उपलब्ध कराना भी इस चैनल का उदेश्य है। https://t.me/goonjshabdonki

25 सितंबर 2020

उड़ान ...श्वेता सिन्हा

चलो बाँध स्वप्नों की गठरी
रात का हम अवसान करें
नन्हें पंख पसार के नभ में
फिर से एक नई उड़ान भरें

बूँद-बूँद को जोड़े बादल
धरा की प्यास बुझाता है
बंजर आस हरी हो जाये
सूखे बिचड़ों में जान भरें

काट के बंधन पिंजरों के
पलट कटोरे स्वर्ण भरे
उन्मुक्त गगन में छा जाये
कलरव कानन में गान भरें

चोंच में मोती भरे सजाये
अंबर के विस्तृत आँगन में
ध्रुवतारा हम भी बन जाये
मनु जीवन में सम्मान भरें

जीवन की निष्ठुरता से लड़
ऋतुओं की मनमानी से टूटे
चलो बटोरकर तिनकों को
फिर से एक नई उड़ान भरें

-श्वेता सिन्हा

24 अगस्त 2020

Bhai Chara / भाईचारा / Brother Hood

Bhai-Chara-Brother-Hood

Bhai Chara / भाईचारा / Brother Hood


Bhai Chara / भाईचारा / Brother Hood


क्या गजब है देशप्रेम,
क्या स्वर्णिम इतिहास हमारा है|
अजब-गजब कि मिलती मिसालें,
क्या अद्भुत भाईचारा है||

जब भी दुश्मन आता सरहद पर,
हमें देशप्रेम बुलाता है|
माँ भारती कि आन-बान को,
हर भारतवासी मर-मिट जाता है||

जब सैनिक भारत माँ कि रक्षा को,
सीने पर गोली खाता है|
हर भारतवासी के सीने को,
वो लहूलुहान कर जाता है||

जब जब आई है विपदा हम पर,
हम कंधे से कंधा मिलाते है|
हम भारत माँ और उन वीर सपूतो के,
वंदन को शीश झुकाते है||

वीर सपूतो के बलिदानों पर,
हर भारत वासी हारा है|
हम माँ भारती कि संताने है,
और हिंदुस्तान हमारा है||

क्या अद्भुत भाईचारा है||



ऋषभ शुक्ला

Hindi Kavita Manch / हिंदी कविता मंच

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28 अप्रैल 2020

Youtube पर गूंज शब्दों की चैनल का शुभारंभ।



आप सभी को बताते हुए  हर्ष हो रहा है कि दिनांक 30 अपरैल 2020 से Youtube पर   गूंज शब्दों की   चैनल का शुभारंभ हो रहा है।   इस चैनल पर  हिन्दी साहित्य के प्रमुख रचनाकार एव कवियो कि अनमोल कृतियों को उनकी आवाज के साथ   संकलन करने का प्रयास किया जा रहा  है
अगर आप भी अपनी रचना को इस चैनल का हिस्सा बनाना चाहते हैं  तो आप  अपनी  रचना का विडिओ संक्षिप्त भूमिका के साथ निम्न ईमेल
goonjshabdonki@gmail.com
 पर भेजें। रचना Google Drive अथुवा अन्य किसी शेयरिंग माध्यम पर अपलोड करके भी भेजी जा सकती है।
1 रचना के लिये किसी प्रकार का शुल्क नहीं दिया जाएगा। इसका एकमात्र उदेश्य हिंदी का प्रचार प्रसार तथा हिंदी प्रेमियों को ध्वनीांकित तथा विडिओ सामग्री उपलब्ध कराना है।
2 इस चैनल पर साहित्य की सभी विधाओं कहानी कविता लेख आदि का स्वागत है। साथ ही किसी रचनाकार द्वारा पूर्व में  कवि गोष्ठियों   अथुवा संमेलन में दी गयी प्रस्तुति भी भेजी जा सकती है। ध्यान रहे कि जो प्रस्तुति  आप भेज रहे हैं, संबंधित गोष्ठियों व संमेलनोंके  आयोजकों को उस प्रस्तुति  को हमारे चैनल पर अपलोड किये जाने पर  किसी प्रकार की आपत्ती न हो। साथ ही वो  रचना Youtube पर पहले से   न हो।
3 रचना के विडिओ व औडिओ की गुणवता पर विशेष ध्यान दें। रचना आप के नाम के साथ ही पोस्ट की जाएगी। 
4 आप चाहें तो हिंदी के पुराने रचनाकारों की रचनाओं को भी अपनी आवाज में विडिओ रिकार्डिंग करके हमे भेज सकते हैं।
 हमे पूरा विश्वास है कि आप इस चैनल के लिये अधिक से अधिक रचनाएं भेजकर हमे सहियोग देंगे।
अधिक जानकारी के लिये निम्न ईमेल पर संपर्क करें।
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